प्रदेश का मौजूदा स्वरूप चिंता जनक है । यह प्रदेश के लोगों का मानना है लेकिन सरकार बड़ी
ही सहजता से इसे इंकार करती है । 18 जिलों वाले इस राज्य के सत्रह जिलों में नक्सलियों का
सिकंजा कसा हुआ है - अच्छा नेटवर्क है , यह स्वंय प्रदेश सरकार कहती है , कब ? जब
प्रदेश के मुख्यमंत्री , मुख्य सचिव , गृह सचिव और ऐसे ही महत्वपूर्ण पदों की शोभा बढ़ाने
वाले नेता और अधिकारी नई दिल्ली में प्रधान मंत्री , गृह मंत्री की बैठकों में पैसा और पैकेज
मांगने के लिए बोलते हैं । इन्हें प्रदेश के हर थाना क्षेत्र की सुरक्षा के लिए केंद्र से 200करोड़
रुपया चाहिए । राजनीति शास्त्र कहता है - " राज्य एक लोकतांत्रिक संस्था है। " लेकिन हमारे
राज्य में आकर देखिए तो एहसास होगा यह एक वर्ग विशेष की बेहद नीजि सी संस्था है ।
यहाँ अमीरी और गरीबी की खाई बेहद तेजी से बढ़ रही है । गरीबों की जमीनें धनवानों को
और अधिक धनवान बना रहीं हैं , वहीं गरीबों को न केवल गरीब वरन आगे चल कर
भूमिहीन और निकम्मा बनाने की बहुत ही सोची-समझी साजिश का आसान शिकार बना रहीं है
। सबका मुंह बंद रखने के लिए निम्न आय वर्ग के लिए सस्ता चांवल देकर । ऐसा होने से
ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों में काम के प्रति उदासीनता बढ़ी देखी जा रही है , खतरा उनकी अगली
पीढ़ी को ज्यादा दिखता है , सरकार इसे अपनी सफ़लता बताने करोड़ों रूपयों के विज्ञापन देश
भर में छपवा कर एक तीर से दो निशाने कर रही है , अखबार भी खुश हैं कि उन्हें अच्छा
बिजनेस मिल रहा हैं छत्तीसगढ़ से और इसी बीच सरकार से जुड़े कथिपत लोग अपना उल्लू
सीधा करने में मस्त हैं । इन्हें मालूम है कि सदा चलने वाली योजना नहीं है यह , जब तक
चल रही तब तक निम्न आय वर्ग की जनता इस एक छोटे से ही सही मगर स्वार्थवश उनके
(सरकार) साथ है , विरोध नहीं करेगी , इस बीच जो करना है कर गुजरो कौन सा जीवन भर
सत्ता सुख भोगा है कोई , लेकिन आज जब मौका है तब तो पीढ़ियों के कमाया ही जा सकता है
। कोई भी यदि इस ओर ध्यान दिलाना चाहे तो शासन - प्रशासन में बैठे सूरमा आक्रामक हो
उठते हैं जबकि नीति कहती है कि राज्य के संचालन से जुड़े इस वर्ग को आक्रामक होने का
अधिकार नहीं है । जिन शोषकों के विरूद्ध राज्य को आक्रामक होना चाहिए , उनके प्रति उनका
नम्र और अपनेपन का व्यवहार देखते ही बनता है । राज्य की - गरीब किसानों की स्थाई
संपत्तियों का हस्तानांतरण इस बात के दस्तावेजी साक्ष्य हैं - ऐतिहासिक गवाही बन पड़े हैं ।
बेहद ही अफ़सोस के साथ यहाँ यह कहना पड़ रहा है कि यह राज्य अपने निर्माण काल से
अब तक बीते दस वर्षों में अपने यहाँ ऐसा वातावरण तैयार करने में पूर्णतः असफ़ल रहा है
जिससे कि राज्य में अपराध को रोका - नियंत्रित किया जा सके । उल्टे रसूकदार अपराधियों
को पकड़ने वालों को सजा मिलती है यहाँ , ए एस पी शशिमोहन इसका जीवंत उदाहरण हैं ,
जिन्होने दूसरा कारण बना कर दो साल की छुट्टी पर रहना ,नौकरी करने से कहीं ज्यादा सही
समझा और किया । अच्छा होता यदि यहाँ लोकतांत्रिक प्रणाली को इतना कुशल बनाया जाता
जिसके सहारे अपराध पर अंकुश लगाने में मदद मिल सके ,लेकिन ऐसा होने नहीं दिया गया ,
क्योंकि अपराध में इनके ही लोग जो शामिल हो गये । यहाँ झूठ और मक्कारी की मदद से
आर्थिक अपराध ने अपनी खासी पैठ बना ली है ।
संक्षेप में यह कहना गलत नहीं होगा कि शोषण के मामले में यहाँ किसी एक राजनीतिक दल
को दोषी नहीं ठहराया जा सकता , सभी के नेता जिन्हें जैसा मौका मिल रहा है दोनो हाँथों से
लूटने में लगे हैं , मौसेरे भाईयों की ही तरह और जनता है कि ठगी सी बैठी खुद को लुटता
देख रही है । अराजकता का इससे ज्यादा शालीन स्वरूप शायद ही किसी देश - दुनियाँ मे
देखने - सुनने को मिले । जहाँ नदी , नाले , तालाब , पोखर , पहाड़ , बेश्कीमती हीरों की
खदानें , यूरेनियम से समृद्ध टिन की खदानें सब अंदर ही अंदर बिक रहीं हैं वहीं नहीं बिक
रहा है तो कवर्धा के किसानों का गन्ना , प्रदेश के किसानों का अच्छा धान - ओन्हारी । कौन
है इन तमाम दुर्दशा का जिम्मेदार ? मैं कहुंगा प्रजातंत्र की आड़ लेकर किया जा रहा तानाशाही
का शासन ही है जिम्मेदार , जो अभी और बढ़ेगा , अति होगी , शायद तभी अंत आएगा ।
मगर आज एक आम मध्यम वर्गीय व्यक्ति का जीवन दूभर हो चला है यहाँ । उच्च वर्ग पंच
मेवा की खीर खा रहा है - निम्न वर्ग चांवल - नमक और सस्ती शराब में खुश है । मध्यम
वर्ग को दो समय का खाना कमाना यहाँ दुष्कर हो रहा है । यह तो हाल है अमीर धरती के
गरीब लोगों का ।