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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस

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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।
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मई 19, 2011

Cabinet approves caste and BPL census / देश में जाति आधारित जनगणना को मंत्रिमंडल ने दी हरी झंडी




केंद्र सरकार ने जाति, धर्म और आर्थिक स्थिति के आधार पर जनगणना के प्रस्ताव को आज गुरुवार 19मई2011 को हरी झंडी दे दी। आजादी के बाद पहली बार ऐसी जनगणना होने जा रही है । इससे गरीबी रेखा के नीचे तथा उसके ऊपर जीवनयापन कर रहे लोगों और उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि के बारे में सही जानकारी मिल सकेगी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में इसे मंजूरी दी गई।
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, जनगणना के लिए सर्वेक्षण जल्द ही शुरू हो जाने की उम्मीद है। जाति तथा धर्म के बारे में जानकारी से इस बात के मूल्यांकन में मदद मिलेगी कि सामाजिक तथा धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण देश के बहुत से नागरिकों के लिए आर्थिक अवसर कहां तक सीमित होते हैं।
जनगणना करने वाले कर्मचारी लोगों के बीच धर्म और जाति से संबंधित प्रश्नावली बांटेंगे । लोगों को सिर्फ दो सवालों के जवाब देने होंगे कि उनकी जाति क्या है और उनका धर्म क्या है? लेकिन गरीबी रेखा के संबंधित सवाल पर कई प्रश्न पूछे जाएंगे, जैसे- परिवार के सदस्यों की संख्या, रोजाना की आय तथा खर्च।
गरीबी से संबंधित जनगणना इससे पहले 2002 में कराई गई थी, लेकिन जाति और धर्म को जनगणना में पहली बार शामिल किया जा रहा है। यह गणना जून से शुरु हो कर दिसम्बर 2011 तक पूरी की जायेगी ।


Approvel of caste and BPL census is wrong step of Cabinet 
देश में जाति आधारित जनगणना , मंत्रिमंडल का गलत कदम , देश नुकसान उठाएगा ! 

भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश में जाति, धर्म और आर्थिक स्थिति के आधार पर जनगणना कराना आत्मघाती कदम है , समय इसे प्रमाणित करेगा । यह एक ओर जहाँ राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित है तो वहीं दूसरी ओर नेताओं के मानसिक दिवालियेपन परिचायक है ।
विकास एक बहाना है । अब तक इस देश मे किसी भी योजना का ठीक-ठीक क्रियान्वयन नहीं हो सका है , कदम कदम पर केवल बदनियति ही झलकती दिखी है , इस गणना के बाद नया क्या और किनके सहारे कर लेगी कोई भी सरकार ? प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी इस देश की दुर्दशा और यहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त दिखता है , वह अपने एक मंत्री को नहीं  सम्हाल पाता है तो लाखों अधिकारियों - कर्मियों की क्या गारंटी ?इस गणना के परिणाम स्वरूप देश में वर्ग संघर्ष बढ़ेगा , राजनेता इसका लाभ लेते दिखेंगे ।
अराजकता और आतंक बढ़ेगा , सरकार पंगु साबित होगी ।देश , आजादी के 65 वर्षों बाद भी आज तक हिन्दु - मुसलमान के झगड़े से तो उबर नहीं पा रहा है , नये नये और झगड़ों की शुरूआत होगी ।देश का दुर्भाग्य ही है कि जब समूचा संसार जाति और धर्म से ऊपर उठ कर विकास के नित्य नये सोपान गढ़ रहा है तभी हम जिसे जाति - धर्म का कड़वा अनुभव भी है , उससे उबरना छोड़ इसकी खाई और गहरी करने चले हैं । यहाँ यह कहना कतई भी गलत नहीं होगा कि यह केन्द्र सरकार की सोची-समझी और ऐतिहासिक भूल साबित होगी । देश विरोध करने की ताकत नहीं रखता तो तैयार रहे भुगतने को । अंग्रेजों ने भारत में सन 1931 में कराई थी ऐसी ही जनगणना और नतीजा भारत - पाकिस्तान के रूप में समूचे विश्व के सामने है ।
जाति आधारित जनगणना का विरोध महात्मा गांधी सहित पंडित जवाहर लाल नेहरू , सरदार वल्लभ भाई पटेल यहाँ तक कि डॉ भीमराव अम्बेडर ने भी किया था । इतिहास और संसदीय दस्तावेज आज भी इस बात के साक्ष्य हैं कि - इनके समकालीन तमाम दिग्ग्ज कांग्रेसी और गैर कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया था । लेकिन दुर्भाग्य देखिए देश का कि उन्हीं के अनुयायी अब जब अपनी तमाम गलत नीतियों की वजह से राजनीति में चंहुओर पिटने लगे हैं तब उन्होंने फ़िर एक बार एक देश का बेड़ा गर्क करने वाला आत्मघाती हथकंडा अपनाया है । इसका विरोध राजनीति से ऊपर उठ कर जन-जन को करना चाहिए ।

मई 10, 2011

पेंशन की खातिर एक वृद्ध सब इंजीनियर ने कलेक्टोरेट अधीक्षक को मारा चाकू

सामने दिख रहे हैं रिटायर्ड सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ,पीछे सफ़ेद पैंट और
 ब्लू लाईनिंग शर्ट पहने हुए हैं जिला अधीक्षक जिन पर हमला हुआ । 
यह चित्र धटना के बाद का है ।



राजधानी रायपुर में पिछले चार वर्षों से अपनी पेंशन पाने के लिए भटक रहे एक वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने कलेक्टोरेट अधीक्षक पर चाकू से हमला बोल दिया । अपनी पेंशन पाने सरकारी दफ़्तरों के चार साल से चक्कर लगाते - लगाते हताश हो चले इस वृद्ध के सब्र का बांध टूट गया और  मानो मरने - मारने पर आमदा हो गया वह थक हार कर । 09 मई 2011 की दोपहर इस वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने चाकू से जिला कलेक्ट्रेट में पदस्थ अधीक्षक जे आर साहू के गाल पर चाकू से वार किया और तभी मौके पर मौजूद जिला प्रशासन अन्य कर्मियों ने फ़ौरी तौर पर उसे पकड़ पुलिस के हवाले कर दिया । इतनी ही फ़ूर्ती यदि उसके पेंशन प्रकरण में निबटारे के लिए दिखाई गई होती तो शायद ऐसे वाकिए ही न होते । फ़िर क्या था सामने आया देश का कानून जिसने परेशान उस वृद्ध को सजा देने अपना लम्बा हाँथ आगे बढ़ाया ,  मगर यही कानून उसे उसके हक की पेंशन न दिला पाया ।
 हताशा की यह छूरी चलाई है 36 साल जल संसाधन विभाग में कार्यरत रहे सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने , जिन्हें विभाग से रिटायर हुए वर्षों हो चुकने के बाद भी आज तक पेंशन तक नसीब नहीं हो पाई है । जी पी एफ़ विभाग ने फ़ंसा रखी है इस व्यक्ति की पेंशन की फ़ाईल और घुमाता रहा जिला कार्यालय इसे ।
नियम है कि रिटायरमेंट के बाद अगले ही महिने से मिलने लगती है पेंशन और यदि किन्हीं कारणों से देर हो रही हो तो पेंशन की यह राशि उस व्यक्ति को एरियर्स के रूप में तुरंत मिलने लगती है । खेद जनक पहलू यह कि यहाँ उस वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह को ऐसी कोई सुविधा नहीं मिल पाई , सिवाय प्रताड़ना और दफ़्तरों के चक्कर पर चक्कर लगाने के , वह अपने तमाम दस्तावेजों से भरा भारी भरकम (करीब 20 - 25 किलो वजनी) बैग टांगे सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाता रहता और दोपहर लंच के समय कौफ़ी हाऊस पहुंच कर कभी दूध ब्रेड तो कभी चाय ब्रेड खा कर दोबारा उन्हीं दफ़्तरों के चक्कर काटने के लिए ताकत जुटाता दिखा ।
पेंशन और ग्रेच्युटी के लिए लगातार चार साल से चक्कर काट रहे सेवानिवृत्त सब इंजीनियर लोकेंद्र सिंह ने सोमवार को कलेक्टोरेट के अधीक्षक जतिराम साहू पर  जब चाकू से हमला कर दिया तब  हमले की खबर से कलेक्टोरेट परिसर में हड़कंप सा मच गया। कार्यालय के सभी अधिकारी और कर्मचारी तत्काल अधीक्षक कार्यालय के बाहर जमा हो गए। आनन-फानन में पुलिस को सूचना दी गई। गोलबाजार थाने की पुलिस पहुंचने के बाद घायल अधीक्षक को तत्काल डॉक्टरी मुलाहिजे के लिए आंबेडकर अस्पताल ले जाया गया। आरोपी को मौके पर ही चाकू के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

बालाघाट निवासी लोकेंद्र सिंह की माली हालत अच्छी नहीं बताई जाती है , वह  जलसंसाधन विभाग रायपुर में सब इंजीनियर के पद पर पदस्थ थे। वे चार साल पहले ही सेवानिवृत्त हो गए थे, लेकिन उनकी ग्रेच्युटी और पेंशन का भुगतान अब तक नहीं हो पाया था। जिसके लिए उन्हें बारबार बालाघाट से यहाँ रायपुर के चक्कर लगाने पड़ते हैं । तीन दिन पहले ही उन्होंने कलेक्टर से मुलाकात कर भुगतान करने के संबंध में आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई थी। कलेक्टर ने यह पत्र कार्यवाही के लिए कलेक्टोरेट अधीक्षक के पास भेज दिया। सोमवार को लोकेंद्र ने अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर अपने प्रकरण में आवश्यक कार्रवाई की मांग की। अधीक्षक श्री साहू ने उन्हें कुछ देर बैठने के लिए कहा। काफी समय तक अधीक्षक के बुलावे का इंतजार कर लोकेंद्र को देर तक नहीं बुलाया गया। इससे आक्रोशित होकर उन्होंने अपने पास रखे सब्जी काटने के चाकू से जति राम पर हमला कर दिया। चाकू के वार से अधीक्षक के गाल पर हल्की खरोंच आई है। तात्कालिक उपचार के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
ऐसा तो हाल है राजधानी रायपुर में संवेदनशील कही जाने वाली सरकार के महकमे का , वह अपने सरकारी अधिकारियों - कर्मियों को जब तंग करने से बाज नहीं आ रहा है तो भला सोचिए आम आदमी यहाँ किस हाल में और कैसा होगा ? लोकेन्द्र अकेला नहीं है आज भी यहाँ पेंशन के हजारों प्रकरण लंबित हैं जिसकी परवाह किसी को भी नहीं है , क्या सभी को वृद्धावस्था में अपनी - अपनी पेंशन पाने इसी तरह चाकू - छूरी का सहारा लेना होगा ?
' सिस्टम' के गाल पर पड़ी हताशा की इस छूरी से क्या कुछ सबक लेगा यहां का स्वयंभू और कथित ' संवेदनशील' प्रशासन , कहा नहीं जा सकता !!!  

फ़रवरी 14, 2011

मिस्र की जनता को मुबारक बाद


                                        मिस्र की जनता को   "गांधीगिरी" मुबारक 

अलविदा , होस्नी मुबारक
दुनिया भर से मिस्र की जनता को सराहा जा रहा है । उसकी एकजुटता जनित क्रांति की अप्रत्यासित सफलता पर बधाइयां - शुभकामनाएं मिल रही हैं । तहरीर चौक पर मिस्र की जनता ने एक तरह से सत्याग्रह के जरिए ही आंदोलन छेड़ा और जीत हासिल की। यह जनक्रांति इतनी जल्दी अपने उद्देश्य में सफ़ल साबित हो जाएगी, इसका अनुमान तो था , पर इतनी जल्दी , इसका अनुमान शायद किसी को भी नहीं रहा होगा । मिस्र में आए इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे इंटरनेट पर चलने वाली फेसबुक जैसी कई सोशल नेटवर्किंग साईट की भी बहुत अहम भूमिका रही। यही वजह थी कि आम जनता एक दूसरे के सीधे संपर्क में आकर सड़कों पर निकल आई। विश्व के राजनैतिक इतिहास में सत्ता परिवर्तन के लिए जितनी भी क्रांतियां हुई हैं, उनमें नेतृत्व व्यक्ति या दल आधारित रहा है। लेकिन मिस्र में मुबारक की तानाशाही के खिलाफ जनता का स्वत:स्फूर्त आंदोलन था। हांलाकि मुस्लिम ब्रदरहुड की अग्रणी भूमिका इस आंदोलन में रही । होस्नी मुबारक के लगातार 30 सालों के शासन के दौरान देश में जहां भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी , भूखमरी और गरीबी ने जहाँ पूरे मिस्र में पैर पसारा वहीं राष्ट्रपति मुबारक स्वयं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बनने में पूरी तरह सफल रहे । मुबारक के धन कुबेर होने का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे इस समय लगभग 70 अरब डालर की संपत्ति के स्वामी हैं।  तीन हफ्तों के संघर्ष के बाद यह प्रश्न अपनी जगह कायम है कि मिस्र में सत्ता की कमान कौन संभालेगा ? फिलहाल सेना इस भूमिका को निभा रही है। और उसने आश्वस्त किया है कि जल्द ही नागरिक सत्ता स्थापित की जाएगी।  अन्यथा पूर्व के अनुभव यह बताते हैं कि जब सेना के हाथों देश की सत्ता आती है, तो फिर सैन्य तानाशाही का रास्ता ही प्रशस्त होता है। मुबारक का बेटा, जिसे वे अपने बाद सत्ता सौंपने के इच्छुक थे, पहले ही देश छोड़कर जा चुका था और जब होस्नी मुबारक को यह अहसास हो गया कि वे किसी भी तरह आंदोलनकारियों को झुका नहीं सकते, तो उन्हें पद छोड़ना ही पड़ा।  मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना में सेना किस तरह से सहयोग करेगी,  अब यह बड़ा सवाल है। समुचे विश्व को संदेश देने में सफ़ल हुआ यह आंदोलन मिस्र की जनता आगे कितना सफ़ल जीवन दिला पाता है इस ओर समूचे संसार की निगाहें हैं । तमाम तानाशाहों को अब सावधान हो जाना चाहिए । नैतिकता की ताकत कितनी अक्षुण्य है संसार ने देखा और सीखा है । जनता अब तानाशाहों के द्वारा विश्वस्तर पर आंख मूंद कर मचाई जाने वाली लूट-खसोट तथा धन-संपत्ति के अथाह संग्रह को भी और अधिक सहन करने के मूड में हरगिज़ नहीं है । दुनिया के लोग अब जागरुक हैं, अपने व अपनी आने वाली नस्लों के भविष्य को लेकर वे चिंतित हैं ।
 साथ ही एक सवाल यह भी है कि क्या भारत की जनता भी कभी जागेगी जमाखोरी , मुनाफ़ाखोरी ,भ्रष्टाचारियों और भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ ?  इन तमाम बुराईयों की जड़ राज नेताओं के खिलाफ़ ??  भ्रष्ट और तानाशाह सरकारी अफ़सरों की मनमानी के खिलाफ़ ???

जनवरी 16, 2011

आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की 31 मंज़िला ईमारत का निर्माण अवैध , ईमारत तोड़ने की बात : गर हम डूबे तो तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम


मुंबई स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी में करगिल युद्ध लड़ने वाले वीर जवानों उनके परिजनों को फ़्लैट मिले , यह योजना थी , जिस पर इस देश के कर्णधार नौकरशाहों और नेताओं के रिश्तेदारों की बुरी नजर पड़ गई , फ़िर क्या था जो ग्रहण लगा कि आज यह ईमारत तोड़ने की बात कर रहे हैं बेशर्म नेता , वे अब इसे भ्रष्टाचार की ईमारत कह रहे हैं क्योंकि अब इसमें उन्हें- उनके रिश्तेदारों को फ़्लैट जो नहीं मिल पा रहा है । हुई न वही बात कि गर हम नहीं खा पायेंगे तो  खाने की सजी सजाई थाली में पानी डाल देंगे । किसी को भी नहीं खाने देंगे ।   गर हम डूबे तो तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम ।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार (16 जनवरी 2011) को अपने बयान में कहा, "यदि दूसरा विकल्प चुना जाता तो ईमारत के अवैध निर्माण को जायज़ ठहराए जाने के बराबर होता. तीसरे विकल्प पर चर्चा हुई पर उसका मतलब भी यही होता । इसलिए तथ्यों और परिस्थितियों पर चर्चा के साथ-साथ विश्लेषण करने के बाद मेरा निर्णय है कि पहले विकल्प (यानी पूरी इमारत को गिराने) का फ़ैसला किया जाए ।"

भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने पाया है कि विवादों में घिरी मुंबई स्थित आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की 31 मंज़िला इमारत का निर्माण अवैध तरीके से, अनिवार्य इजाज़त लिए बिना किया गया और पूरी ईमारत को गिरा दिया जाना चाहिए ।
मुंबई स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी तब विवादों में घिर गई जब पाया गया कि इसकी इमारत के निर्माण में अनेक स्थानीय नियमों और क़ानूनों का उल्लंघन हुआ था । यही नहीं, कई प्रभावशाली अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं के रिश्तेदारों को इस ईमारत में फ़्लैट दिए गए । पूरे मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ा और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की सरकार के उस समय मुख्यमंत्री रहे आशोक चव्हान को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा । अब मंत्रालय का कहना है कि उसके पास तीन विकल्प थे. पहला विकल्प ये था कि कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (तटीय नियमन क्षेत्र - 1991) की इजाज़त के बिना अवैध तौर पर बनाई गई पूरी ईमारत को गिरा दिया जाए । सवाल उठता है खर्च किये गये रुपयों के लिए जिम्मेदार कौन होगा ? एक दिन में तो यह इमारत बनी नहीं होगी , क्या कर रहे थे जिम्मेदार अधिकारी तब, जब यह ईमारत बन रही थी । क्यों न उन अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही की जाए जिनके जिम्मे यह दायित्व होता है कि ऐसे निर्माण न हों । सबसे बड़ी बात यदि सब कुछ  नौकरशाहों और नेताओं के हिसाब से  सब कुछ चल रहा होता , उनके रिश्तेदारों को फ़्लैट मिला हुआ होता तो क्या ये नेता ऐसा निर्णय लेते ? आज हर बड़े शहर में सैकड़ों अवैध बहुमंजिला ईमारतें सीना ताने खड़ी हैं ,क्या उन्हें गिराने कोई मंत्री - नेता सामने आयेगा ।  पर्यावरण के नियमों का खुल्ला उल्लंघन देश में हजारों-लाखों उद्योग कर रहे हैं , क्या कर रहा है जय राम रमेश का पर्यावरण विभाग उनके खिलाफ़ ? रायपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हो सकता है , जहाँ समूची सत्ता इसी काम में जुटी देखी जा सकती है , आम आदमी सरकार के ऐसे कार्यों के विरुद्ध अदालत की शरण ले रहे हैं ।
मेरा मानना है पर्यावरण मंत्रालय का ऐसा सुझाव करगिल के शहीदों का अपमान है । देश का अपमान है । इसके विरूद्ध जनता की आवाज बुलंद होनी ही चाहिए । यह पूरी ईमारत वीर सपूतों के परिजनों को जो जरूरतमंद हों उन्हें दिया जाना चाहिए , पर्यावरण ही नहीं अन्य सभी संबंधित मंत्रालयों को जिनका इससे संबंध है आगे आकर स्वीकृति प्रपत्र ईमारत को बचाने के लिए देना चाहिए । साथ ही जो लोग इस काण्ड से जुडे हैं उन्हें ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिससे दूसरे सबक लें ।  

जनवरी 04, 2011

'शहीद स्मारक' की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह : एक अच्छी लेकिन चिंताजनक खबर " देशबन्धु " से


रायपुर  जी ई रोड पर स्थित शहीद स्मारक भवन का भव्य निर्माण एक बड़ी उपलब्धि है। निर्माण समिति से जुड़े कार्यकारिणी निश्चित रूप से बधाई के पात्र तो हैं ही, विडम्बना यह है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रदेश सेनानियों को समर्पित इस भवन की सार्थकता का अब कोई मायने नहीं रह गया है।
13 अगस्त वर्ष 03 में अखिल भारतीय फ्रीडम फाइटर्स फेडरेशन के अध्यक्ष शशिभूषण वाजपेयी के मुख्य आतिथ्य में एवं छग प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी की अध्यक्षता तथा सांसद पं. श्यामाचरण शुक्ल के विशेष आतिथ्य में स्मारक भवन का शुभार्पण हुआ था, तब सेनानियों ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि उन्हें अवसर पाते ही नेपथ्य में ढकेल दिए जायेंगे वे अपनी उपेक्षा को तो सहते आ रहे हैं, लेकिन स्मारक की दुर्दशा और अव्यवस्था पर उन्हें कड़ा एतराज है। शहीद स्मारक भवन का प्रबंधन जब से निगम के हाथों गया है, आय का स्रोत तो बढ़ा ही है, लेकिन आय स्रोत का एक धेला भी सेनानी समिति के फंड में नहीं जाता। वहीं भवन का रखरखाव भगवान मालिक है। चारों तरफ फैली गंदगी शाम होते ही असमाजिक तत्वों का डेरा अव्यवस्थित पार्किंग यहां तक कि संडास और मूत्रालय भी गंदगी और बदबू से भरे होते हैं। इस गुंबजनुमा सभागार एवं भवन काम्पलेक्स में रंग-रोगन नहीं हुए, सालों बीत गए। गौरतलब है कि इस भवन का निर्माण जिला प्रशासन, नगर पालिक निगम एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मदद से किया गया था। उस समय निर्माण समिति में स्व. कमल नारायण शर्मा, स्व. हरि ठाकुर, स्व. नारायण राव अंबिलकर, स्व. नारायण दास राठौर, धनीराम वर्मा, मोतीलाल त्रिपाठी, रणवीर सिंह शास्त्री जैसे सेनानियों के नेतृत्व का उल्लेखनीय योगदान रहा है।
जिस फ्रीडम फाइटर्स के नेतृत्व में शहीद स्मारक भवन में वर्षभर की गतिविधियों को संचालित कराया जाना था, वह आज दूर की कौड़ी हो गई है। राजधानी में गिनती के बचे-खुचे वयोवृध्द स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को आवश्यक बैठकें लेनी हो तो उन्हें कई सीढ़ियां पार करके सबसे ऊपर कोने के भवन में ढकेल दी जाती है। बताईये जिस भवन पर उनका पूरा अधिकार मिलना चाहिए था वहां उनका अपना कोई बैठक कक्ष भी नहीं है। इतने बड़े भवन में लिफ्ट की व्यवस्था तो दूर शिफ्ट की व्यवस्था भी नहीं है, जो एक उम्रदराज बुजुर्ग के लिए जरूरी होता है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्राय: स्वाभिमानी होते हैं, वे स्वयं आपस में चंदा इकट्ठा कर बैठकें एवं किसी कार्यक्रम को अंजाम देते रहे हैं, लेकिन क्या शासन-प्रशासन कार् कत्तव्य नहीं बनता कि प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी संगठन को आर्थिक रूप से सक्षमता प्रदान की जाए, ताकि वे वर्षभर की गतिविधियों को स्वतंत्र रूप से संचालित कर सकें। ऐसा नहीं है कि जिला और निगम प्रशासन को शहीद स्मारक भवन से मिलने वाली आय-व्यय के स्रोत में कमी हो प्रतिदिन का हिसाब ही देखें तो सभागार का एक दिन का किराया 8 से 12 हजार, विद्युत व्यय 2 हजार रुपये, सफाई व्यवस्था 500 रुपये, कमरा आबंटन के लिए अमानत राशि दस हजार रुपये, म्यूजियम आर्ट गैलरी का प्रतिभाग का किराया 5 हजार रुपये, इसके अलावा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से मिलने वाला नियमित किराया तो अलग, बावजूद इसके स्वंतत्रता संग्राम सेनानियों के संस्था को फूटी कौड़ी नहीं मिलती। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की स्मृति शिलालेख कक्ष तो है लेकिन कहीं किसी दीवार पर किसी एक की भी छायाचित्र आप टंगे हुए नहीं पायेंगे।
ब्लॉग में इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद कुछ गैर राजनीतिक युवकों ने 05 जनवरी की शाम 'शहीद स्मारक भवन' पहुंच कर मोमबत्तियाँ लगा कर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्मारक भवन को पूर्णरूपेण कम्प्युनिटी हॉल जैसे बना देना चिंता का विषय है। लायब्रेरी में देशभक्ति पूर्ण प्रेरणास्पद पुस्तकें हो तो बेहतर होगा। हमारे संगठन को भवन से मिलने वाली आय स्रोत का एक अंश नहीं मिलता। बैठकें लेनी हों तो आपस में खर्चे का जुगाड़ कर लेते हैं।         (साभार : देशबन्धु , रायपुर)

जनवरी 02, 2011

मीठी शक्कर का कड़वा होता बाजार


मीठी शक्कर का बाजार कड़वा होता जा रहा है। दीपावली के बाद से शक्कर में लगभग 200 रूपए प्रति क्विंटल का उछाल स्थानीय कारोबार में आ गया है। सस्ती विदेशी शक्कर को देश में आने से रोकने के लिए सरकार में शामिल षड़यंत्रकारियों ने शक्कर आयात नीति पर कर की दर में 60 % की बढ़ोतरी कर दी है । ऐसा करने से विदेशी यहाँ शक्कर मंहगी होगी और कारोबारी देशी शक्कर लॉबी के चक्कर से बाहर नहीं जा पायेंगे , शक्कर लॉबी मनमाने दाम वसूलने में फ़िर एक बार सफ़ल होगी । बीते वर्ष का अनुभव काम आयेगा ।
बाजार में माल की आवक हो रही है और डिमांड धीरे-धीरे बढ़ रही है। माह के शुरू में भाव 2900 से 2940 रूपए प्रति क्विंटल चल रहे थे, जो बढ़कर 3110 रूपए स्थानीय कारोबार में हो गए। शनिवार को बाजार कुछ नीचे उतरकर 3000-3050 पर आ गए। आगे सरकार की पॉलिसी पर बाजार निर्भर रहेगा। कारोबारी जानकारों का कहना है कि विश्व स्तर पर शक्कर के दाम चढ़ने की खबरें हैं। दूसरा कारोबारियों को शक्कर का निर्यात खुलने की भी उम्मीद है। इससे कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है और हमारे यहाँ इस कारोबार से जुड़े कुछ बड़े लोग जो राजनीति और सरकार से सीधे जुड़े हैं इस अवसर का फ़ायदा उठाने की फ़िराख में हैं। शक्कर के भाव ऊपर-नीचे होने में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जानकारों का कहना है कि सरकार की इच्छा है कि शक्कर मिलें समय से चालू हो और गन्ना किसानों को ऊंचे भाव पर गन्ने का रेट मिले। लेकिन मिले किसानों को 230 रूपए के आसपास भाव देना चाहती है । यह भी सरकार की एक बड़ी चाल है । 45 रुपये किलो की शक्कर बेच चुके लोगों को मानो खून लग चुका है ऊचें दाम का मुनाफ़ा खाने-कमाने  का सो  शादी-ब्याह के सीजन के बहाने फ़िर एक बार कोशिश करेंगे तगड़ा मुनाफ़ा कमाने की । सच  पूछो तो शक्कर के दाम से ज्यादा खतरनाक हैं हमारे नेताओं के इरादे । इनके बेईमान इरादों से कैसे बचेंगे हम !

दिसंबर 30, 2010

धन्य हो गया छत्तीसगढ़ अपने इन नेताओं से…



अब तक आपने सुना होगा बैंक के रिकवरी एजेंट क्लाइंट से जबरिया पैसा वसूल करते हैं । इस मामले को लोगों ने सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया और सुप्रीम कोर्ट ने सभी बैंकों को इस आशय के निर्देष दिये कि जबरिया या दादागिरी के तौर तरीके गलत ही नहीं गैर कानूनी भी हैं ऐसा करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए । किसी भी ॠण की वसूली कानूनी प्रावधान के अन्तर्गत ही की जानी चाहिए , इसके बाद से बैंकों ने थोड़ी नरमी के साथ काम करना शुरु किया । लेकिन यहाँ छत्तीसगढ़ में अभी भी हालात बदतर ही हैं बैंक तो बैंक यहाँ तो सरकारी महकमा भी प्रायवेट गुण्डो का सहारा नियम बना कर ले रहा है । यह अफ़सोस जनक हाल किसी और का नहीं बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का विभाग (बिजली/सी एस ई बी) कर रहा है , वह भी केवल आम नागरिकों के साथ ,जिनका बिजली बिल कुछ दो-चार सौ रुपये का बकाया रह जाता है , उनके साथ , आम लोगों के साथ हो रही इस सरकारी गुण्डागर्दी की खबरें अब बकायदा शहर के अखबार छापने लगे हैं । लेकिन सरकारी महकमें को ऐसी खबरों से कोई फ़र्क नहीं पड रहा है । जिन लोगों ने भी किसी भी कारण से दो -तीन माह से अपना बिजली बिल नहीं जमा कराया ऐसे लोगों के घर दादागिरी करने वालों की , बिजली काटने वालों की एक टीम आ धमकती है , वसूली के लिए बकायदा चमकाती- धमकाती है और बिजली के सर्विस वायर को कहीं से भी काट कर चलते बनती है , मतलब जो कर सकते हो कर लो , जितना बिल दिया है पटाना ही होगा ,भले ही वह एक काम वाली बाई के दो कमरों के घर का बिल ग्यारह हजार रुपया हो , या फ़िर किसी पान की दुकान वाले का एक माह का बिल सोलह हजार रुपया आया हो , नहीं पटाया तो लाईन काटी जायेगी , वह भी दादागिरी से । गलत बिलिंग क्यों होती है ? इसके लिए दोषी कौन हैं ? दोषियों के लिए कोई सजा का प्रावधान भी है क्या ? इसका कोई जवाब नहीं है सरकार के पास । सच पुछें तो तानाशाही जैसा माहौल है यहाँ सरकारी महकमों में , और विभाग यदि माननीय मुख्यमंत्री जी का है तो फ़िर क्या कहनें । कोई कुछ नहीं कह सकता । आम जनता का बुरा हाल है । वहीं दूसरी ओर बड़े कारखानों या उन बड़े लोगों का जिनका बिजली बिल लाखों-करोड़ो रूपयों में बकाया है , उनकी लाईनें काट्ना तो दूर उनकी ओर कोई नजर उठा कर भी नहीं देखेगा । अकेले राजधानी रायपुर में लगे उद्योगों -अन्य कारोबारियों का हजारों करोड़ रुपयों का बिजली बिल बाकी है , मंत्रियों बड़े अधिकारियों के बंगलों इनके निजी आवासों का करोड़ों रूपयों का बिजली बिल बाकी है , किसी की हिम्मत नहीं है बकाया का कागज भी देने की , दादागिरी सिर्फ़ औए सिर्फ़ आम आदमी के साथ , गरीब और निरीह लोगों के साथ होती देखी जा सकती है । समूचे प्रदेश का यह हाल है कि जिन लोगों के यहाँ  ए सी चलते हैं उनके यहाँ उनकी इच्छानुसार - सुविधानुसार बिजली का बिल आता है , सारी सेटिंग घर बैठे हो रही है और जिनके घरों एक पंखा या कूलर है वह मजबूर है हजारों में बिल पटाने को ।
इससे भी बड़ी विड़म्बना यहाँ यह है कि जनता के बीच से निकल कर नेता और मंत्री बने स्वनामधन्य लोग यह भूल जाते हैं वो क्या हैं ? क्यों हैं ? और कितने दिनों के लिए हैं ? कुर्सी पाते ही ऐसे लोग अधिकारियों के हाँथों खेलना शुरु हो जाते हैं । अधिकारी इनकी जी हुजूरी नहीं बल्कि ये अधिकारियों की जी हुजूरी करते नजर आते हैं । कहने में खराब जरूर लगता है पर यहाँ सच्चाई यही है । सभी विभागों का मानो यही हाल है  - "अंधा बांटे रेवड़ी - चीन्ह चीन्ह के दे ।" क्या होगा छत्तीसगढ़ का ?

दिसंबर 26, 2010

कर्ज में डूबे पिता ने तीन बच्चों सहित खुद को लगाई आग

 यह घटना घटी , अखबारों में छपी , लोगों ने पढ़ा और भूल गए । शासन - प्रशासन मौन ! क्योंकि उसकी नजर में यह सामान्य या फ़िर रोज घटने वाली घटना है और शायद शासन - प्रशासन की प्राथमिकता सूची में यह विषय नहीं है । सच ही है 'मर्म' से नहीं 'माल' से चल रहा है छत्तीसगढ़ का शासन ।
कोई माने ना माने पर हकीकत यही है कि प्रदेश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है , गरीबों की जमीनें जबरिया खरीदी जा रही है ,कर्ज देने वालों का जंजाल बुरी कदर फ़ैला हुआ है , इस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है ,रोज मरते हैं कर्ज में लोग लेकिन शासन की बला से । क्योंकि कर्जदाताओं के लम्बें हाँथ नेताओं के गिरेबाँ तक जो हैं ।
पढ़िए हाल की ही एक घटना ---
रायपुर । कर्ज में डूबे राजधानी रायपुर के एक राजमिस्त्री ने शुक्रवार 24दिसम्बर की रात को अपने तीन बच्चों सहित खुद भी आग लगा ली। चारों को अम्बेडकर अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ दो बच्चों ने दम तोड़ दिया , एक बच्ची सहित बाप  जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। जिनकी हालत बेहद चिंता जनक बताई जाती है ।
बजरंग चौक आजादनगर रावांभाठा निवासी गब्बर (37) राजमिस्त्री है। रात करीब साढ़े आठ बजे उसने मिट्टी तेल डालकर दस वर्षीय बेटी श्वेता, आठ वर्षीय प्रिया और दो वर्षीय मयंक को आग लगा दी। इसके बाद खुद भी मिट्टी तेल डालकर आग लगा ली। चीखें सुनकर पत्नी सुनीता पड़ोसियों के साथ घर पहुंची। पड़ोसियों ने आग बुझाई और उन्हें अस्पताल पहुंचाया। 
सुनीता का कहना है कि 11 दिन पहले उसकी डिलीवरी के लिए गजानन ने कर्ज लिया था। अभी वह 15 हजार रूपए के कर्ज में डूबा हुआ था। इससे वह चिड़चिड़ा हो गया। शुक्रवार रात को काम से लौटा तो सुनीता से उसका विवाद हो गया। उसने सुनीता को बच्चों को लेकर मायके जाने के लिए कहा। सुनीता 11 दिन के बच्चे को लेकर घर से चली गई। इसके बाद गजानन ने तीन बच्चों और खुद को आग लगा ली। 
गुस्से में उठाया कदम
टीआई खमतराई विरेंद्र चतुर्वेदी ने बताया कि गजानन शराब का आदी था। शुक्रवार रात भी वह नशे में धुत घर पहुंचा। उसका पत्नी के साथ विवाद हुआ। वह सबसे छोटे बच्चे को साथ लेकर घर से निकल गई। इसके बाद गुस्से में गजानन ने तीन बच्चों को जलाया और खुद को भी आग लगा ली। 
(_कुल मिला कर बात यहाँ खत्म करने की चीर परिचित शैली की शराबी ने नशे में ऐसा किया , सारा दोष शराब और शराबी होने का , हालात को मारो गोली और बंद करो फ़ाईल , पता करो किससे कर्ज लिया था , बुलाओ उसे थाने , कुछ भेंट-पूजा ले लो और छोड़ दो उसे ,उसका भी धंधा है -अपना भी  । शासन को विधानसभा में जवाब देते बने ऐसी एक शानदार रिपोर्ट तैयार करवा कर रखो । बस हो गया काम । यही तो है शायद संवेदनशील प्रशासन  !!! )

दिसंबर 24, 2010

डा. विनायक सेन, नक्सली नेता नारायण सान्याल और पीयूष गुहा राजद्रोही करार

 रायपुर की एक स्थानीय अदालत ने डा. विनायक सेन, नक्सली नेता नारायण सान्याल और पीयूष गुहा को राजद्रोह और छत्तीसगढ जन सुरक्षा अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया ।
डा. विनायक पर छत्‍तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम के तहत मामला दायर किया गया है ।
माओवादियों का मददगार करार देकर उन्‍हें मई 2007 में गिरफ्तार किया गया था । दो साल जेल में बीताने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इन्‍हें जमानत दी थी । डा. विनायक पर आरोप लगाया गया था कि बिलासपुर जेल में बंद माओवादी नेता नारायण सान्‍याल की चिट्ठियां वे अन्‍य माओवादियों तक पहुंचाते थे । आसित सेन पर नक्‍सली साहित्‍य छापने का आरोप है । जेल में सजा काट रहे पीयूष गुहा पर भी माओवादियों को मदद पहुंचाने का आरोप लगाया गया है । 2007 में रायापुर रेलवे स्‍टेशन पर गिर फ्तार किये जाते वक्‍त इनके पास से नारायण सान्‍याल की लिखी चिट्ठी मिली थी । पीयूसीएल नेता और मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. बिनायक सेन देशद्रोह के मामले में दोषी ठहराए गए हैं । शुक्रवार को रायपुर सेशन कोर्ट ने बिनायक सेन को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, लोगों को भड़काने और प्रतिबंधित माओवादी संगठन के लिए काम करने के आरोप में दोषी करार दिया है। इस मामले पर बिनायक सेन के वकील ने कहा कि वह सेशन कोर्ट के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देंगे । 
गौरतलब है कि डॉ. विनायक सेन को पुलिस ने छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा कानून के अंतर्गत 14 मई 2007 को गिरफ्तार किया था । उन पर नक्सलियों के साथ संबंध रखने का आरोप लगा था। हाई कोर्ट ने डॉ. सेन को जमानत देने से इनकार किया इसके बाद छत्तीसगढ़ पुलिस ने उनके खिलाफ चार्ज शीट दायर की । 
दिसंबर 2007 ने सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सेन की जमानत को निरस्त कर दिया। स्वास्थ्यगत कारणों से मई 2009 में डॉ. सेन को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी । 
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 7 जनवरी 2011 तक इस मामले का फैसला देने की आखिरी तारीख निश्चित की  थी ।

दिसंबर 19, 2010

बहादुर बिटिया

बहादुर शीतल


कहानी नहीं बल्कि सच्ची घटना है यह रायपुर की , जहाँ बड़े बड़े मारे डर के काँप उठते हैं वहीं एक दस वर्षीय बच्ची शीतल की हिम्मत ने न केवल अपनी माँ को लुटने से बचाया बल्कि लुटेरों को भी पुलिस के हवाले करा दिया ।
शीतल की माँ रंजीता शनिवार 18दिसम्बर की दोपहर  स्कूटर से शैलेन्द्र नगर से टाटीबंध जा रही थी । अपनी दोनो बेटियों शीतल (10 वर्ष) , जया (07 वर्ष) भी माँ के साथ ही स्कूटर पर सवार थे , टाटीबंध पहुंचने से पहले ही बाईक सवार दो लड़कों ने रंजीता के स्कूटर के समीप अपनी बाईक सटा कर रंजीत के गले से सोने की चैन खींच ली , इसी बीच गुस्साई शीतल ने लुटेरे युवक की शर्ट का कॉलर पकड़ लिया , बैलेंस बिगड़ा और दोनो ही वाहनों पर सवार चार के चारों सड़क पर गिर गये , आसपास के लोगों ने इस वाकये को देखा उन्हें माजरा क्या है यह समझने में देर न लगी और लोगों ने लपक कर उन दोनों लुटेरों को पकड़ लिया , माँ बेटी भी उठ खड़ी हुईं । अब क्या था लोगों ने दोनों लुटेरों की जम कर धुनाई की और पुलिस के हवाले कर दिया ।
चित्र : साभार पत्रिका रायपुर
रायपुर में चैन खींचने की ऐसी घटनाएं आम हो चली हैं । हर महीनें पन्द्रह - बीस घटनाओं की पुलिस में रिपोर्ट दर्ज भी होती है , अनेक लोग पुलिस थाना जाना - रिपोर्ट लिखाना , फ़िर थाना -कचहरी के चक्कर काटने के झंझट से बचना चाहते हैं जो रिपोर्ट ही नहीं लिखाते हैं , ऐसों की संख्या भी कम नहीं है । लेकिन "शीतल"जैसे कम ही हैं जिनका आक्रोश बचाता है अपनों को रोकता है अपराध को । शीतल राजधानी रायपुर के नामी स्कूल होलीक्रॉस में कक्षा चौथी की छात्रा है । अब प्रेरणा भी बहुतों की , कि यार हिम्मत दिखाओ - सही वजह के गुस्सा दिखाओ । गलत करने वालों को रोकने का साहस कर दिखाओ तो सही । शाबाश शीतल तुम गर्म जोश भी , बधाई बच्चे , हम सब को तुम्हारी हिम्मत - सूझबूझ पर गर्व है बच्चे ।

दिसंबर 06, 2010

बढ़ी मानव तस्करी ; छत्तीसगढ़ एक बड़ा बाजार


पत्रिका के रायपुर संस्करण ने अपने सोमवार 06 दिसम्बर 2010 के अंक में संजीत कुमार की चौंकाने वाली खबर प्रकाशित की है , यह खबर शर्मनाक और चिंताजनक भी है । पत्रिका बताता है कि महिलाओं की तस्करी करने वालों के लिए छत्तीसगढ़ एक बड़ा बाजार बन चुका है। प्रदेश की बालाओं को बहला-फुसलाकर देश के अन्य राज्यों में ले जाकर बेच देने की कई घटनाएं सामने आई हैं।

आंकड़ों पर गौर करने पर पता चलता है कि बीते तीन साल में करीब साढ़े छह हजार महिलाएं गायब हो चुकी हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें लगभग आधी संख्या नाबालिग लड़कियों की है। पुलिस गुमशुदगी का मामला दर्ज कर अपना कर्तव्य पूरा कर रही है। इन लड़कियों का आंकड़ा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।
राज्य में मानव तस्करी की सबसे ज्यादा घटनाएं आदिवासी बहुल सरगुजा और बस्तर में सामने आ रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2007 से 2009 के बीच राज्य से करीब 18664 लोगों के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज की गई।
इनमें सबसे ज्यादा संख्या महिलाओं और बालिकाओं की है। इन तीन सालों में लगभग 4500 से अधिक नाबालिग लड़के भी गायब हुए हैं। पुलिस अफसरों के अनुसार पिछले कुछ सालों के दौरान राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में भी गुमशुदगी के मामले बढ़े हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मामले थानों तक नहीं पहुंचते। इस वजह से वहां के सही आंकड़े नहीं मिल पाते।
-शिकायत ही नहीं पहुंचती
राज्य के आदिवासी क्षेत्रों से भी बड़े पैमाने पर महिलाओं और युवतियों के गुम होने की घटनाएं हो रही हैं। जानकारी का अभाव सहित अन्य कारणों से इनमें से ज्यादातर मामलों की शिकायत पुलिस तक नहीं पहुंच पाती।
-पकड़ी जा चुकी है मानव तस्करी
करीब दो साल पहले रायपुर पुलिस ने एक कंटेनर पकड़ा था। उसमें 50 से अधिक लोगों को चोरी-छिपे दूसरे राज्य ले जाया जा रहा था। जम्मू व उत्तरप्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में यहां के लोगों को बंधक बनाए जाने की भी लगातार सूचनाएं आती रहती हैं।
सरकार स्वीकार चुकी है मानव तस्करी
पूर्व गृहमंत्री नंदकुमार पटेल के अनुसार राज्य की बालिकाओं और मासूम बच्चियों की तस्करी की जा रही है। उन्हें दूसरे राज्यों में ले जाकर बेचा जा रहा है। वर्तमान सरकार भी इस बात को विधानसभा में स्वीकार कर चुकी है। इसके बावजूद इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है।
-महानगरों में सप्लाई
करीब ढाई साल पहले बस्तर की एक लड़की को दिल्ली पुलिस ने कुछ लोगों की चंगुल से मुक्त कराया था। युवती को अच्छा काम दिलाने के बहाने दिल्ली ले जाकर बेच दिया गया था। पुलिस अफसरों के अनुसार सरगुजा क्षेत्र की कई लड़कियों को दिल्ली, मुम्बई व पुणे आदि शहरों से मुक्त करा कर लाया गया है।
-नहीं देते सूचना
पुलिस अफसरों के अनुसार कई बार गुम इंसान कुछ समय बाद लौट आता है, लेकिन परिवार के लोग इसकी सूचना थाने में नहीं देते। इस वजह से भी आंकड़े बढ़ जाते हैं।
गुम इंसानों की तलाश के लिए हरसंभव प्रयास करने के निर्देश सभी थानों को दिए गए हैं। इसके तहत समय-समय पर थाना स्तर पर गुम इंसानों का पॉम्पलेट और पोस्टर भी चस्पा किया जाता है। दूसरे थानों, जिलों और प्रदेशों को भी सूचना दी जाती है। इसकी मॉनिटरिंग के लिए पुलिस मुख्यालय में सीआईडी शाखा के अधीन राज्यस्तरीय एक सेल भी बनाया गया है।
-राजेश मिश्रा, प्रवक्ता, छत्तीसगढ़ पुलिस
साभार : पत्रिका रायपुर , संजीत कुमार

दिसंबर 04, 2010

ओछी मानसिकता


 हरियाणा के बहादुरगढ़ कसबे में पूर्व सैनिक भगवान सिंह राठी के घर जन्में मित्र रविन्द्र राठी जी बताते हैं कि -
भारत माँ को अपने अमर सपूत तरुण शहीद खुदी राम बोस की शहादत पर सदा फक्र रहेगा और इनके सम्मान में हमारा सर सदा ही झुका रहेगा। मगर मुजफ्फरपुर में जहाँ उनका अंतिम संस्कार हुआ था, वहां कुछ देशद्रोही ताकतों ने एक जन शौचालय का निर्माण करवा कर अपनी ओछी मानसिकता का ही परिचय दिया है। मैं अपने सभी मित्रों से अपील करता हूँ कि आज उस महान क्रांतिकारी की जयंती पर सभी बिहार के मुख्यमंत्री (cmbihar-bih@nic.in) को पत्र लिखकर इस मामले में तुरंत कार्रवाई की मांग करें। यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जय भारत।                                                                                                                            अमर शहीद खुदीराम बोस का जन्म 3दिसम्बर,1889 को ग्राम्य हबीबपुर, जनपद-मिदनापुर ,प0बंगाल में श्री त्रिलोक्यनाथ बोस के घर हुआ था।  बताते हैं स्वदेशी आन्दोलन में भाग लेने  के लिए खुदीराम बोस ने नवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ी थी। खुदीराम बोस का जन्म भारत वर्ष में आजादी के लिए लड़ने व क्रांति मार्ग को प्रज्जवलित करने के लिए ही हुआ था।
28फरवरी,1906 को ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ परचा बांटने के जुर्म में पुलिस सिपाही ने आपको पकड़ लिया। इस समय मात्र 15 वर्षीय खुदीराम बोस ने सिपाही को एक जोरदार तमाचा मारा और उससे अपना हाथ छुड़ा कर भाग निकले। 1अप्रैल,1906 को मिदनापुर के जिलाधीश की उपस्थिति में भी खूदीराम बोस ने वन्देमातरम् का नारा लगाया और पर्चे बांटे और वहाँ से भी बच निकले । 31मई,1906 को छात्रावास में सोते समय ही ब्रिटिश पुलिस खुदीराम बोस को गिरफ़्तार कर पाई । बंग-भंग आंदोलन के समय कलकत्ता का मुख्य मजिस्टेट किंग्सफोर्ड था।इसके दमन चक्र ने सारी हदें तोड़ दी थी। 28मार्च,1908 को किंग्सफोर्ड़ का तबादला मुजफफरपुर,बिहार कर दिया गया।
खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को किंग्सफोर्ड़ को मारने का कार्य सौंपी गया। 30 अप्रैल,1908 को रात के 8बजे दोनों लोग यूरोपीयन क्लब पहुँचे। वहाँ किंग्सफोर्ड़ की गाड़ी के धोखें में कैनेड़ी परिवार की गाड़ी को बम फ़ेंक कर  नष्ट कर दिया। फिर चाकी समस्तीपुर स्टेशन की तरफ तथा खुदीराम बोस बेनीपुर स्टेशन की तरफ भागे। चाकी ने 1मई,1908 को पुलिस द्वारा पकड़े जाने अपनी ही गोली से खुद को शहीद कर लिया । उधर 20-25 किमी पैदल चनने के बाद पुलिस के दो सिपाहियों ने खुदीराम बोस को दो रिवाल्वर,37कारतूस व नक्शों के साथ हिरासत में लिया । खुदीराम बोस को 21मई,1908 को मुजफफरपुर के मजिस्टेट के सामने पेश किया गया। वहाँ से अपराध स्वीकृति के बाद 25 मई,1908 को सेशन्स कोर्ट भेजा गया तथा 8जून,1908 को सेशन्स कोर्ट में सुनवाई हुई। जज ने खुदीराम बोस को फाँसी की सजा दी। 6जुलाई,1908 को हाईकोर्ट में अपील की गई। जिसकी सुनवाई 13 जुलाई,1908 को हुई। अभी खुदीराम की उम्र 18 वर्ष की भी नहीं थी लेकिन फाँसी की सजा हाईकोर्ट ने बरकरार रखी।
फाँसी के दिन 11अगस्त,1908 को खुदीराम बोस का वजन दो पौण्ड़ बढ़ गया था। प्रातः 6बजे उन्हें फाँसी दे दी गई । गंड़क नदी के तट पर खुदीराम बोस के वकील श्री करलीदास मुखर्जी ने उनकी पार्थिव काया अग्नि को समर्पित की ।हजारों की संख्या में युवकों का समूह एकत्रित था। अमर शहीद खुदीराम बोस चिता की आग से निकली चिंगारियां सम्पूर्ण भारत में फैली। चिता की भस्मी को लोगों ने अपने माथे पर लगाया , पुड़िया बांध कर घर ले गये। खुदीराम बोस ही प्रथम शख्स हैं जिन्होंने बीसवीं सदी में आजादी के लिए फाँसी के तख्ते पर अपने प्राणों की आहुति दी थी।

नवंबर 28, 2010

क्यों कोई नहीं डरता जनता से ?


सुनने में उन्हें जरूर बुरा लग सकता है जो सरकार से या फ़िर सीधे पी डब्लु डी डिपार्टमेंट से जुड़े हैं , लेकिन सच तो यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री के निवास से सीधे नया सर्किट हाऊस जाने वाली आधा किलोमीटर की नई बनी सड़क में चार जगह आपको लहर, उतार-चढ़ाव मिलेंगे । यहाँ शायद यह बताना भी जरूरी होगा कि मुख्यमंत्री का काफ़िला इस मार्ग से होकर दिन में कई मर्तबा गुजरता है , मंत्रालय से वापसी के लिए यही मार्ग तय किया जाता  है ।जब यह हाल मुख्यमंत्री  निवास के सामने की सड़क का हो सकता है तो सोचिए बाकि जगह काम कैसा होता होगा ? मुख्यमंत्री निवास से विधानसभा जाने वाला मार्ग की टायरिंग इससे पहले कई बार उखड़ चुकी है । हफ़्तों अखबारों के पन्ने रंगे रहे इनकी खबरों से । हर साल बनने वाली यह सड़क जिसके दोनो ओर नेता प्रतिपक्ष, मंत्रियों , मुख्य सचिव अन्य अधिकारियों के बंगले हैं वह उखड़ती है और किसी को कोई फ़र्क तक नहीं पड़ता । राज भवन के सामने  से सिविल लाइन जाने वाली  सड़क का हाल आप स्वंय  देख आईये ।  ठेकेदार का रुतबा कम नहीं होता , उसे और नए नए काम दिये जाते हैं । कभी लगता है कि  क्यों कोई नहीं डरता जनता से ? फ़िर लगता है, अब तो विभाग के मंत्री और सचिव ही बहुत नामी हैं , अब डर काहे का !!!

नवंबर 24, 2010

शर्म आनी चाहिए संघ और भाजपा को …

यह चित्र भारतीय जनता पार्टी के उस व्यक्ति का है  जो मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए अपने  बेटों को लाभ देने के लिए अपने राज्य में बडा जमीन घोटाले और अवैध खनन का आरोपी है । राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से जुडा है और संघ के कहने बाद भी इस्तीफ़ा देने को तैयार नहीं है । घोटाले की जमीन लौटा कर अपने आप को पाक-साफ़ बताने में लगा हुआ है । वहीं भाजपा हर छोटे - बडे मामले पर संसद में हंगामा खडा कर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों कि खिलाफ़त करती इन्हीं दिनों रोज देखी जा सकती है । कैसी बेशर्मी आखिर यह ??? ये हैं  कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदुरप्पा जो यह  कहते हैं कि उन्होंने कुछ भी ग़लत नहीं किया है।
आज भारतीय जनता पार्टी ने भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा पर लगे सारे आरोपों को नकारते हुए घोषणा की है कि वे मुख्यमंत्री बने रहेंगे । पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने येदुरप्पा से हुई मुलाक़ात के बाद जारी बयान में इस फ़ैसले की घोषणा की है । उल्लेखनीय है कि बीएस येदुरप्पा पर भूमि आवंटन के मामले में गंभीर आरोप लगे हैं । आरोप है कि उनके परिवार पर एक खनन कंपनी को ज़मीन बेचने के बदले करोड़ों रुपए हासिल किए ।
हालांकि येदुरप्पा किसी भी तरह के घोटाले से से इनकार किया है । उनका कहना है कि जो पैसे उनके परिजनों को मिले वे ज़मीन बेचने से मिले और जब ज़मीन बेची गई तो उन्हें पता नहीं था कि जो ज़मीन ख़रीद रही है वो खनन कंपनी है। इन आरोपों के बीच कई दिनें से अटलकें लगाई जा रही थीं कि भाजपा बीएस येदुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटा सकती है।इसी मामले पर चर्चा के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें दिल्ली बुलवाया था ।
यह कितने शर्म की बात है कि न हटा पाने की स्थिति में बुधवार 24 नबम्बर 2010 को  भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि पिछले कई दिनों से येदुरप्पा पर आरोप लगाए गए थे लेकिन उन्होंने इन आरोपों का खंडन किया है । गडकरी ने अपने बयान में कहा है कि येदुरप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने रहेंगे । इस बयान में कहा गया है कि मुख्यमंत्री पर लगे आरोपों की जाँच के लिए एक आयोग का गठन किया गया है और मुख्यमंत्री ने यह प्रस्ताव भी किया है कि संतुष्टि के लिए भाजपा को अपनी ओर से भी जाँच करनी चाहिए । यानि की अरोपी ही जाँच कराएगा या चाहे तो आरोपी की पार्टी (भारतीय जनता पार्टी) जाँच करा ले । भला यह कैसी राजनीति है ? खास कर उनकी जो अपनी पूरी राजनीति केवल नैतिकता की दुहाई देकर ही करते आ रहे हैं । क्या यह घटना राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के दोहरे चरित्र को उजागर  ही नहीं बल्कि प्रमाणित भी  करती हैं ?

नवंबर 09, 2010

दीपावली

दीपावली का त्यौहार सभी ने मना लिया ,बधाइयाँ  । मुझे ऐसा प्रतीत हुआ इस वर्ष की दीपावली गत वर्ष की अपेक्षा कुछ ज्यादा इको फ़्रेण्डली रही । आतिश बाजी भी अपेक्षाकृत कम हुई , हरे-हरे केले के पेड़ो को काटा तो गया लेकिन खरीददारों ने तरजीह नहीं दी ,तभी जगह-जगह जहाँ से बिकते थे वहाँ ही बिना बिके पडे देखे गये। नकली खोये के भय ने भी अपना  काम किया ,घरों में बेसन-आटे की मिठाइयाँ -घर के बने नमकीन ज्यादा दिखे । बच्चों ने भी अपेक्षाकृत बडे बम कम ही फ़ोडे , आकाशिय फ़टाके कहीं ज्यादा चलाये । घरेलू सजावट में भी चायनिज रंगीन  बल्बों का अधिक्ता में प्रयोग किया गया हो ऐसा भी कहीं नहीं दिखा । अच्छा है जागरुकता आए । लेकिन वहीं दूसरी ओर शहर के हर बडे अखबारों ने जिन्होंने ढ़ेरों विज्ञापन पूरे हफ़्ते भर छापे थे उन्हें शायद मजबूरी में यह बताना पडा अपनी रिपोर्ट में कि राजधानी में करोड़ों का बर्तन , सोना-चाँदी , कपड़ा , आटोमोबाईल , फ़टाका बिका । बाज़ार बूम रहा । ये बाज़ार को बूम बताने वाले आंकड़े भी हर एक ने अपने-अपने ढ़ंग  से बताए ।  ऐसी रिपोर्ट को लेकर बाज़ार में तरह - तरह की चर्चाएं होतीं रहीं , खुद अधिकांश व्यवसायी हतप्रभ थे ।         संक्षेप में कुछ ऐसी रही इस बार की दीपावली ।

अक्टूबर 27, 2010

राज्योत्सव 2010 : नेताओं का सपरिवार आनंद मेला

ये सारे नेता गर्व महसूस कर रहे हैं , दबंग अभिनेता सलमान खान का सम्मान करते हुए , और  सलमान हैं कि  यहाँ  इस  उदघाटन  के कार्यक्रम में बमुश्किल 5 मिनट रुके और वापस उड़ लिए अपने उद्योगपति दोस्त के साथ ।
छत्तीसगढ़ राज्य के दस साल पूरे होने पर रायपुर के साइंस कालेज मैदान में मंगलवार को राज्योत्सव की रंगारंग शुरुआत हुई। महोत्सव का शुभारंभ करते हुए राज्यपाल शेखर दत्त ने कहा कि इन दस सालों में राज्य ने काफी तरक्की की है। खनिज संसाधनों के साथ ही उद्योगों का भी विकास हुआ है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने दस सालों की विकास यात्रा को गौरवशाली बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षो में प्रदेश का नागरिक हर क्षेत्र में तरक्की करेगा। समारोह के पहले दिन अभिनेता सलमान खान की मौजूदगी खास रही। इसके अलावा झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल भी मौजूद थे। इस मौके पर संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने राज्य की सांस्कृति विरासतों व धरोहरों का गुणगान किया।
नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे ने कहा कि उत्तराखंड, झारखंड व छत्तीसगढ़ तीनों ही राज्य एक साथ बने हैं और तीनों ही राज्य उन्नति कर रहे हैं।  

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छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण को  01 नवम्बर 2010 को  दस बरस पूरे हो जायेंगे । हर बरस इस खुशी में हमारे प्रदेश में एक बडे मेले का आयोजन किया जाता है जिसे  'राज्योत्सव' का नाम दिया गया है । इस मेले में शासन  गरीबों की गाढ़ी कमाई में से करोड़ो रुपये फ़ूंकता है , मुम्बई ने नामी-गिरामी नाचने-गाने वाले आते हैं और मंत्रियों- बडे अधिकारियों , बडे व्यापारियों , इनके परिजनों  के मनोरंजन का सार्वजनिक इंतजाम किया जाता है । ये वी वी आई पी बन कर सोफ़ा सेट पर बैठ कार्यक्रमों का मजा लेते हैं , और प्रदेश की गरीब जनता - युवा , महिला-पुरुष पीछे दूर खड़े तमाशा देखते रहते हैं ।   बीच-बीच में पुलिस आकर इनपर अपना रोब दाब दिखा कर व्यवस्था बनाती दिखती है । पूरे सात दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम को गौर से देखें तो बर्बस ही अंग्रेजों की याद आ जाती है । छत्तीसगढ़ियों को दर किनार कर उन्हे पीछे  धकेल कर सातों दिन कार्यक्रम का पूरा मजा लूटते हैं  -राज्य शासन के  मंत्री- बडे अधिकारी , बडे व्यापारी , और इनके परिजन - चाहने वाले । संक्षेप में यही है    छत्तीसगढ़ का  'राज्योत्सव' । सरकारी खर्चे पर बडे लोगों का आनंद मेला । पूरे सात दिनों तक और बाद में भी चापलूस इसकी भी जय जयकार करते देखे जायेंगे।   जिसकी इस वर्ष शुरुवात 26अक्टूबर की शाम हो गई है  यह उत्सव एक नबम्बर तक चलेगा ।                               शायद आप यह भी जानना चाहेंगे कि क्या है -                                              





                                                                                                                                         

अक्टूबर 25, 2010

बहुत से पप्पू हैं कांग्रेस में

नारायण सामी
                                                                                                                                                                                     
 बीते दिनों कुछ हलचल सी मची थी रायपुर में उस वक्त जब कांग्रेस के केन्द्रिय मंत्री और छत्तीसगढ़ प्रदेश में कांग्रेस के प्रभारी नारायण सामी के ऊपर कालिख फ़ेंकी गई । हंगामा मचा , दूसरे दिन एक नाम सामने आया कि यह सब पप्पू फ़रिश्ता के इशारे पर हुआ है । नाम आने से पहले डरे- सहमे से बैठे रहे कांग्रेस नेता गण । डर इस बात का कि कहीं कोई उनका नाम ना घसीट ले इस काण्ड में ।
कालिख काण्ड में एक नाम सामने आते ही मानो सब खुशी से उछल - मचल गये कि चलो अपन तो बच गये, न जाने दूसरा - तीसरा गुट क्या करता मेरे खिलाफ़ ? अब इस बात का तो डर खत्म हुआ । सारे कांग्रेसी एक हो गये "दोषी पप्पू" को सजा दिलाने की दिखावटी और खुद को बचाने वाली मांग करने लगे । वहीं कुछ बडे कहे जाने वाले नेता इस बात का भी प्रयास करने लगे कि 'पप्पू' उनके दुश्मन का नाम ले दे कि उसके कहने पर उसने ऐसा   किया है फ़िर 'पप्पू'  को हाई कमान से ले जाकर मिलवाते हैं । यह प्रयास बंद हो गये हैं ऐसी बात भी नहीं है । इस बात के लिए यह भी प्रयास किये जा रहे हैं कि रायपुर के नगर भईया जो मंत्री भी हैं प्रदेश में, पप्पू उनकी बात तो मानता है , और मान ही लेगा , क्यों न उन मंत्री जी की मदद ली जाय बदले में उनके मामलों में अन्दर-बाहर से हम सहयोग करेंगे । कहने का सीधा सा मतलब यही कि सारी गुटबाजी पूरी तरह से सक्रिय है इस काण्ड के बाद एक - दूसरे को पटखनी देने के लिए । सामने वाले की लकीर मिटा कर अपनी लकीर को बड़ा बताने की कोशिश में लगे हैं कथित दिग्गज नेता गण यहाँ । 
इस पूरे प्रकरण में सर्वाधिक चिंता और दुख का विषय यह है कि देश और प्रदेश का कोई भी नेता यह सोचने - समझने को तैयार नहीं है कि आखिर किसी कांग्रेसी(पप्पू) को ऐसा कदम क्यों उठाना पड़ा ?  प्रदेश में कांग्रेस का यह हाल कैसे ,क्यों और कब
हो गया ? कौन - कौन हैं इस दशा के निर्माण के लिए जिम्मेदार ? उनकी सजा भी कुछ होनी चाहिए या नहीं ? या सजा केवल छोटे मोटे पप्पूओं को ही ? क्या इससे सुधर जायेगी कांग्रेस की स्थिति ? छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद से आज तक एक नेता का बस यही कहना है कि "मैं नहीं तो कांग्रेस नहीं" । क्या कांग्रेस के कथित हाई कमान तक यह आवाज नहीं पहुंची है या अनसुनी कर दी गई 'जार्ज' के कहने पर ?  यहां कांग्रेस में एक नहीं तमाम पप्पू घूम रहे हैं जिन्होने अपना सब कुछ लुटाया है कांग्रेस के लिए और नया राज्य, नई सरकार बनते ही ऐसे निष्ठावान लोगों को दूध में से निकाल कर फ़ेंकी गई मक्खी की ही तर्ज पर पार्टी से निकाल फ़ेंका या फ़िर दरकिनार कर दिया गया है । नकली सिक्कों ने असली सिक्कों को मानो चलन से बाहर कर दिया है । पप्पू यहाँ प्रतीक मात्र है । जगह-जगह कांग्रेस को पराजय का मुंह क्यों देखना पड़ रहा है ? कांग्रेस को अपनी दशा-दिशा का गहन अध्ययन जरूर करना चाहिए पप्पू के बहाने ही सही ।  
केंद्रीय मंत्री व छत्तीसगढ़ के कांग्रेस प्रभारी वी नारायण सामी पर मंगलवार 19 अक्टूबर की  सुबह कुछ युवकों ने स्याही फेंक दी। सामी उस वक्त प्रदेश कांग्रेस प्रतिनिधियों की बैठक के लिए कांग्रेस भवन में जा रहे थे। स्याही फेंकने वाला युवक मौके से फरार हो गया।
हालांकि बाद में नारे लगाने वाले चार लड़कों को पकड़ लिया गया। मौके पर मिले पर्चे में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उपेक्षा किए जाने की बात लिखी गई है। सामी प्रदेश चुनाव अधिकारी श्रीमती विप्लव ठाकुर और सांसद चरणदास महंत के साथ जैसे ही कांग्रेस भवन पहुंचे, करीब 20 से 22 कार्यकर्ताओं ने सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नारे लगाने शुरू कर दिए। इन्हीं में एक लड़के ने शीशी में भरी काली स्याही सामी पर फेंकी। सामी के कपड़ों के अलावा चेहरे पर भी स्याही के छींटे पड़े। उनके साथ खड़े महंत के कपड़ों पर भी स्याही लग गई।
जब लड़कों को पकड़ने की कोशिश की गई तो स्याही फेंकने वाला युवक मौके से भाग गया। इस बीच नारे लगा रहे चार लड़कों की पिटाई कर दी गई। बाद में उन्हें पुलिस को सौंप दिया गया। पकड़े गए लड़के रायपुर के हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार प्रदर्शनकारी युवक नशे में धुत थे।

अक्टूबर 24, 2010

रायपुर में सेना के साहसिक कारनामों से जमीन से आसमान तक छाया रोमांच


छत्तीसगढ़ के राज्यपाल श्री शेखर दत्त की उपस्थिति में आज रायपुर के पुलिस परेड मैदान में भारतीय सेना के जवानों ने जमीन से लेकर आसमान तक साहसिक और रोमांचकारी कारनामों का प्रदर्शन किया। छत्तीसगढ़ विधानसभा के उपाध्यक्ष श्री नारायण चन्देल तथा स्कूल शिक्षा एवं संस्कृति मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने भी सेना के जांबाज जवानों द्वारा दिखाये गए साहस और संतुलन से लबरेज प्रदर्शनों का अवलोकन कर उनका उत्साह बढ़ाया। 
छत्तीसगढ़ में पहली बार राजधानी रायपुर में 'राष्ट्र प्रहरी' की अवधारणा पर अपनी सेना को जाने नाम से सैन्य मेले का आयोजन किया गया है। इस मेले के प्रति छत्तीसगढ़ की जनता विशेषकर युवाओं, किशोरों और बच्चों के अपार उत्साह और उमंग तथा उनके इस मेले के प्रति आकर्षण को देखते हुए इसकी अवधि दो दिन से बढ़ाकर तीन दिन की गई। आज रविवार को मेले के समापन अवसर पर 22 अक्टूबर को तेज बारिश के कारण निरस्त सभी साहसिक और जांबाजी से भरें प्रदर्शनों को फिर से किया गया।
डेयर डेविल्स नाम से प्रसिध्द मोटर साइकिल सवारों ने कम्पनी हवलदार राजेश कुमार के नेतृत्व में आग के गोले के बीच से निकलकर टयूब लाईट की दीवार तोड़ने, ईटों की छद्म दीवार तोड़ने सहित पिरामिड और कमल की आकृति बनाने तथा अन्य रोमांचक प्रदर्शन किए। भारतीय वायु सेना के माइक्रोलाइट नन्हें प्लेनों ने भारतीय सेना के झण्डे फहराते हुए मैदान में गोता लगाया और जमीन से काफी नजदीक आकर फिर से आसमान की राह पकड़ी। इसी तरह पैरा मोटर के नाम से प्रसिध्द तथा छोटे से मोटर की सहायता से उड़ने वाले ग्लाइडर ने लम्बे समय तक पुलिस परेड मैदान के चारों ओर घुमते हुए दर्शकों को लुभाया और अंत में मैदान में उतर कर दर्शकों को रोमांचित किया। राडार की पकड़ से बचने के कारण ऐसे माइक्रोलाइट और पैरामोटर सरहद पार जाकर दुश्मन की गोपनीय गतिविधियों की जानकारी लेने में सक्षम है। सेना के गुड़सवारों ने तेज गति से दौड़ते हुए भाले से अपना शिकार पकड़ा और मैदान में बनाए गए सभी बाधाओं को पार किया। मैदान में प्रदर्शित हाट एयर बैलून भी दर्शकों के आकर्षण का केन्द्र बना रहा। जम्मू एवं कश्मीर में आतंकवादी हमलों को नाकाम करने के लिए चलाए गए ऑपरेशन 'रक्षक' तथा श्रीलंका में चलाए गए ऑपरेशन 'पवन' में दुश्मनों से लड़ते हुए विकलांग बने सेना के पांच वीर सैनिकों को राज्यपाल ने विशेष स्कूटर प्रदान किया। सिक्ख रेजीमेंट द्वारा भागड़े का उत्साहपूर्ण प्रदर्शन भी किया गया।

राज्यपाल ने टैंक, मिसाइल और रक्षा उपकरणों की ली जानकारी


रोमांचक कारनामों के अवलोकन के उपरांत राज्यपाल ने सैन्य मेले में लगाए गए विभिन्न स्टालों पहुंचकर उनका जायजा लिया। राज्यपाल ने यहां बड़ी संख्या में तथा अलग-अलग विशेषताओं भरें रॉकेट लान्चर, मशीन गन, एम.एम.जी, मोर्टार, अत्याधुनिक संचार  उपकरण रेडियो सेट, आदि का अवलोकन किया। उन्होंने भारतीय थल सेना के टी-72 अजय टैंक, ब्रम्होस मिसाइल, बोफोर्स तोप के साथ-साथ भी अत्याधुनिक एवं विशालकाय रक्षा उपकरणों का भी अवलोकन किया। छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सब एरिया मुख्यालय, रायपुर के ब्रिगेडियर ए. कृष्णन, कर्नल राजीव खुल्लर और लेफ्टिनेन्ट कर्नल लोकेश सक्सेना ने राज्यपाल को इन रक्षा उपकरणों की विस्तार से जानकारी दी। राज्यपाल श्री दत्त ने यहां सैनिक स्कूल, एन.सी.सी., सैनिक कल्याण, सेन्ट्रल आर्डिनेन्स डिपो जबलपुर, सेना भर्ती कार्यालय रायपुर आदि के स्टाल पहुंचकर प्रदान की जा रही महत्पूर्ण जानकारी तथा रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान (डी. आर. डी. ओ,) में प्रदर्शित अग्नि तथा अन्य उपकरणाें के मॉडलों तथा अन्य अनुसंधान कार्यो की विस्तार से जानकारी प्राप्त की।  

राज्यपाल का अनुरोध : 'कदम-कदम बढ़ाए जा' गीत पर बजी धुन


स्टालों के अवलोकन के अवसर पर जब राज्यपाल ब्रास बैंड और पाईप बैंड बजाने वाले जवानों के पास पहुंचकर सब मेजर पाल सिंह तथा सब मेजर ए. के. डे.और बैंड के सदस्यों को शानदार और यादगार प्रस्तुति के लिए बधाई दी तो उन्होंने राज्यपाल की इच्छा जानकर उनके अनुरोध पर 'कदम-कदम बढ़ाए जा' तथा 'ये देश है वीर जवानों का' गीतों के धुन सुनाई। उल्लेखनीय है राज्य में पहली बार सेना के इतने बड़े बैंड दल ने प्रदर्शन किया है। इस अवसर पर ब्रास बैंड के अंतर्गत सिक्ख रेजीमेंटल सेन्टर, बिहार रेजीमेंट सेन्टर, ए. एस. सी. सेन्टर नार्थ, ए.ए.डी. सेन्टर, जे.ए.के. आर.आई. एफ. सेन्टर तथा पाईप लाईन बैंड के अंतर्गत ग्रेनेडियर रेजीमेंटर सेन्टर, 39 जी. टी.सी. सिक्ख रेजीमेंटल सेन्टर, ए.ए.डी. सेन्टर, ए.एस.सी. सेन्टर नार्थ ने एक साथ प्रदर्शन किया है।

आग के गोले को मोटर सायकल से पार करता जवान , सैकड़ों ट्यूब लाईट्स को फ़ोड़ते निकलता सेना का जवान .

Document A

अक्टूबर 09, 2010

राजनीतिक इच्छा शक्ति की कमी का परिणाम है नक्सलियों का लगातार आगे बढ़ना

नक्सली प्रशिक्षण -आंदोलन वनांचलों में 
नक्सली कसडोल के जंगलों  में अपना नया अड्डा बना चुके हैं , यहाँ से वनांचल के युवकों को अपने साथ जोड़ने का सफ़ल प्रयास भी कर रहे हैं और 100किलोमीटर दूर बैठी सरकार कहती है वह नजर रखे हुए है । क्या होगा ऐसी नजर रखने से ? सच्चाई तो यह है कि सरकार और उसका पुलिस महकमा बुरी कदर डरा बैठा है इसका फ़ायदा नक्सली आराम से उठा रहे हैं । सरकारी मीडिया और विज्ञापन दे-देकर खरीदा गया मीडिया भी सच्चाई बयान करने से डरता है , धंधा जो बैठ जायेगा उनका , दूसरे प्रदेशों में बैठा उनका मालिक लात मार कर निकाल देगा मैनेजरों को । यहाँ विज्ञापन की लालच ने चापलूस बना कर रख छोड़ा है मीडिया को। राजधानी रायपुर को नक्सलियों ने चारो तरफ़ से घेर रखा है । बगैर किसी ठोस सामरिक नीति बनाये खाना पूर्ति करने चंद पुलिस कर्मियों की टुकडियाँ भेज दी जातीं हैं कुछ दिन बाद खबर आती है ,इतने पुलिस कर्मी शहीद हुए फ़िर सरकारी बयान - कि यह नक्सलियों की कायराना हरकत है । हमारे जवान मुकाबला करेंगें । आपात बैठकें होतीं हैं , कैबिनेट बुलाई जाती है , बडे अधिकारी फ़िल्ड में निकलने की बजाय एक बंद कमरे में घण्टों बैठक करते हैं और नतीजा क्या , बस फ़िर सब टाँय -टाँय फ़िस्स ।  चंद बड़े अधिकारियों-मंत्रियों की , उनके परिजनों की सुरक्षा तगड़ी कर दी गई है । स्वयं पुलिस के छोटे अफ़सर - कर्मचारी अपने आप को असहाय - असुरक्षित महसूस कर रहे हैं , मारे जा रहे हैं । एस पी स्तर का अधिकारी भी डरा हुआ है । आम आदमी मारा जा रहा है । इस प्रदेश का मूल आदिवासी मारा जा रहा है ।इन्हें दोहरी मार का शिकार होना पड़ रहा है । साथ न देने -मुखबिरी करने का आरोप लगा कर एक ओर जहाँ नक्सली इन आदिवासियों को मौत की घाट उतार रहें हैं तो वहीं दूसरी ओर सरकार इनके जानोमाल की रक्षा का करने का दावा कर इनके हिस्से के पैसे खाने-पचाने और इन्हें सरकारी संरक्षण में होने का दिखावा कर नक्सलियों का सीधा शिकार बना कर  ठीक वैसा ही खुला छोड़ दे रही है जैसे कि शेर के सामने बकरी छोड़ी जाती है । लगातार मारे जा रहे हैं निर्दोष लोग । मजे में है सरकार और उसके चंद पैरोकार  जो विदेशों में जा- जाकर इन्वेस्टमेंट की जगह तलाश करते नजर आ रहे हैं ,तो वहीं दूसरी ओर विपक्ष उसमें भी अपनी हिस्सेदारी की सम्भावना तलाशता दिखता है , मौन है । कैसे भला होगा छत्तीसगढ़ का , जहाँ सब लूटने-खाने में ही लगे दिखते हैं । विकास के नाम पर केवल बिल्डर का काम करने बडे लोगों को लाभान्वित करने की नीयत से मंहगे आवास -मॉल कॉम्प्लेक्स बनाने में लगे हैं सरकरी उपक्रम - निगम । , अब सरकार भी सब काम धाम छोड़ केवल इसी काम को विकास का पर्याय बनाने में व्यस्त देखी जा सकती है । लोग हतप्रभ हैं - हैरान हैं सरकार के कामकाज के तरीकों से ,और सरकार है कि मदमस्त है अपनी चाल पर , उसे कुछ भी गलत लगता ही नहीं ,क्योंकि चंहु ओर व्यवसायियों से घिरी सरकार के प्रसंशक भी ये व्यवसायी ही हैं , जिनकी सुनियोजित - फ़्रिकवेंट मुलाकात मुख्यमंत्री से कराई जाती है जिससे कि मुख्यमंत्री का हौसला बना रहे और यह भी लगता रहे कि राज्य में सब कुछ बिलकुल ठीक ठाक चल रहा है , राष्ट्रीय अध्यक्ष जी भी आपकी कार्यशैली की तारीफ़ करते हैं ,साहब खुश तो बताईये   कैसे होगा  इस प्रदेश का भला  ???

शहीदों को श्रद्धांजलि देते प्रदेश के राज्यपाल - मुख्यमंत्री , अन्य मंत्रीगण-अधिकारी 

अक्टूबर 06, 2010

फ़िजिक्स का नोबल रशिया मूल के दो युवा वैज्ञानिकों को

आंद्रे जिम 
कॉस्टिन नोवोस्लो
 भौतिक शास्त्र ( फ़िजिक्स) का वर्ष 2010 का नोबल पुरष्कार रशिया मूल के दो युवा वैज्ञानिकों आंद्रे जिम  और कॉस्टिन नोवोस्लो को संयुक्त रूप से  प्रदान किया गया है ।  इन्हें यह प्राईज ग्राउंड ब्रेकिंग एक्सपेरिमेंन्ट्स रिगार्डिंग द टू डोमिनेशनल मेटेरियल ग्रेपन के विषय पर सफ़लता के लिए दिया गया है । वर्तमान में ये दोनो                            मेनचेस्टर युनिवर्सिटी से संबद्ध  हैं ।



फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

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