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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस

रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा   :  मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस
रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।
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सितंबर 05, 2011

कौन हैं अन्ना हज़ारे …?



 अन्ना हज़ारे का जन्म 15 जून, 1937 को महाराष्ट्र के अहमदनगर के भिंगार गांव के एक किसान परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम बाबूराव हज़ारे और मां का नाम लक्ष्मीबाई हज़ारे था। [1] उनका बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे। दादा फौज में। दादा की तैनाती भिंगनगर में थी। वैसे अन्ना के पुरखों का गांव अहमद नगर जिले में ही स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया। अन्ना के छह भाई हैं। परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिय.

व्यवसाय -

वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद सरकार की युवाओं से सेना में शामिल होने की अपील पर अन्ना 1963 में सेना की मराठा रेजीमेंट में ड्राइवर के रूप में भर्ती हो गए। अन्ना की पहली तैनाती पंजाब में हुई। 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान अन्ना हज़ारे खेमकरण सीमा पर तैनात थे। 12 नवंबर 1965 को चौकी पर पाकिस्तानी हवाई बमबारी में वहां तैनात सारे सैनिक मारे गए।[2] इस घटना ने अन्ना की ज़िंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। इसके बाद उन्होंने सेना में १३ और वर्षों तक काम किया। उनकी तैनाती मुंबई और कश्मीर में भी हुई। १९७५ में जम्मू में तैनाती के दौरान सेना में सेवा के १५ वर्ष पूरे होने पर उन्होंने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति ले ली। वे पास के गाँव रालेगन सिद्धि में रहने लगे और इसी गाँव को उन्होने अपनी सामाजिक कर्मस्थली भी बना लिय

सामाजिक कार्य -

१९६५ के युद्ध में मौत से साक्षात्कार के बाद नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उन्होंने स्वामी विवेकानंद की एक पुस्तक 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' देखा और खरीद लिया। इसे पढ़कर उनके मन में भी अपना जीवन समाज को समर्पित करने की इच्छा बलवती हो गई। उन्होंने महात्मा गांधी और विनोबा भावे की पुस्तकें भी पढ़ीं। 1970 में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहकर स्वयं को सामाजिक कार्यों के लिए पूर्णतः समर्पित कर देने का संकल्प कर लिया।

रालेगन सिद्धि -

मुम्बई पदस्थापन के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे। वे वहाँ चट्टान पर बैठकर गांव को सुधारने की बात सोचा करते थे। १९७५ में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति लेकर रालेगन आकर उन्होंने अपना सामाजिक कार्य प्रारंभ कर दिया। इस गांव में बिजली और पानी की ज़बरदस्त कमी थी। अन्ना ने गांव वालों को नहर बनाने और गड्ढे खोदकर बारिश का पानी इकट्ठा करने के लिए प्रेरित किया और ख़ुद भी इसमें योगदान दिया। अन्ना के कहने पर गांव में जगह-जगह पेड़ लगाए गए। गांव में सौर ऊर्जा और गोबर गैस के जरिए बिजली की सप्लाई की गई।[3] उन्होंने अपनी ज़मीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी और अपनी पेंशन का
सारा

पैसा गांव के विकास के लिए समर्पित कर दिया। वे गांव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं। आज गांव का हर शख्स आत्मनिर्भर है। आस-पड़ोस के गांवों के लिए भी यहां से चारा, दूध आदि जाता है। यह गांव आज शांति ,सौहर्द एवं भाईचारे की मिसाल है।

महाराष्ट्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन १९९१ -

१९९१ में अन्ना हज़ारे ने महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा की सरकार के कुछ 'भ्रष्ट' मंत्रियों को हटाए जाने की मांग को लेकर भूख हड़ताल की। ये मंत्री थे- शशिकांत सुतर, महादेव शिवांकर और बबन घोलाप। अन्ना ने उन पर आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप लगाया था। सरकार ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अंतत: उसे दागी मंत्रियों शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को हटाना ही पड़ा।[4] घोलाप ने अन्ना के खिलाफ़ मानहानि का मुकदमा दायर दिया। अन्ना अपने आरोप के समर्थन में न्यायालय में कोई सबूत पेश नहीं कर पाए और उन्हें तीन महीने की जेल हो गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने उन्हें एक दिन की हिरासत के बाद छोड़ दिया। एक जाँच आयोग ने शशिकांत सुतर और महादेव शिवांकर को निर्दोष बताया। लेकिन अन्ना हज़ारे ने कई शिवसेना और भाजपा नेताओं पर भी भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप
लगाए

सूचना का अधिकार आंदोलन १९९७-२००५ -

1997 में अन्ना हज़ारे ने सूचना का अधिकार अधिनियम के समर्थन में मुंबई के आजाद मैदान से अपना अभियान शुरु किया। 9 अगस्त, 2003 को मुंबई के आजाद मैदान में ही अन्ना हज़ारे आमरण अनशन पर बैठ गए। 12 दिन तक चले आमरण अनशन के दौरान अन्ना हज़ारे और सूचना का अधिकार आंदोलन को देशव्यापी समर्थन मिला। आख़िरकार 2003 में ही महाराष्ट्र सरकार को इस अधिनियम के एक मज़बूत और कड़े मसौदे को पारित करना पड़ा। बाद में इसी आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन का रूप ले लिया। इसके परिणामस्वरूप 12 अक्टूबर 2005 को भारतीय संसद ने भी सूचना का अधिकार अधिनियम पारित किया। [5] अगस्त 2006, में सूचना का अधिकार अधिनियम में संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ अन्ना ने 11 दिन तक आमरण अनशन किया, जिसे देशभर में समर्थन मिला। इसके परिणामस्वरूप, सरकार ने संशोधन का इरादा बदल दिय

महाराष्ट्र भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन 2003 -
2003 में अन्ना ने कांग्रेस और एनसीपी सरकार के चार मंत्रियों; सुरेश दादा जैन, नवाब मलिक, विजय कुमार गावित और पद्मसिंह पाटिल को भ्रष्ट बताकर उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ दी और भूख हड़ताल पर बैठ गए। तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने इसके बाद एक जांच आयोग का गठन किया। नवाब मलिक ने भी अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। आयोग ने जब सुरेश जैन के ख़िलाफ़ आरोप तय किए तो उन्हें भी त्यागपत्र देना पड़ा

लोकपाल विधेयक आंदोलन २०११ -
देखें मुख्य लेख जन लोकपाल विधेयक आंदोलन जन लोकपाल विधेयक (नागरिक लोकपाल विधेयक) के निर्माण के लिए जारी यह आंदोलन अपने अखिल भारतीय स्वरूप में ५ अप्रैल २०११ को समाजसेवी अन्ना हज़ारे एवं उनके साथियों के जंतर-मंतर पर शुरु किए गए अनशन के साथ आरंभ हुआ, जिनमें मैग्सेसे पुरस्कार विजेता अरविंद केजरीवाल, भारत की पहली महिला प्रशासनिक अधिकारी किरण बेदी, प्रसिद्ध लोकधर्मी वकील प्रशांत भूषण, आदि शामिल थे। संचार साधनों के प्रभाव के कारण इस अनशन का प्रभाव समूचे भारत में फैल गया और इसके समर्थन में लोग सड़कों पर भी उतरने लगे। इन्होंने भारत सरकार से एक मजबूत भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल विधेयक बनाने की माँग की थी और अपनी माँग के अनुरूप सरकार को लोकपाल बिल का एक मसौदा भी दिया था। किंतु मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन सरकार ने इसके प्रति नकारात्मक रवैया दिखाया और इसकी उपेक्षा की। इसके परिणामस्वरूप शुरु हुए अनशन के प्रति भी उनका रवैया उपेक्षा पूर्ण ही रहा। किंतु इस अनशन के आंदोलन का रूप लेने पर भारत सरकार ने आनन-फानन में एक समिति बनाकर संभावित खतरे को टाला और १६ अगस्त तक संसद में लोकपाल विधेयक पारित कराने की बात स्वीकार कर ली। अगस्त से शुरु हुए मानसून सत्र में सरकार ने जो विधेयक प्रस्तुत किया वह कमजोर और जन लोकपाल के सर्वथा विपरीत था। अन्ना हज़ारे ने इसके खिलाफ अपने पूर्व घोषित तिथि १६ अगस्त से पुनः अनशन पर जाने की बात दुहराई। १६ अगस्त को सुबह साढ़े सात बजे जब वे अनशन पर जाने के लिए तैयारी कर रहे थे, उन्हें दिल्ली पुलिस ने उन्हें घर से ही गिरफ्तार कर लिया। उनके टीम के अन्य लोग भी गिरफ्तार कर लिए गए। इस खबर ने आम जनता को उद्वेलित कर दिया और वह सड़कों पर उतरकर सरकार के इस कदम का अहिंसात्मक प्रतिरोध करने लगी। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया। अन्ना ने रिहा किए जाने पर दिल्ली से बाहर रालेगाँव चले जाने या ३ दिन तक अनशन करने की बात अस्वीकार कर दी। उन्हें ७ दिनों के न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया। शाम तक देशव्यापी प्रदर्शनों की खबर ने सरकार को अपना कदम वापस खींचने पर मजबूर कर दिया। दिल्ली पुलिस ने अन्ना को सशर्त रिहा करने का आदेश जारी किया। मगर अन्ना अनशन जारी रखने पर दृढ़ थे। बिना किसी शर्त के अनशन करने की अनुमति तक उन्होंने रिहा होने से इनकार कर दिया। 17 अगस्त तक देश में अन्ना के समर्थन में प्रदर्शन होता रहा। दिल्ली में तिहाड़ जेल के बाहर हजारों लोग डेरा डाले रहे। 17 अगस्त की शाम तक दिल्ली पुलिस रामलीला मैदान में और 7 दिनों तक अनशन करने की इजाजत देने को तैयार हुई। मगर अन्ना ने 30 दिनों से कम अनशन करने की अनुमति लेने से मना कर दिया. उन्होंने जेल में ही अपना अनशन जारी रखा। अन्ना को राम्लीला मैदान मै १५ दिन कि अनुमति मिलि,और अब १९ अगस्त से श्री अन्ना राम लीला मेदान मै जन लोकपाल बिल के लिये आनशन जारी रखने पर दृढ़ रहे आखिरकार सरकार उनकी जिद पर झुकी और जन लोकपाल लाने सहमति दी.
व्यक्तित्व और विचारधारा
गाधी की विरासत उनकी थाती है। कद-काठी में वह साधारण ही हैं। सिर पर गांधी टोपी और बदन पर खादी है। आंखों पर मोटा चश्मा है, लेकिन उनको दूर तक दिखता है। इरादे फौलादी और अटल हैं। महात्मा गांधी के बाद अन्ना हज़ारे ने ही भूख हड़ताल और आमरण अनशन को सबसे ज्यादा बार बतौर हथियार इस्तेमाल किया है। इसके जरिए उन्होंने भ्रष्ट प्रशासन को पद छोड़ने एवं सरकारों को जनहितकारी कानून बनाने पर मजबूर किया है। अन्ना हज़ारे को आधुनिक युग का गान्धी भी कहा जा सकता है अन्ना हज़ारे हम सभी के लिये आदर्श है ।
अन्ना हज़ारे गांधीजी के ग्राम स्वराज्य को भारत के गाँवों की समृद्धि का माध्यम मानते हैं। उनका मानना है कि ' बलशाली भारत के लिए गाँवों को अपने पैरों पर खड़ा करना होगा।' उनके अनुसार विकास का लाभ समान रूप से वितरित न हो पाने का कारण रहा गाँवों को केन्द्र में न रखना.
व्यक्ति निर्माण से ग्राम निर्माण और तब स्वाभाविक ही देश निर्माण के गांधीजी के मन्त्र को उन्होंने हकीकत में उतार कर दिखाया, और एक गाँव से आरम्भ उनका यह अभियान आज 85 गावों तक सफलतापूर्वक जारी है। व्यक्ति निर्माण के लिए मूल मन्त्र देते हुए उन्होंने युवाओं में उत्तम चरित्र, शुद्ध आचार-विचार, निष्कलंक जीवन व त्याग की भावना विकसित करने व निर्भयता को आत्मसात कर आम आदमी की सेवा को आदर्श के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया है।
सम्मान
• पद्मभूषण पुरस्कार (१९९२)
• पद्मश्री पुरस्कार (११९०)
• इंदिरा प्रियदर्शिनी वृक्षमित्र पुरस्कार (१९८६)
• महाराष्ट्र सरकार का कृषि भूषण पुरस्कार (१९८९)
• यंग इंडिया पुरस्कार
• मैन ऑफ़ द ईयर अवार्ड (१९८८)
• पॉल मित्तल नेशनल अवार्ड (२०००)
• ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंटेग्रीटि अवार्ड (२००३)
• विवेकानंद सेवा पुरुस्कार (१९९६)
• शिरोमणि अवार्ड (१९९७)
• महावीर पुरुस्कार (१९९७)
• दिवालीबेन मेहता अवार्ड (१९९९)
• केयर इन्टरनेशनल (१९९८)
• बासवश्री प्रशस्ति (२०००)
• GIANTS INTERNATIONAL AWARD (२०००)
• नेशनलइंटरग्रेसन अवार्ड (१९९९)
• विश्व-वात्सल्य एवं संतबल पुरस्कार
• जनसेवा अवार्ड (१९९९)
• रोटरी इन्टरनेशनल मनव सेवा पुरस्कार (१९९८)
• विश्व बैंक का 'जित गिल स्मारक पुरस्कार' (२००८)

अप्रैल 13, 2011

अनुकंपा नियुक्ति की माँग करता परिवार : चार हो गये आत्महत्या के शिकार

साहु परिवार : माँ और पीछे खड़ी बेटियाँ  , भाई सुनील जहर  दिखाता हुआ । यह  फ़ोटो उन दिनों की है जब तंग आकर इस परिवार खुद को अपने ही घर में कैद कर लिया था और सल्फ़ास खाकर मर जाने की धमकी भी दे डाली थी , मगर दुर्भाग्य कि शासन-प्रशासन सोया रहा। 



छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में स्थित स्टील अथारिटी आफ इंडिया लिमिटेड के भिलाई इस्पात संयंत्र में अनुकंपा नियुक्ति की मांग कर रहे परिवार के पाँच सदस्यों ने 12 अप्रैल2011 को जहर खा लिया, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई तथा एक सदस्य को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
 राज्य के मुख्य विपक्षी दल काँग्रेस ने इस मामले की न्यायिक जाँच कराने की माँग की है।
भिलाई निवासी 39 वर्षीय सुनील साहू संयंत्र की कालोनी में अपनी माँ मोहिनी साहू [65], तथा तीन बहने रेखा [40], शीला [32] और शोभा [28] के साथ रहता था। सात अप्रैल को साहू परिवार ने भिलाई इस्पात संयंत्र में अनुकंपा नियुक्ति की माँग को लेकर स्वयं को घर में बंद कर लिया था।
इस घटना के बाद जब भिलाई इस्पात संयंत्र के अधिकारियों तथा जिला प्रशासन के अधिकारियों ने परिवार से लगातार बात की तो कल को परिवार ने घर से बाहर आने की बात मान ली थी, लेकिन आज सुबह परिवार के सदस्यों ने जहर खा लिया।
कुमार ने बताया कि परिवार के जहर खाने के बाद सुनील ने इसकी जानकारी जब अपने पड़ोसियों को दी तो उन्होंने पुलिस की मदद ली। पुलिस ने परिवार के सदस्यों को अस्पताल पहुंचाया लेकिन तब तक साहू की माँ मोहिनी साहू तथा तीनों बहनें रेखा, शीला और शोभा की मृत्यु हो गई थी। साहू अस्पताल में भर्ती है, जहाँ उसकी हालत स्थिर है। कुमार ने बताया कि पुलिस ने मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।
पुलिस अधिकारी ने बताया कि जानकारी मिली है कि सुनील के पिता एमएल साहू भिलाई इस्पात संयंत्र में अधिकारी थे तथा दिसंबर 1994 में एक रेल दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई थी। इसके बाद से वह संयंत्र में अनुकंपा नियुक्ति की माँग की थी। मृत मोहिनीदेवी के पति एम.एल. साहू बीएसपी के औद्योगिक सम्बंध (आईआर) विभाग में डिप्टी मैनेजर थे। उनका शव 4 दिसम्बर 1994 को रेलवे पटरी पर संदिग्ध हालत में पाया गया था। परिजनों ने घटना में बीएसपी के ही कुछ कर्मियों पर उनकी हत्या करने का आरोप लगाया था। साथ ही उन्होंने अनुकम्पा नियुक्ति की मांग की थी। पुलिस ने घटना में आत्महत्या का मामला दर्ज किया था। इस आधार पर प्रबंधन ने अनुकम्पा नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था। एम.एल. साहू की मौत के बाद भी परिवार बीएसपी क्वार्टर में रह रहा था। गुरूवार 7 अप्रैल को कब्जा खाली कराने के लिए चल रहे अभियान के दौरान उनके घर की बिजली सप्लाई रोक दी गई। अनुकम्पा नियुक्ति व आवास आवंटन की मांग को लेकर शुक्रवार को परिवार ने खुद को मकान में बंधक बनाकर आंदोलन शुरू कर दिया था।
इस दौरान सुनील का परिवार संयंत्र की कालोनी में ही रह रहा था। गत दिनों जब संयंत्र प्रबंधन ने मकान खाली करने के लिए सुनील को नोटिस दिया तो उसके परिवार ने अनशन शुरू कर दिया और स्वयं को मकान में बंद कर लिया। ।
इस मामले में भिलाई इस्पात संयंत्र प्रबंधन ने  अब इस घटना के बाद इसे दुखद बताते हुए कहा कि प्रबंधन ने सुनील के प्रकरण पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने का भरोसा दिलाया था।
सवाल यह है कि यदि भरोसा दिलाने में प्रबंधन कामयाब रहता तो साहू परिवार सल्फ़ास जैसा जहर खा कर आत्म हत्या क्यों करता ???
भिलाई इस्पात संयत्र के उपमहाप्रबंधक जनसंपर्क एसपीएस जग्गी ने बताया कि कल सोमवार को बीएसपी प्रबंधन के उप महाप्रबंधक [औद्योगिक संबंध] एके कायल, एसडीएम सिद्धार्थ दास तथा सीएसपी राकेश भट्ट ने सुनील से उनके निवास पर मिलकर चर्चा की थी।
चर्चा के दौरान सुनील को बताया गया था कि उनके प्रकरण में मानवीय आधार पर सहानुभूतिपूर्वक पुन: विचार किया जाएगा। इससे पहले समय समय पर विभिन्न जनप्रतिनिधियों ने उससे चर्चा कर उसे पूरी सहायता करने का आश्वासन दिया था। कल प्रबंधन के कुछ अधिकारियों से चर्चा के बाद सुनील ने कहा था कि आज 12 अप्रैल को सुबह 11 बजे बाहर आकर सामान्य स्थिति बहाल करेगा ।
यह सारा नाटक आत्महत्या की इस बड़ी घटना के बाद महज अखबार बाजी करने की औपचारिता मात्र प्रतीत होती है ।सच्चाई यह है कि प्रबंधन से विगत 17वर्षों से प्रताड़ित साहू परिवार सामूहिक आत्महत्या करने को मजबूर हो गया और इस घटना को नया मोड़ देने भिलाई का प्रबंधन अब एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है , जिसमें उसके "पेड" लोग काफ़ी सक्रिय गेखे जा रहे हैं ।
इधर, इस घटना के बाद राज्य के मुख्य विपक्षी दल काँग्रेस ने इसके लिए रमन सरकार और भिलाई इस्पात संयंत्र को आड़े हाथों लेते हुए इस मामले की न्यायिक जाँच की माँग की है।
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने कहा है कि सुनील का परिवार पिछले 17 सालों से अनुकंपा नियुक्ति के लिए लड़ रहा है। यदि इस मामले की न्यायिक जाँच कराई जाएगी तो ही इस घटना के दोषियों के बारे में जानकारी मिल सकेगी।
जोगी ने कहा है कि राज्य में युवक नौकरी को लेकर आत्महत्या कर रहे हैं और सरकार इस मामले में असंवेदनशील है। सरकार इस मामले की न्यायिक जाँच की घोषणा करे तथा दोषियों के खिलाफ जल्द से जल्द कार्रवाई करे।                                                                                                   भिलाई स्टील प्लांट में छोटे कर्मचारियों - अधिकारियों को , उनके परिजनों को , प्रबंधन के द्वारा सताये जाने के तमाम मामले वर्षों से देखे - सुने जा रहे हैं , जो बाद में स्थिति बिगड़ने के बाद मीड़िया और चंद नेताओं के जेबें गरम होते ही शांत कर दिये जाते हैं , इसमें भी यही होना है ।
राज्यपाल-मुख्यमंत्री ने जताया शोक
राज्यपाल शेखर दत्त ने इस घटना को स्तब्ध कर देने वाली त्रासदपूर्ण बताते हुए गहरा शोक प्रकट किया और उन्होंने परिवार के एकमात्र बचे सदस्य के शीघ्र स्वस्थ्य होने की कामना ईश्वर से की है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने भी घटना को अत्यंत दुखद और दुर्भाग्यजनक बताया है और पीड़ित परिवार के प्रति अपनी गहरी संवेदना और सहानुभूति प्रकट की है। उन्होंने मामले को गंभीरता से लिया है और दुर्ग कलेक्टर को जांच करने तथा जल्द अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा है। मुख्यमंत्री ने परिवार के बेरोजगार युवा सदस्य द्वारा भिलाई इस्पात संयंत्र से अनुकम्पा नियुक्ति की मांग किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय इस्पात प्राधिकरण और संयंत्र प्रबंधन को इस पर मानवीय दृष्टिकोण से विचार करते हुए गंभीरता और तत्परता से ध्यान देना चाहिए था।

अप्रैल 12, 2011

जलियांवाला बाग और शहीद-ए-आज़म सरदार उधम सिंह





जलियांवाला बाग अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास का एक बगीचा है जहाँ 13 अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर के नेतृत्व में अंग्रेजी फौज ने गोलियां चला के निहत्थे, शांत बूढ़ों, महिलाओं और बच्चों सहित सैकड़ों लोगों को मार डाला था और हज़ारों लोगों को घायल कर दिया था। यदि किसी एक घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर सबसे अधिक प्रभाव डाला था तो वह घटना यह जधन्य हत्याकाण्ड ही था। इस हत्याकांड ने तब 12 वर्ष की उम्र के भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। इसकी सूचना मिलते ही भगत सिंह अपने स्कूल से १२ मील पैदल चलकर जालियावाला बाग पहुंच गए थे।बैसाखी के दिन 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं। नेताओं ने सैनिकों को देखा, तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा।सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरु कर दीं। 10 मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं। जलियांवाला बाग उस समय मकानों के पीछे पड़ा एक खाली मैदान था। वहां तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। भागने का कोई रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया।
बाद को उस कुएं में से 120 लाशें निकाली गईं। शहर में क‌र्फ्यू लगा था जिससे घायलों को इलाज के लिए भी कहीं ले जाया नहीं जा सका। लोगों ने तड़प-तड़प कर वहीं दम तोड़ दिया। अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि जलियांवाला बाग में कुल 388 शहीदों की सूची है। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।मुख्यालय वापस पहुँच कर ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को टेलीग्राम किया कि उस पर भारतीयों की एक फ़ौज ने हमला किया था जिससे बचने के लिए उसको गोलियाँ चलानी पड़ी। ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर ने इसके उत्तर में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को टेलीग्राम किया कि तुमने सही कदम उठाया। मैं तुम्हारे निर्णय को अनुमोदित करता हूँ। फिर ब्रिटिश लेफ़्टिनेण्ट गवर्नर मायकल ओ डायर ने अमृतसर और अन्य क्षेत्रों में मार्शल लॉ लगाने की माँग की जिसे वायसरॉय लॉर्ड चेम्सफ़ोर्ड नें स्वीकृत कर दिया।इस हत्याकाण्ड की विश्वव्यापी निंदा हुई जिसके दबाव में भारत के लिए सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट एडविन मॉण्टेगू ने 1919 के अंत में इसकी जाँच के लिए हंटर कमीशन नियुक्त किया। कमीशन के सामने ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर ने स्वीकार किया कि वह गोली चला कर लोगों को मार देने का निर्णय पहले से ही ले कर वहाँ गया था और वह उन लोगों पर चलाने के लिए दो तोपें भी ले गया था जो कि उस संकरे रास्ते से नहीं जा पाई थीं। हंटर कमीशन की रिपोर्ट आने पर 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को पदावनत कर के कर्नल बना दिया गया और अक्रिय सूचि में रख दिया गया। उसे भारत में पोस्ट न देने का निर्णय लिया गया और उसे स्वास्थ्य कारणों से ब्रिटेन वापस भेज दिया गया। हाउस ऑफ़ कॉमन्स ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया परंतु हाउस ऑफ़ लॉर्ड ने इस हत्याकाण्ड की प्रशंसा करते हुये उसका प्रशस्ति प्रस्ताव पारित किया। विश्वव्यापी निंदा के दबाव में बाद को ब्रिटिश सरकार ने उसका निंदा प्रस्ताव पारित किया और 1920 में ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर को इस्तीफ़ा देना पड़ा।
1927 में प्राकृतिक कारणों से उसकी मृत्यु हुई।
स्मारक : शहीदों की स्मृति को संजोकर रखने के लिए

शहीद-ए-आज़म सरदार उधम सिंह .... शहीद राम मोहम्मद सिंह आजाद 

भारत की आज़ादी की लड़ाई में पंजाब के प्रमुख क्रान्तिकारी सरदार उधम सिंह का नाम अमर है। आम धारणा है कि उन्होने जालियाँवाला बाग हत्याकांड के उत्तरदायी जनरल डायर को लन्दन में जाकर गोली मारी और निर्दोष लोगों की हत्या का बदला लिया, लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उन्होंने माइकल ओडवायर को मारा था, जो जलियांवाला बाग कांड के समय पंजाब के गर्वनर थे। ओडवायर जहां उधम सिंह की गोली से मरा, वहीं जनरल डायर कई तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर मरा।

जीवन वृत्त


उधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गाँव में हुआ था। सन 1901 में उधमसिंह की माता और 1907 में उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना के चलते उन्हें अपने बड़े भाई के साथ अमृतसर के एक अनाथालय में शरण लेनी पड़ी। उधमसिंह का बचपन का नाम शेर सिंह और उनके भाई का नाम मुक्तासिंह था जिन्हें अनाथालय में क्रमश: उधमसिंह और साधुसिंह के रूप में नए नाम मिले। इतिहासकार मालती मलिक के अनुसार उधमसिंह देश में सर्वधर्म समभाव के प्रतीक थे और इसीलिए उन्होंने अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आजाद रख लिया था जो भारत के तीन प्रमुख धर्मों का प्रतीक है।
अनाथालय में उधमसिंह की जिन्दगी चल ही रही थी कि 1917 में उनके बड़े भाई का भी देहांत हो गया। वह पूरी तरह अनाथ हो गए। 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ दिया और क्रांतिकारियों के साथ मिलकर आजादी की लड़ाई में शमिल हो गए। उधमसिंह अनाथ हो गए थे, लेकिन इसके बावजूद वह विचलित नहीं हुए और देश की आजादी तथा डायर को मारने की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहे । उधमसिंह 13 अप्रैल, 1919 को घटित जालियाँवाला बाग नरसंहार के प्रत्यक्षदर्शी थे। राजनीतिक कारणों से जलियाँवाला बाग में मारे गए लोगों की सही संख्या कभी सामने नहीं आ पाई। इस घटना से वीर उधमसिंह तिलमिला गए और उन्होंने जलियाँवाला बाग की मिट्टी हाथ में लेकर माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा ले ली। अपने मिशन को अंजाम देने के लिए उधम सिंह ने विभिन्न नामों से अफ्रीका, नैरोबी, ब्राजील और अमेरिका की यात्रा की। सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुंचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वहां उन्होंने यात्रा के उद्देश्य से एक कार खरीदी और साथ में अपना मिशन पूरा करने के लिए छह गोलियों वाली एक रिवाल्वर भी खरीद ली। भारत का यह वीर क्रांतिकारी माइकल ओ डायर को ठिकाने लगाने के लिए उचित वक्त का इंतजार करने लगा।उधम सिंह को अपने सैकड़ों भाई-बहनों की मौत का बदला लेने का मौका 1940 में मिला। जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल ओ डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुंच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके ।बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल ओ डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल ओ डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधमसिंह ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर दुनिया को संदेश दिया कि अत्याचारियों को भारतीय वीर कभी बख्शा
नहीं करते। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी। उन पर मुकदमा चला। अदालत में जब उनसे पूछा गया कि वह डायर के अन्य साथियों को भी मार सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया। उधम सिंह ने जवाब दिया कि वहां पर कई महिलाएं भी थीं और भारतीय संस्कृति में महिलाओं पर हमला करना पाप है।4 जून, 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह यह क्रांतिकारी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के
इतिहास में अमर हो गया। 1974 में ब्रिटेन ने उनका अस्थि कलश भारत को सौंप दिया।
शहीद उधम सिंह को कोटि कोटि नमन …।

अप्रैल 09, 2011

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ पहली जीत हुई दर्ज … बधाई

नन्ही बच्ची के हाँथों नींबू का रस पीकर अन्ना ने तोड़ा अनशन
भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अन्‍ना हजारे का 97 घंटे से अधिक का उपवास खत्‍म हो गया है। जन लोकपाल बिल को लेकर सरकार की ओर से सभी मांगें माने जाने के बाद अन्‍ना ने शनिवार को आमरण अनशन खत्‍म कर दिया।

सुबह साढ़े दस बजे जंतर मंतर स्थित मंच पर पहुंचे अन्‍ना ने सबसे पहले 'इंकलाब जिंदाबाद' के नारे लगाए। वहां मौजूद बड़ी संख्‍या में लोगों ने भी अन्‍ना के सुर में सुर मिलाए। अन्‍ना ने वहां मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए कहा, 'आज हमारी जो जीत हुई, आपके चलते हुई। हमारी लड़ाई अभी खत्‍म नहीं हुई। हम मिलते रहेंगे।' अन्‍ना और उनके समर्थकों ने इसे जनता की जीत करार दिया है।

अन्‍ना ने धरना स्‍थल पर अनशन पर बैठे अन्‍य लोगों को पहले जूस पिलाया, इसके बाद खुद एक बच्‍ची के हाथों जूस पीकर अपना उपवास तोड़ा। अन्‍ना के उपवास तोड़ने के साथ ही धरना स्‍थल पर जश्‍न का माहौल है। बीच-बीच में ‘अन्‍ना हजारे जिंदाबाद’ , ‘अन्‍ना तुम संघर्ष करो हम तुम्‍हारे साथ हैं’ के नारे सुनाई दे रहे हैं। मंच पर मौजूद कई कलाकारों ने गीत-संगीत के रंगारंग कार्यक्रम पेश किए।
इससे पहले सरकार ने आज सुबह साढे नौ बजे के करीब जन लोकपाल बिल से जुड़े सरकारी आदेश की कॉपी स्‍वामी अग्निवेश को सौंप दी। अग्निवेश इस कॉपी को लेकर जंतर मंतर पहुंचे और वहां मंच से इसकी कॉपी की प्रति पूरे देश को दिखाई गई। किरण बेदी ने इसे 'आत्‍म सम्‍मान' की जीत करार दिया है।

हजारे ने जन लोकपाल बिल के लिए गत मंगलवार को आमरण अनशन शुरू किया था। उसके बाद लगातार उनके साथ लोग जुड़ते गए। धीरे-धीरे भ्रष्‍टाचार के खिलाफ लोगों में गुस्‍सा भी बढ़ रहा था। इसे देखते हुए शुकवार रात सरकार ने घुटने टेक दिए। सरकार बिल के मसौदा प्रस्ताव के लिए 10 सदस्यीय समिति बनाने पर राजी हो गई। इसके बाद अन्‍ना ने ऐलान किया कि जनता की जीत हुई है और अब वह अनशन तोड़ देंगे।

दोनों पक्षों में बातचीत के बाद शुक्रवार देर रात समझौता हुआ। सरकार के प्रमुख वार्ताकार कपिल सिब्बल ने कहा कि हम लोकपाल बिल पर तुरंत काम शुरू करेंगे। हमें हर हाल में 30 जून से पहले ड्राफ्ट तैयार कर लेना है। इससे इसे मानसून सत्र में संसद में पेश करना मुमकिन होगा। हजारे ने इस कामयाबी को पूरे देश की जीत बताया। उन्होंने कहा कि सरकार ने हमारी सभी मांगें मान ली हैं।

सरकार झुकी

हजारे समर्थक किरण बेदी और स्वामी अग्निवेश ने साफ किया था कि जब तक सरकार बिल की मसौदा समिति के गठन का औपचारिक आदेश जारी नहीं करेगी तब तक अनशन खत्म नहीं किया जाएगा। इसके बाद सिब्‍बल को कहना पड़ा कि सरकार आदेश जारी करने पर भी राजी है।

मसौदा समिति के सदस्य
सरकार की ओर से : प्रणब मुखर्जी (अध्यक्ष), सदस्य- केंद्रीय मंत्री वीरप्पा मोइली, कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम तथा सलमान खुर्शीद।

सिविल सोसाइटी की ओर से : शांति भूषण (सह-अध्यक्ष), सदस्य- प्रशांत भूषण, सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज संतोष हेगड़े, आरटीआई कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल तथा अन्ना हजारे।

आगे क्या?

- बिल बनने और संसद में पेश करने की राह खुलेगी।

प्रधानमंत्री, सोनिया को पत्र

- हजारे ने अपनी मांगों को लेकर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने कहा कि जारी होने वाली अधिसूचना में इसके अध्यक्ष व सदस्यों के नाम, समय-सीमा तथा शर्तो का जिक्र हो।

- हजारे ने याद दिलाया कि सरकार संयुक्त मसौदा समिति पर राजी हुई है जिसमें 50 फीसदी सदस्य गैर-सरकारी होंगे।

- सोनिया ने हजारे से अनशन खत्म करने की अपील की थी। इस पर हजारे ने सोनिया को लिखे पत्र में याद दिलाई है कि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की उप समिति जन लोकपाल बिल के व्यापक मसौदे पर राजी थी।

- उन्होंने सोनिया से परिषद की पूर्ण बैठक में चर्चा का आश्वासन भी मांगा।

ये मांगें मानीं

समिति में सामाजिक संगठनों और सरकार के पांच-पांच प्रतिनिधि हों। बिल बनाने का काम तुरंत शुरू हो। संसद के मानसून सत्र में इसे पेश किया जाए।

दो मुद्दों पर गतिरोध

लेकिन समिति के अध्यक्ष पद पर सरकार वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को रखने पर अड़ी दिखी। लेकिन हजारे इस पर किसी रिटायर्ड जज की नियुक्ति चाहते थे। फिर हजारे ने समिति के गठन संबंधी अधिसूचना जारी करने की भी मांग रखी। लेकिन सरकार ने इससे इनकार कर दिया।

ऐसे बनी रजामंदी

बाद में हजारे ने अपने रुख में नरमी दिखाते हुए कहा कि सरकार भले ही समिति के अध्यक्ष का पद अपने पास रख ले। लेकिन सह-अध्यक्ष हमारा होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि समिति में कोई दागी मंत्री नहीं होना चाहिए।

बीच का रास्ता निकाला

हजारे ने कहा, यदि अध्यक्ष हमारा होगा तो सरकार को कठिनाई होगी। लेकिन यदि कोई मंत्री अध्यक्ष बनेगा तो कैबिनेट को उसकी सिफारिशें मंजूर करनी होंगी। अध्यक्ष और सह-अध्यक्ष के अधिकारों में कोई अंतर नहीं होगा।

अप्रैल 05, 2011

जानिए क्या है "जन लोकपाल बिल"



कुछ अवगत नागरिकों द्वारा शुरू की गई एक पहल का नाम है जन लोकपाल बिल। इस कानून के अंतर्गत, केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तक् का गठन होगा। जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण और अरविन्द केजरीवाल द्वारा बनाया गया यह विधेयक लोगों के द्वारा वेबसाइट पर दी गयी प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया गया है। यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी। कोई भी नेता या सरकारी आधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पायेगा। इस बिल को भारी समर्थन प्राप्त हुआ है। शांति भूषण, जे. एम. लिंगदोह, किरण बेदी, अन्ना हजारे आदि इसके समर्थन में हैं।
लोकपाल बिल की मांग है कि भ्रष्टाचारियों  के खिलाफ कोई भी मामले की जांच एक साल के भीतर पूरी की जाये। प्ररिक्षण एक साल के अन्दर पूरा होगा और दो साल के अन्दर अन्दर भ्रष्ट नेता व आधिकारियो को सजा सुनाई जायेगी । इसी के साथ ही भ्रष्टाचारियों का अपराध सिद्ध होते ही सरकार को हुए घाटे की वसूली की जाये। यह बिल एक आम नागरिक के लिए मददगार साबित होगा, क्योंकि यदि किसी नागरिक का काम तयशुदा समय सीमा में नहीं होता है तो लोकपाल बिल की मदद से दोषी अफसर पर जुर्माना लागायेगा और वह जुर्माना
शिकायतकर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा। इसी के साथ अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती है तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते है।  आप किसी भी तरह के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते है जैसे की सरकारी राशन में काली बाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी  या पंचायत निधि का  दुरूपयोग। और इसी तरह के जन हित के तमाम अन्य मामले ।लोकपाल के  सदस्यों  का चयन जजों, नागरिको और संवैधानिक संस्थायों द्वारा किया जायेगा। इसमें कोई भी नेता की कोई भागे दारी नहीं होगी।  इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से, जनता की भागीदारी से होगी। सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सी.बी.आई.का भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (ऐन्टी करप्शन डिपार्ट्मन्ट) का लोकपाल में विलय कर दिया जायेगा। लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण शक्ति और व्यवस्था होगी।इस बिल के प्रति प्रधानमंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियो को 01 दिसम्बर 2010 को भेजा
गया था, जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. इस मुहीम के बारे  में आप ज्यादा जानकारी  के लिए www.indiaagainstcorruption.org पर जा सकते है. इस तरह की पहल से समाज में ना सिर्फ एक उम्दा सन्देश जाएगा बल्कि, एक आम नागरिक का समाज के नियमों पर विश्वास भी बढेगा। हर सरकार जनता को जवाबदेह है और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाना हर नागरिक का हक है।
बीते 40 सालों से यह बिल देश के नेताओं ने रोक रखा है , डरते हैं कि कहीं जनता का बनाया यह बिल उन भ्रष्ट नेताओं को सलाखों के पीछे न भेज दे ।
 इसी जन लोकपाल बिल को देश में लागू करने की मांग को लेकर जनप्रिय समाजसेवक अन्ना हजारे  नईदिल्ली में जंतर- मंतर के सामने आज  05 अप्रैल 2011 से आमरण अनशन पर बैठ गये हैं । इसे भष्टाचार के खिलाफ़ अब तक की सबसे बड़ी जंग माना जा रहा है ।   अन्ना हजारे चाहते हैं कि सरकार लोकपाल बिल तुरंत लाए, लोकपाल की सिफारिशें अनिवार्य तौर पर लागू हों और लोकपाल को जजों, सांसदों, विधायकों आदि पर भी मुकदमा चलाने का अधिकार हो। लेकिन सरकार इन खास मुद्दों बहस और चर्चा की जरूरत मान रही है। 

सोमवार को पत्रकारों से बातचीत में हजारे ने आमरण अनशन पर बैठने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था, 'चूंकि प्रधानमंत्री ने लोकपाल बिल का स्वरूप तय करने के लिए नागरिक समाज के लोगों के साथ एक संयुक्त समिति गठित किए जाने की मांग को अस्वीकार कर दिया है, इसलिए पूर्व में की गई घोषणा के अनुसार मैं आमरण अनशन पर बैठूंगा। यदि इस दौरान मेरी जिंदगी भी कुर्बान हो जाए तो मुझे इसका अफसोस नहीं होगा। मेरा जीवन राष्ट्र को समर्पित है।'
हजारे मंगलवार सुबह नौ बजे राजघाट गए और उसके बाद उन्होंने इंडिया गेट से जंतर-मंतर का रुख किया। जंतर-मंतर पर उन्होंने अपना उपवास शुरू किया।
अन्ना हजारे, स्वामी रामदेव, स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी, अरविंद केजरीवाल आदि ने दिसंबर में प्राइम मिनिस्टर को पत्र लिखा था। पिछले महीने हजारे अपने साथियों के साथ पीएम, कानून मंत्री और कई बड़े अफसरों से मिले भी थे। पीएम ने उन्हें लोकपाल बिल पर समुचित कदम उठाने का भरोसा दिया था। एक कमेटी बनाने की बात भी की थी।
हजारे चाहते हैं कि उन्होंने लोकपाल बिल का जो ड्राफ्ट सरकार को दिया है, उसे उसी रूप में स्वीकार कर लिया जाए। लेकिन कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े, वकील प्रशांत भूषण और एक्टिविस्ट अरविंद केजरीवाल द्वारा तैयार इस ड्राफ्ट को मानने से पहले सरकार इस पर विचार-विमर्श करना चाहती है ।



                                    आजादी की दूसरी लड़ाई… तैयार हो भाई !!!  


अजादी की दूसरी लड़ाई लड़ी जा रही है । यह लड़ाई अब उन अपनों से है जिन्हें हमने भरोसे के साथ सत्ता पर बिठाया । इस भरोसे के साथ कि भारत को सोने की चिड़िया माना गया , तुम सब इसकी हिफ़ाजत करना , इसे स्वस्थ - तंदरुस्त - मजबूत रखना और आगे बढ़ाते रहना । लेकिन हमारे अपनों ने हमसे ही बेईमानी की , सोने की चिड़िया को सम्हालना छोड़ उसके सारे पंख ही भ्रष्टाचार की हमलावर - आक्रामक ऊंगलियों से नोच डाले । बेहद शर्मनाक काम किया , इतना ही नहीं इससे भी ज्यादा शर्मनाक काम तो वह किया कि देश की जनता को "बाहरी लोग" कह डाला प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने । अर्थात सत्ता और उस बैठे नेता-अफ़सर अंदर के शेष देश बाहरी हो गया , ऐसी घिनौनी सोच तो अंग्रेजों की भी नहीं थी , जो विशुद्ध रूप से लूटने ही आये थे भारत को ! समय है एक जुट हो कर हम सब को , सारे देश को सड़क पर उतर कर भ्रट आचरण करने वालों को नेस्तनाबूत करने की । अपने देश को बचाने की । अन्ना हजारे एक ऐसे अखण्ड दीप क नाम है जो एक पवित्र उद्देश्य के लिए प्रज्जवलित हुआ है  एक - एक दीप हमें भी बनना होगा तभी मिटेगा हमारे घर का अंधियारा , और तभी जगमगा उठेगा हमारा घर । लेकिन हमें अपने अपने घरों - दफ़्तरों - दुकानों से निकल कर सड़क पर आना होगा - आंदोलन में अपनी जीवंत भूमिका का निर्वाह कर होगा । यह ज्यादा जरूरी है । जय हिन्द - जय भारत ।

- आशुतोष मिश्र , रायपुर , छत्तीसगढ़ । संपर्क - 094242 02729.                                                                                


कौन हैं अन्ना हजारे …

अन्‍ना हजारे का वास्‍तविक नाम किसन बाबूराव हजारे है। 15 जून 1938 को महाराष्ट्र के अहमद नगर के भिंगर कस्बे में जन्मे अन्ना हजारे का बचपन बहुत गरीबी में गुजरा। पिता मजदूर थे, दादा फौज में थे। दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी। अन्ना के पुश्‍तैनी गांव अहमद नगर जिले में स्थित रालेगन सिद्धि में था। दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया. अन्ना के 6 भाई हैं।
परिवार में तंगी का आलम देखकर अन्ना की बुआ उन्हें मुम्बई ले गईं। वहां उन्होंने सातवीं तक पढ़ाई की। परिवार पर कष्टों का बोझ देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में 40 रुपये की पगार में काम करने लगे। इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया।
छठे दशक के आसपास वह फौज में शामिल हो गए. उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर पंजाब में हुई. यहीं पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बचे थे। इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक पुस्‍तक 'कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन' खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी। उन्होंने गांधी और विनोबा को भी पढ़ा।
  


अप्रैल 03, 2011

आईसीसी क्रिकेट वर्ल्डकप 2011 - हम फ़िर बने विश्व विजेता



हम फ़िर बन गये विश्व विजेता । भारत ने आईसीसी क्रिकेट वर्ल्डकप 2011 जीत कर विश्व पटल पर देश का सिर गर्व से  ऊँचा किया ।  यह क्रम , यह जोश और यही एकता यदि हर क्षेत्र में बन जाए तो क्या कहना है "इंडिया" का  !!!   बधाई टीम इंडिया को  , बधाई क्रिकेट के दिवानों को  , बधाई आप सभी क्रिकेट प्रेमियों को  ।  




गौतम गंभीर (97 रन) और कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की नाबाद अर्धशतकीय कप्तानी पारी के दम पर टीम इंडिया ने 28 साल बाद मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में एक नया इतिहास रच दिया है। आईसीसी क्रिकेट वर्ल्डकप 2011 के खिताबी मुकाबले में भारत ने श्रीलंका को 6 विकेट से हराने के साथ वर्ल्डकप खिताब पर भी कब्जा जमा लिया।

ये टीम इंडिया का दूसरा वर्ल्डकप है। धोनी के धुरंधरों ने 28 साल बाद वो कर दिखाया जो 1983 में कपिल देव एंड कंपनी ने इंग्लैंड में किया था। कप्तान धोनी ने शानदार पारी खेलते हुए नाबाद 91 रन बनाए। मैच के 48.2 ओवर में धोनी ने छक्का जमाकर भारत को ऐतिहासिक जीत दिलाई।

इस जीत के साथ ही टीम इंडिया का वनडे रैंकिंग में नंबर 1 बनना पक्का हो गया है।
भारत की इस ऐतिहासिक जीत के हीरो गौतम गम्भीर रहे जिन्होंने 97 रनों की साहसिक पारी खेली। विराट कोहली (35) के साथ तीसरे विकेट के लिए 83 रन जोड़कर भारत को वीरेंद्र सहवाग (0) और सचिन तेंदुलकर (18) के आउट होने से झटके से उबारने वाले गम्भीर ने कप्तान धौनी के साथ चौथे विकेट के लिए 109 रन जोड़कर टीम को जीत की दहलीज तक पहुंचा दिया। गम्भीर और धौनी ने विश्व कप फाइनल के इतिहास में भारत की ओर से अब तक की सबसे बड़ी साझेदारी को अंजाम दिया।

गम्भीर, धौनी और कोहली की शानदार पारियों की बदौलत भारत ने 275 रनों के लक्ष्य को 48.2 ओवरों में चार विकेट खोकर हासिल कर लिया। गम्भीर ने अपनी 122 गेंदों की पारी में नौ चौके लगाए। वह जब आउट हुए थे तब भारत को जीत के लिए 53 रनों की जरूरत थी। दूसरी ओर, धौनी 91 रन बनाकर विश्व कप में एक बल्लेबाज के तौर पर अपनी अब तक की नाकामी को धो दिया। उनके साथ युवराज सिंह 21 रनों पर नाबाद रहे।

मार्च 31, 2011

कम नहीं हुआ कन्या भ्रुण हत्या का मामला : शर्मसार हुआ देश




 जनगणना आयुक्त सी चंद्रमौली ने भारत की 15वीं जनगणना के आंकड़े जारी किये। इन आंकड़ो के अनुसार भारत की कुल आबादी एक अरब इक्कीस करोड़ पर पहुंच गयी है।  पिछले 10 सालो में भारत की आबादी 18 करोड़ बढी है।  देश में महिलाओ की कुल आबादी 58 करोड़ है।  यानि कि पिछले 10 सालो में 9 करोड़ महिलाओं की आबादी बढी है जबकि पुरुषों की कुल आबादी 62 करोड़ है। और पुरुषो की आबादी 17 फीसदी और महिलाओ की आबादी में 18 फीसदी की वृद्धि हुई है।
इस जनगणना का एक सबसे निराशाजनक तथ्य सामने आया है कि लिंग अनुपात में महिलाओं की संख्या में और कमी आई है। प्रति हजार पुरुषो के अनुपात में महिलाओ की संख्या 927 से घटकर 914 हो गई है। इतना ही नहीं गर्भ में भी लड़कियों की हत्या के मामलों मे बढ़ोत्तरी हुई है।
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक पुरुषों की आबादी 17 फीसदी बढ़ी है। वही महिलाओं की आबादी 18 फीसदी बढी है। 6 साल तक के बच्चो की संख्या घटी है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ी है।
15वीं जनगणना से प्राप्त आंकड़ो के मुताबिक उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 21 करोड़ है। जबकि जनसंख्या के हिसाब से महाराष्ट्र दूसरे नंम्बर का राज्य बन गया है। देश का एक मात्र नागालैंड ऐसा राज्य है जिसकी जनसंख्या में कमी आयी है। ठाणे देश का सबसे अघिक आबादी वाला जिला उभरा है ।  यह तो अच्छा है कि लड़कियाँ अब शिक्षा के क्षेत्र में लड़कों से आगे आ रही हैं । साक्षरता दर में भी  अब लड़कियों ने बाजी मारी है । पुरुष साक्षरता दर 38.82  %  है , वहीं महिलाओं की साक्षरता दर 49.10 % है । युवा महिलाओं की संख्या में भी पुरुषों की तूलना में इजाफ़ा हुआ है । यह संख्या प्रति हजार युवा पुरुषों पर पहले  933  थी जो अब बढ़ कर  940  हो गई है ।

मार्च 28, 2011

भारत में बाघों की संख्या बढ़ी




भारत में  बाघों (टाइगर्स) की संख्या 295 बढ़ गई है। दुनिया के सबसे ज्यादा बाघ भारत में ही रहते हैं लेकिन उनके अस्तित्व पर बराबर खतरा मंडरा रहा है. ऐसे में बाघ की आबादी के ताजा आंकड़े निःसंदेह खुश करने वाले हैं , अब भारत में बाघों की संख्या बढ़ कर 1706 हो गई है ।

पिछले साल हुई इस गणना के दौरान भारत में बाघों की संख्या 1,706 बताई गई है जो 2006 में 1,411 थी. नई दिल्ली में अधिकारियों ने बताया कि बाघों की संख्या में वद्धि की वजह सही तरह से उनकी गिनती करना है. सरकार की तरफ से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट टाइगर के राजेश गोपाल ने कहा, "हमने अपनी गिनती का दायरा पूरे भारत तक बढ़ा दिया है और हमारा अनुमान पहले से कहीं ज्यादा सही है."

दुनिया के लगभग आधे बाघ भारत में रहते हैं , लेकिन उनकी संख्या तेजी से घट रही है।
 टाइगरों की इस गणना में सुंदरवन जैसे इलाकों में भी सघन रूप से गिनती की गई। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में फैले इस इलाके को खासा दुर्गम माना जाता है। सरकार की ओर से उनके संरक्षण के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम में इस बात की पूरी कोशिश की गई है कि इस खूबसूरत जानवर को लुप्त होने से रोका जाए।

2002 में भारत में बाघों की संख्या 3,700 थी जबकि बात अगर 1947 की करें तो यह संख्या 40 हजार के आसपास थी। पूरे एशिया में अधिकारी बाघ के शिकार को रोकने की कोशिशों में जुटे हैं। जंगलों को काटे जाने से भी बाघों के बसेरे सिमट रहे हैं। यह भी उनकी घटती संख्या की वजह मानी जाती है।



मार्च 17, 2011

"गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा…"


साथी और भाई संजीत त्रिपाठी की सलाह है कि मैं,पत्रकारिता के अपने अनुभव "खबरों की दुनियाँ" में शेयर करुं । कोशिश होगी कि वर्तमान समय जो बदलाव आया या आ रहा है उसे दृष्टिगत कर अपने अनुभव आप तक इस माध्यम से पहुंचा सकूं ।पिछ्ड़ा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ , पत्रकारिता के क्षेत्र में समृद्ध रहा है । ज्यादा पुरानी बात नहीं करता 1985 से आज तक की बातें करें तो इस क्षेत्र में "मूल्यों" का बड़ा परिवर्तन आया है ।यहाँ मेरे कहने का यह मतलब कतई न निकाला जाए कि अब कहीं मूल्यवान पत्रकारिता नहीं हो रही है या फ़िर आज के साथी यह समझने की भूल कर बैठें कि वे मूल्यवान पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं और पुराने लोग बड़े आदर्शवादी थे । यहाँ मैं उन हालातों की चर्चा करने की चेष्टा करुंगा जिन्होंने पत्रकारिता के मूल्य बदले हैं और आज जिन वजहों से पत्रकारिता से जुड़े कलम के सच्चे सिपाही भी जन सामान्य को पत्रकारिता पर सरेराह टिप्पणी करते , कुछ भी कहते-बोलते सुनते रहते हैं ।
सन 1990 का दौर था एक बड़े पत्र ने रायपुर की धरती पर अपनी नींव रखनी शुरु की थी । सही मायने मे यही वह काल खण्ड था जहाँ से बदलाव की बयार बहुत धीरे-धीरे ही सही ,लेकिन बहना शुरु हो गई थी । स्थापित दो बड़े अखबारों के दिल की धड़कनें बढ़ गईं थीं । इससे पहले तक "प्रतिस्पर्धा" धीमी थी और मान-मर्यादा , लोक लिहाज से मानो डरती थी । रिपोर्टिंग की ही बात की जाय तो उन दिनों किसी भी घटना की रिपोर्ट और उसका फ़ालोअप , नतीजे तक पहुंचने तक करना पत्र की मानो एक जिम्मेदारी होती थी  , दूसरा पत्र भी समर्थन की दिशा में काम करता था । किसी भी तरह का दबाव सोचना भी मानो पाप जैसा था , तब लोग ऐसा पाप करना तो दूर सोचने से भी डरते थे । कहने का सीधा सा मतलब कि समाचार पत्रों का दबाव था अपराधी ही नहीं तत्कालीन शासन-प्रशासन भी डरता था कि उससे कहीं कोई बड़ी गलती न हो जाय , वर्ना खैर नहीं । पत्र समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भलिभाँति वाकिफ़ ही नहीं थे बल्कि सतत उसका निर्वहन भी करते थे।  पत्र-पत्रकारों की राय-सुमारी केवल सामाजिक संगठन ही नहीं , नेता और शासन-प्रशासन के लोग भी मानते थे , क्रियान्वित करते थे । मायाराम जी सुरजन , मधुकर खेर जी , बबन प्रसाद जी मिश्र , राजनारायण मिश्रा जी  'दा' , कुमार साहू जी , गिरिजा शंकर जी अग्रवाल , रम्मू शीवास्तव जी, सतेन्द्र गुमाश्ता जी ,  रामाश्रय उपाध्याय जी , बसंत तिवारी जी , नीरव जी , अनल शुक्ल जी , नरेन्द्र पारख जी , निर्भीक वर्मा जी  और इनके बाद एम ए जोसेफ़ , आसिफ़ इकबाल , सुरेश तिवारी  जैसे और बहुत सारे ऐसे नाम हैं जो पत्रकारिता करते हुए समाज हित को सर्वोपरि रखते रहे हैं । हमें सौभाग्य से ऐसे लोगों के मार्ग दर्शन में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ । समय ने करवट ली नया राज्य बना छत्तीसगढ़  राजधानी में हर बड़े पत्र - पत्रिकाओं के स्टेट ब्यूरो आए , पत्रकारिता को नई दिशा मिली , रायपुर ने भी जाना क्या होती है  ' पेड न्यूज ' । उन दिनों मैं दैनिक भास्कर में था । प्रदेश में पहली मर्तबा विधान सभा का चुनाव का समय आ गया था , मुझे और मेरे जैसे तमाम लोगों को बताया गया कि किस पार्टी की न्यूज कैसी और क्यूं लगेगी और किसकी नहीं लगेगी । चुनावी पैकेज कैसा होता है यह भी उम्मीदवारों को हमें ही समझाने को कहा गया , मेरे मना करने पर मुझे काम से हटाने की बात समझाई गयी , बाद में मेरे आग्रह पर यह काम मेरे कार्यक्षेत्र में प्रेस के उच्च पदस्थ व्यक्ति ने आ कर पैकेज डील किया प्रेस के लिए । कुछ दिनों बाद मैं कार्यमुक्त हो गया था । फ़िर मैंने रायपुर मे ही जहाँ भी नौकरी की यही तकलीफ़ आई , दरअसल मैं था संपादकीय विभाग का आदमी , मुख्य रूप से सिटी रिपोर्टर रहा , विशेष संवाददाता रहा , प्रेस प्रबंधन चाहता था मैं और मेरे साथी विज्ञापन और प्रसार का भी काम देंखें , पेपर के लिए जमीन दिलाने , सरकारी मामले -मुकदमें निपटाने का भी काम बखूबी करें जो हम नहीं करना चाहते थे । हम गुलदस्ता हाँथों में लेकर किसी मंत्री या अधिकारी के  घर - दफ़्तर के बाहर नहीं खडे होना सीख पाए थे , हमारे अग्रजों ने हमें यह नहीं सिखाया था , सो हमारे जैसे सभी लोग फ़ेल हो गये ऐसा कर पाने में और आज सब प्रेस से बाहर अपना अपना छोटा छोटा काम जो पत्रकारिता से जुडा है कर रहे हैं । हाँ 1993-94 में रायपुर से प्रकाशित पहले रंगीन दैनिक अखबार समवेत शिखर में काम करते हुए उस अखबार के लिए , तत्कालीन कलेक्टर देवराज विरदी जी से अच्छे संबंधों के चलते रजबंधा मैदान जो आज प्रेस कॉम्प्लेक्स के नाम से जाना जाता है  , वहाँ पर 44000 वर्गफ़ुट(एक एकड़) जगह उस प्रेस को एक रुपये वर्गफ़ुट के हिसाब से दिलवाने का काम जरूर किया था , इस जगह को उस समय रौद्रमुखी पत्र के लिए लेने का प्रयास किया जा रहा था लेकिन यह जगह हमें मिल गई थी । आज वहाँ नवनिर्मित कॉम्प्लेक्स बन कर तैयार है । हम तब और अब भी ऐसे कामों से अपना नफ़ा - नुकसान नहीं समझ पाए । लेकिन आज हालात किसी से छिपे नहीं हैं । हमको ही सोचना होगा हम जाने अनजाने में क्या कर रहें हैं । जहाँ कभी प्रेस की बिल्डिंग देखी थी लोगों ने उसी जगह पर विशाल शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं । लोग अब सरेराह इनपर छींटा कसी कर रहे हैं , जो इस शहर में कभी खरा - खरा लिखने के नाम से जाने जाते थे उन्हें भी सरकार से पद चाहिए , वह भी चुप बैठने को सशर्त तैयार देखे जा सकते हैं ।  साथी पत्रकार जिन्होने समय के साथ करवट बदली - उन मूल्यों को तिलांजलि दी जो कभी बेहद मूल्यवान हुआ करते थे और वे आज करोड़ों रुपयों बेशुमार दौलत के मालिक हैं जमीन के कारोबार में जुड़े तमाम लोगों के बेहद हित चिंतक हैं । यह है पत्रकारिता का नया स्वरूप । पहले कभी जिन मूल्यों की कदर थी वह मुल्य अब बेकद्री के शिकार हैं , नये मूल्य स्थापित हो गये जिन्हें रिक्शा चलाने वाला भी समझता है कि इस मूल्य से बोटल आती है  , ऐसे मूल्य आज हुए हैं यहाँ मूल्यवान । छत्तीसगढ़ में तो मानो मौका भी है और दस्तूर भी कि दोनो हाँथों से लूट लो , ऐसा मौका फ़िर कहाँ मिलेगा ? फ़िर यह भी तो सही है न कि गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा… सच ही है सब लूटो - खावो में लगे हैं इस अमीर धरती को और उसके गरीब लोगों को। मुबारक हो ।

मार्च 09, 2011

जानिए होली को उसके समूचे स्वरूप में






होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।

इतिहास

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।


राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली

इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है । शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की अहमदनगर की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।

 होली की कहानियाँ


भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है।कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था ।

परंपराएँ

होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं, और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। । वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।


होलिका दहन

होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए। लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं।


सार्वजनिक होली मिलन

होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजी, भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्रायः सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने की वज़ह से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता ।

 देश विदेश की होली

भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी १५ दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है जबकि मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है। दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया , जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के श्रृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।

साहित्य में होली

प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर , जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं। इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है। सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं। आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँ, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सव, यश चोपड़ा की सिलसिला, वी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं।

संगीत में होली


भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली हैं, जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहां ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है,अपने महबूब के घर रंग है री। इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता हैं। भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और 'नवरंग' के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।
आधुनिकता का रंग

होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते है। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं। लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं। होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। बाज़ार में इसकी उपयोगिता का अंदाज़ इस साल होली के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान केन्ज़ोआमूर द्वारा जारी किए गए नए इत्र होली है से लगाया जा सकता है।

मार्च 06, 2011

होली खेलने से पहले पत्रिका की यह खबर पढ़िए …

                                                                                                           
                                                                              


फ़रवरी 11, 2011

छत्तीसगढ़ का एक त्योहार (छत्तीसगढ़ी तिहार) "छेरछेरा पुन्नी"

छेरछेरा मांगने निकले बच्चे । फोटो  साभार : तेजेन्द्र ताम्रकार फ़्लीकर्स

धान का कटोरा
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति यहाँ के लोकमानस मे लोक रंगों की अनेक विधाएं है जो यहाँ  के  लोकजीवन का सहज चित्रण करती है| छत्तीसगढ़ मे वर्ष भर तरह - तरह के जनश्रुति से जुड़े त्योहार मनाये जाते है | पूष माह की पूर्णिमा को यहाँ समूचे प्रदेश में  "छेरछेरा" का त्योहार पारम्परिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है , यह छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति और  ग्रामीण जनजीवन में सम्पन्नता और समानता में समन्वय की भावना को प्रकट करता है | "छेरछेरा ,माई कोठी के धान हेर हेरा " के सामुहिक घोष के साथ बच्चे-बड़े मनना आरंभ करते हैं इस त्योहार को मनाना । गाँव ही नहीं शहरी क्षेत्रों में भी मनाया जाता है यह त्योहार । समूचे देश में छत्तीसगढ़ को " धान का कटोरा " के नाम से जाना जाता है । Bowl of Rice( paddy ) .


   छत्तीसगढ़ में यह पर्व नई फसल के खलिहान से घर आ जाने के बाद मनाया जाता है। इस दौरान लोग घर-घर जाकर लोग धान जो इस प्रदेश की मुख्य फ़सल है , वह मुट्ठी भर माँगते हैं । जिसकी जितनी समाई होती होती है वह अपने द्वार आने वाले को उतना धान दान देता है । यहाँ यह दान सभी छोटे-बड़े , सभी वर्ग के लोग देते - लेते हैं । इसके पीछे की कथा रतनपुर के महाराजा कल्याण साय के इस दिन अपने राज्य वापस लौटने की खुशी से जुड़ी है । आठ वर्षों बाद महाराज दिल्ली से वापस अपनी राजधानी रतनपुर (अब बिलासपुर जिला में )लौटे थे , जिसकी खुशी में राज्य में धन-धान्य लुटाया गया था । राज कोष के अलावा प्रजा ने भी अपना धन-धान्य , कोठियों में रखा - जमा किया हुआ धान दान कर खुशी का इजहार किया था । इस सब को देखकर प्रसन्न हो कर महराज ने यह घोषणा की थी कि अब से हर वर्ष इसी तिथी को "छेरछेरा" पर्व मनाया जाएगा । तभी से प्रतिवर्ष यह त्योहार लोक परंपरा के अनुसार पौष माह की पूर्णिमा को  " छेरछेरा पुन्नी " के नाम से  मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही बच्चे, युवक व युवतियाँ हाथ में टोकरी, बोरी आदि लेकर घर-घर छेरछेरा माँगते हैं। वहीं युवकों की टोलियाँ डंडा नृत्य कर घर-घर पहुँचती हैं। धान मिंसाई हो जाने के चलते गाँव में घर-घर धान का भंडार होता है, जिसके चलते लोग छेर छेरा माँगने वालों को मुक्त हस्त दान देते हैं। इसी त्योहार में छत्तीसगढ़ के तमाम जमीदारों - दाऊ कहे जाने वाले सम्पन्न लोगों ने जरूरतमंदों - ब्राह्मणों को जमीन -जायदाद आदि भी दान दिया है । मंदिर-देवालय बनवाये हैं ।बहुत ही समृद्धशाली है छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पुन्नी का इतिहास । इस दिन लोग इतने प्रसन्न बदन देखे जाते कि वे इस त्योहार के दिन कामकाज पूरी तरह बंद रहते हैं - पूरे दिन इस त्योहार की उमंग - तरंग में खोए रहते हैं । इस दिन लोग प्रायः गाँव छोड़कर बाहर नहीं जाते ।

फ़रवरी 07, 2011

" ब्रह्मकमल "

ब्रह्मकमल का अर्थ है ‘ब्रह्मा का कमल’। यह माँ नन्दा का प्रिय पुष्प है । तालाबों या पानी के पास नहीं बल्कि ज़मीन पर होता है। ब्रह्मकमल 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है। ब्रह्मकमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। और इसकी भारत में लगभग 61 प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें से लगभग 58 तो अकेले हिमालयी इलाकों में ही होती हैं।
ब्रह्मकमल का वानस्पतिक नाम सोसेरिया ओबोवेलाटा है। यह एसटेरेसी वंश का पौंधा है। इसका नाम स्वीडर के वैज्ञानिक डी सोसेरिया के नाम पर रखा गया था। ब्रह्मकमल को अलग-अगल जगहों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तरखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस नाम से इसे जाना जाता है।
ब्रह्मकमल भारत के उत्तराखंड, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश, कश्मीर में पाया जाता है। भारत के अलावा यह नेपाल, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान में भी पाया जाता है। उत्तराखंड में यह पिण्डारी, चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदारनाथ आदि जगहों में इसे आसानी से पाया जा सकता है।
इस फूल के कई औषधीय उपयोग भी किये जाते हैं। इस के राइज़ोम में एन्टिसेप्टिक होता है इसका उपयोग जले-कटे में उपयोग किया जाता है। यदि जानवरों को मूत्र संबंधी समस्या हो तो इसके फूल को जौ के आटे में मिलाकर उन्हें पिलाया जाता है। गर्मकपड़ों में डालकर रखने से यह कपड़ों में कीड़ों को नही लगने देता है। इस पुष्प का इस्तेमाल सर्दी-ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है। इस फूल की संगुध इतनी तीव्र होती है कि इल्का सा छू लेने भर से ही यह लम्बे समय तक महसूस की जा सकती है और कभी-कभी इस की महक से मदहोशी सी भी छाने लगती है।
इस फूल की धार्मिक मान्यता भी बहुत हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे बुरी आत्माओं को भगाया जाता है । इसे नन्दाष्टमी के समय में तोड़ा जाता है और इसके तोड़ने के भी सख्त नियम होते हैं जिनका पालन किया जाना अनिवार्य होता है। यह फूल अगस्त के समय में खिलता है और सितम्बर-अक्टूबर के समय में इसमें फल बनने लगते हैं। इसका जीवन 5-6 माह का होता है।

दिसंबर 06, 2010

बढ़ी मानव तस्करी ; छत्तीसगढ़ एक बड़ा बाजार


पत्रिका के रायपुर संस्करण ने अपने सोमवार 06 दिसम्बर 2010 के अंक में संजीत कुमार की चौंकाने वाली खबर प्रकाशित की है , यह खबर शर्मनाक और चिंताजनक भी है । पत्रिका बताता है कि महिलाओं की तस्करी करने वालों के लिए छत्तीसगढ़ एक बड़ा बाजार बन चुका है। प्रदेश की बालाओं को बहला-फुसलाकर देश के अन्य राज्यों में ले जाकर बेच देने की कई घटनाएं सामने आई हैं।

आंकड़ों पर गौर करने पर पता चलता है कि बीते तीन साल में करीब साढ़े छह हजार महिलाएं गायब हो चुकी हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें लगभग आधी संख्या नाबालिग लड़कियों की है। पुलिस गुमशुदगी का मामला दर्ज कर अपना कर्तव्य पूरा कर रही है। इन लड़कियों का आंकड़ा साल दर साल बढ़ता जा रहा है।
राज्य में मानव तस्करी की सबसे ज्यादा घटनाएं आदिवासी बहुल सरगुजा और बस्तर में सामने आ रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2007 से 2009 के बीच राज्य से करीब 18664 लोगों के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज की गई।
इनमें सबसे ज्यादा संख्या महिलाओं और बालिकाओं की है। इन तीन सालों में लगभग 4500 से अधिक नाबालिग लड़के भी गायब हुए हैं। पुलिस अफसरों के अनुसार पिछले कुछ सालों के दौरान राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में भी गुमशुदगी के मामले बढ़े हैं, लेकिन इनमें से ज्यादातर मामले थानों तक नहीं पहुंचते। इस वजह से वहां के सही आंकड़े नहीं मिल पाते।
-शिकायत ही नहीं पहुंचती
राज्य के आदिवासी क्षेत्रों से भी बड़े पैमाने पर महिलाओं और युवतियों के गुम होने की घटनाएं हो रही हैं। जानकारी का अभाव सहित अन्य कारणों से इनमें से ज्यादातर मामलों की शिकायत पुलिस तक नहीं पहुंच पाती।
-पकड़ी जा चुकी है मानव तस्करी
करीब दो साल पहले रायपुर पुलिस ने एक कंटेनर पकड़ा था। उसमें 50 से अधिक लोगों को चोरी-छिपे दूसरे राज्य ले जाया जा रहा था। जम्मू व उत्तरप्रदेश सहित कई अन्य राज्यों में यहां के लोगों को बंधक बनाए जाने की भी लगातार सूचनाएं आती रहती हैं।
सरकार स्वीकार चुकी है मानव तस्करी
पूर्व गृहमंत्री नंदकुमार पटेल के अनुसार राज्य की बालिकाओं और मासूम बच्चियों की तस्करी की जा रही है। उन्हें दूसरे राज्यों में ले जाकर बेचा जा रहा है। वर्तमान सरकार भी इस बात को विधानसभा में स्वीकार कर चुकी है। इसके बावजूद इसे रोकने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है।
-महानगरों में सप्लाई
करीब ढाई साल पहले बस्तर की एक लड़की को दिल्ली पुलिस ने कुछ लोगों की चंगुल से मुक्त कराया था। युवती को अच्छा काम दिलाने के बहाने दिल्ली ले जाकर बेच दिया गया था। पुलिस अफसरों के अनुसार सरगुजा क्षेत्र की कई लड़कियों को दिल्ली, मुम्बई व पुणे आदि शहरों से मुक्त करा कर लाया गया है।
-नहीं देते सूचना
पुलिस अफसरों के अनुसार कई बार गुम इंसान कुछ समय बाद लौट आता है, लेकिन परिवार के लोग इसकी सूचना थाने में नहीं देते। इस वजह से भी आंकड़े बढ़ जाते हैं।
गुम इंसानों की तलाश के लिए हरसंभव प्रयास करने के निर्देश सभी थानों को दिए गए हैं। इसके तहत समय-समय पर थाना स्तर पर गुम इंसानों का पॉम्पलेट और पोस्टर भी चस्पा किया जाता है। दूसरे थानों, जिलों और प्रदेशों को भी सूचना दी जाती है। इसकी मॉनिटरिंग के लिए पुलिस मुख्यालय में सीआईडी शाखा के अधीन राज्यस्तरीय एक सेल भी बनाया गया है।
-राजेश मिश्रा, प्रवक्ता, छत्तीसगढ़ पुलिस
साभार : पत्रिका रायपुर , संजीत कुमार

नवंबर 28, 2010

क्यों कोई नहीं डरता जनता से ?


सुनने में उन्हें जरूर बुरा लग सकता है जो सरकार से या फ़िर सीधे पी डब्लु डी डिपार्टमेंट से जुड़े हैं , लेकिन सच तो यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री के निवास से सीधे नया सर्किट हाऊस जाने वाली आधा किलोमीटर की नई बनी सड़क में चार जगह आपको लहर, उतार-चढ़ाव मिलेंगे । यहाँ शायद यह बताना भी जरूरी होगा कि मुख्यमंत्री का काफ़िला इस मार्ग से होकर दिन में कई मर्तबा गुजरता है , मंत्रालय से वापसी के लिए यही मार्ग तय किया जाता  है ।जब यह हाल मुख्यमंत्री  निवास के सामने की सड़क का हो सकता है तो सोचिए बाकि जगह काम कैसा होता होगा ? मुख्यमंत्री निवास से विधानसभा जाने वाला मार्ग की टायरिंग इससे पहले कई बार उखड़ चुकी है । हफ़्तों अखबारों के पन्ने रंगे रहे इनकी खबरों से । हर साल बनने वाली यह सड़क जिसके दोनो ओर नेता प्रतिपक्ष, मंत्रियों , मुख्य सचिव अन्य अधिकारियों के बंगले हैं वह उखड़ती है और किसी को कोई फ़र्क तक नहीं पड़ता । राज भवन के सामने  से सिविल लाइन जाने वाली  सड़क का हाल आप स्वंय  देख आईये ।  ठेकेदार का रुतबा कम नहीं होता , उसे और नए नए काम दिये जाते हैं । कभी लगता है कि  क्यों कोई नहीं डरता जनता से ? फ़िर लगता है, अब तो विभाग के मंत्री और सचिव ही बहुत नामी हैं , अब डर काहे का !!!

नवंबर 11, 2010

ठहरो , जरा रुको ; अभी मेरे शहर का विकास चल रहा है…


जी हाँ ,मेरा शहर अभी विकास के दौर से गुजर रहा है । यहाँ आसपास के हर खेत-खलिहान पाटे जा रहे हैं , शहर की हर झोपडी तोड़ी जा रही है , छोटे - छोटे बाजार उजाडे जा रहे हैं ,यहाँ खड़े होंगे बडे बाज़ार , बडे-बडे मकान जो शहर के विकास के साक्षी बनेंगे । न रहेगा कोई गरीब  ना रहेगी गरीबी मेरे इस शहर में । गरीब और गरीबी को हमेशा हमेशा के लिए हटा कर एक सुन्दर सा शहर सिंगापुर - बैंकाक जैसा शहर बनायेंगे इसे राज्य के आई ए एस  अधिकारी और नेता मेरे शहर को । भा ज पा का शासन है लिहाजा संस्कृति की रक्षा होगी , हर गली मोहल्ले का नाम बदल जाएगा । हर गली-चौराहे में कमल ही कमल खिलेगा । जगह जगह बस कमल विहार ही बनेगा । हर जगह जहाँ कहीं भी झोपड़ियाँ दिखेंगी तोड़ दी जाएंगी । उस जगह खिलेगा कमल । मुझे शर्म नहीं, गर्व है अपनी सरकारों पर , अपने प्रशासनिक अधिकारियों - नेताओं पर कि आज मेरे शहर का नाम सारा देश जानता है - कभी गंदगी के लिए तो कभी मंहगाई के लिए ,नेता और अधिकारियों की बेशुमार कमाई के लिए । कलकत्ता और मारवाड़ के बैंकों से लूट कर लाई गई मलाई के लिए । इटली ,मलेशिया , सिंगापुर , उड़ीसा , महाराष्ट्र और राजस्थान में लगाई गई छत्तीसगढ़ की गाढ़ी कमाई के लिए ।  ठहरो , जरा रुको । अभी मेरे शहर का विकास चल रहा है । मीडिया इस पर फ़िनीशिंग की मुहर लगा रहा है । नेता - अधिकारी बताते हैं -गरीब लुट रहे हैं - बर्बाद हो रहें हैं तो यह नीयति ही है उनकी । हम तो दे रहे हैं न दो - तीन रुपये में  चाँवल -सस्ती शराब , और क्या चाहता है यह गरीब ? हजारों रुपये दे रहे हैं न इसे ,इसकी जमीन के , खोल रहे हैं न इसकी जमीन पर कारखानें - खदानें , बना रहे हैं न इनकी खेतिहर बेकार जमीनों पर सुन्दर-सुन्दर मकान और दुकानें और क्या चाहिये इस 'गरीब' को ? देखिएगा देखते जाइयेगा इक दिन ऐसा भी आयेगा जब मेरे शहर को कोई भी न पहचान पाएगा , जगह-जगह जब वह नई -नई बुलंद ईमारतें ही पाएगा , चक्कर खाकर गिर जायेगा । और मेरा शहर विकसित हो जाएगा । ईमारतों की फ़सल यहाँ लहलहाएगी , गरीब और गरीबी कोषों दूर तक भी नजर नहीं आएगी । सच्चे भारत का सपना यहीं से साकार होगा , अन्य प्रदेशों का यह प्रदेश मॉडल आधार होगा । सच पूछें तो शायद ऐसे ही इस देश का उद्धार होगा । गांधी जी का सपना साकार होगा । गरीबी और गरीबों से रहित नव भारत का निर्माण होगा  - छत्तीसगढ़ इसका द्वार होगा ।

अक्टूबर 31, 2010

क्या हमारे शहर आने वाला खोवा असली है ???

 पिछले साल  जप्त किया गया नकली खोवा 
दिवाली आ गई । शहर की मिठाई दुकानों में हजारों किलो मिठाइयों के आर्डर हैं , बिना आर्डर के भी हजारों किलो मिठाइयाँ बिकनी हैं ।समूचे प्रदेश में लाखों किलो मिठाइयाँ बिकतीं हैं इस दौरान । सिंथेटिक खोवा जो कि आलू , शकरकंद, स्टार्च के साथ  यूरिया खाद , डिटर्जेंट पाउडर , एसेंस और अन्य तमाम तरीकों के जहरीले - प्राण घातक अखाद्य पदार्थों के मिश्रण से बनाया जाता है , बहुत ही घातक होता है  , ऐसा टनों खोआ पिछ्ले दो हफ़्तों से बेधड़क बाहर से आ रहा है , कोई रोक-टोक या जाँच का सवाल यहाँ नहीं उठता । क्यों ?  क्या नकली खोवा , आम आदमी की जिंदगी  से खिलवाड़ करने वाला खोवा नहीं आता हमारे यहाँ ? मगर सरकार में बैठे प्रभावशाली लोगों का कहना है कि पुलिस या खाद्य विभाग ऐसी कोई भी कार्यवाही न करे जिससे कि हमारे व्यापारी बंधुओं को कोई परेशानी का सामना ऐन त्योहार के वक्त करना पड़े । याद रहे कि नकली खोवा पकडने जाने के जुर्म में प्रदेश के एक पुलिस अफ़सर को नगर के एक सर्वाधिक चर्चित मंत्री ने खूब खरी-खोटी सुनाई थी । इस घटना से क्षुब्द पुलिस अधिकारी लम्बी छुट्टी पर चले  गये  , इस बात को साल भर से ऊपर हो गया है , अधिकारी आज भी छुट्टी पर है , और बडे से बडा पुलिस अधिकारी अब रायपुर में नकली खोवा पकडने के काम से मानो तौबा कर लिया है । तो खावो नकली और जानलेवा खोवा-मिठाई । आम आदमी भी अपने को बेबस - लाचार बता कर लगा है इस नकली खोए को खाने , और अपने शरीर में नित्य नई तरह की बीमारियों को जन्म देने पालने में । उसमें भी इतना साहस नहीं - समझ नहीं कि वह इस नकली और जानलेवा मिठाइयों का त्याग - तिरस्कार कर सके , कम से कम अपनी और अपने परिजनों के स्वास्थ्य की रक्षा कर सके । इस बात का विश्वास बेचने वालों को है । उन्हें यह भी मालूम है कि जब तक कोई बडी घटना न हो जाय यहाँ सब कुछ ऐसा ही चलता रहेगा ,और कोई घटना हो भी गई तो सम्हल ही जाएगी ,  आखिर ये बेचने वाले कोई और नहीं कहीं न कहीं है मंत्री के ही जातभाई हैं - भाईबंद हैं । कोई कुछ नहीं कर सकता इनका ,दिखा दिया है कि बडे ही दमदार हैं ये मिठाई बेचने वाले छत्तीसगढ़ की राजधानी के । जय हो  छत्तीसगढ़ महतारी !!!
छत्तीसगढ़ में एक तरफ जहां भ्रष्ट मंत्री और अफसर बेसुमार हैं तो ईमानदार अफसरों की भी कमी नहीं है। पुलिस जैसे विभाग के एक ईमानदार एएसपी शशिमोहन सिंह ने इस्तीफा सीधे तौर पर मंत्री के मुंह पर मारा है। अभी उनके इस्तीफे के एक दिन पहले ही नगर निगम के ईमानदार आयुक्त अमित कटारिया को राजनीति के खेल में हटाया गया था। अब इससे पहले की शशिमोहन सिंह का भी हश्र ऐसा ही होता उन्होंने इस्तीफा देने में भला समझा और सीधे इस्तीफा देकर चर्चा में आ गए है। यह वाकया अक्टूबर 2009 का है । वे आज भी छुट्टी पर हैं।

फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

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