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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस

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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।
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जून 12, 2011

लोग क्या चाहते हैं और क्या कर रही है सरकार ???




इस देश में मंहगाई की वजह से आम आदमी रोजमर्रा के जरूरी सामान जुटाने में ही मरा जा रहा है , खुद को तबाह होता , बर्बाद होता पा रहा है । मंहगाई और लूट का आलम यह कि शिक्षा - चिकित्सा - रोटी - पानी , मकान - दुकान सब कुछ धीरे धीरे आम आदमी के हाँथ से मानो फ़िसलता जा रहा है। जीवन में उसके लिए अब कुछ आसान नहीं रह गया है । मन मानो अधीर सा होता जा रहा है । इसी मर्म को महसूस कर आगे आए अन्ना हजारे और बाबा रामदेव का गला दबाने की कोशिश सिर्फ़ और सिर्फ़ इसलिए की जाने लगी क्योंकि ये किसी राजनीतिक दल सीधे सीधे कहें तो सत्तासीन कांग्रेस के नहीं हैं ! आरोप मढ़ने का प्रयास किया गया कि येRSS  और  BJP समर्थित हैं और देश का ध्यान मुख्य बात से हटाने का सुनियोजित और असफ़ल प्रयास भी किया गया । इसमें कहीं कोई शक नहीं कि कांग्रेस के इन गंदे प्रयासों के चलते आम जनता उससे नाराज है , यहां तक की स्वयं कांग्रेस में भी तमाम वरिष्ठ जन अपनी पार्टी की हरकतों से नाराज बैठे हैं , एक्का-दुक्का बयान भी आ रहे हैं । इस देश के असंखय लोग जो चाहकर भी धरना - प्रदर्शन या आन्दोलन के लिए समय नहीं निकाल सकते वे सभी अपनी ताकत अन्ना और बाबा रामदेव को दे रहे थे तन नहीं तो मन और धन से , जो बात कांग्रेस को बहुत जोर से खटकने लगी और उसने अपने चिरपरिचित अंदाज में दांव खेला जिसमें उसका बच्चा - बच्चा माहिर है । अब दौर शुरु हो गया है अपने अपने काले - पीले धन को मैनेज करने का , यहाँ - वहाँ शिफ़्ट करने का , जिसके चलते हर बड़ा कहा जाने वाला आदमी - नेता विदेशों के फ़ेरे ले रहा है , अपने-अपने विश्वस्थों - रिश्तेदारों को इसी काम से भेज रहा है । जब यह काम पूरा हो जायेगा तब होगी घोषणा कालेधन को लेकर । तब तक दमनचक्र चलता रहेगा । केन्द्र हो या फ़िर कोई भी राज्य सभी जगह सता पक्ष मनमानी कर रहा है और वहाँ का विपक्ष उसमें जगह देख कर अपनी - अपनी रोटियाँ भी सेंक ले रहा है । जनता यह सब कुछ देख भी रही है और समझ भी रही है ।  व्यवस्था में सुधार और समस्याओं के समाधान के लिए केन्द्र सरकार ने तमाम समितियों का एक ऐसा घना सा जाल बुना जिसमें तेजतर्रार समझे जाने वाले विपक्षी नेता भी उलझे हुए हैं ।  केन्द्र सरकार शयाद इस भ्रम में है कि मौजुदा व्यवस्था में किसी भी तरह का बदलाव  या बड़े सुधार की तो नौबत ही नहीं आयेगी । केन्द्र को न तो मंहगाई का मुद्दा दिखता है और न ही कहीं भ्रष्टाचार या कालेधन का कोई मुद्दा दिखता है , दिखे भी कैसे आखिर यह सब उपज भी तो उसी के लोगों के प्रयासों का नतीजा है ! सरकार यह समझने की भूल कर बैठी है कि रामलीला मैदान में बैठे 50 - 60 हजार की भीड़ क्या है भला , उसके साथ तो देश की सवा अरब जनता है , उसे भला किस बात की चिंता ! अन्ना या बाबा तो नाम हैं उन करोड़ों लोगों का जो इस देश में चोतरफ़ा मची लूट से राहत चाहते हैं , यह भी सही है कि अब लोगों को नेताओं और उनकी पार्टियों पर भी भरोसा नहीं रह गया है । यही कारण है कि हम सभी किसी सर्वमान्य गैरराजनीतिक नैतृत्व की तलाश में अब भी भटक रहे हैं ।

हे  राम…

जून 06, 2011

प्रजातंत्र बनाम तानाशाही …


मध्य रात्रि मंच पर एकाएक मची अफ़रा तफ़री …


देश की राजधानी में पाँच जून की आधी रात बाबा रामदेव के पंडाल में जो कुछ भी घटना घटी उसने दिल्ली में - देश में राज करने वालों की मंसा जाहिर कर दी है । ये सरकारें जन सामान्य के प्रति कितनी संवेदनशील हैं यह भी दिखा जब सो रहे हजारों लोगों पर रात दो बजे लाठियाँ बरसाईं गईं , अश्रुगैस के गोले छोड़े , महिलाओं बच्चों और बूढ़ो को पुलिसिया जूतों तले रौंदा गया , महिलाओं के साथ खुले आम बदसलूकी की गई । भ्रष्टाचार और अनाचार के खिलाफ़ लड़ी जाने वाली लड़ाई अब शायद इसी तरह दमित की जाती रहेगी , मानो लुटेरों की खिलाफ़त करने वालों की अब खैर नहीं। एक राजनीतिक आदेश ने पुलिस को इतना बल दिया कि दिल्ली पुलिस ने आधी रात रामलीला मैदान में भगदड़ मचा कर रातो रात लोगों को पंडाल से खदेड़ कर दम ही लिया । सियासतदारोम को जहाँ इस दुश्कर्म के लिए शर्म आनी चाहिए तो वहीं वे इसे पूरी बेशर्मी के साथ सही  कार्यवाही निरूपित करने की कवायद करते देखे जा रहे हैं । क्या यही सही तरीका है शासन - प्रशासन का जनता के प्रति जवाबदेही का ? क्या गुनाह किया था आधीरात सो रही है जनता ने ? क्या नागरिक अधिकार खत्म कर दिये गये हैं ?
देख लिया अंग्रेजों की औलादों को …
दिल्ली के रामलीला मैदान पर आधी रात सो रहे हजारों अनशनकारियों पर पुलिस की लाठियाँ बरसाने का आदेश देकर और बाबा रामदेव , आचार्य बालकृष्ण सहित तमाम अन्य नेतृत्वकर्ताओं को अज्ञात स्थल पर ले जाकर दिल्ली में बैठी केन्द्र और दिल्ली राज्य की कांग्रेस सरकार ने यह साबित कर दिखाया है कि अपने लोगों पर शासन करने का उनका तरीका आज भी अंग्रेजियत से प्रेरित है ।
पंडाल में आग लगाना , सो रहे निर्दोष इंसानों ,महिलाओं - बच्चों - बुजुर्गों पर लाठी बरसाना कहाँ तक उचित है  ? पाँच जून की सुबह कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने प्रेस काफ़्रेंस में बाबा रामदेव पर तरह तरह के आरोप लगाये और उन्हें गलत आदमी बताया , क्या मैं यह जान सकता हूँ कि अब तक बाबा रामदेव की गलतियों के लिये उनके विरूद्ध आवाज समय रहते क्यों नहीं उठाई गई ? क्यों कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्रियों ने उनसे एयरपोर्ट पर और पाँच सितारा होटल में जाकर घण्टों बातचीत की ? क्यों एक गलत समझे जाने वाले बाबा और उनके महामंत्री आचार्य बालकृष्ण से लिखित आश्वासन लिया ? एक तरफ़ बाबा रामदेव को आप सिरे से खारिज करते हैं ठीक उसी वक्त उसी आदमी बाबा रामदेव को आपके ही दल के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और वरिष्ठ मंत्री (बकौल दिग्विजय सिंह) सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर लगा कर चर्चा क्यों करती है ??? क्या यह दोहरा चरित्र नहीं है कांग्रेस का ?
 क्या अविभाजित मध्य प्रदेश की जनता दिग्विजय सिंह को नहीं जानती ? क्या उनके कार्यकाल को नहीं जानती ? क्या कभी अपने गिरेबान में झांकने का साहस करेंगे हमारे देश के नेता ? दिग्विजय सिंह कहते थे दो दिन पहले की ही बात है कि अगर कांग्रेस बाबा रामदेव से डरती होती तो उन्हें गिरफ़्तार कर लेती । अब क्या समझा जाय ? क्या डर गई कांग्रेस जो रातोरात उसे ऐसी बर्बर कार्यवाही करने प्रशासन का दुरुपयोग करना पड़ा ? है कोई जबाव दिग्विजय सिंह  जैसे कांग्रेसियों के पास ?
इस घटना ने एक बार फ़िर जलियाँवाला बाग की बर्बरतापूर्ण घटना की याद दिला दी है , शर्म आनी चाहिये ऐसी कथित आजादी पर और नेताओं के नाम पर अंग्रेज की ऐसी संतानों पर  ।

सो रहे लोगों को पंडाल से खसिट कर बाहर ले जाती दिल्ली पुलिस
इससे पहले देर रात की घटना -

मुख्य मंच पर लगाई आग 
दिल्ली के रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के अनशन को अभी एक रात भी नहीं बीती थी कि पूरे आयोजन ने एक अति-नाटकीय मोड़ ले लिया।दिल्ली पुलिस ने देर रात रामलीला मैदान में बाबा रामदेव के अनशन पंडाल को चारों ओर से घेरे में ले लिया. इससे पहले बाबा रामदेव की अनशन करने की अनुमति को रद्द कर दिया गया। उधर रामलीला मैदान में मौजूद बाबा रामदेव के समर्थकों ने पंडाल के मंच और बाकी स्थानों को घेर लिया और बाबा के बचाव में उनके समर्थक पुलिस से आमने-सामने उतर आए। इस दौरान पंडाल के एक हिस्से में आग लगने की खबर से अफरातफरी मच गयी. कयास यह भी लगाए जा रहे हैं कि यह आग शायद पुलिस द्वारा लगायी गयी हो. देखते ही देखते स्थिति बेकाबू हो गयी. इस दौरान पुलिस ने थोड़ा बल प्रयोग भी किया और आंसूगैस के गोले भी छोड़े. इस पूरे माहौल के बाद से बड़ी तादाद में रामदेव समर्थकों को पंडाल छोड़कर भागना पड़ा। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक वहां का नजारा जलियावाला बाग घटना से मेल खाता था. यह देखकर बिल्कुल नहीं लग रहा था कि देश आजाद हो चुका है ।  भ्रष्टाचार और विदेशों में जमा काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव ने चार जून से दिल्ली में अपने हज़ारों समर्थकों के साथ अनशन की शुरुआत की थी । हालांकि शाम होते-होते ही अनशन को लेकर बाबा रामदेव और केंद्र सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया था.।   जहां एक ओर केंद्र सरकार ने बाबा रामदेव पर समझौते के बावजूद अनशन को जारी रखने का आरोप लगाया वहीं बाबा रामदेव ने केंद्र सरकार पर अफवाहें फैलाने और उनके साथ धोखा करने का आरोप लगाया । शाम को ही केंद्र सरकार अपने बयान में तल्ख नज़र आने लगी थी. सरकार का कहना था कि बाबा रामदेव अपने वादे से मुकरे और उन्होंने समझौते के बावजूद अनशन को जारी रखा । इससे पहले अनशन की शुरुआत के साथ ही विवादों का सिलसिला शुरू हो गया था।
रातो रात खाली हो गया पंडाल जहाँ सो रहे थे हजारों आम लोग 
चित्र  कुछ बोल रहे हैं…
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मई 10, 2011

पेंशन की खातिर एक वृद्ध सब इंजीनियर ने कलेक्टोरेट अधीक्षक को मारा चाकू

सामने दिख रहे हैं रिटायर्ड सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ,पीछे सफ़ेद पैंट और
 ब्लू लाईनिंग शर्ट पहने हुए हैं जिला अधीक्षक जिन पर हमला हुआ । 
यह चित्र धटना के बाद का है ।



राजधानी रायपुर में पिछले चार वर्षों से अपनी पेंशन पाने के लिए भटक रहे एक वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने कलेक्टोरेट अधीक्षक पर चाकू से हमला बोल दिया । अपनी पेंशन पाने सरकारी दफ़्तरों के चार साल से चक्कर लगाते - लगाते हताश हो चले इस वृद्ध के सब्र का बांध टूट गया और  मानो मरने - मारने पर आमदा हो गया वह थक हार कर । 09 मई 2011 की दोपहर इस वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने चाकू से जिला कलेक्ट्रेट में पदस्थ अधीक्षक जे आर साहू के गाल पर चाकू से वार किया और तभी मौके पर मौजूद जिला प्रशासन अन्य कर्मियों ने फ़ौरी तौर पर उसे पकड़ पुलिस के हवाले कर दिया । इतनी ही फ़ूर्ती यदि उसके पेंशन प्रकरण में निबटारे के लिए दिखाई गई होती तो शायद ऐसे वाकिए ही न होते । फ़िर क्या था सामने आया देश का कानून जिसने परेशान उस वृद्ध को सजा देने अपना लम्बा हाँथ आगे बढ़ाया ,  मगर यही कानून उसे उसके हक की पेंशन न दिला पाया ।
 हताशा की यह छूरी चलाई है 36 साल जल संसाधन विभाग में कार्यरत रहे सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह ने , जिन्हें विभाग से रिटायर हुए वर्षों हो चुकने के बाद भी आज तक पेंशन तक नसीब नहीं हो पाई है । जी पी एफ़ विभाग ने फ़ंसा रखी है इस व्यक्ति की पेंशन की फ़ाईल और घुमाता रहा जिला कार्यालय इसे ।
नियम है कि रिटायरमेंट के बाद अगले ही महिने से मिलने लगती है पेंशन और यदि किन्हीं कारणों से देर हो रही हो तो पेंशन की यह राशि उस व्यक्ति को एरियर्स के रूप में तुरंत मिलने लगती है । खेद जनक पहलू यह कि यहाँ उस वृद्ध सब इंजीनियर लोकेन्द्र सिंह को ऐसी कोई सुविधा नहीं मिल पाई , सिवाय प्रताड़ना और दफ़्तरों के चक्कर पर चक्कर लगाने के , वह अपने तमाम दस्तावेजों से भरा भारी भरकम (करीब 20 - 25 किलो वजनी) बैग टांगे सरकारी दफ़्तरों के चक्कर लगाता रहता और दोपहर लंच के समय कौफ़ी हाऊस पहुंच कर कभी दूध ब्रेड तो कभी चाय ब्रेड खा कर दोबारा उन्हीं दफ़्तरों के चक्कर काटने के लिए ताकत जुटाता दिखा ।
पेंशन और ग्रेच्युटी के लिए लगातार चार साल से चक्कर काट रहे सेवानिवृत्त सब इंजीनियर लोकेंद्र सिंह ने सोमवार को कलेक्टोरेट के अधीक्षक जतिराम साहू पर  जब चाकू से हमला कर दिया तब  हमले की खबर से कलेक्टोरेट परिसर में हड़कंप सा मच गया। कार्यालय के सभी अधिकारी और कर्मचारी तत्काल अधीक्षक कार्यालय के बाहर जमा हो गए। आनन-फानन में पुलिस को सूचना दी गई। गोलबाजार थाने की पुलिस पहुंचने के बाद घायल अधीक्षक को तत्काल डॉक्टरी मुलाहिजे के लिए आंबेडकर अस्पताल ले जाया गया। आरोपी को मौके पर ही चाकू के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

बालाघाट निवासी लोकेंद्र सिंह की माली हालत अच्छी नहीं बताई जाती है , वह  जलसंसाधन विभाग रायपुर में सब इंजीनियर के पद पर पदस्थ थे। वे चार साल पहले ही सेवानिवृत्त हो गए थे, लेकिन उनकी ग्रेच्युटी और पेंशन का भुगतान अब तक नहीं हो पाया था। जिसके लिए उन्हें बारबार बालाघाट से यहाँ रायपुर के चक्कर लगाने पड़ते हैं । तीन दिन पहले ही उन्होंने कलेक्टर से मुलाकात कर भुगतान करने के संबंध में आवेदन देकर न्याय की गुहार लगाई थी। कलेक्टर ने यह पत्र कार्यवाही के लिए कलेक्टोरेट अधीक्षक के पास भेज दिया। सोमवार को लोकेंद्र ने अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर अपने प्रकरण में आवश्यक कार्रवाई की मांग की। अधीक्षक श्री साहू ने उन्हें कुछ देर बैठने के लिए कहा। काफी समय तक अधीक्षक के बुलावे का इंतजार कर लोकेंद्र को देर तक नहीं बुलाया गया। इससे आक्रोशित होकर उन्होंने अपने पास रखे सब्जी काटने के चाकू से जति राम पर हमला कर दिया। चाकू के वार से अधीक्षक के गाल पर हल्की खरोंच आई है। तात्कालिक उपचार के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
ऐसा तो हाल है राजधानी रायपुर में संवेदनशील कही जाने वाली सरकार के महकमे का , वह अपने सरकारी अधिकारियों - कर्मियों को जब तंग करने से बाज नहीं आ रहा है तो भला सोचिए आम आदमी यहाँ किस हाल में और कैसा होगा ? लोकेन्द्र अकेला नहीं है आज भी यहाँ पेंशन के हजारों प्रकरण लंबित हैं जिसकी परवाह किसी को भी नहीं है , क्या सभी को वृद्धावस्था में अपनी - अपनी पेंशन पाने इसी तरह चाकू - छूरी का सहारा लेना होगा ?
' सिस्टम' के गाल पर पड़ी हताशा की इस छूरी से क्या कुछ सबक लेगा यहां का स्वयंभू और कथित ' संवेदनशील' प्रशासन , कहा नहीं जा सकता !!!  

मई 08, 2011

अंग्रेजों से कहीं ज्यादा बर्बर और लालची लोग




अंग्रेजों से कहीं ज्यादा बर्बर और लालची साबित हो रहे हैं हमारे अपने लोग जिनके हाँथों में है सत्ता की बागडोर । उत्तर प्रदेश अकेला नहीं है समूचे देश में इस समय सत्ताधीश और पूर्व सताधीश मिलजुल कर जमीन का कारोबार खुलेआम , बेझिझक पूरी बेशर्मी के साथ करतेअ देखे जा सकते हैं । किसानों की जमीनों को सस्ते में खरीद कर बड़े औद्योगिक धरानों को ऊंचे दामों व अपनी शर्तों पर उपलब्ध कराने का काम करने में मस्त हैं ये कथित राजनेता और अखिल भारतीय स्तर पर एकजुट भी हैं , दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर एक हैं ये ।
उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध जिले के भट्टा ग्राम में अपनी जमीन के जबरिया और मनमाने अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानों और उनके परिजनों के साथ खून की होली खेलने पर आमदा है उत्तर प्रदेश का कथित दलित पीड़ित जनों का शासन । यहाँ शासन ने अपनी योग्यता और नीयत का खुला प्रदर्शन कर दिया है । देश है कि तमाशबीन बना बैठा है और हिजड़ों के जैसा बैठा है केन्द्र शासन। उत्तर प्रदेश पीएसी के जवानों ने नोएडा के भट्ठा गांव में रात भर तांडव मचाया। यहां किसानों की धरपकड़ के लिए पुलिस ने घरों में घुस कर बच्‍चों और महिलाओं को प्रताडि़त किया। गांव की महिलाओं का आरोप है कि कई पुलिस वालों ने लूटपाट भी की। यही नहीं सोते बच्‍चों पर भी पुलस वाले अत्‍याचार करने से बाज नहीं आये।
पुलिस ने किसानों पर जमकर लाठियां भांजी और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोलियां भी चलाईं। पुलिस ने रात भर अभियान चलाकर 100 से ज्‍यादा किसानों को हिरासत में लिया है। गौतमबुद्धनगर में धारा 114 लागू कर दी गई है। आगरा व ग्रेटर नोएडा दोनों जगह भारी संख्‍या में पुलिस बल तैनात कर दिये गये हैं।
नोएडा एक्‍सप्रेस वे के निर्माण के लिए अपनी जमीनों के अधिग्रहण के खिलाफ ग्रेटर नोएडा में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस की फायरिंग, रात भर भट्ठा गांव में रात भर किसानों की धरपकड़ के लिए पुलिस का तांडव और अब रविवार की सुबह से आगरा में प्रदर्शन के दौरान पुलिस की दोबारा फायरिंग। जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ शनिवार को नोएडा से भड़का किसानों का उग्र आंदोलन निर्माणाधीन यमुना एक्सप्रेसवे के आखिरी छोर आगरा तक पहुँच गया है । अधिकारियों के अनुसार रविवार को आगरा में किसानों के साथ संघर्ष में प्रांतीय सशस्त्र बल पीएसी के कम से कम चार जवान घायल हो गए हैं, जबकि नोएडा में मरने वालों की संख्या पांच हो गई है ।
नोएडा में मरने वालों में दो पुलिस जवान और दो किसान हैं , जबकि पांचवें व्यक्ति की शिनाख्त नही हो पाई है ।
 जी हां ग्रेटर नोएडा से लेकर आगरा के चोगन ग्राम तक किसानों पर पुलिस का कहर जारी है। वो भी उस दिन जब प्रदेश सरकार के चार साल पूरे हुए हैं।
उत्‍तर प्रदेश में मायावती सरकार ने आज अपने चार साल पूरे किये हैं, लेकिन ऐसे समय में जहां मुख्‍यमंत्री अपनी उपलब्धियों का बखान करने निकली हैं, वहीं दूसरी ओर उन्‍हीं की पुलिस किसानों पर कहर बरपा रही है। शनिवार को ग्रेटर नोएडा में फायरिंग के दौरान एक जवान और दो किसानों की मौत के खिलाफ आगरा व ग्रेटर नोएडा दोनों जगह किसानों ने रविवार की सुबह जमकर प्रदर्शन किया। इस दौरान किसानों ने आगरा में कई फैक्ट्रियों में आग लगा दी और एक्‍सप्रेस हाईवे जाम कर दिया। उधर अलीगढ़ के किसान भी आंदोलन में उतर आये हैं।
छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश का तो हाल ही बुरा है । यहाँ तो सरकारें ही नहर , तालाब और बांध औद्योगिक घरानों को बेच रही है , विधान सभा में आये दिन हंगामें होतो और शांत पडते देखे-सुने जाते हैं । किसानों की जमीनें हथियाने और कालोनी बनाने का काम यहाँ भी जोरशोर से चल रहा है ,लोग कोलकाता , ओरिशा , राजस्थान , बिहार , और महाराष्ट्र से आकर यहाँ बड़ा इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं और सता के संगवारी उनके साथ देखे जा सकते हैं । यहाँ जमीनों के मामले अदालतों में न्याय पाने की अभिलाषा लिये अपनी अपनी बारी आने की बाट जोह रहे हैं ।




मई 02, 2011

शर्म करो बेशर्मों , कुछ तो सीखो …


ओसामा बिन लादेन (जिंदा)
ओसामा बिन लादेन (मुर्दा)


विश्वगुरू बनने की लालसा रखने वाले भारत के दो मुहें नेताओं को कुछ सिखने और शर्मसार होने का समय आया है । एक ओर जहाँ विश्व के सर्वाधिक भ्रष्ट और बड़े तानाशाह, लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी को साफ़ करने की मुहिम जारी है, त्रिपोली उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के हवाई हमले में शनिवार 29अप्रैल को लीबिया के शासक कर्नल गद्दाफी बाल-बाल बच गए लेकिन उनके सबसे छोटे बेटे सैफ अल-अरब गद्दाफी (29) और तीन पोतों की मौत हो गई।
 वहीं इसी बीच यह खबर आती है कि दुनिया के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन अल कायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन आखिरकार मारा गया। अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने ओसामा के मारे जाने की आधिकारिक पुष्टि कर दी है। पाकिस्‍तान की राजधानी इस्‍लामाबाद के समीप अबोटाबाद में एक आलीशान हवेली में छिपे लादेन को सीआईए के ऑपरेशन में मार गिराया गया।अमेरिका ने ले लिया 9 / 11 की घटना का बदला दस वर्षों बाद , ढ़ूंढ़ कर मार गिराया अपने दुश्मन को ।
आतंकवाद को जड़ से मिटाने की बात कहने वालों ने कामयाबी पा ली है , श्रीलंका ने भी चीन की मदद से अपने यहाँ लिट्टे का सफ़ाया कर लिया । सिर्फ़ अमेरिका की चमचागिरी करना ही “विदेश नीति” नहीं होती, यह बात कौन हमारे नेताओं को समझायेगा? आखिर कब भारत एक तनकर खड़ा होने वाला देश बनेगा। तथाकथित मानवाधिकारों की परवाह किये बिना कब भारत अपने बारे में सोचेगा?
अमेरिका में 9 / 11 की घटना
   जो कुछ चीन ने श्रीलंका में किया क्या हम नहीं कर सकते थे ?
 शर्म आनी चाहिए उनको जो भारत में आतंकवाद को , आतंकवादियों को खुले आम पनाह देते हैं , डरते हैं कसाब और अफ़जल गुरु जैसे आतंकवदियों को सजा देने से । भला ऐसे कमजोर नेता कैसे बलवान भारत बनायेंगे ???

सीआईए प्रमुख लियोन पेनेटा ने अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए पाकिस्तान में चलाए गए अभियान की जानकारी मंगलवार को अमेरिकी सांसदों को दी।

सांसदों के साथ बातचीत में समझा जाता है कि पेनेटा ने बताया कि अमेरिका ने पाकिस्तान को इसलिए कोई सूचना नहीं दी थी क्योंकि उसे लगता था कि यदि कोई सूचना दी गयी हो तो वह लीक हो सकती है।

अमेरिकी कांग्रेस की खबरों की कवरेज करने वाले दी हिल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सीआईए चीफ पेनेटा ने सीनेटरों को एक बैठक में बिन लादेन मिशन के बारे में जानकारी दी और बताया कि प्रशासन ने पाकिस्तान को सूचित नहीं करने का फैसला किया था क्योंकि आशंका थी कि जानकारी लीक हो सकती है और मिशन में बाधा आ सकती है।

बैठक में मौजूद एक सांसद ने यह जानकारी दी। पेनेटा ने इससे पहले टाइम मैगजीन को बताया था कि यह फैसला किया गया कि पाकिस्तान के साथ मिलकर कार्रवाई करने का कोई भी प्रयास अभियान को पंगु बना सकता है। हो सकता है कि वे संबंधित लोगों को चेतावनी दे दें।

बैठक के बाद सांसद पीटर किंग ने संवाददाताओं से कहा कि यह यकीन करना असंभव है कि जिस प्रकार की आधुनिक खुफिया एजेंसी और सैन्य क्षमता पाकिस्तान के पास है, उसके बावजूद उन्हें यह नहीं पता हो कि दुनिया का सर्वाधिक वांछित आतंकवादी खुले आम इस कदर आंखों के सामने रह रहा है।

उन्होंने सवाल किया कि पाकिस्तान को अहसास होना चाहिए कि कांग्रेस में कई सदस्य गंभीर सवाल उठा रहे हैं। सवाल यह है कि दुनिया का सर्वाधिक वांछित आतंकवादी उनके बीच में रह रहा है और वे उसे पकड़ नहीं सकते तो हमें क्यों सालाना तीन अरब डॉलर की राशि उसे देनी चाहिए।

अप्रैल 19, 2011

क्या होगा कांग्रेस का यहाँ … ?

छ्त्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस के नवनियुक्त अध्यक्ष नंद कुमार पटेल



क्या होगा कांग्रेस का यहाँ … ?

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के हालात किसी से छिपे नहीं हैं , इन्हीं हालातों के बीच पार्टी आलाकमान ने पूर्वमंत्री नंद कुमार पटेल को प्रदेश कांग्रेस का नया अध्यक्ष नियुक्त किया है । अब दौर है कहीं खुशी - कहीं गम का क्योंकि यही खासियत है इस पार्टी कि जितने सर उतने धड़े , गुटीय राजनीति ने सर्वाधिक नुकसान किया है कांग्रेस का , यह बात सभी कांग्रेसी और गैरकांग्रेसी बखूबी जानते - समझते हैं , पर कांग्रेस को बचाने के लिए शायद समझना ही नहीं चाहते ।

प्रदेश में कांग्रेस की इस दुर्गति के जिस एक अतिजिम्मेदार नेता का नाम लिया जाता है , उसका उल्लेख करना अब यहाँ जरूरी नहीं समझता हूँ , समूचा प्रदेश ही नहीं बल्कि देश जानता है उस नेता तो , शुक्र है उस नीली छतरी वाले का जिसने छत्तीसगढ़ को दूसरा बिहार बनने से बचा लिया । यहाँ वर्ग संघर्ष के जनक को पदच्युत कर दिया और शायद प्रभावहीन भी । इन नये अध्यक्ष महोदय पर उन नेता की छवि - उनका आशीर्वाद , उनका वरदहस्त होना बताया जाता है , सच्चाई तो ऊपर वाला और वे दोनो नेता ही समझ सकते हैं , पर जो हल्ला है उससे इंकार नहीं किया जा सकता । अब सवाल यहाँ यह है कि कैसे सुधरेगी प्रदेश  में कांग्रेस की दशा-दिशा ? क्या उन पुराने कांग्रेसियों को वापस कांग्रेस में सम्मान के साथ काम करने का अवसर मिल पायेगा जैसा कि वे वर्षों से करते आ रहे थे और इस प्रदेश को दशकों तक कांग्रेस का गढ़ बना कर रखा था । यहाँ इस बात का उल्लेख करना बेहद जरूरी हो जाता है कि नया राज्य बनने और नई राजनीतिक शुरुआत ने यहां प्रदेश के गाँव - गाँव , शहर - शहर से ऐसे निष्टावान कांग्रेसियों को एक मुश्त उखाड़ फ़ेंकने का काम एक बहुत ही सोची समझी साजिश के चलते किया था , जिसे नया राज्य बनने के बाद , आज तक 11 वर्षों बाद तक भी किसी कांग्रेसी नेता ने सुधारना नहीं चाहा और परिणाम सामने है । क्या नये अध्यक्ष  इस दिशा में भी सोचेंगे ? या फ़िर इशारों में चलेगी यहाँ कांग्रेस जैसा कि बीते एक दशक से चलती आ रही है । शर्म आती है जब  सार्वजनिक तौर पर लोगों को यह कहते सुना जाता है कि अमुख कांग्रेस नेता तो अमुख बी जे पी के नेता - मंत्री से सेट है , कांग्रेस प्रत्याशी को अमुख जगह चुनाव हराने में उसकी बड़ी भूमिका थी , उसने तो "इतना सूटकेस" या "खोखा" लेकर अपनी ही पार्टी को वहाँ हराने का काम बड़ी सक्रियता से किया । क्या नये अध्यक्ष इस चुनौती को स्वीकार कर कुछ कर दिखायेंगे यहाँ जिसकी कि आम कांग्रेस कार्यकर्ता उनसे अपेक्षा करता है ! छत्तीसगढ़ का आम कार्यकर्ता यह भी भलीभाँति जानता है कि उसके किस अतिजिम्मेदार नेता ने सन 2003 के पहले और 2008 के दूसरे विधान सभा चुनावों में अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को चुनाव हराने के लिए क्या क्या नहीं किया था । तब से आज तक यहाँ कांग्रेस की स्थिति सुधरती नहीं दिखती है । क्या करेंगे नये अध्यक्ष महोदय इस दिशा में ? शायद उन्हें इसकी जानकारी होगी ।
एक आम कार्यकर्ता यह नहीं समझ पाता है कि जो भी - जहाँ भी कांग्रेस अध्यक्ष बनता है सबको (सभी गुटों को) साथ में लेकर चलने की बात क्यों करता है , वह कांग्रेस के साथ चलने और सबको कांग्रेस के साथ चलाने की बात क्यों नहीं करता ???    

अप्रैल 04, 2011

सार्थक बनाएं माँ की आराधना

नवरात्रि के परम पावन अवसर पर हम सभी माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना में सतत लीन रहते हैं , प्रार्थना है माँ सभी की मंगल कामनाएं पूर्ण करें । साथ बेटी स्वरूप में माँ सबके घर पधारें । कोख में आए माँ के आशीर्वाद स्वरूप रत्न  " कन्या " की कोई माँ - बाप या सास - ससुर , जेठ - जेठानी , देवर - देवरानी , नंद - नंदोई  कोई भी हत्या न कर पाए  बल्कि ऐसी पापी सोच ही किसी के दिमाग में विकसित न हो पाए  तब सार्थक होगी माँ की आराधना ।                                                                                                                                                                                       प्यार की घनी छाँव हैं ये बेटियाँ  - उर्मि कृष्ण
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प्यार की घनी छाँव हैं ये बेटियाँ


भर देती जिंदगी के अभाव ये बेटियाँ


बापू की आन में


पति की शान में


चाचा, ताऊ और जेठ, देवर


के भार में


मन के गुबार को, सद्‍भावना के नीचे


दफना रही हैं ये बेटियाँ


कुल की लाज में


सपूतों के निर्माण में






अपने अरमान को


मौन में


पी रही हैं ये बेटियाँ


कला की आड़ में


सौंदर्य के गुमान में


रंगमंच हो या टीवी


बेटी हो या बीवी


अखबार हो या पत्रिका


उघाड़ी जा रही हैं ये बेटियाँ


आग की आँच पर


चौपड़ की बिसात पर


सीता सावित्री के नाम पर


हर युग में दाँव पर


लगी हैं ये बेटियाँ






तुम कुछ भी कहो


कुछ भी करो


हर युग में मिटती आई है बेटियाँ


घर को सँवारती


जग को सुधारती


कभी न हारती


नया जन्म फिर फिर


लेती हैं बेटियाँ


नया जन्म फिर फिर


देती हैं बेटियाँ ।
                                                      

मार्च 17, 2011

"गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा…"


साथी और भाई संजीत त्रिपाठी की सलाह है कि मैं,पत्रकारिता के अपने अनुभव "खबरों की दुनियाँ" में शेयर करुं । कोशिश होगी कि वर्तमान समय जो बदलाव आया या आ रहा है उसे दृष्टिगत कर अपने अनुभव आप तक इस माध्यम से पहुंचा सकूं ।पिछ्ड़ा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ , पत्रकारिता के क्षेत्र में समृद्ध रहा है । ज्यादा पुरानी बात नहीं करता 1985 से आज तक की बातें करें तो इस क्षेत्र में "मूल्यों" का बड़ा परिवर्तन आया है ।यहाँ मेरे कहने का यह मतलब कतई न निकाला जाए कि अब कहीं मूल्यवान पत्रकारिता नहीं हो रही है या फ़िर आज के साथी यह समझने की भूल कर बैठें कि वे मूल्यवान पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं और पुराने लोग बड़े आदर्शवादी थे । यहाँ मैं उन हालातों की चर्चा करने की चेष्टा करुंगा जिन्होंने पत्रकारिता के मूल्य बदले हैं और आज जिन वजहों से पत्रकारिता से जुड़े कलम के सच्चे सिपाही भी जन सामान्य को पत्रकारिता पर सरेराह टिप्पणी करते , कुछ भी कहते-बोलते सुनते रहते हैं ।
सन 1990 का दौर था एक बड़े पत्र ने रायपुर की धरती पर अपनी नींव रखनी शुरु की थी । सही मायने मे यही वह काल खण्ड था जहाँ से बदलाव की बयार बहुत धीरे-धीरे ही सही ,लेकिन बहना शुरु हो गई थी । स्थापित दो बड़े अखबारों के दिल की धड़कनें बढ़ गईं थीं । इससे पहले तक "प्रतिस्पर्धा" धीमी थी और मान-मर्यादा , लोक लिहाज से मानो डरती थी । रिपोर्टिंग की ही बात की जाय तो उन दिनों किसी भी घटना की रिपोर्ट और उसका फ़ालोअप , नतीजे तक पहुंचने तक करना पत्र की मानो एक जिम्मेदारी होती थी  , दूसरा पत्र भी समर्थन की दिशा में काम करता था । किसी भी तरह का दबाव सोचना भी मानो पाप जैसा था , तब लोग ऐसा पाप करना तो दूर सोचने से भी डरते थे । कहने का सीधा सा मतलब कि समाचार पत्रों का दबाव था अपराधी ही नहीं तत्कालीन शासन-प्रशासन भी डरता था कि उससे कहीं कोई बड़ी गलती न हो जाय , वर्ना खैर नहीं । पत्र समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भलिभाँति वाकिफ़ ही नहीं थे बल्कि सतत उसका निर्वहन भी करते थे।  पत्र-पत्रकारों की राय-सुमारी केवल सामाजिक संगठन ही नहीं , नेता और शासन-प्रशासन के लोग भी मानते थे , क्रियान्वित करते थे । मायाराम जी सुरजन , मधुकर खेर जी , बबन प्रसाद जी मिश्र , राजनारायण मिश्रा जी  'दा' , कुमार साहू जी , गिरिजा शंकर जी अग्रवाल , रम्मू शीवास्तव जी, सतेन्द्र गुमाश्ता जी ,  रामाश्रय उपाध्याय जी , बसंत तिवारी जी , नीरव जी , अनल शुक्ल जी , नरेन्द्र पारख जी , निर्भीक वर्मा जी  और इनके बाद एम ए जोसेफ़ , आसिफ़ इकबाल , सुरेश तिवारी  जैसे और बहुत सारे ऐसे नाम हैं जो पत्रकारिता करते हुए समाज हित को सर्वोपरि रखते रहे हैं । हमें सौभाग्य से ऐसे लोगों के मार्ग दर्शन में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ । समय ने करवट ली नया राज्य बना छत्तीसगढ़  राजधानी में हर बड़े पत्र - पत्रिकाओं के स्टेट ब्यूरो आए , पत्रकारिता को नई दिशा मिली , रायपुर ने भी जाना क्या होती है  ' पेड न्यूज ' । उन दिनों मैं दैनिक भास्कर में था । प्रदेश में पहली मर्तबा विधान सभा का चुनाव का समय आ गया था , मुझे और मेरे जैसे तमाम लोगों को बताया गया कि किस पार्टी की न्यूज कैसी और क्यूं लगेगी और किसकी नहीं लगेगी । चुनावी पैकेज कैसा होता है यह भी उम्मीदवारों को हमें ही समझाने को कहा गया , मेरे मना करने पर मुझे काम से हटाने की बात समझाई गयी , बाद में मेरे आग्रह पर यह काम मेरे कार्यक्षेत्र में प्रेस के उच्च पदस्थ व्यक्ति ने आ कर पैकेज डील किया प्रेस के लिए । कुछ दिनों बाद मैं कार्यमुक्त हो गया था । फ़िर मैंने रायपुर मे ही जहाँ भी नौकरी की यही तकलीफ़ आई , दरअसल मैं था संपादकीय विभाग का आदमी , मुख्य रूप से सिटी रिपोर्टर रहा , विशेष संवाददाता रहा , प्रेस प्रबंधन चाहता था मैं और मेरे साथी विज्ञापन और प्रसार का भी काम देंखें , पेपर के लिए जमीन दिलाने , सरकारी मामले -मुकदमें निपटाने का भी काम बखूबी करें जो हम नहीं करना चाहते थे । हम गुलदस्ता हाँथों में लेकर किसी मंत्री या अधिकारी के  घर - दफ़्तर के बाहर नहीं खडे होना सीख पाए थे , हमारे अग्रजों ने हमें यह नहीं सिखाया था , सो हमारे जैसे सभी लोग फ़ेल हो गये ऐसा कर पाने में और आज सब प्रेस से बाहर अपना अपना छोटा छोटा काम जो पत्रकारिता से जुडा है कर रहे हैं । हाँ 1993-94 में रायपुर से प्रकाशित पहले रंगीन दैनिक अखबार समवेत शिखर में काम करते हुए उस अखबार के लिए , तत्कालीन कलेक्टर देवराज विरदी जी से अच्छे संबंधों के चलते रजबंधा मैदान जो आज प्रेस कॉम्प्लेक्स के नाम से जाना जाता है  , वहाँ पर 44000 वर्गफ़ुट(एक एकड़) जगह उस प्रेस को एक रुपये वर्गफ़ुट के हिसाब से दिलवाने का काम जरूर किया था , इस जगह को उस समय रौद्रमुखी पत्र के लिए लेने का प्रयास किया जा रहा था लेकिन यह जगह हमें मिल गई थी । आज वहाँ नवनिर्मित कॉम्प्लेक्स बन कर तैयार है । हम तब और अब भी ऐसे कामों से अपना नफ़ा - नुकसान नहीं समझ पाए । लेकिन आज हालात किसी से छिपे नहीं हैं । हमको ही सोचना होगा हम जाने अनजाने में क्या कर रहें हैं । जहाँ कभी प्रेस की बिल्डिंग देखी थी लोगों ने उसी जगह पर विशाल शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं । लोग अब सरेराह इनपर छींटा कसी कर रहे हैं , जो इस शहर में कभी खरा - खरा लिखने के नाम से जाने जाते थे उन्हें भी सरकार से पद चाहिए , वह भी चुप बैठने को सशर्त तैयार देखे जा सकते हैं ।  साथी पत्रकार जिन्होने समय के साथ करवट बदली - उन मूल्यों को तिलांजलि दी जो कभी बेहद मूल्यवान हुआ करते थे और वे आज करोड़ों रुपयों बेशुमार दौलत के मालिक हैं जमीन के कारोबार में जुड़े तमाम लोगों के बेहद हित चिंतक हैं । यह है पत्रकारिता का नया स्वरूप । पहले कभी जिन मूल्यों की कदर थी वह मुल्य अब बेकद्री के शिकार हैं , नये मूल्य स्थापित हो गये जिन्हें रिक्शा चलाने वाला भी समझता है कि इस मूल्य से बोटल आती है  , ऐसे मूल्य आज हुए हैं यहाँ मूल्यवान । छत्तीसगढ़ में तो मानो मौका भी है और दस्तूर भी कि दोनो हाँथों से लूट लो , ऐसा मौका फ़िर कहाँ मिलेगा ? फ़िर यह भी तो सही है न कि गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा… सच ही है सब लूटो - खावो में लगे हैं इस अमीर धरती को और उसके गरीब लोगों को। मुबारक हो ।

फ़रवरी 04, 2011

आखिर कब तक चूड़ी पहनी बैठी रहे जनता …?


मंहगाई की मार ने किसी को भी नहीं छोड़ा है । रोटी , दाल और सब्जी की जद्दोजहद इस दशा में दोहरा सरदर्द बन गया है । हमारे देश में अभी मंहगाई दर 17.7% है । आम आदमी का बजट शक्कर , प्याज , टमाटर और आलू जैसी रोजमर्रा की चीजों ने बिगाड़ रहा है । मंहगाई और मनमोहन सरकार का मानो चोली दामन का साथ हो गया है । दु:खद है  विश्व के एक जानेमाने अर्थ शास्त्री के प्रधान मंत्री रहते हुए अर्थ से जुड़े मुद्दे में उसका अपने ही  देश के सामने असफ़ल सिद्ध होना ।
इससे भी कहीं ज्यादा दु:खद है बेकाबू मंहगाई पर देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बेतुका बयान - यह कहना कि " मंहगाई को कम करने के उनके पास कोई जादू की छड़ी या अलादीन का चिराग नहीं है । " मैं इसे सरकार की नाकामी ही नहीं बल्कि बेशर्मी भरा कथन मानता हूँ । किसने कहा है कि आपके पास जादू की छड़ी है , या आपको जादू की छड़ी हाँथ में ले कर शासन चलाना है  , किसने कहा है या आपसे ऐसा बेतुका सवाल किया है , जो आप समूचे  देश के सामने ऐसा सीना तानकर कह रहे हैं ? आपको सत्ता क्या केवल सुख भोगने और भौंकने के लिए दी गई है क्या ? अरे समूचे देश के सामने बोलने का सहूर तो होना चाहिए । क्यों भूलते हो कि तुम कहीं के राजा या फ़िर तानाशाह नहीं हो , फ़िर ऐसी भाषा कैसे बोलने का साहस कर गुजरते हो ? अच्छे - अच्छे राजा और तानाशाह तो धूल चाट गये और चाट रहें है । मिश्र की राजधानी काहिरा का ही हाल देख लो । तमाम तानाशाहों और उनके अरबी मुल्कों का हाल देख कर भी नहीं सीखना चाहते , प्रजातंत्र के हिमायती बनते हो , शर्म करो - जनता से डरो , अपने देश की माटी से डरो , जमीन में ही रहो और मर्यादित रहो वर्ना यहाँ भी वह दिन दूर नहीं जब घर- दफ़्तर में घुस कर जनमानस तुमको कुर्सी से उठा बाहर फ़ेंक देगा , धरा का धरा रह जाएगा तुम्हारा सारा धन और घमण्ड । बेकारी - बेबसी में वर्षों से जीती आ रही जनता और कितने दिन क्या-क्या सहेगी ? तुम बैठे हो समस्या सुलझाने की जगह पर समस्या सुलझाने की वजाय उलझाने और भड़काने वाली बातें करते हो अपने बयानों में क्या यही है तुम्हारी राजनीतिक दूर दर्शिता- दक्षता ? यही है देश का भविष्य संवारने वाला बयान ? अरे नहीं सम्हलती है कुर्सी तो छोड़ो - हटो । 70-70 वर्ष के हो रहे हो , चलते फ़िरते नहीं बन रहा है , बोलते नहीं बन रहा है , अपने पैरों पर चल नहीं पा रहे हो , व्हील चेयर चाहिए सबको वह भी जनता के पैसों से , कोई मौलिक सोच नहीं है साहस नहीं है फ़िर भ्रष्टाचार करना है करके बने हुए हो पूरी बेशर्मी के साथ , क्या है यह सब  ? है कोई जवाब ?
इतनी ही बेशर्म हैं तमाम राज्य सरकारें मंहगाई की बेकाबू चाल पर ये बेशर्म सरकारें खुश हैं , जनता को बताना चाहती हैं मंहगाई तो केन्द्र सरकार की गलत नीतियों की वजह से बढ़ रही है । ये राज्य सरकारें यदि अपने ही प्रदेश की जनता की हिमायती हैं तो क्यों नहीं ये अपने अपने राज्यों में  मंहगाई पर काबू पाने - अपनी जनता को राहत देने ये मंडी टैक्स , तमाम तरह के अन्य स्थानीय (Local) टैक्स , ऑक्ट्रॉय कम या माफ़ कर देतीं ? ऐसा करने से उन प्रदेशों में तो मंहगाई कम होगी । केन्द्र हो या राज्य की सरकारें सब केवल जनता को ही बेवकूफ़ समझें और उसी से बेतुकी - बदमिजाजी की बातें करती रहें कब तक चलेग यह सब ? अखिर कब तक ??? आखिर कब तक भारत का बेरोजगार - किसान - आम आदमी - बेबस महिलाएं , नेताओं की हवस का शिकार महिलाएं - बच्चियाँ आत्महत्या का , हत्या का शिकार होती रहें ? कब तक आम जनता चूड़ी पहनी बैठी रहे ???

जनवरी 23, 2011

अपनी पवित्र गायों से द्रोह



यह जानकर शायद आपको झटका लगेगा कि हमने अपनी देसी गायों को गली-गली आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया है, क्योंकि वे दूध कम देती हैं और इसलिए उनका आर्थिक मोल कम है, लेकिन आज ब्राजील हमारी इन्हीं गायों की नस्लों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। ब्राजील भारतीय प्रजाति की गायों का निर्यात करता है, जबकि भारत घरेलू दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए अमरीका और यूरोपीय प्रजाति की गायें आयात करता है। वास्तव में, तीन महत्वपूर्ण भारतीय प्रजाति गिर, कंकरेज और ओंगोल की गायें जर्सी गाय से भी ज्यादा दूध देती हैं, यहां तक कि भारतीय प्रजाति की एक गाय तो होलेस्टेन फ्राइजियन जैसी विदेशी प्रजाति की गाय से भी ज्यादा दूध देती है। जबकि भारत अपने यहां दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए होलेस्टेन फ्राइजियन का आयात करता है।

अब जाकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के गर्व - गिर प्रजाति की गाय - को स्वीकार करने का निश्चय किया है। उन्होंने हाल ही में मुझे बताया कि उन्होंने उच्च प्रजाति की शुद्ध गिर नस्ल की गाय को ब्राजील से आयात करने का निश्चय किया है। उन्होंने यह भी कहा कि आयात की गई गिर गाय को भविष्य में "क्रॉस ब्रीडिंग प्रोग्राम" में इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि राज्य में दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा मिल सके। मैंने उन्हें बताया कि हाल ही में ब्राजील में दुग्ध उत्पादन प्रतियोगिता हुई थी, जिसमें भारतीय प्रजाति की गिर गाय ने एक दिन में 48 लीटर दूध दिया। तीन दिन तक चली इस प्रतियोगिता में दूसरा स्थान भी भारतीय नस्ल की गिर गाय को ही प्राप्त हुआ। इस गाय ने 45 लीटर दूध दिया। तीसरा स्थान आंध्र प्रदेश के ओंगोल नस्ल की गाय (जिसे ब्राजील में नेरोल कहा जाता है) को मिला। उसने भी एक दिन में 45 लीटर दूध दिया।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत विकास की गलत नीति अपनाकर चल रहा है। यदि हमें अपने यहां गायों की नस्लों का विकास करना है, तो हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, अपने यहां जो उच्च उत्पादकता वाली गायें हैं, उनसे क्रॉस ब्रिडिंग कराने का बड़ा वैज्ञानिक महत्व है।

आयातित प्रजातियों के प्रति आकर्षण भारतीय डेयरी उद्योग के लिए घातक सिद्ध हुआ है। हमारे योजनाकारों व नीति निर्माताओं ने देसी नस्लों को पूरी तरह आजमाए बिना ही विदेशी नस्लों को आगे बढ़ाया है। भारतीय नस्ल की गायें स्थानीय माहौल में अच्छी तरह ढली हुई हैं, वे भीषण गर्मी झेलने में सक्षम हैं, उन्हें कम पानी चाहिए, वे दूर तक चल सकती हैं, वे स्थानीय घासों के भरोसे रह सकती हैं, वे अनेक संक्रामक रोगों का मुकाबला कर सकती हैं। अगर उन्हें सही खुराक और सही परिवेश मिले, तो वे उच्च दुग्ध उत्पादक भी बन सकती हैं।

केवल ज्यादा दुग्ध उत्पादन की बात हम क्यों करें, हमारी गायों के दूध में ओमेगा-6 फैटी एसिड्स होता है, जिसकी कैंसर नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विडंबना देखिए, ओमेगा-6 के लिए एक बड़ा उद्योग विकसित हो गया है, जो इसे कैप्सूल की शक्ल में बेच रहा है, जबकि यह तत्व हमारी गायों के दूध में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। गौर कीजिएगा, आयातित नस्ल की गायों के दूध में ओमेगा-6 का नामोनिशान नहीं है। न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने पाया है कि पश्चिमी नस्ल की गायों के दूध में "बेटा केसो मॉर्फिन" नामक मिश्रण होता है, जिसकी वजह से अल्जाइमर (स्मृतिलोप) और पार्किसन जैसे रोग होते हैं।

इतना ही नहीं, भारतीय नस्ल की गायों का गोबर भी आयातित गायों के गोबर की तुलना में श्रेष्ठ है। भारतीय गायों का गोबर अर्घ-कठोर होता है, जबकि आयातित गायों का गोबर अर्घ-तरल। इसके अलावा देसी गायों का गोबर ऎसा पंचागभ्य तैयार करने के अनुकूल है, जो रासायनिक खादों का बेहतर विकल्प है। कई शोध बताते हैं कि गो मूत्र भी औषधीय प्रयोग में आता है। गो-मूत्र और एंटीबायोटिक के एक औषधीय मिश्रण का अमरीका में पेटेंट कराया गया है। गो-मूत्र में मौजूद कारगर तत्वों के लिए और कैंसर रोधी कारक के रूप में भी गो-मूत्र का पेटेंट हुआ है।

एक ऎसा देश, जो अपने प्राकृतिक संसाधनों पर भी शायद ही गर्व करता है, वहां यह उम्मीद करने का सवाल ही नहीं उठता कि पवित्र गायों का वैज्ञानिक व तकनीकी रूप से विकास किया जाता। जब हमने अपने पशुधन के मोल को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जब हमने अपने पशुधन की क्षमता बढ़ाने के तमाम प्रयासों को धता बता दिया, तब हमारे देसी पशुधन को विदेशी धरती पर शानदार पहचान मिल रही है!

पिछली सदी के मध्य में ब्राजील ने भारतीय पशुधन का आयात किया था। ब्राजील गई भारतीय गायों में गुजरात की गिर और कंकरेज नस्ल और आंध्र प्रदेश की ओंगोल नस्ल की गाय शामिल थी। इन गायों को मांस के लिए ब्राजील ले जाया गया था, लेकिन जब ये गायें ब्राजील पहंुचीं, तो वहां लोगों को अहसास हुआ कि इन गायों मे कुछ खास बात है और वे दुग्ध उत्पादन का बेहतर स्रोत हो सकती हैं। भारतीय गायों को अपने यहां के मौसम के अनुरूप पाकर ब्राजील जैसे देशों ने उनकी नस्लों का विकास किया और भारतीय गायों को अपने यहां प्रजनन परियोजनाओं में आदर्श माना। भारतीय पशुपालकों और भारतीय पशु वैज्ञानिकों ने अगर देसी गायों की उपेक्षा नहीं की होती, तो हमारी गायों का इतिहास कुछ और होता। तब हमारी पवित्र गायों की सचमुच पूजा हो रही होती। हमारी गायें सड़कों पर लाचार खुले में घूमती न दिखतीं।

अगर भारत ने विदेशी जहरीली नस्लों के साथ क्रॉस ब्रिडिंग की बजाय अपनी ही गायों के विकास पर ध्यान दिया होता, तो हमारी गायें न केवल आर्थिक रूप से व्यावहारिक साबित होतीं, बल्कि हमारे यहां खेती और फसलों की स्थिति भी व्यावहारिक और लाभदायक होती। मरूभूमि के अत्यंत कठिन माहौल में रहने मे सक्षम राजस्थान में पाई जाने वाली थारपारकर जैसी नस्ल की शक्तिशाली गायें उपेक्षित न होतीं। आज दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए आयातित नस्लों पर विश्वास करने से ज्यादा विनाशकारी और कुछ नहीं हो सकता।

देविन्दर शर्मा
कृषि व खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ
राजस्थान पत्रिका से साभार

जनवरी 16, 2011

आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की 31 मंज़िला ईमारत का निर्माण अवैध , ईमारत तोड़ने की बात : गर हम डूबे तो तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम


मुंबई स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी में करगिल युद्ध लड़ने वाले वीर जवानों उनके परिजनों को फ़्लैट मिले , यह योजना थी , जिस पर इस देश के कर्णधार नौकरशाहों और नेताओं के रिश्तेदारों की बुरी नजर पड़ गई , फ़िर क्या था जो ग्रहण लगा कि आज यह ईमारत तोड़ने की बात कर रहे हैं बेशर्म नेता , वे अब इसे भ्रष्टाचार की ईमारत कह रहे हैं क्योंकि अब इसमें उन्हें- उनके रिश्तेदारों को फ़्लैट जो नहीं मिल पा रहा है । हुई न वही बात कि गर हम नहीं खा पायेंगे तो  खाने की सजी सजाई थाली में पानी डाल देंगे । किसी को भी नहीं खाने देंगे ।   गर हम डूबे तो तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम ।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार (16 जनवरी 2011) को अपने बयान में कहा, "यदि दूसरा विकल्प चुना जाता तो ईमारत के अवैध निर्माण को जायज़ ठहराए जाने के बराबर होता. तीसरे विकल्प पर चर्चा हुई पर उसका मतलब भी यही होता । इसलिए तथ्यों और परिस्थितियों पर चर्चा के साथ-साथ विश्लेषण करने के बाद मेरा निर्णय है कि पहले विकल्प (यानी पूरी इमारत को गिराने) का फ़ैसला किया जाए ।"

भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने पाया है कि विवादों में घिरी मुंबई स्थित आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की 31 मंज़िला इमारत का निर्माण अवैध तरीके से, अनिवार्य इजाज़त लिए बिना किया गया और पूरी ईमारत को गिरा दिया जाना चाहिए ।
मुंबई स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी तब विवादों में घिर गई जब पाया गया कि इसकी इमारत के निर्माण में अनेक स्थानीय नियमों और क़ानूनों का उल्लंघन हुआ था । यही नहीं, कई प्रभावशाली अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं के रिश्तेदारों को इस ईमारत में फ़्लैट दिए गए । पूरे मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ा और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की सरकार के उस समय मुख्यमंत्री रहे आशोक चव्हान को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा । अब मंत्रालय का कहना है कि उसके पास तीन विकल्प थे. पहला विकल्प ये था कि कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (तटीय नियमन क्षेत्र - 1991) की इजाज़त के बिना अवैध तौर पर बनाई गई पूरी ईमारत को गिरा दिया जाए । सवाल उठता है खर्च किये गये रुपयों के लिए जिम्मेदार कौन होगा ? एक दिन में तो यह इमारत बनी नहीं होगी , क्या कर रहे थे जिम्मेदार अधिकारी तब, जब यह ईमारत बन रही थी । क्यों न उन अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही की जाए जिनके जिम्मे यह दायित्व होता है कि ऐसे निर्माण न हों । सबसे बड़ी बात यदि सब कुछ  नौकरशाहों और नेताओं के हिसाब से  सब कुछ चल रहा होता , उनके रिश्तेदारों को फ़्लैट मिला हुआ होता तो क्या ये नेता ऐसा निर्णय लेते ? आज हर बड़े शहर में सैकड़ों अवैध बहुमंजिला ईमारतें सीना ताने खड़ी हैं ,क्या उन्हें गिराने कोई मंत्री - नेता सामने आयेगा ।  पर्यावरण के नियमों का खुल्ला उल्लंघन देश में हजारों-लाखों उद्योग कर रहे हैं , क्या कर रहा है जय राम रमेश का पर्यावरण विभाग उनके खिलाफ़ ? रायपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हो सकता है , जहाँ समूची सत्ता इसी काम में जुटी देखी जा सकती है , आम आदमी सरकार के ऐसे कार्यों के विरुद्ध अदालत की शरण ले रहे हैं ।
मेरा मानना है पर्यावरण मंत्रालय का ऐसा सुझाव करगिल के शहीदों का अपमान है । देश का अपमान है । इसके विरूद्ध जनता की आवाज बुलंद होनी ही चाहिए । यह पूरी ईमारत वीर सपूतों के परिजनों को जो जरूरतमंद हों उन्हें दिया जाना चाहिए , पर्यावरण ही नहीं अन्य सभी संबंधित मंत्रालयों को जिनका इससे संबंध है आगे आकर स्वीकृति प्रपत्र ईमारत को बचाने के लिए देना चाहिए । साथ ही जो लोग इस काण्ड से जुडे हैं उन्हें ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिससे दूसरे सबक लें ।  

जनवरी 11, 2011


जनवरी 07, 2011

देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान…


मृत विधायक राजकिशोर और आरोपी महिला रूपम पाठक
वो मेरी बेटी का इज्जत लूटना चाहते थे। उसका पीए फोन पर लगातार धमकियां देता था। विधायक हत्याकांड में दोषी रूपम पाठक ने यह सनसनीखेज खुलासा किया है। रूपम का कहना है कि, राजकिशोर केसरी का पीए विपिन उसको फोन पर बेटी के साथ शारीरिक संबंध बनाने की बात कहता था। उसने मेरी इज्जत तो बर्बाद कर ही दी, अब बेटी की इज्जत बर्बाद करना चाहते थे। इसलिए मैंने उसे मार दिया।
दैहिक शोषण के खिलाफ़ आवाज उठी , पुलिस में रिपोर्ट हुई , रिपोर्ट वापस लेने दबाव बना , रिपोर्ट वापस भी हो गई , पीड़ित-आक्रोशित महिला ने चाकू से दोषी को मारा , दोषी की मौत हो गई । राज्य के मुख्यमंत्री ने तुरंत ही यह घोषणा कर दी की पूरे राजकीय सम्मान के साथ मृत विधायक का अंतिम संस्कार किया जायेगा । इस पूरी घटना से लगा कि दो ही वर्ग है । एक राजनेताओं का , राजनीतिज्ञों का दूसरा आमजनता का । हर हाल में सम्मान के हकदार ये नेता ही हैं चाहे वे कूछ भी कर लें । सम्मान जनता का तो है ही नहीं । एक महिला ने इतना बड़ा कदम किन हालातों में , क्यों और कैसे उठाया , यह सोचने - समझने की जरूरत ही नहीं , सारी हमदर्दी राजनीति के साथ  है तभी तो बिना देर किये मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी कि मृत विधायक का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जायेगा । मर गई संवेदना , कि भरी भीड़ में उस महिला ने आखिर ऐसा किया क्यों ? उसकी आवाज क्यों और कैसे दबा दी गई ? राजनीति कहाँ आकर खड़ी है ? तमाम सवाल हैं जिसकी मानो किसी को परवाह ही नहीं है। उल्टा समाज के ठेकेदारों - मर्दों ने उस अकेली महिला को सरे आम पीट कर मानो कानून की रक्षा की । चापलूसी का उत्कृष्ट नमूना पेश किया । राज्य शासन को शायद इन्हें भी पुरस्कृत करना चाहिए । भूल गये मुख्यमंत्री जी इस आशय की घोषणाकरना शायद ।
 बिहार में सत्ताधारी भाजपा के स्थानीय विधायक राजकिशोर केसरी की एक महिला ने कथित तौर पर चाकू मारकर हत्या कर दी।
बिहार के पुलिस महानिदेशक नीलमणि ने बताया कि मंगलवार सुबह पूर्णिया के विधायक केसरी अपने घर पर आम लोगों से मिल रहे थे। उसी दौरान रूपम पाठक नामक एक महिला ने अचानक उन पर चाकू से हमला कर दिया। नीलमणि ने बताया कि हमले के बाद खून से लथपथ केसरी को पास के अस्पताल में भर्ती कराया, जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।घटना के बाद विधायक के घर पर मौजूद लोगों ने आरोपी महिला को बुरी तरह पीटा और बाद में उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
आरोपी महिला ने छह महीने पहले विधायक केसरी के खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाया था।भाजपा विधायक की मौत से स्तब्ध मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने मामले की उच्चस्तरीय जाँच कराने के निर्देश पुलिस महानिदेशक को दिए और विधायकों से मिलने से पहले लोगों की समुचित तलाशी सुनिश्चित करने को कहा।
नीतीश ने उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को तुरंत घटनास्थल पर रवाना होने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि केसरी की अंत्येष्टि राजकीय सम्मान के साथ की जाएगी। उन्होंने पूर्णिया में विधायक समर्थकों और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की और भरोसा दिलाया कि दोषी को समुचित सजा दिलाई जाएगी।
मुझे फाँसी दे दीजिए -
विधायक राजकिशोर केसरी की हत्या की आरोपी 40 वर्षीय महिला रूपम पाठक ने कहा है कि उसे फाँसी दे दी जाए। रूपम का इलाज कटिहार के एक अस्पताल में चल रहा है। अस्पताल में रूपम ने पत्रकारों से कहा कि वह दुष्ट है, शैतान है, पापी है, अन्यायी है। वह नहीं मर सकता। पूर्णिया के राजहंस पब्लिक स्कूल में शिक्षिका रूपम ने कहा कि उसे फाँसी दे दी जाती तो अच्छा होता।
सारे देश के लिये यह खबर एक नया सन्देश लेकर आयी है।  मौके पर तैनात पुलिस वालों ने रूपम को घटनास्थल पर पकड लिया और पीट-पीट कर अधमरा कर दिया।
घटनास्थल पर उपस्थित अधिकांश लोगों को और विशेषकर पुलिसवालों को इस बात की पूरी जानकारी थी कि विधायक पर क्यों हमला किया गया है एवं हमला करने वाली महिला कितनी मजबूर थी। बावजूद इसके पुलिस वालों ने आक्रमण करने वाली  आरोपी महिला रूपम पाठक द्वारा किये गए आक्रमण के समय सुरक्षा गार्ड उसको नियन्त्रित नहीं कर सके और उसकी बेरहमी से पिटाई की, जिसका पुलिस को कोई अधिकार नहीं था। रूपम की पिटाई करने वाले पुलिस वालों के विरुद्ध किसी प्रकार का प्रकरण तक दर्ज नहीं किया गया है। जबकि रूपम के विरुद्ध हत्या का अभियोग दर्ज करने के साथ-साथ, रूपम पर आक्रमण करने वालों के विरुद्ध भी मामला दर्ज होना चाहिये था।
राजकिशोर केसरी की हत्या के बाद यह बात सभी के सामने आ चुकी है कि इस घटना से पहले रूपम पाठक ने बाकायदा लिखित में फरियाद की थी कि राज किशोर केसरी, विधायक चुने जाने से पूर्व से ही गत तीन वर्षों से उसका यौन-शोषण करते रहे थे और उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित भी कर रहे थे। जिसके विरुद्ध नीतिश कुमार प्रशासन से कानूनी संरक्षण प्रदान करने और दोषी विधायक के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करने की मांग भी की गयी थी, लेकिन पुलिस प्रशासन एवं नीतिश सरकार कुमार ने रूपम पाठक को न्याय दिलाना तो दूर, किसी भी प्रकार की प्राथमिक कानूनी कार्यवाही करना तक जरूरी नहीं समझा। आखिर सत्ताधारी गठबन्धन के विधायक के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कैसे की जा सकती थी?
स्वाभाविक रूप से रूपम पाठक द्वारा पुलिस को फरियाद करने के बाद; विधायक राज किशोर केसरी एवं उनकी चौकडी ने रूपम पाठक एवं उसके परिवार को तरह-तरह से प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। सूत्र यह भी बतलाते हैं कि रूपम पाठक से राज किशोर केसरी के लम्बे समय से सम्बन्ध थे। जिन्हें बाद में रूपम ने यौन शोषण का नाम दिया है। हालांकि इन्हें रूपम ने अपनी नीयति मानकर स्वीकार करना माना है, लेकिन पिछले कुछ समय से राज किशोर केसरी ने रूपम की 17-18 वर्षीय बेटी पर कुदृष्टि डालना शुरू कर दिया था, जो रूपम पाठक को मंजूर नहीं था। इसी कारण से रूपम पाठक ने पहले पुलिस में गुहार की और जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो खुद ने ही विधायक एवं विधायक के आतंक का खेल खतम कर दिया!
रूपम पाठक ने जिस विधायक का खेल खत्म किया है, उस विधायक के विरुद्ध दाण्डिक कार्यवाही नहीं करने के लिये बिहार की पुलिस के साथ-साथ नीतिश कुमार के नेतृत्व वाली संयुक्त सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती है। विशेषकर भाजपा इस कलंक को धो नहीं सकती, क्योंकि राजकिशोर केसरी को भाजपा ने यह जानते हुए भी टिकिट दिया कि राज किशोर केसरी पूर्णिया जिले में आपराधिक छवि के व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। जिसकी पुष्टि चुनाव लडने के लिये पेश किये गये स्वयं राज किशोर केसरी के शपथ-पत्र से ही होती है।
पवित्र चाल, चरित्र एवं चेहरे तथा भय, भूख एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलाने का नारा देने वाली बिहार सरकार का यह भी एक चेहरा है, जिसे बिहार के साथ-साथ पूरे देश को ठीक से पहचान लेना चाहिये और नीतिश कुमार को देश में सुशासन के शुरूआत करने वाला जननायक सिद्ध करने वालों को भी अपने गिरेबान में झांकना होगा। इससे उन्हें ज्ञात होना चाहिये कि बिहार के जमीनी हालात कितने पाक-साफ हैं। जो सरकार एक महिला द्वारा दायर मामले में संज्ञान नहीं ले सकती, उससे किसी भी नयी शुरूआत की उम्मीद करना दिन में सपने देखने के सिवा कुछ भी नहीं है!
रूपम पाठक का मामला केवल बिहार, भाजपा, नीतिश कुमार या राजनैतिक ताकतों के मनमानेपन का ही प्रमाण नहीं है, बल्कि यह प्रकरण एक ऐसा उदाहरण है जो हर छोटे-बडे व्यक्ति को यह सोचने का विवश करता है कि नाइंसाफी से परेशान इंसान किसी भी सीमा तक जा सकता है। पुलिस, प्रशासन एवं लोकतान्त्रिक ताकतें आम व्यक्ति के प्रति असंवेदनशील होकर अपनी पदस्थिति का दुरूपयोग कर रही हैं और देश के संसाधनों का मनमाना उपयोग तथा दुरूपयोग कर रही हैं। सत्ता एवं ताकत के मद में आम व्यक्ति के अस्तित्व को ही नकार रही हैं।
ऐसे मदहोश लोगों को जगाने के लिये रूपम ने फांसी के फन्दे की परवाह नहीं करते हुए, अन्याय एवं मनमानी के विरुद्ध एक आत्मघाती कदम उठाया है। जिसे यद्यपि न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन रूपम का यह कदम न्याय एवं कानून-व्यवस्था की विफलता का ही प्रमाण एवं परिणाम है। जब कानून और न्याय व्यवस्था निरीह, शोषित एवं दमित लोगों के प्रति असंवेदनशील हो जाते हैं तो रूपम पाठक तथा फूलन देवियों को अपने हाथों में हथियार उठाने पडते हैं। जब आम इंसान को हथियार उठाना पडता है तो उसे कानून अपराधी मानता है और सजा भी सुनाता है, लेकिन देश के कर्णधारों के लिये और विशेषकर जन प्रतिनिधियों तथा अफसरशाही के लिये यह मनमानी के विरुद्ध एक ऐसी शुरूआत है, जिससे सर्दी के कडकडाते मौसम में अनेकों का पसीना छूट रहा है।
अत: बेहतर होगा कि राजनेता, पुलिस एवं उच्च प्रशासनिक अधिकारी रूपम के मामले से सबक लें और लोगों को कानून के अनुसार तत्काल न्याय देने या दिलाने के लिये अपने संवैधानिक और कानूनी फर्ज का निर्वाह करें, अन्यथा हर गली मोहल्लें में आगे भी अनेक रूपम पैदा होने से रोकी नहीं जा सकेंगी। समझने वालों के लिये रूपम एक चेतावनी है ।

जनवरी 06, 2011

लगी खेलने लेखनी सुख-सुविधा के खेल , फ़िर सत्ता की नाक में डाले कौन नकेल…?


"आजाद भारत में गुलाम पत्रकार" शीर्षक से लिखी गई  गंगा सहाय मीणा की रिपोर्ट यहाँ प्रकाशित है । देश की तमाम जनता प्रजातंत्र के चौथे खम्बे से क्या अपेक्षा रखती आई है और कब-कब वह कहाँ-कहाँ  उसे कितना खरा पाई है । पढ़िए यह रिपोर्ट जिसे हमने शीर्षक दिया है - "लगी खेलने लेखनी सुख-सुविधा के खेल , फ़िर सत्ता की नाक में डाले कौन नकेल…?"
आज के पत्रकार लिख रहे हैं कि 'ठण्‍ड से इतने मरे', मानो इस साल पहली बार अचानक से ठण्‍ड पडी हो और प्राकृतिक आपदा में लोग मर गए हों. आज के पत्रकारों से 100 साल पुराने पत्रकार ज्‍यादा अच्‍छे थे. वे ब्रिटिश शासन के दमन और पाबंदियों के बावजूद अपने अखबारों में स्पष्‍ट उल्‍लेख करते थे कि लोग किन स्थितियों में रह रहे हैं और उनकी मौत के लिए कौन जिम्‍मेदार है. 1905 के 'भारत मित्र' में 'एक दुराशा' शीर्षक से बालमुकुन्‍द गुप्‍त लिखते हैं (एक बार पूरे उद्धरण को तब के साथ आज के संदर्भ में भी पढें)-
''नगर जैसा अंधेरे में था, वैसा ही रहा, क्‍योंकि उसकी असली दशा देखने के लिए और ही प्रकार की आंखों की जरूरत है. जब तक यह आंखें न होंगी, यह अंधेर यों ही चलता जावेगा... इस नगर में लाखों प्रजा भेडों, सुअरों की भांति सडे-गंदे झोंपडों में पडी लोटती है. उनके आसपास सडी बदबू और मैले सडे पानी के नाले बहते हैं, कीचड और कूडे के ढेर चारों ओर लगे हुए हैं. उनके शरीर पर मैले-कुचैले फटे चिथडे लिपटे हुए हैं. उनमें से बहुतों को आजीवन पेट भर अन्‍न और शरीर ढांकने को कपडा नहीं मिलता. जाडों में सर्दी से अकड कर रह जाते हैं और गर्मी में सडकों पर घूमते तथा जहां-तहां पडते फिरते हैं. बरसात में सडे सीले घरों में भींगे पडे रहते हैं. सारांश यह है कि हरेक ऋतु की तीव्रता में सबसे आगे मृत्‍यु का पथ वही अनुगमन करते हैं. मौत ही एक है जो उनकी दशा पर दया करके जल्‍द-जल्‍द उन्‍हें जीवन रूपी रोग के कष्‍ट से छुडाती है.
... इसी कलकत्‍ते में इसी इमारतों के नगर में माई लार्ड प्रजा में हजारों आदमी ऐसे हैं, जिनको रहने के लिए सडा झोंपडा भी नहीं है. गलियों और सडकों पर घूमते-घूमते जहां जगह देखते हैं, वहीं पड रहते हैं. पहरे वाला आकर डण्‍डा लगाता है तो सरक कर दूसरी जगह जा पडते हैं. बीमार होते हैं तो सडकों पर ही पडे पांव पीट-पीटकर मर जाते हैं. कभी आग जलाकर खुले मैदान में पडे रहते हैं. कभी-कभी हलवाइयों की भट्टी से चिमटकर रात काट देते हैं. नित्‍य इतनी दो चार लाशें जहां-तहां से पडी हुई पुलिस उठाती है. भला माई लार्ड तक उनकी बात कौन पहुंचावे? दिल्‍ली दरबार में भी, जहां सारे भारत का वैभव एकत्र था, सैंकडों ऐसे लोग दिल्‍ली की सडकों पर पडे दिखाई देते थे, परन्‍तु उनकी ओर देखने वाला कोई न था. यदि माई लार्ड एक बार इन लोगों को देख पाते तो पूछने को जगह हो जाती कि वह लोग भी ब्रिटिश राज के सिटीजन हैं या नहीं? यदि हैं तो कृपापूर्वक पता लगाइए कि उनके रहने के स्‍थान कहां हैं और ब्रिटिश राज्‍य से उनका क्‍या नाता है? क्‍या कहकर वे अपने राजा और उसके प्रतिनिधि को संबोधित करें? किन शब्‍दों में ब्रिटिश राज को असीस दें, क्‍या यों कहें कि जिस ब्रिटिश राज्‍य में हम अपनी जन्‍मभूमि में एक उंगल भूमि के अधिकारी नहीं, जिसमें हमारे शरीर को फटे चिथडे भी नहीं जुडे और न कभी पापी पेट को पूरा अन्‍न मिला, उस राज्‍य की जय हो ! उसका राजप्रतिनिधि हाथियों का जुलूस निकालकर सबसे बडे हाथी पर चंवर छत्र लगाकर निकले और स्‍वदेश में जाकर प्रजा के सुखी होने का डंका बजावे?''
(बालमुकुन्‍द गुप्‍त के श्रेष्‍ठ निबंध, संपादक- सत्‍यप्रकाश मिश्र, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2005, पृष्‍ठ-182-83)

(यह नोट लिखते वक्‍त यह बात दिमाग में है कि हमारे अधिकांश पत्रकार मित्रों को अपनी नौकरी बचाने के लिए खबरों को एक खास ढंग से पेश करना पड़ता है। हम सभी जानते हैं कि गरीबी और शोषण की बात करने वाले पत्रकार किसी अखबार या चैनल में बहुत दिन टिक नहीं सकते हैं। 100 साल पहले भी लगभग यही स्थिति थी. सच के पक्ष में खडे होन वाले पत्रकारों के अपने पत्र हुआ करते थे और उन पर भी अंग्रेज सरकार पाबंदी लगा देती थी. इसके बावजूद गुलाम भारत में इतना जोखिम उठाने वाले पत्रकारों की परंपरा हमारे सामने है, इससे आज के पत्रकारों को प्रेरणा लेनी चाहिए.
गंगा सहाय मीणा
इस नोट की प्रेरणा दिलीप मंडल जी की इस टिप्‍पणी से मिली- ''जो पत्रकार लिख रहे हैं कि ठंड से इतने लोग मरे...उतने लोग मरे, वे या तो बेवकूफ हैं या फिर शब्दों का अर्थ बदलने की सत्ता की साजिश में हिस्सेदार। कोई भी आदमी ठंड से नहीं मरता, गरीबी से मरता है। अगर ठंड से लोग मरते तो अलास्का, आइसलैंड और स्कैंडेनेवियाई देशों में कोई जीवित नहीं बचता, जहां साल में कई महीने तक तापमान शून्य से काफी नीचे रहता है।'')
( हम आभारी है भाई गंगा सहाय मीणा के )

जनवरी 02, 2011

मीठी शक्कर का कड़वा होता बाजार


मीठी शक्कर का बाजार कड़वा होता जा रहा है। दीपावली के बाद से शक्कर में लगभग 200 रूपए प्रति क्विंटल का उछाल स्थानीय कारोबार में आ गया है। सस्ती विदेशी शक्कर को देश में आने से रोकने के लिए सरकार में शामिल षड़यंत्रकारियों ने शक्कर आयात नीति पर कर की दर में 60 % की बढ़ोतरी कर दी है । ऐसा करने से विदेशी यहाँ शक्कर मंहगी होगी और कारोबारी देशी शक्कर लॉबी के चक्कर से बाहर नहीं जा पायेंगे , शक्कर लॉबी मनमाने दाम वसूलने में फ़िर एक बार सफ़ल होगी । बीते वर्ष का अनुभव काम आयेगा ।
बाजार में माल की आवक हो रही है और डिमांड धीरे-धीरे बढ़ रही है। माह के शुरू में भाव 2900 से 2940 रूपए प्रति क्विंटल चल रहे थे, जो बढ़कर 3110 रूपए स्थानीय कारोबार में हो गए। शनिवार को बाजार कुछ नीचे उतरकर 3000-3050 पर आ गए। आगे सरकार की पॉलिसी पर बाजार निर्भर रहेगा। कारोबारी जानकारों का कहना है कि विश्व स्तर पर शक्कर के दाम चढ़ने की खबरें हैं। दूसरा कारोबारियों को शक्कर का निर्यात खुलने की भी उम्मीद है। इससे कीमतों में तेजी दर्ज की जा रही है और हमारे यहाँ इस कारोबार से जुड़े कुछ बड़े लोग जो राजनीति और सरकार से सीधे जुड़े हैं इस अवसर का फ़ायदा उठाने की फ़िराख में हैं। शक्कर के भाव ऊपर-नीचे होने में सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जानकारों का कहना है कि सरकार की इच्छा है कि शक्कर मिलें समय से चालू हो और गन्ना किसानों को ऊंचे भाव पर गन्ने का रेट मिले। लेकिन मिले किसानों को 230 रूपए के आसपास भाव देना चाहती है । यह भी सरकार की एक बड़ी चाल है । 45 रुपये किलो की शक्कर बेच चुके लोगों को मानो खून लग चुका है ऊचें दाम का मुनाफ़ा खाने-कमाने  का सो  शादी-ब्याह के सीजन के बहाने फ़िर एक बार कोशिश करेंगे तगड़ा मुनाफ़ा कमाने की । सच  पूछो तो शक्कर के दाम से ज्यादा खतरनाक हैं हमारे नेताओं के इरादे । इनके बेईमान इरादों से कैसे बचेंगे हम !

दिसंबर 30, 2010

धन्य हो गया छत्तीसगढ़ अपने इन नेताओं से…



अब तक आपने सुना होगा बैंक के रिकवरी एजेंट क्लाइंट से जबरिया पैसा वसूल करते हैं । इस मामले को लोगों ने सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया और सुप्रीम कोर्ट ने सभी बैंकों को इस आशय के निर्देष दिये कि जबरिया या दादागिरी के तौर तरीके गलत ही नहीं गैर कानूनी भी हैं ऐसा करने वालों के विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए । किसी भी ॠण की वसूली कानूनी प्रावधान के अन्तर्गत ही की जानी चाहिए , इसके बाद से बैंकों ने थोड़ी नरमी के साथ काम करना शुरु किया । लेकिन यहाँ छत्तीसगढ़ में अभी भी हालात बदतर ही हैं बैंक तो बैंक यहाँ तो सरकारी महकमा भी प्रायवेट गुण्डो का सहारा नियम बना कर ले रहा है । यह अफ़सोस जनक हाल किसी और का नहीं बल्कि प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह का विभाग (बिजली/सी एस ई बी) कर रहा है , वह भी केवल आम नागरिकों के साथ ,जिनका बिजली बिल कुछ दो-चार सौ रुपये का बकाया रह जाता है , उनके साथ , आम लोगों के साथ हो रही इस सरकारी गुण्डागर्दी की खबरें अब बकायदा शहर के अखबार छापने लगे हैं । लेकिन सरकारी महकमें को ऐसी खबरों से कोई फ़र्क नहीं पड रहा है । जिन लोगों ने भी किसी भी कारण से दो -तीन माह से अपना बिजली बिल नहीं जमा कराया ऐसे लोगों के घर दादागिरी करने वालों की , बिजली काटने वालों की एक टीम आ धमकती है , वसूली के लिए बकायदा चमकाती- धमकाती है और बिजली के सर्विस वायर को कहीं से भी काट कर चलते बनती है , मतलब जो कर सकते हो कर लो , जितना बिल दिया है पटाना ही होगा ,भले ही वह एक काम वाली बाई के दो कमरों के घर का बिल ग्यारह हजार रुपया हो , या फ़िर किसी पान की दुकान वाले का एक माह का बिल सोलह हजार रुपया आया हो , नहीं पटाया तो लाईन काटी जायेगी , वह भी दादागिरी से । गलत बिलिंग क्यों होती है ? इसके लिए दोषी कौन हैं ? दोषियों के लिए कोई सजा का प्रावधान भी है क्या ? इसका कोई जवाब नहीं है सरकार के पास । सच पुछें तो तानाशाही जैसा माहौल है यहाँ सरकारी महकमों में , और विभाग यदि माननीय मुख्यमंत्री जी का है तो फ़िर क्या कहनें । कोई कुछ नहीं कह सकता । आम जनता का बुरा हाल है । वहीं दूसरी ओर बड़े कारखानों या उन बड़े लोगों का जिनका बिजली बिल लाखों-करोड़ो रूपयों में बकाया है , उनकी लाईनें काट्ना तो दूर उनकी ओर कोई नजर उठा कर भी नहीं देखेगा । अकेले राजधानी रायपुर में लगे उद्योगों -अन्य कारोबारियों का हजारों करोड़ रुपयों का बिजली बिल बाकी है , मंत्रियों बड़े अधिकारियों के बंगलों इनके निजी आवासों का करोड़ों रूपयों का बिजली बिल बाकी है , किसी की हिम्मत नहीं है बकाया का कागज भी देने की , दादागिरी सिर्फ़ औए सिर्फ़ आम आदमी के साथ , गरीब और निरीह लोगों के साथ होती देखी जा सकती है । समूचे प्रदेश का यह हाल है कि जिन लोगों के यहाँ  ए सी चलते हैं उनके यहाँ उनकी इच्छानुसार - सुविधानुसार बिजली का बिल आता है , सारी सेटिंग घर बैठे हो रही है और जिनके घरों एक पंखा या कूलर है वह मजबूर है हजारों में बिल पटाने को ।
इससे भी बड़ी विड़म्बना यहाँ यह है कि जनता के बीच से निकल कर नेता और मंत्री बने स्वनामधन्य लोग यह भूल जाते हैं वो क्या हैं ? क्यों हैं ? और कितने दिनों के लिए हैं ? कुर्सी पाते ही ऐसे लोग अधिकारियों के हाँथों खेलना शुरु हो जाते हैं । अधिकारी इनकी जी हुजूरी नहीं बल्कि ये अधिकारियों की जी हुजूरी करते नजर आते हैं । कहने में खराब जरूर लगता है पर यहाँ सच्चाई यही है । सभी विभागों का मानो यही हाल है  - "अंधा बांटे रेवड़ी - चीन्ह चीन्ह के दे ।" क्या होगा छत्तीसगढ़ का ?

दिसंबर 26, 2010

कर्ज में डूबे पिता ने तीन बच्चों सहित खुद को लगाई आग

 यह घटना घटी , अखबारों में छपी , लोगों ने पढ़ा और भूल गए । शासन - प्रशासन मौन ! क्योंकि उसकी नजर में यह सामान्य या फ़िर रोज घटने वाली घटना है और शायद शासन - प्रशासन की प्राथमिकता सूची में यह विषय नहीं है । सच ही है 'मर्म' से नहीं 'माल' से चल रहा है छत्तीसगढ़ का शासन ।
कोई माने ना माने पर हकीकत यही है कि प्रदेश में अमीर और गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है , गरीबों की जमीनें जबरिया खरीदी जा रही है ,कर्ज देने वालों का जंजाल बुरी कदर फ़ैला हुआ है , इस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है ,रोज मरते हैं कर्ज में लोग लेकिन शासन की बला से । क्योंकि कर्जदाताओं के लम्बें हाँथ नेताओं के गिरेबाँ तक जो हैं ।
पढ़िए हाल की ही एक घटना ---
रायपुर । कर्ज में डूबे राजधानी रायपुर के एक राजमिस्त्री ने शुक्रवार 24दिसम्बर की रात को अपने तीन बच्चों सहित खुद भी आग लगा ली। चारों को अम्बेडकर अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ दो बच्चों ने दम तोड़ दिया , एक बच्ची सहित बाप  जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। जिनकी हालत बेहद चिंता जनक बताई जाती है ।
बजरंग चौक आजादनगर रावांभाठा निवासी गब्बर (37) राजमिस्त्री है। रात करीब साढ़े आठ बजे उसने मिट्टी तेल डालकर दस वर्षीय बेटी श्वेता, आठ वर्षीय प्रिया और दो वर्षीय मयंक को आग लगा दी। इसके बाद खुद भी मिट्टी तेल डालकर आग लगा ली। चीखें सुनकर पत्नी सुनीता पड़ोसियों के साथ घर पहुंची। पड़ोसियों ने आग बुझाई और उन्हें अस्पताल पहुंचाया। 
सुनीता का कहना है कि 11 दिन पहले उसकी डिलीवरी के लिए गजानन ने कर्ज लिया था। अभी वह 15 हजार रूपए के कर्ज में डूबा हुआ था। इससे वह चिड़चिड़ा हो गया। शुक्रवार रात को काम से लौटा तो सुनीता से उसका विवाद हो गया। उसने सुनीता को बच्चों को लेकर मायके जाने के लिए कहा। सुनीता 11 दिन के बच्चे को लेकर घर से चली गई। इसके बाद गजानन ने तीन बच्चों और खुद को आग लगा ली। 
गुस्से में उठाया कदम
टीआई खमतराई विरेंद्र चतुर्वेदी ने बताया कि गजानन शराब का आदी था। शुक्रवार रात भी वह नशे में धुत घर पहुंचा। उसका पत्नी के साथ विवाद हुआ। वह सबसे छोटे बच्चे को साथ लेकर घर से निकल गई। इसके बाद गुस्से में गजानन ने तीन बच्चों को जलाया और खुद को भी आग लगा ली। 
(_कुल मिला कर बात यहाँ खत्म करने की चीर परिचित शैली की शराबी ने नशे में ऐसा किया , सारा दोष शराब और शराबी होने का , हालात को मारो गोली और बंद करो फ़ाईल , पता करो किससे कर्ज लिया था , बुलाओ उसे थाने , कुछ भेंट-पूजा ले लो और छोड़ दो उसे ,उसका भी धंधा है -अपना भी  । शासन को विधानसभा में जवाब देते बने ऐसी एक शानदार रिपोर्ट तैयार करवा कर रखो । बस हो गया काम । यही तो है शायद संवेदनशील प्रशासन  !!! )

फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

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