मेरा अपना संबल

रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस

रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा   :  मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस
रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।
समस्याएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समस्याएँ लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मई 16, 2011

2G SCAM : PLEASE SHARE IF YOU CARE.




PLEASE SHARE IF YOU CARE.


1) CAG report on 2G scam identified three groups of


losses.
a) 102498 cr loss with 122 licenses,
b) 37154 cr dual tech,
c) 36993 cr below 6.3Mhz spectrum


2) CBI has been focusing only on the 122 new license


part (2007-08) of 2G scam. A.Raja, Kani., etc are from here.  :  )




3) Dual Tech Part:- Reliance-14 circles, Tata-19 circles &


others-2 circles,a 2G scam loss of Rs.37,154 cr are NOT


under CBI probe at present    : (


4) 2G scam's spectrum under 6.2MHz:- BSNL/MTNL,


Bharti, Vodafone and IDEA, totalling Rs.36,993 cr loss,


NOT under CBI investigation now    : (


Source: @DNA Newspaper.

मई 10, 2011

पेंशन की खातिर एक वृद्ध सब इंजीनियर ने कलेक्टोरेट अधीक्षक को मारा चाकू

सामने दिख रहे हैं रिटायर्ड सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ,पीछे सफ़ेद पैंट और
 ब्लू लाईनिंग शर्ट पहने हुए हैं जिला अधीक्षक जिन पर हमला हुआ । 
यह चित्र धटना के बाद का है ।



राजधानी रायपुर में पिछले चार वर्षों से अपनी पेंशन पाने के लिए भटक रहे एक वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने कलेक्टोरेट अधीक्षक पर चाकू से हमला बोल दिया । अपनी पेंशन पाने सरकारी दफ़्तरों के चार साल से चक्कर लगाते - लगाते हताश हो चले इस वृद्ध के सब्र का बांध टूट गया और  मानो मरने - मारने पर आमदा हो गया वह थक हार कर । 09 मई 2011 की दोपहर इस वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने चाकू से जिला कलेक्ट्रेट में पदस्थ अधीक्षक जे आर साहू के गाल पर चाकू से वार किया और तभी मौके पर मौजूद जिला प्रशासन अन्य कर्मियों ने फ़ौरी तौर पर उसे पकड़ पुलिस के हवाले कर दिया । इतनी ही फ़ूर्ती यदि उसके पेंशन प्रकरण में निबटारे के लिए दिखाई गई होती तो शायद ऐसे वाकिए ही न होते । फ़िर क्या था सामने आया देश का कानून जिसने परेशान उस वृद्ध को सजा देने अपना लम्बा हाँथ आगे बढ़ाया ,  मगर यही कानून उसे उसके हक की पेंशन न दिला पाया ।
 हताशा की यह छूरी चलाई है 36 साल जल संसाधन विभाग में कार्यरत रहे सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने , जिन्हें विभाग से रिटायर हुए वर्षों हो चुकने के बाद भी आज तक पेंशन तक नसीब नहीं हो पाई है । जी पी एफ़ विभाग ने फ़ंसा रखी है इस व्यक्ति की पेंशन की फ़ाईल और घुमाता रहा जिला कार्यालय इसे ।
नियम है कि रिटायरमेंट के बाद अगले ही महिने से मिलने लगती है पेंशन और यदि किन्हीं कारणों से देर हो रही हो तो पेंशन की यह राशि उस व्यक्ति को एरियर्स के रूप में तुरंत मिलने लगती है । खेद जनक पहलू यह कि यहाँ उस वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह को ऐसी कोई सुविधा नहीं मिल पाई , सिवाय प्रताड़ना और दफ़्तरों के चक्कर पर चक्कर लगाने के , वह अपने तमाम दस्तावेजों से भरा भारी भरकम (करीब 20 - 25 किलो वजनी) बैग टांगे सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाता रहता और दोपहर लंच के समय कौफ़ी हाऊस पहुंच कर कभी दूध ब्रेड तो कभी चाय ब्रेड खा कर दोबारा उन्हीं दफ़्तरों के चक्कर काटने के लिए ताकत जुटाता दिखा ।
पेंशन और ग्रेच्युटी के लिए लगातार चार साल से चक्कर काट रहे सेवानिवृत्त सब इंजीनियर लोकेंद्र सिंह ने सोमवार को कलेक्टोरेट के अधीक्षक जतिराम साहू पर  जब चाकू से हमला कर दिया तब  हमले की खबर से कलेक्टोरेट परिसर में हड़कंप सा मच गया। कार्यालय के सभी अधिकारी और कर्मचारी तत्काल अधीक्षक कार्यालय के बाहर जमा हो गए। आनन-फानन में पुलिस को सूचना दी गई। गोलबाजार थाने की पुलिस पहुंचने के बाद घायल अधीक्षक को तत्काल डॉक्टरी मुलाहिजे के लिए आंबेडकर अस्पताल ले जाया गया। आरोपी को मौके पर ही चाकू के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

बालाघाट निवासी लोकेंद्र सिंह की माली हालत अच्छी नहीं बताई जाती है , वह  जलसंसाधन विभाग रायपुर में सब इंजीनियर के पद पर पदस्थ थे। वे चार साल पहले ही सेवानिवृत्त हो गए थे, लेकिन उनकी ग्रेच्युटी और पेंशन का भुगतान अब तक नहीं हो पाया था। जिसके लिए उन्हें बारबार बालाघाट से यहाँ रायपुर के चक्कर लगाने पड़ते हैं । तीन दिन पहले ही उन्होंने कलेक्टर से मुलाकात कर भुगतान करने के संबंध में आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई थी। कलेक्टर ने यह पत्र कार्यवाही के लिए कलेक्टोरेट अधीक्षक के पास भेज दिया। सोमवार को लोकेंद्र ने अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर अपने प्रकरण में आवश्यक कार्रवाई की मांग की। अधीक्षक श्री साहू ने उन्हें कुछ देर बैठने के लिए कहा। काफी समय तक अधीक्षक के बुलावे का इंतजार कर लोकेंद्र को देर तक नहीं बुलाया गया। इससे आक्रोशित होकर उन्होंने अपने पास रखे सब्जी काटने के चाकू से जति राम पर हमला कर दिया। चाकू के वार से अधीक्षक के गाल पर हल्की खरोंच आई है। तात्कालिक उपचार के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
ऐसा तो हाल है राजधानी रायपुर में संवेदनशील कही जाने वाली सरकार के महकमे का , वह अपने सरकारी अधिकारियों - कर्मियों को जब तंग करने से बाज नहीं आ रहा है तो भला सोचिए आम आदमी यहाँ किस हाल में और कैसा होगा ? लोकेन्द्र अकेला नहीं है आज भी यहाँ पेंशन के हजारों प्रकरण लंबित हैं जिसकी परवाह किसी को भी नहीं है , क्या सभी को वृद्धावस्था में अपनी - अपनी पेंशन पाने इसी तरह चाकू - छूरी का सहारा लेना होगा ?
' सिस्टम' के गाल पर पड़ी हताशा की इस छूरी से क्या कुछ सबक लेगा यहां का स्वयंभू और कथित ' संवेदनशील' प्रशासन , कहा नहीं जा सकता !!!  

मई 08, 2011

अंग्रेजों से कहीं ज्यादा बर्बर और लालची लोग




अंग्रेजों से कहीं ज्यादा बर्बर और लालची साबित हो रहे हैं हमारे अपने लोग जिनके हाँथों में है सत्ता की बागडोर । उत्तर प्रदेश अकेला नहीं है समूचे देश में इस समय सत्ताधीश और पूर्व सताधीश मिलजुल कर जमीन का कारोबार खुलेआम , बेझिझक पूरी बेशर्मी के साथ करतेअ देखे जा सकते हैं । किसानों की जमीनों को सस्ते में खरीद कर बड़े औद्योगिक धरानों को ऊंचे दामों व अपनी शर्तों पर उपलब्ध कराने का काम करने में मस्त हैं ये कथित राजनेता और अखिल भारतीय स्तर पर एकजुट भी हैं , दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर एक हैं ये ।
उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध जिले के भट्टा ग्राम में अपनी जमीन के जबरिया और मनमाने अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों और उनके परिजनों के साथ खून की होली खेलने पर आमदा है उत्तर प्रदेश का कथित दलित पीड़ित जनों का शासन । यहाँ शासन ने अपनी योग्यता और नीयत का खुला प्रदर्शन कर दिया है । देश है कि तमाशबीन बना बैठा है और हिजड़ों के जैसा बैठा है केन्द्र शासन। उत्तर प्रदेश पीएसी के जवानों ने नोएडा के भट्ठा गांव में रात भर तांडव मचाया। यहां किसानों की धरपकड़ के लिए पुलिस ने घरों में घुस कर बच्‍चों और महिलाओं को प्रताडि़त किया। गांव की महिलाओं का आरोप है कि कई पुलिस वालों ने लूटपाट भी की। यही नहीं सोते बच्‍चों पर भी पुलस वाले अत्‍याचार करने से बाज नहीं आये।
पुलिस ने किसानों पर जमकर लाठियां भांजी और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोलियां भी चलाईं। पुलिस ने रात भर अभियान चलाकर 100 से ज्‍यादा किसानों को हिरासत में लिया है। गौतमबुद्धनगर में धारा 114 लागू कर दी गई है। आगरा व ग्रेटर नोएडा दोनों जगह भारी संख्‍या में पुलिस बल तैनात कर दिये गये हैं।
नोएडा एक्‍सप्रेस वे के निर्माण के लिए अपनी जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ ग्रेटर नोएडा में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस की फायरिंग, रात भर भट्ठा गांव में रात भर किसानों की धरपकड़ के लिए पुलिस का तांडव और अब रविवार की सुबह से आगरा में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की दोबारा फायरिंग। जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शनिवार को नोएडा से भड़का किसानों का उग्र आंदोलन निर्माणाधीन यमुना एक्सप्रेसवे के आखिरी छोर आगरा तक पहुँच गया है । अधिकारियों के अनुसार रविवार को आगरा में किसानों के साथ संघर्ष में प्रांतीय सशस्त्र बल पीएसी के कम से कम चार जवान घायल हो गए हैं, जबकि नोएडा में मरने वालों की संख्या पांच हो गई है ।
नोएडा में मरने वालों में दो पुलिस जवान और दो किसान हैं , जबकि पांचवें व्यक्ति की शिनाख्त नही हो पाई है ।
 जी हां ग्रेटर नोएडा से लेकर आगरा के चोगन ग्राम तक किसानों पर पुलिस का कहर जारी है। वो भी उस दिन जब प्रदेश सरकार के चार साल पूरे हुए हैं।
उत्‍तर प्रदेश में मायावती सरकार ने आज अपने चार साल पूरे किये हैं, लेकिन ऐसे समय में जहां मुख्‍यमंत्री अपनी उपलब्धियों का बखान करने निकली हैं, वहीं दूसरी ओर उन्‍हीं की पुलिस किसानों पर कहर बरपा रही है। शनिवार को ग्रेटर नोएडा में फायरिंग के दौरान एक जवान और दो किसानों की मौत के खिलाफ आगरा व ग्रेटर नोएडा दोनों जगह किसानों ने रविवार की सुबह जमकर प्रदर्शन किया। इस दौरान किसानों ने आगरा में कई फैक्ट्रियों में आग लगा दी और एक्‍सप्रेस हाईवे जाम कर दिया। उधर अलीगढ़ के किसान भी आंदोलन में उतर आये हैं।
छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का तो हाल ही बुरा है । यहाँ तो सरकारें ही नहर , तालाब और बांध औद्योगिक घरानों को बेच रही है , विधान सभा में आये दिन हंगामें होतो और शांत पडते देखे-सुने जाते हैं । किसानों की जमीनें हथियाने और कालोनी बनाने का काम यहाँ भी जोरशोर से चल रहा है ,लोग कोलकाता , ओरिशा , राजस्थान , बिहार , और महाराष्ट्र से आकर यहाँ बड़ा इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं और सता के संगवारी उनके साथ देखे जा सकते हैं । यहाँ जमीनों के मामले अदालतों में न्याय पाने की अभिलाषा लिये अपनी अपनी बारी आने की बाट जोह रहे हैं ।




मई 02, 2011

शर्म करो बेशर्मों , कुछ तो सीखो …


ओसामा बिन लादेन (जिंदा)
ओसामा बिन लादेन (मुर्दा)


विश्वगुरू बनने की लालसा रखने वाले भारत के दो मुहें नेताओं को कुछ सिखने और शर्मसार होने का समय आया है । एक ओर जहाँ विश्व के सर्वाधिक भ्रष्ट और बड़े तानाशाह, लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी को साफ़ करने की मुहिम जारी है, त्रिपोली उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के हवाई हमले में शनिवार 29अप्रैल को लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी बाल-बाल बच गए लेकिन उनके सबसे छोटे बेटे सैफ अल-अरब गद्दाफी (29) और तीन पोतों की मौत हो गई।
 वहीं इसी बीच यह खबर आती है कि दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन अल कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन आखिरकार मारा गया। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने ओसामा के मारे जाने की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। पाकिस्‍तान की राजधानी इस्‍लामाबाद के समीप अबोटाबाद में एक आलीशान हवेली में छिपे लादेन को सीआईए के ऑपरेशन में मार गिराया गया।अमेरिका ने ले लिया 9 / 11 की घटना का बदला दस वर्षों बाद , ढ़ूंढ़ कर मार गिराया अपने दुश्मन को ।
आतंकवाद को जड़ से मिटाने की बात कहने वालों ने कामयाबी पा ली है , श्रीलंका ने भी चीन की मदद से अपने यहाँ लिट्टे का सफ़ाया कर लिया । सिर्फ़ अमेरिका की चमचागिरी करना ही “विदेश नीति” नहीं होती, यह बात कौन हमारे नेताओं को समझायेगा? आखिर कब भारत एक तनकर खड़ा होने वाला देश बनेगा। तथाकथित मानवाधिकारों की परवाह किये बिना कब भारत अपने बारे में सोचेगा?
अमेरिका में 9 / 11 की घटना
   जो कुछ चीन ने श्रीलंका में किया क्या हम नहीं कर सकते थे ?
 शर्म आनी चाहिए उनको जो भारत में आतंकवाद को , आतंकवादियों को खुले आम पनाह देते हैं , डरते हैं कसाब और अफ़जल गुरु जैसे आतंकवदियों को सजा देने से । भला ऐसे कमजोर नेता कैसे बलवान भारत बनायेंगे ???

सीआईए प्रमुख लियोन पेनेटा ने अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए पाकिस्तान में चलाए गए अभियान की जानकारी मंगलवार को अमेरिकी सांसदों को दी।

सांसदों के साथ बातचीत में समझा जाता है कि पेनेटा ने बताया कि अमेरिका ने पाकिस्तान को इसलिए कोई सूचना नहीं दी थी क्योंकि उसे लगता था कि यदि कोई सूचना दी गयी हो तो वह लीक हो सकती है।

अमेरिकी कांग्रेस की खबरों की कवरेज करने वाले दी हिल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सीआईए चीफ पेनेटा ने सीनेटरों को एक बैठक में बिन लादेन मिशन के बारे में जानकारी दी और बताया कि प्रशासन ने पाकिस्तान को सूचित नहीं करने का फैसला किया था क्योंकि आशंका थी कि जानकारी लीक हो सकती है और मिशन में बाधा आ सकती है।

बैठक में मौजूद एक सांसद ने यह जानकारी दी। पेनेटा ने इससे पहले टाइम मैगजीन को बताया था कि यह फैसला किया गया कि पाकिस्तान के साथ मिलकर कार्रवाई करने का कोई भी प्रयास अभियान को पंगु बना सकता है। हो सकता है कि वे संबंधित लोगों को चेतावनी दे दें।

बैठक के बाद सांसद पीटर किंग ने संवाददाताओं से कहा कि यह यकीन करना असंभव है कि जिस प्रकार की आधुनिक खुफिया एजेंसी और सैन्य क्षमता पाकिस्तान के पास है, उसके बावजूद उन्हें यह नहीं पता हो कि दुनिया का सर्वाधिक वांछित आतंकवादी खुले आम इस कदर आंखों के सामने रह रहा है।

उन्होंने सवाल किया कि पाकिस्तान को अहसास होना चाहिए कि कांग्रेस में कई सदस्य गंभीर सवाल उठा रहे हैं। सवाल यह है कि दुनिया का सर्वाधिक वांछित आतंकवादी उनके बीच में रह रहा है और वे उसे पकड़ नहीं सकते तो हमें क्यों सालाना तीन अरब डॉलर की राशि उसे देनी चाहिए।

अप्रैल 19, 2011

क्या होगा कांग्रेस का यहाँ … ?

छ्त्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष नंद कुमार पटेल



क्या होगा कांग्रेस का यहाँ … ?

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के हालात किसी से छिपे नहीं हैं , इन्हीं हालातों के बीच पार्टी आलाकमान ने पूर्वमंत्री नंद कुमार पटेल को प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है । अब दौर है कहीं खुशी - कहीं गम का क्योंकि यही खासियत है इस पार्टी कि जितने सर उतने धड़े , गुटीय राजनीति ने सर्वाधिक नुकसान किया है कांग्रेस का , यह बात सभी कांग्रेसी और गैरकांग्रेसी बखूबी जानते - समझते हैं , पर कांग्रेस को बचाने के लिए शायद समझना ही नहीं चाहते ।

प्रदेश में कांग्रेस की इस दुर्गति के जिस एक अतिजिम्मेदार नेता का नाम लिया जाता है , उसका उल्लेख करना अब यहाँ जरूरी नहीं समझता हूँ , समूचा प्रदेश ही नहीं बल्कि देश जानता है उस नेता तो , शुक्र है उस नीली छतरी वाले का जिसने छत्तीसगढ़ को दूसरा बिहार बनने से बचा लिया । यहाँ वर्ग संघर्ष के जनक को पदच्युत कर दिया और शायद प्रभावहीन भी । इन नये अध्यक्ष महोदय पर उन नेता की छवि - उनका आशीर्वाद , उनका वरदहस्त होना बताया जाता है , सच्चाई तो ऊपर वाला और वे दोनो नेता ही समझ सकते हैं , पर जो हल्ला है उससे इंकार नहीं किया जा सकता । अब सवाल यहाँ यह है कि कैसे सुधरेगी प्रदेश  में कांग्रेस की दशा-दिशा ? क्या उन पुराने कांग्रेसियों को वापस कांग्रेस में सम्मान के साथ काम करने का अवसर मिल पायेगा जैसा कि वे वर्षों से करते आ रहे थे और इस प्रदेश को दशकों तक कांग्रेस का गढ़ बना कर रखा था । यहाँ इस बात का उल्लेख करना बेहद जरूरी हो जाता है कि नया राज्य बनने और नई राजनीतिक शुरुआत ने यहां प्रदेश के गाँव - गाँव , शहर - शहर से ऐसे निष्टावान कांग्रेसियों को एक मुश्त उखाड़ फ़ेंकने का काम एक बहुत ही सोची समझी साजिश के चलते किया था , जिसे नया राज्य बनने के बाद , आज तक 11 वर्षों बाद तक भी किसी कांग्रेसी नेता ने सुधारना नहीं चाहा और परिणाम सामने है । क्या नये अध्यक्ष  इस दिशा में भी सोचेंगे ? या फ़िर इशारों में चलेगी यहाँ कांग्रेस जैसा कि बीते एक दशक से चलती आ रही है । शर्म आती है जब  सार्वजनिक तौर पर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि अमुख कांग्रेस नेता तो अमुख बी जे पी के नेता - मंत्री से सेट है , कांग्रेस प्रत्याशी को अमुख जगह चुनाव हराने में उसकी बड़ी भूमिका थी , उसने तो "इतना सूटकेस" या "खोखा" लेकर अपनी ही पार्टी को वहाँ हराने का काम बड़ी सक्रियता से किया । क्या नये अध्यक्ष इस चुनौती को स्वीकार कर कुछ कर दिखायेंगे यहाँ जिसकी कि आम कांग्रेस कार्यकर्ता उनसे अपेक्षा करता है ! छत्तीसगढ़ का आम कार्यकर्ता यह भी भलीभाँति जानता है कि उसके किस अतिजिम्मेदार नेता ने सन 2003 के पहले और 2008 के दूसरे विधान सभा चुनावों में अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को चुनाव हराने के लिए क्या क्या नहीं किया था । तब से आज तक यहाँ कांग्रेस की स्थिति सुधरती नहीं दिखती है । क्या करेंगे नये अध्यक्ष महोदय इस दिशा में ? शायद उन्हें इसकी जानकारी होगी ।
एक आम कार्यकर्ता यह नहीं समझ पाता है कि जो भी - जहाँ भी कांग्रेस अध्यक्ष बनता है सबको (सभी गुटों को) साथ में लेकर चलने की बात क्यों करता है , वह कांग्रेस के साथ चलने और सबको कांग्रेस के साथ चलाने की बात क्यों नहीं करता ???    

फ़रवरी 25, 2011

बदतमीजी और बेशर्मी की राजनीति से पीड़ित है समूचा देश




कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह कहते हैं बाबा रामदेव को राजनैतिक बातें नहीं करनी चाहिए , राजनीति करना ही है तो वे एक राजनैतिक पार्टी बनाना चाहते हैं , बना कर  मैदान में आएं राजनीति में आएं फ़िर उनका मुकाबला करेंगे , उनकी बातों का जवाब दिया जायेगा … आदि आदि । मैं बाबा रामदेव का या दिग्विजय सिंह का ना तो समर्थक हूँ और ना ही विरोधी , पर दिग्विजय सिंह की बात मुझे गैर वाजिब लगी - अप्रजातांत्रिक लगी ,इसलिए मजबूर हुआ हूँ यहाँ कुछ लिखने को । कमोवेश  बदतमीजी और बेशर्मी की राजनीति से पीड़ित है समूचा देश ।
क्या मैं दिग्विजय सिंह जी से यह जान सकता हूँ कि उन्हें ऐसा कहने का यह अधिकार कौन सा संविधान देता है ? क्या भारत का कोई नागरिक राजनीति की बातें कहने के लिए किसी दल में हो , यह जरूरी है ? कहाँ लिखा है ऐसा कोई नियम या कानून बताईये ? आपका बाबा रामदेव से वाद-विवाद चल रहा है इसका यह मतलब तो नहीं है कि आप जो आपके मन में आए कह दें ? काला धन विवाद का विषय है - वह चाहे राजनीतिक लोगों के पास हो , बड़े औद्योगिक घरानों के पास हो या फ़िर बाबा रामदेव या कोई और बाबा , संत , प्रवचनकारों के पास हो सब गलत है ,इसकी जाँच ही होनी चाहिए , बल्कि तत्काल प्रभाव से ऐसे चोरों को सजा दी जानी चाहिए । क्यों डरती है सरकारें ऐसी कार्यवाहियाँ करने से ? क्यों सालों साल से ऐसे बड़े और आर्थिक अपराधियों को संरक्षण देतीं है भारत सरकार ? इसका जबाव सीधे सीधे देना छोड़ कर बेकार की बकवास कर रहें हैं नेता गण ।  मैं पूछना चाहता हूँ कि क्यों बनने देते हैं काले धन से किसी भी बाबा का आश्रम ? जब कहीं भी काला धन लग रह होता है तब क्या करता रहता है शासन - प्रशासन ? जिसे जनता की गाड़ी कमाई का करोड़ो - अरबों रूपया सिर्फ़ कानून - व्यवस्था को समय पर लागू करने के लिए हर माह बतौर वेतन - भत्ता  और सुविधाओं के रूप में दिया जाता है ? शर्म नहीं आती देश के कर्णधार बनने वालों को चोरी और सीना जोरी करते हुए ? अरे सा… कब तक सहेगी इस देश की जनता तुमको ? चोरी तुम करो , झूठ तुम बोलो , मक्कारी तुम करो , हत्याएं तुम करो , बलात्कार तुम करो , जनता के पैसों पर ऐय्याशियाँ तुम करो , काला धन देश के बाहर जमा कर देश द्रोह तुम करों , सत्ता पर कब्जा तुम करो , देश में जाति - धर्म , संप्रदाय को भड़का कर दंगा - फ़साद तुम करवाओ । देश को जगह जगह गिरवी रखते तुम घूमों , रक्षा सौदों  में दलाली तुम खा जाओ । अमेरिका के हाँथो अपनी देश की जनता का भविष्य तुम बेच ड़ालो - तमाम गुप्त समझौते तुम करो , हवाला काण्ड तुम करो , शक्कर - तेल के माफ़िया तुम बनो , क्या नहीं कर रहे हो तुम ? और जब कोई तुम्हें आईना दिखाए तो उसे भला - बुरा कहो । क्या यही है तुम्हारा राष्ट्रीय चरित्र ? शर्म करो यार - शर्म करो , सुधरो अति हो गई है , बड़े बड़े राजे - महाराजे , तानाशाह नहीं टिक पाए , तुम  क्या चीज हो सुधरो । भगवान से डरो । जनता से डरो  जो बेकारी - भुखमरी और तमाम तरह की बदहाली के बाद भी तुमको झेल रही है , कुछ कर नहीं रही है तुम्हारा … लेकिन कब तक ? पानी सर से ऊपर जाता जा रहा है ।      

फ़रवरी 21, 2011

छतीसगढ़ संदर्भ - 2011




प्रदेश का मौजूदा स्वरूप चिंता जनक है । यह प्रदेश के लोगों का मानना है लेकिन सरकार बड़ी
ही सहजता से इसे इंकार करती है । 18 जिलों वाले इस राज्य के सत्रह जिलों में नक्सलियों का
सिकंजा कसा हुआ है - अच्छा नेटवर्क है , यह स्वंय प्रदेश सरकार कहती है , कब ? जब
प्रदेश के मुख्यमंत्री , मुख्य सचिव , गृह सचिव और ऐसे ही महत्वपूर्ण पदों की शोभा बढ़ाने
वाले नेता और अधिकारी नई दिल्ली में प्रधान मंत्री , गृह मंत्री की बैठकों में पैसा और पैकेज
मांगने के लिए बोलते हैं । इन्हें प्रदेश के हर थाना क्षेत्र की सुरक्षा के लिए केंद्र से 200करोड़
रुपया चाहिए । राजनीति शास्त्र कहता है - " राज्य एक लोकतांत्रिक संस्था है। " लेकिन हमारे
राज्य में आकर देखिए तो एहसास होगा यह एक वर्ग विशेष की बेहद नीजि सी संस्था है ।
 यहाँ अमीरी और गरीबी की खाई बेहद तेजी से बढ़ रही है । गरीबों की जमीनें धनवानों को
और अधिक धनवान बना रहीं हैं , वहीं गरीबों को न केवल गरीब वरन  आगे चल कर
भूमिहीन और निकम्मा बनाने की बहुत ही सोची-समझी साजिश का आसान शिकार बना रहीं है
। सबका मुंह बंद रखने के लिए निम्न आय वर्ग के लिए सस्ता चांवल देकर । ऐसा होने से
ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों में काम के प्रति उदासीनता बढ़ी देखी जा रही है , खतरा उनकी अगली
पीढ़ी को ज्यादा दिखता है , सरकार इसे अपनी सफ़लता बताने करोड़ों रूपयों के विज्ञापन देश
भर में छपवा कर एक तीर से दो निशाने कर रही है , अखबार भी खुश हैं कि उन्हें अच्छा
बिजनेस मिल रहा हैं छत्तीसगढ़ से और इसी बीच सरकार से जुड़े कथिपत लोग अपना उल्लू
सीधा करने में मस्त हैं । इन्हें मालूम है कि सदा चलने वाली योजना नहीं है यह , जब तक
चल रही तब तक निम्न आय वर्ग की जनता इस एक छोटे से ही सही मगर स्वार्थवश उनके
(सरकार) साथ है , विरोध नहीं करेगी , इस बीच जो करना है कर गुजरो कौन सा जीवन भर
सत्ता सुख भोगा है कोई , लेकिन आज जब मौका है तब तो पीढ़ियों के कमाया ही जा सकता है
।  कोई भी यदि इस ओर ध्यान दिलाना चाहे तो शासन - प्रशासन में बैठे सूरमा आक्रामक हो
उठते हैं जबकि नीति कहती है कि राज्य के संचालन से जुड़े इस वर्ग को आक्रामक होने का
अधिकार नहीं है । जिन शोषकों के विरूद्ध राज्य को आक्रामक होना चाहिए , उनके प्रति उनका
नम्र और अपनेपन का व्यवहार देखते ही बनता है । राज्य की  -  गरीब किसानों  की स्थाई
संपत्तियों का हस्तानांतरण इस बात के दस्तावेजी साक्ष्य हैं - ऐतिहासिक गवाही बन पड़े हैं ।
 बेहद ही अफ़सोस के साथ यहाँ यह कहना पड़ रहा है कि यह राज्य अपने निर्माण काल से
अब तक बीते दस वर्षों में अपने यहाँ ऐसा वातावरण तैयार करने में पूर्णतः असफ़ल रहा है
जिससे कि राज्य में अपराध को रोका - नियंत्रित किया जा सके । उल्टे रसूकदार अपराधियों
को पकड़ने वालों को सजा मिलती है यहाँ , ए एस पी शशिमोहन इसका जीवंत उदाहरण हैं ,
जिन्होने दूसरा कारण बना कर दो साल की छुट्टी पर रहना ,नौकरी करने से कहीं ज्यादा सही
समझा और किया । अच्छा होता यदि यहाँ लोकतांत्रिक प्रणाली को इतना कुशल बनाया जाता
जिसके सहारे अपराध पर अंकुश लगाने में मदद मिल सके ,लेकिन ऐसा होने नहीं दिया गया ,
क्योंकि अपराध में इनके ही लोग जो शामिल हो गये । यहाँ झूठ और मक्कारी की मदद से
आर्थिक अपराध ने अपनी खासी पैठ बना ली है ।
 संक्षेप में यह कहना गलत नहीं होगा कि शोषण के मामले में यहाँ किसी एक राजनीतिक दल
को दोषी नहीं ठहराया जा सकता , सभी के नेता जिन्हें जैसा मौका मिल रहा है दोनो हाँथों से
लूटने में लगे हैं , मौसेरे भाईयों की ही तरह  और जनता है कि ठगी सी बैठी खुद को लुटता
देख रही है । अराजकता का इससे ज्यादा शालीन स्वरूप शायद ही किसी देश - दुनियाँ मे
देखने - सुनने को मिले । जहाँ नदी , नाले , तालाब , पोखर , पहाड़ , बेश्कीमती हीरों की
खदानें , यूरेनियम से समृद्ध टिन की खदानें सब अंदर ही अंदर बिक रहीं हैं  वहीं नहीं बिक
रहा है तो कवर्धा के किसानों का गन्ना , प्रदेश के किसानों का अच्छा धान - ओन्हारी । कौन
है इन तमाम दुर्दशा का जिम्मेदार ? मैं कहुंगा प्रजातंत्र की आड़ लेकर किया जा रहा तानाशाही
का शासन ही है जिम्मेदार , जो अभी और बढ़ेगा , अति होगी , शायद तभी अंत आएगा ।
मगर  आज एक आम मध्यम वर्गीय व्यक्ति का जीवन दूभर हो चला है यहाँ । उच्च वर्ग पंच
मेवा की खीर खा रहा है - निम्न वर्ग चांवल - नमक और सस्ती शराब में खुश है । मध्यम
वर्ग को दो समय का खाना कमाना यहाँ दुष्कर हो रहा है । यह तो हाल है अमीर धरती के
गरीब लोगों का ।



जनवरी 27, 2011

अपील : श्री सांई विशेष


" भाग्योत्कर्ष " धर्म , आध्यात्म , वास्तु शास्त्र और ज्योतिष से जुड़ा नाम है जो प्रकाशन के क्षेत्र में कार्यरत है । रायपुर (छत्तीसगढ़) से भाग्योत्कर्ष का मासिक प्रकाशन होता है । हर आध्यात्मिक विषय पर भाग्योत्कर्ष का एक विशेष अंक 'वेद-पुराणों' पर आधारित होता है जो ग्लेज आर्ट पेपर प्रकाशित होता है । धार्मिक संस्थानों - आध्यात्मिक चाहत रखने वाले लोगों के हाँथों इसका वितरण धर्मावलंबियों - जिज्ञासु जनों के मध्य होता है ।
  अब तक भाग्योत्कर्ष के "अघोर" , "देवी शक्ति" , "समृद्धि" , "मंत्र शक्ति" ,  "रामसेतु" , "भगवान श्री परशुराम" , "राजिम कुंभ" , "जागरण" , "चेतना" जैसे अनेक महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित हुए हैं ।
 सर्व विदित है कि यह विषय आज के तड़क-भड़क की दुनियाँ , ग्लेमर की दुनियाँ से अलग है लिहाजा इसका प्रकाशन कठिन ही नहीं दुष्कर होता है । प्रदेश के मुख्य मंत्री डॉ रमन सिंह इस बात को समझते थे , लेकिन यह बात उनके मातहतों को अच्छी नहीं लगी । प्रकाशन लम्बे समय से अवरुद्ध हो गया ।
भाग्योत्कर्ष ने पुनः हिम्मत जुटा कर शिरडी वाले सांई बाबा पर एक विशेष अंक के प्रकाशन की  तैयारी की है । बाबा के सक्षम भक्तों से सहयोग की अपेक्षा सहित यहाँ यह पोस्ट लगाई गई है । सहयोग केवल इतना कि इस अंक की प्रतियाँ अपनों - भक्तों के बीच वितरित करने के लिए अग्रिम क्रय कर प्रकाशन को सुलभ सुगम बनाने में मदद करें ।                                                                                                                                                                                                                - आशुतोष मिश्र / 094242 02729

अगस्त 26, 2010

नौकरानी के शरीर में 23 कीलें ठोंक दीं

सऊदी अरब के एक परिवार ने दरिंदगी की सारी हदों को पार करते हुए अपनी नौकरानी के शरीर में 23 कीलें ठोंक दीं। अमानवीय यातनाएं झेलने के बाद श्रीलंका की यह नौकरानी अपने देश लौट गई है, जहां उसका इलाज चल रहा है। नौकरानी की पहचान आरियावथी (50) के रूप में हुई है।
श्रीलंका के न्यूज चैनल ‘न्यूजफस्र्ट सिरासा’ पर प्रसारित फुटेज में नौकरानी ने उन जख्मों के निशान दिखाए, जहां वक्त-वक्त पर कीलें ठोंकी गई थीं। उसने बताया कि उसे दिनभर काम करना पड़ता था। यदि वह थकान के बाद सुस्ताने की कोशिश करती तो दंड देने के लिए शरीर में कील ठोंक दी जाती।
उसके मालिकों ने धमकी दी थी कि यदि उसने इसका खुलासा किया तो उसे जान से मार दिया जाएगा। रियाद स्थित श्रीलंकाई दूतावास के एक अधिकारी ने कहा कि नौकरी दिलवाने वाले एजेंट ने इस बारे में दूतावास को कोई जानकारी नहीं दी। और महिला को स्वदेश भेज दिया। उन्हें विदेश मंत्रालय से इस बारे में शिकायत मिली है। इस बारे में जल्द कार्रवाई की जाएगी ।दरिदंगी के आगे मानवता फ़िर एक बार हुई है शर्मसार । 

अगस्त 20, 2010

मुम्बई के धोबी जाएं तेल लेने …

आईये साहबान विकास के नाम काँक्रिट के जंगलों में करें एक और नायाब काम । जी हाँ , राज ठाकरे की मुम्बई में अब सामत आई है धोबियों की । मुम्बई के धोबी घाट पर अब नजर है वहां के बिल्डरों की ,इन्होने बी एम सी को आगे किया है । बी एम सी का कहना है - जिस जगह पर धोबी कपडे धोते हैं - सुखाते हैं ,वह जगह बी एम सी की है और अब उसे वापस चाहिए । वहां वह विकास की नई गंगा बहाएगी । सदियों से यहां काम करते आ रहे धोबी जाएं तेल लेने । कुछ को कपडा सुखाने की मशीनें दे दी जायेंगी ,उनसे उनकी जगह छीनने के बाद । याने विरासत का मिटना तय है । बिल्डर्स ने नेताओंको अपना सपना मनी-मनी जो दिखा दिया है । अब जनता को दिखाने - भरमाने के लिए ये लालची बंदर आपस में दिखावटी-राजनीतिक उठा पटक का खेल करके दिखायेंगे , मीडिया अपनी प्लांड भूमिका का निर्वाह करता दिखेगा और इन सब के बाद पूर्व निर्धारित बिल्डर्स को उनकी चिन्हित जमीनें दे दी जायेंगी ।  इस विकास की कीमत चुकायेंगे दस हजार धोबी परिवार , जिनकी पीढ़ियों ने मुंम्बई के लोगों के कपडों मे चमक - दमक लाने का काम पूरी निष्ठा से किया था ,बगैर यह सोचे कि ऐसा भी एक दिन आयेगा। हद कर दी है लालच ने  , अमानवीय - असंवेदनशील शासन-प्रशासन ने । ऐसे कृत्यों को समय रहते  रोका जाना चाहिए , ह्तोत्साहित किया जाना चाहिए ।

अगस्त 18, 2010

देश और दुनियाँ के गरीब देशों में " छत्तीसगढ़" भी

"ऑक्सफ़ोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव" नामक संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित संस्था जिसको विश्व स्तरीय मान्यता प्राप्त है ,का अध्यन है कि छत्तीसगढ़ में  भी अफ़्रीकी देशों जैसी ही गरीबी है -निर्धनता है।शर्म आनी चाहिए हमारे उन सभी नेताओं को जिन्होने  छत्तीसगढ़ के विकास के नाम पर अरबों - खरबों रुपए फ़ूंक डाले और यह भी साबित कर दिखाया कि उन रुपयों से उन्होंने किसका विकास किया है ।
संस्था की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के आठ राज्यों में अफ़्रीका के 26 सर्वाधिक  गरीब देशों से भी ज्यादा गरीबी है । ये गरीबी भोग रहे राज्य हैं - बिहार,झारखंड, मध्य प्रदेश,  छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल ।और ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि इसकी जानकारी भारत सरकार को भी है। भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने बकायदा राज्यसभा में इस बात को स्वीकार भी किया है । उनकी इस स्वीकारोक्ति के पीछे गर्वोक्ति छिपी थी या शर्म यह पता नहीं चल पाया , लेकिन देश जरूर शर्मसार है कि उसके पास ऐसे नेताओं की ही भरमार है । देश को  गरीब रख कर खुद को अमीर बनाने वाले नेताओं से आखिर कब और कैसे निजात मिल पायेगी ? ये बेशर्मी से अपनी तनख्वाह बढ़ाने जा रहे हैं । अरे शर्म करो, निर्लज्जों । छत्तीसगढ़ का हाल यह है कि यहाँ कल तक  सड़कों की धूल फ़ांकने वाले कथित नेता आज के अरब पति बने बैठे हैं ,बिना किसी व्यवसाय के । और प्रदेश के लोगों की गरीबी दिनों दिन बढ़ती जा रही है । इन गरीबों को सस्ता चांवल देने के नाम पर भी यहाँ नेता और उनके चंद व्यापारी लाल हुए जा रहे हैं । गरीबों का बुरा हाल है । कागजी विकास, कांक्रीट के जंगलों का विकास , यहाँ का मूल मुद्दा है जिसे लेकर सभी राजनैतिक पार्टियों में एका है ।गरीबों की खेतिहर जमीनें जबर्दस्ती खरीदीं-बिकवाई जा रही हैं । इस काम में क्या मंत्री और क्या संत्री सभी पूरे जोरशोर से लगे देखे जा सकते हैं । भला कोई बताए कैसे और कब होगी यहां से गरीबी दूर , जहाँ के रक्षक ही भक्षक बन बैठे हैं ???

अगस्त 07, 2010

कहीं "टशन" तो कहीं "टेंशन" है "ट्यूशन"

 स्कूल  का नया सत्र आरंभ हुए दो माह होने को आए हैं । बड़ी विड्म्बना ही है कि जितना जरूरी  स्कूल  जाना है , उतना ही जरूरी हो गया है "ट्यूशन" जाना । पढ़ाई पर हावी हो गया है  ट्यूशन। कभी आप सोच भी पाते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है ? पहले कभी तो नहीं होता था ऐसा । अब क्यों ? मैं तो कहता हूं पढ़े लिखे ऐसे अभिभावक जो अपनी सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर भागते हैं ,प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से वे ही ट्यूशन के गोरख धंधे को बढ़ावा देते हैं । कम पढ़े लिखे अभिभावकों की मजबूरी समझ आती है ।
आप शायद सहमत होगें की स्कूल-कॉलेज में उनकी क्षमता से कहीं अधिक संख्या में बच्चों को प्रवेश दिया जाता है । जिसकी वजह से प्रबंधन पैसा कमाता और बच्चा तकलीफ़ें पाता देखा जाता है । क्वालिटी ऑफ़ एजुकेशन की कमी ,कोर्स की अधिकता , समय प्रबंधन की कमी , कोर्स और किताबों के चयन में क्वालिटी की बजाय कमीशन पर ज्यादा ध्यान दिया जाना । क्लासेस में बैठने की समुचित व्यवस्था न होना ,प्रकाश और हवादार बड़ी खिड़कियों की व्यवस्था का न होना , या कहीं-कहीं घर का वातावरण कलह भरा - तनाव पूर्ण होना ऐसे तमाम दोष हैं जो ट्यूशन को जन्म ही नहीं वरन सतत प्रोत्साहन देते हैं ।
 ट्यूशन सफ़लता की कोई कुंजी हो ऐसा कतई भी नहीं है । आज तो इसका विकृत स्वरूप मानो एक फ़ैशन या सोशल स्टेटस का रूप धारण करता हुआ देखा जा सकता है । कुछ न समझ आ रहा हो ,और उस विषय पर मार्ग दर्शन चाहें ,अच्छे से पूछ्ने- बताने की सहुलियत हो तो क्लास रूम ही बहुत होगा ,लेकिन फ़िर इस बीच कमाई का रुपया न होगा ,इसलिए भी बहुत जरूरी हो जाता है ट्यूशन । बिखरा और डरा हुआ अभिभावक अपनी बात समझा नहीं पाता स्कूल - कॉलेज प्रबंधन को , और प्रबंधन समझना भी नहीं चाहता ,शायद इसलिए भी बहुत जरूरी हो जाता है ट्यूशन । वरना सबसे अच्छा है टीचर्स के द्वारा स्कूल - कॉलेज में दिया गया मार्ग दर्शन , बच्चों की सेल्फ़ स्टडी ,घर में माँ की या पिता की देखरेख में की गई पढ़ाई, टाईम टेबल बना कर की जाने वाली पढ़ाई , जब पढ़ाया जा रहा हो उस वक्त ध्यान केवल पढ़ाई पर ही केन्द्रित हो । न समझ आने वाली बातों को तुरंत ही पूछ लिया जाए और शिक्षकवृंद ऐसा माहौल अपनी-अपनी कक्षाओं में बनाएं कि बच्चा कुछ पूछने में डर या झिझक न महसूस करे । शिक्षा विभाग में पदस्थ बड़े अधिकारी इसकी प्रॉपर मॉनिट्रिंग करें । पर ऐसा होता नहीं है ,क्यों ? कौन देगा जवाब ? अधिकांश शैक्षणिक संस्थाओं में अप्रशिक्षित , कम पढ़े-लिखे , कम वेतन पर काम करने वाले शिक्षक हैं ।जो स्वयं शोषित-पीडित हैं ,इनसे आप क्या और कैसी उम्मीद करेंगे ? जरूरत है शैक्षणिक संस्थाओं में उनके प्रबंधन पर शासन-प्रशासन की ईमानदार मजबूत पकड़ -पहल की , सतत निगरानी की तभी कुछ अच्छे नतीजे आने की उम्मीद करना उचित होगा वरना जो जैसा चल रहा है चलता रहेगा ।  ट्यूशन एक सफ़ल व्यवसाय बन चुका है ,बना ही रहेगा । विशिष्ट वर्ग को छोड़ कर शेष सारा सामान्य वर्ग ऐसा ही त्रस्त रहेगा । समाज में एक नया फ़्रस्टेशन बढ़ेगा ।

अगस्त 02, 2010

फ़्रेंडशिप डे पर पिटाई - हंगामा

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल शाम बूढ़ा तालाब स्थित विवेकानंद उद्यान में बजरंगियों ने एक प्रेमी युगल के मुंह पर न केवल कालिख पोती वरन युवक और युवती दोनो को पीटा भी , हमेशा की ही तरह यहाँ तैनात पुलिस मुक दर्शक बनी रही ।यह मामला आज विधान सभा में भी गूंजा , जिस पर गृह मंत्री ननकी राम कंवर ने पाँच आरोपियों को गिरफ़्तार किये जाने की बात कही विधान सभा में विपक्ष ने इस विषय पर जम कर हंगामा मचाया । जन प्रतिनिधियों और आम लोगों में इस बात को लेकर आक्रोश था कि बजरंगियों ने सरेआम युवती के साथ मारपीट की , उसके मुंह पर भी कालिख पोती ।यह सच है कि राजधानी की पुलिस सख्ती के नाम पर केवल और केवल सड़कों पर अवरोधक बेरिकैट्स लगा कर मोटर सायकलों - कारों , भारी वाहनों से चालान के नाम वसूली करती ही दिखती है । शहरी गुण्डों - बदमाशों से याराना है । बड़े बिल्डरों के सामने मानो दुम हिलाती है । रही बात प्रेमी युगलों की ,यह किसी भी बढ़ते शहर में जहाँ बाहर से पढ़ने - नौकरी करने युवक युवती आतें ,वहाँ की एक बडी समस्या है ही । रायपुर में हर बड़े होटलों , रिसॉर्ट्स , गार्ड्न में शाम होते ही ऐसे मनचले रोज देखे जा सकते हैं । यहाँ इन्हें देख कर भी अनदेखी की जाती है । पुलिस केवल पैसा पहचानती है ,यहीं की नहीं सभी जगह की । समाज सुधरना नहीं चाहता है ।इसे समय की मांग बताते हैं ,ऐसी घटनाओं के पक्षधर । सर्वाधिक दुर्भाग्य जनक बात तो यह है कि ऐसे मनचलों का सबसे बडा जमावड़ा राज भवन के सामने वाली सड़क पर बने एक गार्डन, मुख्यमंत्री निवास से लगे शहर के सबसे बड़े गार्डन और कलेक्ट्रेट गार्डन में रोज होता है । यह तीनों ही गार्डन पुलिस मुख्यालय के भी निकट है , क्या करती है पुलिस ? इन उद्यानों में आज भी सम्भ्रांत जन सपरिवार आने में कतराते हैं । कहाँ हैं जनता के रखवाले ? केवल   फ़्रेंडशिप डे या फ़िर वेलेन्टाईन डे पर हल्ला बोलना ही कर्तव्यों की इति श्री है ? क्यों जरूरी है मारपीट करना ? या कालिख पोतना ? बहुत से सवाल हैं जो सिर्फ़ इसलिए उत्तर विहीन हैं क्यों कि रक्षकों की ही नीयत साफ़ नहीं है । उनके इरादे जगजाहिर हैं । उनका लक्ष्य "कहीं पे निगाहें - कहीं पे निशाना" जैसा छल - कपट भरा है । प्रदेश में अब बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा जैसा माहौल है ,कांग्रेस को बैठे बिठाये मिल गया मुद्दा और वह तो इस मुद्दे पर प्रदेश की "बेचारी सी" - "निर्दोष सी" भा ज पा सरकार से गद्दी छोड्ने की मांग करने लगी है । मतलब, बहुत कर लिया तुमने, अब हमको मौका दो । यह सब तो चलता ही रहेगा । तुम तो गद्दी छोडो ।

अगस्त 01, 2010

दर्द जब दोहरा हुआ…


एक समय ऐसा भी था जब समुचे मध्य प्रदेश में एक ही समय पर अखबारों के माध्यम से लोगों को खबरें मिल जाया करतीं थीं । लेकिन आज ऐसा नहीं होता । हर जिले की   खबर  के लिए अब आपको उस जिले का संस्करण पढ़ना होगा जो एक ही जगह से आम आदमी को तो उपलब्ध नहीं हो पायेगा । इसीलिए अब आपको यह भी पता नहीं चल पाता है कि पड़ोसी जिले में क्या हो रहा है ? अखबार मालिकों ने भी डॉक्टरों की ही तरह मानो बिना कहे ही यह कह दिया है कि यह उनका धंधा है कोई मिशन नहीं , रहा होगा कभी मिशन । आज तो यह प्रोफ़ेशन है अच्छी खासी कमाई का जरिया है ऐसे में इसे संवेदनशील भला कैसे बनाया जा सकता है , आप ही बताईये ? इसी अंधी दौड़ में - धन पिशाचों से यह उम्मीद करना कि ये निधन की सूचना या सामाजिक जनचेतना से जुड़ी खबरें पूरे प्रदेश में देंगे ,बेईमानी होगी , अपने को धोखा देने जैसा काम करना होगा । मेरे एक मित्र इंजीनियर हैं उनकी भतीजी गीतांजली हफ़्ते भर  पहले ही दहेज की बली चढ़ गई , मित्र की इच्छा थी कि  खबर  रायपुर के अखबारों मे भी छपे ताकि दोषी जनों पर प्रभावी कार्यवाही हो सके , वरिष्ठ अधिकारी जनों की नजर से यह मामला गुजरे । लेकिन दुर्भाग्य आम लोगों का कि ऐसा काम रायपुर से प्रकाशित होने वाले अखबारों ने आमलोगों के लिये बंद कर दिया है । किसी बड़े विज्ञापनदाता या बिल्डर की सिफ़ारिश पर छापा जा सकता है कुछ भी , पर आम आदमी का … सॉरी । "ये उनके फ़ॉर्मेट में फ़िट नहीं है । "
  खबर छपनी थी रायपुर और बिलासपुर के बीच के एक गाँव की , तो बिलासपुर संस्करण में छ्प कर इतिश्री कर दी गई ,जहाँ लोग इस घटना को जानते थे उन्हीं को पढ़ाया भी गया । जो नहीं जानते थे ,वो क्यों जानें ? उन्हें क्यों पढ़ाया जाए ? कुछ ऐसा हो गया है अखबारों का रवैया आम लोगों के लिए । लेकिन खास लोग जो खबरों को छापने के बदले विज्ञापन देते-दिलाते हैं उनकी सर्दी-खाँसी , पैदल चलने-फ़िरने ,चना-मुर्रा खाने की खबरें भी अपने सभी संस्करणों में छाप कर दुनियाँ को बताने से नहीं हिचकिचाते आज के अखबार । कितनी गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक है ये बात हम सब की नजरों में । इसे सुधारना तो होगा । कौन - कब सुधारेगा यह अभी नहीं मालूम , देर-सबेर होगा जरूर ,अखबारों की संकीर्ण मानसिकता भी दूर होगी ।
बहरहाल खबर यह है कि ग्राम खम्हरिया निवासी शशीकांत पांडेय पिता रामकृष्ण पांडेय की पुत्र वधु गीतांजली की दहेज प्रताड़ना के बाद जलने से मौत हो गई ,उसका दो साल का एक बच्चा आज भी अपनी माँ के अस्पताल से लौटने का इंतजार कर रहा है । सन 2007 में अपनी बेटी के हाँथ पीले करने वाले बूढ़े बाप का कलेजा दहल उठा है , परिजनों के आंसू थम नहीं रहे हैं , गीतांजली की माँ को जो बीमार है उन्हें  कुछ भी बताया नहीं गया है ,वह घर के लोगों को रोता देखकर और भी अधिक परेशान है । गीतांजली की मौत के बाद उसके मायके वालों को बताया जाना कि वह चिमनी की लौ से जल कर मर गई । संदेह को जन्म ही नहीं देता वरन पुख्ता करता है । मायके वाले चाहते हैं इस मामले में दोषी दामाद को सजा हो । उनके उन अन्य परिजनों को भी सजा हो जिन्होंने शादी से पूर्व शशीकांत पांडेय को इंजीनियर हैं , बताया था । दामाद ने अपने ससुर से अपनी टेक्नीशियन की नौकरी परमानेंट कराने के लिए डेढ़ लाख रुपये लिये थे , रायपुर में मकान खरीदने के और रुपयों की माँग करते हुए  नवम्बर 2009 में ससुर कन्हैयाधर दीवान से साथ उन्हीं के घर में मारपीट भी की थी , वह चाहता था कि ससुर गांव की सम्पत्ति को बेचकर उसके साथ रायपुर चल कर उसे एक घर खरीदने के लिए मदद करे और उसी के साथ रहे । इन्हीं बातों को लेकर विवाद हुआ करता था । इस लालच की बली चढ़ी बेटी गीतांजली । दोनो परिवारों का दुख कम होने की बजाय कई गुना बढ़ गया है । गीतांजली के पिता कन्हैयाधर दीवान पुलिस अधिकारियों से इंसाफ़ की गुहार लगा रहे हैं ,क्योंकि इस धरती के प्रथम भगवान बन बैठे "पुलिस वाले" यदि रिपोर्ट ही सही-सही लिख कर उसकी विवेचना सही समय पर कर दें तो यह इंसाफ़ पाने की पहली सीढ़ी साबित होगी । बाकि फ़िर इंसाफ़ तो वही करता है और करेगा भी जिसका यह जिम्मा है सही मायने में । हम इस घटना में अपनी गहन संवेदना प्रकट करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं उसके अपने घर में यह दरिंदगी - वहशीपन न होने दें । साथ ही अखबार वालों को , पुलिस वालों को अच्छा करने की ताकत - बुद्धि दें ।

जुलाई 28, 2010

एक दर्द जो शायद आपने भी यहाँ आ कर महसूस किया हो …

आज आप सभी से एक ऐसे विषय पर अपनी बात साझा करना चाहता हूँ , जिससे कहीं न कहीं और किसी न किसी रूप में आप भी जुड़े हैं ।   रायपुर आप में से बहुतों का आना-जाना लगा ही रहता होगा , बहुत से तो यहीं के मेरे मित्र हैं जो इस ब्लॉग में भी मिलते हैं । बाजार भी आना- जाना होता ही होगा । क्या अनुभव किया है, आपने   रायपुर   के बाजार का ? कपड़ा ,फ़ल , सब्जी , किराना , स्टेश्नरी , क्रॉकरी , बर्तन , जूता-चप्पल , बेकरी आईटम्स , यहाँ तक की चाट - पकौड़ी , टिक्की-छोले , नास्ता-पानी और भी बहुत कुछ हैं सूची में । ये सारे के सारे सामान यहाँ बिना किसी भाव ताव के ,मुहँमांगे दाम पर बिकते हैं । आप इनका मोलभाव करना भी चाहें तो नहीं कर सकते । विक्रेता या तो नाराजगी जाहिर करता है या फ़िर आपकी अनदेखी । नई राजधानी क्या बन गया   रायपुर  , मानो सारे रिवाज - रंगत ही बदल गए यहाँ के । अब हाल यह है कि अगर कुछ खरीदना है और बेचने वाला जो कह रहा है ,उसकी बात मानते हो खरीद लो वर्ना चलते बनो । पाँच का पच्चीस बोलता है तो भी ठीक है , चिल्हर नहीं है कहता हुआ वह जितना ज्यादा या कम देता है ,  फ़ल या सब्जी वाला दिखाने की और बेचने की चीजें अलग -अलग रखता है और जो दिखाता है ,उसे आपके मांगने पर भी नहीं देता है तो भी जो वह दे रहा है , चुपचाप लो । गया वह जमाना जब ग्राहक भगवान  कहा-समझा जाता था । आज का भगवान हरा-लाल पत्ता है , जिसके एक किनारे बापू मुस्कुराते हैं और दूसरे किनारे पर उसे लपक कर छीनने वाला ।  प्रेम से किसी ने बताया तो यही कि क्या करोगे महँगाई सभी जगह है । मगर मै यहाँ यह कहना चाहता हूँ कि जितनी रायपुर में है उतनी लूट और कहीं नहीं है । भरोसा न हो तो आजमा कर अंतर महसूस करें । एक मित्र चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स में हैं । सोचा उनसे कहूं , फ़िर लगा अब तो भाई जी छोटा धंधा छोड़ कर राजनीति के बड़े धंधे में सक्रिय हैं ,इस बार उन्हें सरकार ने कोई जिम्मेदारी भी नहीं दी है , इस निराशा को दूर करने में उनका सारा समय बड़े नेताओं के चक्कर काटने में बीत जाता है ,वो भला अब ऐसी फ़ालतू बातों के लिए कहाँ वक्त दे पायेंगे ? जो मंत्री कुछ कर सकते हैं वो सभी जमीनी कारोबार में व्यस्त हैं । मुख्यमंत्री स्तर की बात यह है नहीं ,अधिकारी समझा देंगे उन्हें । फ़िर ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को भला कहाँ और कैसे समझ आयेगी महँगाई ? फ़िर यह तो कांग्रेस की बुराई करने का हथियार है ,और हमारे यहाँ भा ज पा की सरकार है , वह भला इस हथियार को क्यों नुकसान पहुंचायेगी ? रही लोगों की बात तो वो तो ऐसे भी मरते हैं वैसे भी मरेंगे , मरने दो सा… को । नेता ,मंत्री अधिकारी ,व्यापारी इन सब का फ़ील गुड चल रहा है न बस चलने दो ।   रायपुर  का -   छत्तीसगढ़  का विकास इसी में है । ऐसी व्यवस्था का विरोध केवल वे ही करते हैं जिनके पास कोई काम धाम नहीं है और जो केवल नकारात्मक सोच रखते हैं । यही जवाब है उन सक्रिय लोगों का जो चहुँ ओर केवल लूट-खसोट में लगे हैं । विकास की नित्य नई कहानी लिख रहे हैं । आपने यह तो सुना ही होगा - " राम नाम की लूट है , लूट सके तो लूट " बस यहाँ राम का मायने बदल गया है । "राम राज्य" में कुछ इस तरह से मची है हमारे यहाँ लूट । मुझे दर्द हुआ सो मैंने अपनो के साथ बांटने की कोशिश की । सही लगे तो इसे आगे बढ़ाईएगा , शायद कहीं से कुछ सुधार की पहल हो !

जुलाई 20, 2010

तुम याद बहुत आते हो …

याद बहुत आते हैं आप स्वर्गीय प्रमोद महाजन जी , आपने ही इस देश के लिए "इंडिया शाईन" और "फ़ील गुड़" का  स्वप्न जो देखा था । आज आप होते तो हम आपको  इंडिया का तो नहीं लेकिन हाँ अपने प्रदेश छत्तीसगढ़ का हाल जरूर बताते । हमारे यहाँ जरूर शायनिंग आई है - फ़ील गुड है आपकी पार्टी में । आलम यह है कि हमारे यहां  सब के सब मस्त हैं , शाईन 
करने लगे हैं सभी के चेहरे , जो सायकलों से चलते थे वे भी इस आर्थिक मन्दी के दौर में मंहगी कारों में चलने लगे हैं । करोड़ नहीं,अरबों के मालिक हैं ऐसे लोग जिन्हें कल तक यह भी पता नहीं होता था कि कितने शून्य लगते ऐसी जमा पूंजियों में ।  क्या मंत्री और क्या अधिकारी सभी जगह है फ़ील गुड की बयार। एक चाय की गुमटी में खड़े कुछ निट्ठले लोग चर्चा 
कर रहे थे - यार देखो नये - नये अखबार वाले तो सरकार के खिलाफ़ खुल कर लिख रहे हैं । क्या इन्हें जरा भी डर - भय  नहीं है ? और ये मन्त्री अखबारों में छपी खबरो से भी नहीं घबरा रहें है। अधिकारी भी मानों निर्लज्ज हो गये हैं । क्या हो रहा है यह सब ? गाड़ी खड़ी करते - करते हमने भी इतना तो सुन लिया था। इन लोगों से परिचय तो था नहीं वरना इन्हें बताते कि भाईयों किस दुनियाँ में हो , तुम्हारे ये नेता और अधिकारी , तुम्हारा छत्तीसगढ़िया अखबार नहीं पढ़ते , पढ़ना भी हो तो दिल्ली - मुम्बई के चेन्नई के भोपाल के उन अखबारों को पढ़ते हैं जिनमें उनकी जय छपी होती है , प्रदेश की उन्नति की तेज रफ़्तार छपी होती है , यहां के बेशुमार विज्ञापन छपे होते हैं । यहां एक्का - दुक्का अखबारों को छोड़ कर भला और कौन उनके जैसा स्तुति गान कर सकता है ? इसीलिए यहाँ के भी उन्हीं अखबारों को पढ़ा जाता हो फ़ील गुड को समझते हों - जीना जानते हों । बाकि तो मानों भौं… हैं । फ़िर इतने अखबार हैं कि यदि उनमें से कुछ एक को भी पढ़ें तो दिमाग खराब होगानेताओं-साहबों का । सब कुछ तो छाप देते हैं ये छोटे अखबार वाले । अब अपना दिमाग खराब करें या फ़िर रोज मर्रा के फ़ील गुड के कार्यक्रमों  में लगें, जिसकी बदौलत रोज शाम तक साहबों सहित उनके परिजनों के चेहरे पर शायनिंग आती हैं । तो ये तो रिश्ता है हमारे यहाँ अखबारों और नेताओं-अधिकारियों का । अब रही बात प्रदेश के उन अखबारों का जिन्होने सरकार के खिलाफ़ छापना बन्द नहीं किया है । अब इनका भी ईलाज किया जा रहा है । ऐसे सभी अखबार अब बन्द कराने की मुहिम एक वरिष्ट अधिकारी को सौंपी गई है जो अपना काम कर रहे हैं । ये हाल है राज्य में प्रजातंत्र के चौथे खम्भे का । लुटेरों की बड़ी बस्ती है भला यहाँ ये चंद छोटे - छोटे प्रजातंत्र के रखवाले क्या और कैसे कर पायेंगे ? गर साथ ही रहने का शौक है तो  आओ लूटना सीखना होगा ,इन्हें भी  । लुटेरे नहीं तो कम से कम चोर बन कर तो दिखाना पड़ेगा । तब तो साथ रहने लायक बन पायेंगे , वरना मारे जायेंगे , लुटेरों की बस्ती में । नयी बस्ती है अभी जोश ज्यादा है । आप होते तो शायद इस आभा को 
समझ पाते , जनता को बचाने ,दुबारा सरकार को लाने का रास्ता बने ऐसा कोई उपाए जरूर बताते ,लेकिन यह तो शायद ऊपर वाले को भी मंजूर नहीं था ।            

जुलाई 08, 2010

गर तोप मुकाबिल हो तो "अखबार" निकालो

नक्सली आतंक को लेकर छत्तीसगढ़ में जो स्थिती निर्मित है उसे भयावह ही कहा जा सकता है ।कौन है इसके लिए जिम्मेदार ? यह प्रश्न सरल हो सकता है पर इसका उत्तर शायद इतना सरल नहीं है,जितना कि अपेक्षित रहता है ।नक्सलवाद कभी आंदोलन रहा होगा ,लेकिन अब आतंक का दूसरा नाम है । समाज को इस समस्या से खुद नक्सलियों ने और फ़िर मीडिया ने परिचित कराया है । पहले ने अपने आतंक के जरिये तो दुसरे ने अपने प्रचार माध्यमों को रेटिंग की सीढ़ी पर चढ़ा कर गला फ़ाडू आवाज में विस्तार देने का सफ़ल प्रयास किया है ।   दोनो ही तरीके घातक सिद्ध हुए हैं । दोनो ने ही इसे अपने-अपने मतलब से किया है। मैं चाहता हूँ कि आप स्वयं ही इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि किनके कितने प्रयासों से यह आंदोलन आतंक  बन बैठा है । प्रश्न यह है कि क्या ऐसा किया जाना जरूरी था ?  इससे किसको लाभ हुआ है ? आम लोगों में उत्पन्न भय का वातावरण घटना जनित है या फ़िर उन घट्नाओं के प्रचार-प्रसार का तौर तरीका भी एक जिम्मेदार पहलू है । किसी बड़ी घटना का हल्ला समझ आता है पर हर छोटी से छोटी बात पर भी उतना ही हल्ला होना ,क्या परोछ रूप से जन मानस में भय का वातावरण उत्पन्न करने में सहायक नहीं होता है ? क्या लगातार ऐसा होते रहना उचित होगा ? क्या यह सोचना-समझना हम मीडिया जगत से जुड़े लोगों की सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बनती ? किस घटना का समाज पर कैसा असर होगा यह तय करना और इसे भुनना आतंकी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं । ये लोग तोप ,तलवार के साथ-साथ हथियारों की ही तरह अखबार (मीडिया के अन्य सभी श्रोतों) का उपयोग भी करने लगे हैं । प्रारंभिक अवस्था है आज की जहां उन्हें इस तीसरे हथियार के प्रयोगके लिये खुद होकर ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ रहा है । चिंतन उन्हें जरूर करना चाहिए जो अनजाने में ही हथियार के रूप में प्रयुक्त हो रहे हैं । समाज इनकी करनी से कहीं ज्यादा भयभीत या कहें खौफ़ज़दा नजर आता है। हमें गंभीरता पूर्वक यह सोचना चाहिए कि एक खाली पड़ा थाना भवन उड़ा कर जितना आतंक वे वहां पैदा नहीं कर पाते उससे कहीं ज्यादा तो हम यहां उस घटना के विषय में प्रचारित-प्रसारित कर देश-दुनिया के लोगों में अनायास ही आतंक उत्पन्न कर देते हैं , आखिर क्यों ? शायद यहां यह कहना कतई भी गलत नहीं होगा कि सिर्फ़ और सिर्फ़ हमको छोड़ कर शेष उपयोग कर्ता  नेता ,  ठग ,  आतंकी , सभी अकबर इलाही की उन चंद लाईनों को सार्थक रूप में जी रहे हैं जिनमें यह कहा गया था कि- खिचों न कमान , न तलवार निकालो , गर तोप मुकाबिल हो तो  "अखबार"  निकाओ ।
तभी तो ये सभी के सभी अखबारों (मीडिया) का सबसे अच्छा और सीधा सा  उपयोग   करते  आ रहे
हैं , बात बुरा मानने के लिए नहीं , बल्कि समझने और स्वीकार करने  की है ।

जान - समझ कर ऐसा क्यों करते हैं हम सब ?

ग्लोबल वार्मिंग को लेकर हमने हजारों फैक्ट पढे, पर्यावरण प्रदूषण की बातें रोजाना सुनते हैं। हम यह भी जानते हैं कि भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है, लेकिन फिर भी हमनें हमारी पृथ्वी को शुद्ध रखने और बचाने के लिए क्या कदम उठाएं हैं ? पूरी गारंटी के साथ हम कुछ नहीं कह पाएंगे। कुछ ऎसा ही संकल्प लें कि इस धरती की सुंदरता को हम आने वाली पीढ़ियों के लिए उसी स्वरूप में छोड़ जाएंगे,जैसा कि हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा । इसके लिए प्रयास हमें ही शुरू करना होगा।हम सब को यह समझना ही होगा कि हम रोजमर्रा में कहां - कहां , क्या-क्या गलतियाँ करते जा रहे हैं , जिसके दुष्परिणाम हमारे बच्चे और उनके बच्चे भुगतेंगे ।खुली हवा में साँस लेने को तरस जायेंगे । हम बड़ी ही सहजता से अपने आसपास कभी न खत्म होने वाला जहर फ़ैला रहे हैं । इस जहर को हम बड़े गर्व से अंग्रेजी में पॉलीथिन बैग , कैरी बैग्स कहते हैं ,उपयोग करते नहीं शर्माते हैं । अब तो इसकी छपाई भी इतनी आकर्षक होने लगी है कि बड़ा से बड़ा आदमी भी इसे दिखावे के रूप में
भी उपयोग करने में नहीं झिझकता ।
पॉलिथिन बैग जिस चीज़ से बनते हैं वे बायोडिग्रेडेबल पदार्थ नहीं हैं। यानी वे नष्ट नहीं
होते, रिसायकल नहीं होते और प्रकृति में अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं।
इससे बहुत सारे नुकसान होते हैं। पर्यावरण से जुड़े लोग इसीलिए इनके इस्तेमाल का
विरोध करते हैं। इसी तर्क पर दिल्ली ही नहीं कई दूसरे राज्यों में भी पॉलिथिन को
प्रतिबंधित कर दिया गया है। इससे उन राज्यों को प्रदूषण और गंदगी से बचाने में
मदद भी मिली है। इसके अलावा पॉलिथिन खाने से होने वाली पशुओं की मौतों में
भी कमी आई है। लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ में बेरोकटोक , बेधड़क - बेहिसाब
पॉलीथिन का उपयोग किया जा रहा है ।
कुदरत खुद जो भी पैदा करती है तो उसके सृजन से लेकर विसर्जन तक की जिम्मेदारी
भी खुद ही निभाती है। मगर मानव अपने कारखानों में जो भी बनाता है और उस बने
हुए कृत्रिम सामान का उपयोग करता है परन्तु उसके विसर्जन की जिम्मेदारी न उत्पादन
कर्ता लेता है और न उपभोक्ता लेता है । चूंकि जो मानव ने कृत्रिम तरीके से बनाया है
उसके अपव्यय को धरती भी स्वीकार नही करती। अर्थात् समस्त संसार में प्रदूषण रूपी
राक्षस संसार से जीवन खत्म करने के लिए अपनी प्रदूषण रूपी सेना बढ़ा रहा है।
हमारे वेदों में राक्षस उसी को कहते हैं जिसका क्षय नहीं होता है।
यह कुदरत का नियम है जो समाप्त नहीं होता वह समाप्त कर देता है।
पॉलिथिन के कारण पर्यावरण प्रदूषण जल मल की निकासी में व्यवधान उत्पन्न
होता है । आज हर गली - मोहल्लों में बारिश का पानी क्यों जमा हो जाता है ?
लोग अपने घरों में पानी घुसने के लिए शासन-प्रशासन को दोषी मानते हैं ,
लेकिन क्या यह सच नहीं कि वे खुद भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं इसके लिए ?
पहले जब कभी पॉलीथिन का उपयोग नही होता था तब तो ऐसी समस्या नहीं थी ।
आज हर शहरी क्षेत्रों में नाले-नालियाँ पॉलीथिन से पटे पड़े हैं । कहाँ से निकलेगा
बारिश का पानी ? कैसे होगा आपके आसपास का वातावरण पर्यावरण शुद्ध ?
कैसे बचेगा , कैसे शुद्ध रह पायेगा आपके लिये पीने वाला पानी ? ऐसी
विषम स्थितियों में कैसे न हो नई-नई बीमारियों का जन्म ? आदमी तो
आदमी बड़ी संख्या में बेजुबान पशुओं की असामयिक मृत्यु के लिये भी पॉलिथिन जिम्मेदार है।
सही मायने में इस पुरे विषाक्त वातावरण के निर्माण के हम सब दोषी हैं ,हमें
सोचना समझना चाहिए और कुछ अच्छा करने की हिम्मत का परिचय देना
चाहिए , तभी हम अपने और आने वाली पीढ़ी के साथ न्याय कर पायेंगे ।

जुलाई 06, 2010

727 गल्तियों वाली पुस्तक

यह कोई बाजारू नहीं बल्कि सरकारी  पुस्तक  है , जिसे छ्त्तीसगढ़ शासन ने अपने पाठ्य पुस्तक निगम से छपवाया है ,जिसमें कुल 727 जगह गल्तियाँ हैं।यह  पुस्तक है कक्षा नवमीं की गणित।
जिसमे 8 यूनिट और 20 चेप्टर हैं  । हर चेप्टेर में ढेरों गल्तियाँ हैं । यहाँ तक की इस  पुस्तक के मुखय पेज (कव्हर) पर भी छत्तीसगढ़ बोर्ड ओफ़ सेकेण्ड्री एजुकेशन की स्पैलिंग गलत प्रिन्ट है ।  पिछले वर्ष भी यह  पुस्तक स्कूली बच्चों को दे दी गई थी । रायगढ़ के एक जागरूक शिक्षक ने अपने विभागीय अधिकारियों को इस आशय की शिकायत भी की थी ,लेकिन कुछ भी ना हो सका । इस वर्ष भी  दूसरा कोई विकल्प न होने की वजह से , वही गल्तियों से भरी गणित की किताब हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम के बच्चे खरीदने को मजबूर हैं ।  गल्तियों से भरी यह पुस्तक बाजार में 71 रूपये की कीमत पर उपलब्ध है । पाठ्य  पुस्तक छापने वाला विभाग कहता है उसने गल्तियाँ सुधार दी हैं , लेकिन किताब में गल्तियाँ जस की तस हैं ।सरकारी पुस्तकों की छ्पाई , कागज की रद्दी किस्मों  और बाईंडिग को लेकर हर वर्ष चर्चा रहती ही थी । अब पुस्तकों में प्रकाशकीय त्रुटि को लेकर भी स्कूली बच्चे और उनके अभिभावक  परेशान हैं ।भला नक्कार खाने में तूती कभी सुनी गई है जो अब सुने जाने की उम्मीद की जाए ?      जय हो छ्त्तीसगढ़ की ।

जून 29, 2010

ये अखबार वाले

राजधानी बनने के बाद से रायपुर में मानो अखबारों की बाढ़ सी आ गई है । दूर देश बैठे लोग भी मानो सूंघ-सूंघ कर चले आ रहे हैं यहां । नित्य  नये अखबार खुलने लगे हैं यहां ।  एक अखबार और आया है शहर में । स्वागत है । अखबार शुरु होने में अभी समय है । यहां हमें किसी अखबार से कुछ लेना - देना नहीं है  , लेकिन बिक्री के उसके तौर-तरीके ने आज हमें इस विषय  पर आपके साथ जरूर थोड़ा बात करेंगे को मजबूर किया है । तरीका कोई ज्यादा नया भी नहीं है , हाल के ही कुछ वर्षों में अख्तियार किया गया है ।सभी नें किया है । अब चलन सा बन गया है ।
हमको लगता है अब शायद ही कोई अखबार बिना किसी सहारे के बिक पायेगा ,  तभी शायद  इसे बेचने  निकलने वाले  अखबार के साथ स्टील या कांच  के बर्तन , चटाई या फ़िर पूजा का आसन  या फ़िर प्लास्टिक की बाल्टी , सोडा , सर्फ़ साबुन जैसे तरह-तरह के अन्य होम एप्लायसेंस  के सहारे अखबार का ग्राहक बनाने गली-गली घूमते दिख जाया करते हैं । सवाल यह है कि ऐसा क्यों होने लगा है  ?   अखबार अपने नाम , अपने काम की वजह  से बिकेंगे ,ऐसा अखबार निकालने -चलाने वालों को क्यों नहीं लगता ? उनको अपने अखबार  की गुणवत्ता से कहीं ज्यादा भरोसा बाज़ार की घरेलू सामग्री पर और लोगों को लालच देने , भरमाने पर भला क्यों रहता है ?  लगता है कहीं न कहीं  वो भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि जो आम पाठकों  को चाहिए  वह सब  अब वो उन्हें उपलब्ध नहीं  करा पायेंगे । अखबार अब बिना किसी सहारे नहीं बिक पायेंगे , शायद । इसीलिए बीच का रास्ता अख्तियार करना पढ़ रहा है । लालच देकर ग्राहक पटाओ और सच्चाई ,सही- सही खबरें ना छाप कर  ,जन समस्याओं को न छाप कर उनको खुश रखो , उपकृत करो जिनसे पैकेज या विज्ञापन आदि मिलते हों । कुछ अखबारों ने तो बाकायदा ऐसे कुछ फ़ॉर्मेट तय कर लिये हैं कि चाहे जो हो जाये पर वो किस -किस के खिलाफ़ नहीं जायेंगे  या फ़िर किस-किस से समर्थन में कुछ नहीं लिखेंगे ।  इसके दिशा - निर्देश   " ऊपर " से होते हैं , जिसके लिए सड़कों पर गाली खाते हैं अखबारों के फ़ील्ड वर्कर , रिपोर्टर , मार्केटिंग  का  काम देखने वाले लोग । अंधी और दिशा हीन  दौड़   , सिर्फ़ और सिर्फ़ पैस कमाने की  होड़  में लगे  ये धन पिशाच से लोगों ने  कलंकित कर दिया है अखबार जगत को । अब भला इन्हें कोई कैसे यह समझा  सकता है कि   यार अपना उत्पाद ही ईमानदारी के साथ निकालें तो इन्हें किसी भी  दूसरे के उत्पाद का सहारा नहीं लेना पड़ेगा । लेकिन इनको तो कारपोरेट जगत में ऐनकेन प्रकारेण अपने आपको लेजाने  की सूझ रही है न । लोग क्या चाहते हैं ? इसकी चिंता भला ये क्यों करने लगे ?  कुछ भी छाप दो , अखबार बिकेगा  शैम्पू  ,तेल टेबल-कुर्सी , सी डी , डी वी डी ,  टी वी , घड़ी और पंखे  के सहारे । गया वो जमाना जब अखबार निकालना और उसे चलाना एक '" मिशन " हुआ करता  था ।  आज जमाना हुआ है " कमीशन " का । अखबार को धंधा बना , पैसे के लिए  अपने हांथों में फ़ूलों का गुलदस्ता लिए इसके - उसके दरवाजे घूमने वाले अब शायद ही जल्दी सुधर पायेंगे । जब तक कोई बड़ी घटना नहीं होगी ,ये शायद ही चेत पायेंगे ।Technorati tags:

फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...