मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने नक्सल हिंसा में शहीद छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक व्ही.के. चौबे की प्रथम पुण्य तिथि के दिन उनके सुपुत्र सौमिल रंजन चौबे को राज्य शासन की ओर से विशेष अनुकम्पा नियुक्ति प्रदान की है। मुख्यमंत्री ने आज सवेरे यहां ई.ए.सी. कॉलोनी स्थित स्वर्गीय श्री चौबे के घर जाकर उनके सुपुत्र को डिप्टी कलेक्टर के पद पर विशेष अनुकम्पा नियुक्ति के आदेश की प्रति सौंपी और उन्हें अपनी शुभकामनाएं दी। डॉ. रमन सिंह ने स्वर्गीय श्री चौबे और उनके साथ राजनांदगांव जिले के मदनवाड़ा के जंगलों में पिछले साल आज ही दिन शहीद हुए सुरक्षा बलों के वीर जवानों की शहादत को भी याद किया। डॉ. रमन सिंह ने श्रीमती रंजना चौबे सहित उनके परिवारजनों के प्रति अपनी संवेदना और सहानुभूति व्यक्त की। इस अवसर पर पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक रामनिवास तथा रायपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक मुकेश गुप्ता उपस्थित थे।
निःसंदेह राज्य शासन का यह एक प्रशंसनीय कार्य कहा जायेगा । और भी अच्छा होगा यदि शहीद
सभी पुलिस के जवानों - सैनिकों के परिजनों को भी समय रहते अनुकम्पा नियुक्तियाँ दी जाय । उन शहीदों की आत्मा को शांति मिलेगी , परिजनों के कष्ट कम होंगे । सरकार के ईमानदार प्रयासों से प्रदेश की जनता रूबरू होगी । इस कार्य के लिए शासन - प्रशासन में बैठे लोगों को "खबरों की दुनियाँ" की ओर से साधुवाद । रायपुर, 12 जुलाई 2010
लगी खेलने लेखनी, सुख-सुविधा के खेल। फिर सत्ता की नाक में, डाले कौन नकेल।। खबरें वो जो आप जानना चाह्ते हैं । जो आप जानना चाह्ते थे ।खबरें वो जो कहीं छिपाई गई हों । खबरें जिन्हें छिपाने का प्रयास किया जा रहा हो । ऐसी खबरों को आप पायेंगे " खबरों की दुनियाँ " में । पढ़ें और अपनी राय जरूर भेजें । धन्यवाद् । - आशुतोष मिश्र , रायपुर
मेरा अपना संबल
रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस
रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।
जुलाई 13, 2010
धन्य हुआ है ये प्रजा तन्त्र आपसे मेरे लाल फ़ीताशाहों
छत्तीसगढ़ में " लालसलाम " और लालफ़ीताशाही का खुला राज है । सत्ताधीश इन दोनो के सामने मानो नत मस्तक हो कर रहने में ही अपनी भलाई और फ़ायदे की बात मानने लगे हैं । प्रदेश शासन की बागडोर अब धीरे-धीरे नेताओं को अयोग्य ठहराते-नासमझ बताते हुये प्रदेश के लालफ़ीताशाह अपने हाथों में लेते जा रहे हैं । खुद निर्णय करने लगे हैं और उस निर्णय पर प्रदेश के मुखिया से हामी के हस्ताक्षर कराने लगे हैं । बदले में जीवन भर सुख-समृद्धि , ऐशो-आराम की गारंटी । अर्जित फ़ंड के मैनेजमेंट की गारंटी,जिससे की कभी सत्ता रहे न रहे आमदनी बनी रहे जीवन पर्यन्त इस बात की भी सौ फ़ीसदी गारंटी दे रहा है लालफ़ीताशाही दिमाग । बस बदले में एक गारंटी देना होगी जनता के मुखिया को कि वह कहीं भी अपना दिमाग इस्तेमाल नहीं करेंगे । बस हाँ में हाँ कहेंगे । मामला किसी खरीद- फ़रोख्त का हो फ़िर कोई दमनकारी नीति का हो लालफ़ीताशाह बेखटक निर्णय करने और उस पर सरकार की मुहर लगवाने लगे हैं ।खबर हाल ही की है जिसमे एक नौकरशाह ने प्रदेश के मुख्यमंत्री को यह समझाने में कामयाबी पा ली की प्रदेश में चल रहे लगभग 1500 छोटे अखबार जो बेबाक-बेझिझक कुछ भी छापने में नहीं ड़रते उन्हें तकनीकि कारण बता कर सरकारी विज्ञापन देने से रोका जाए । मुख्यमंत्री ने हामी भर दी और तुरन्त ही प्रदेश के ऐसे अखबारों को ' डी ब्लॉग ' घोषित कर दिया गया । सरकार अब इन्हे विज्ञापन नहीं देगी। इन ' डी ब्लॉग ' घोषित अखबारों में अधिकांश अखबार ऐसे ही हैं जो सरकार की कहीं ना कहीं पोल खोलते हैं । लालफ़ीताशाही को उजागर करते हैं और सरकारी तंत्र इन्हें ब्लैक मेलर की संज्ञा देते रहता है । क्यों कि ये छोटे अखबार उन " चारण - भाट " की तरह काम नहीं करते जो पैकेज लेकर खबरें छापते हैं , और सालाना करोड़ो रूपयों का सरकारी विज्ञापन (एड्वांस रुपया लेकर भी ) सिर्फ़ इसलिए छापते हैं कि अघोषित सेंसरशिप के तहत निर्देशित ढ़ंग से प्रतिबद्ध्तापूर्ण तौर तरीके से ही काम करेंगे । सरकार या बताये गये लोगों के खिलाफ़ कुछ भी नहीं लिखेंगे । तब तक जब तक की कोई निर्देश ना दिया जाये । निर्देश प्राप्त होने पर किसी भी नेता , मन्त्री , अधिकारी के विरूद्ध प्रदत्त सामग्री का यथा स्वरूप प्रकाशन करेंगे । यह सारी शर्तें मानों किसी तरह का कोई बॉण्ड हों उस तरीके से मनवाई जातीं हैं । यह तो हाल है हमारे राज्य में प्रजातंत्र के चौथे स्तंभ का । कितना मजबूत या कमजोर है यह तो सभी देख और महसूस कर ही रहे हैं । लेकिन अफ़्सोस सिर्फ़ इस बात का है कि क्या प्रहरी और क्या जन सेवक , क्या मंत्री और क्या मुख्यमंत्री सभी ने मानो घुटने टेक दिये " लालफ़ीताशाहों " के सामने । क्या अब यह सच नहीं लगने लगा कि सचमुच पैसा ही सबकुछ है । सर चढ़कर बोलता है । अच्छे-अच्छों का दिमाग फ़िरा देता है । ऐसे में लगता है कि फ़िर उनका क्या दोष जिन्हें एकाएक - अप्रत्याशित रूप से करोड़ो रुपये देखने को मिले हों । कैसे सम्हलेंगे दिन-रात सिर्फ़ यही चिंता सताती हो । ऐसे हालात में क्या बुरा है किसी अधिकारी की बात मानना ? आखिर बेचारा उनके लिये मैनेजर जैसा काम भी तो कर ही रहा है ना ?इसके बदले में उसे - करो जो करना है सिर्फ़ इतनी ही छूट तो दी गई है , इसमें भला गलत कहाँ है , क्या है ? मजे की बात तो तब देखेंगे जब यही अधिकारी आने वाली दूसरी सरकार को हंस - हंस कर यह बतायेंगे कि ऐसे एक साथ इतने - इतनों को " उनका " दुश्मन बना कर निबटाया था पिछ्ली सरकार को , आपके एक इशारे पर " सर " । आखिर हम सब हैं तो आपके ही जूनियर हैं " सर " । दस साल बाद ही सही , मुबारक हो आपको आपकी पुरानी कुर्सी " सर " । आदेश !!!
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चिंतन
जुलाई 11, 2010
शहीद पुलिस अधीक्षक स्व.विनोद कुमार चौबे सहित 29 जवानों को उनके शहादत दिवस पर श्रध्दांजलि
छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले में शहीद पुलिस अधीक्षक स्व. श्री विनोद कुमार चौबे सहित 29 जवानों को उनके शहादत दिवस के मौके पर 12 जुलाई को श्रध्दांजलि दी जाएगी। मानपुर के कोरकोट्टी गांव में नक्सलियों से बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हुए पुलिस अधीक्षक व पुलिस जवानों की याद में 12 जुलाई को सुबह 8 बजे स्मृति रैली निकाली जाएगी। यह रैली म्युनिस्पल स्कूल ग्राऊंड से प्रारंभ होकर नगर का भ्रमण करते हुए ठाकुर प्यारेलाल उच्चतर माध्यमिक शाला प्रांगण पहुंचेगी। यहां पूर्वान्ह 11 बजे श्रध्दांजलि सभा का आयोजन कर शहीदों को पुष्पांजलि अर्पित की जाएगी। 12 जुलाई को ही संध्या 6.30 बजे से शहीदों की याद में संगीतांजलि का कार्यक्रम आयोजित होगा। इस कार्यक्रम में देश भक्ति से परिपूर्ण गीतों की प्रस्तुति होगी। शहीदों को श्रध्दांजलि अर्पित करने का यह कार्यक्रम राजनांदगांव शहर की जनता की ओर से आयोजित किया गया है। इस कार्यक्रम में नगर की समस्शैक्षणिक संस्थाओं, स्वयंसेवी, समाजसेवी संस्थाओं व नागरिकों से बढ़-चढ़कर भाग लेने की अपील की गई है। "खबरों की दुनियाँ" सभी शहीदों को नमन करता है ।
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जानकारियाँ
जुलाई 10, 2010
एक और नेता ने पकड़ी लालू की राह
भारतीय राजनीति में अब विदूषकों की कमी नहीं रही । अब तो शीर्ष पर बैठा व्यक्ति भी ऐसा कुछ कर दिखाना चाहता है जिससे कि केवल एक लाईन या फ़िर एक मुहावरा बोल देने मात्र से ही वह अपने देश की राजनीति में मानो रातोरात छा जाए । पिछ्ले ड़ेढ़-दो दशक से लालू यह काम करके चर्चा में बने हुए हैं और अब आ गए हैं नए नवेले नेता गडकरी । आम लोग सोचते हैं बड़ा नेता कुछ सोच-समझ कर ही बोलता होगा , गंभीर और पते की बातें बोलता होगा ,लेकिन अब जिस तरह के बयान पढ़ने-सुनने को मिलने लगे हैं ,उसे देख-सुन कर वजनदार नेताओं का हल्कापन मानों खुलकर समझ आने लगा है , साथ ही लोग यह समझने में भी दिक्कत महसूस नहीं कर रहे हैं कि ये साहब कितने पानी में हैं।यहां यह बताना शायद जरूरी समझता हूं कि मैं किसी राजनीतिक पार्टी का कोई हिमायती या सदस्य नहीं हूँ । भगवान की साक्षात कृपा है , बचा हुआ हूँ । लिखने को विवश इसलिए हूँ कि अब राजनीति की मुंडेर पर "हंस" बने बैठे लोग "कौए" की कर्कश आवाज में शोर मचा कर लोगों को परेशान करते दिखने लगे हैं , महज लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए । वर्ना उनका बयान इतना सतही-हल्का कतई न होता , अगर राजनैतिक परिपक्वता होती और विचारों में जरा भी गंभीरता होती । शर्म की बात तो यह है कि जिन्होनें अपने कंधे पर "राष्ट्रीयता"का बोझ लाद रखा है वे ही गैरजिम्मेदाराना बयान देने में ,अमर्यादित भाषा बोलने में नहीं झिझकते , क्या आप इसे विडम्बना नहीं कहेंगे ? जिन्हें सार्वजनिक रूप से बोलना तक नहीं आता उनसे भला कैसे यह उम्मीद की जाय कि ये देश का भला भी सोच पायेंगे ? अटल जी - आडवानी जी ने तो बहुत दिक्कतें देखीं हैं भारतीय राजनीति में , इन्हें तो कभी भी अप शब्दों का सहारा नहीं लेना पड़ा अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों को परास्त करने के लिये ?
सच ही है बहुत अंतर है एक जबर्दस्त नेता होने और जबर्दस्ती नेता होने में , समय-समय पर यह अंतर देखने को मिलता है । वैचारिक गरीबी भी अब देश के कथित - स्वयंभू कर्णधारों को दबोचने-घेरने लगी है। तभी तो शायद एक राष्ट्रीय पार्टी का शीर्ष नेता दूसरे को सार्वजनिक रूप से "कुत्ता" कहता है । किसी की "बेटी" कहीं व्याहने को आतुर हो कर बयान देता है । मकसद सिर्फ़ इतना कि देश मे उसकी - उसके उल्टे-सीधे बयानों की चर्चा हो । इसमें जरूर वह कामयाब है ।मगर हमारी चिंता यह है कि देश के शीर्ष आसन पर बैठने वाले ही जब मानसिक रूप से गरीबी का शिकार हो जायेंगे तो फ़िर इस देश की गरीब जनता का क्या भला हो पायेगा - कैसे भला हो पायेगा ?
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चिंतन
जुलाई 09, 2010
श्रीमती शांता मुक्तिबोध का निधन , विनम्र श्रद्धांजलि
देश के ख्यातिनाम साहित्यकार स्वर्गीय गजानन माधव मुक्तिबोध की पत्नी एवं वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की माता श्रीमती शांता मुक्तिबोध का 88 वर्ष की आयु में रायपुर स्थित निवास स्थान में निधन हो गया ।आज नौ जुलाई 2010 की सुबह उनका अंतिम संस्कार किया गया ।
वह लम्बे समय से अस्वथ्य थीं ।साहित्य जगत से जुड़े लोगों एवम पत्रकार जगत के लोगों ने श्रीमती मुक्तिबोध के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।
स्वर्गीय श्रीमती शांता मुक्तिबोध अपने पीछे रमेश , दिवाकर , गिरीश , और दिलीप मुक्तिबोध का भरापूरा परिवार छोड़ गईं । आप एक आदर्श गृहणी थीं, उन्होंने साहित्यकार स्वर्गीय श्री मुक्तिबोध की जीवनसंगिनी के रूप में पति की साहित्य साधना में अमूल्य योगदान देते हुए अपने पारिवारिक दायित्वों का बखूबी पालन किया। "खबरों की दुनियाँ" एवम "भाग्योत्कर्ष" परिवार स्वर्गीय श्रीमती शांता मुक्तिबोध के निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है ।
वह लम्बे समय से अस्वथ्य थीं ।साहित्य जगत से जुड़े लोगों एवम पत्रकार जगत के लोगों ने श्रीमती मुक्तिबोध के निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।
स्वर्गीय श्रीमती शांता मुक्तिबोध अपने पीछे रमेश , दिवाकर , गिरीश , और दिलीप मुक्तिबोध का भरापूरा परिवार छोड़ गईं । आप एक आदर्श गृहणी थीं, उन्होंने साहित्यकार स्वर्गीय श्री मुक्तिबोध की जीवनसंगिनी के रूप में पति की साहित्य साधना में अमूल्य योगदान देते हुए अपने पारिवारिक दायित्वों का बखूबी पालन किया। "खबरों की दुनियाँ" एवम "भाग्योत्कर्ष" परिवार स्वर्गीय श्रीमती शांता मुक्तिबोध के निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करता है ।
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खबर
जुलाई 08, 2010
धोनी की शादी और मीडिया का रोल
क्रिकेट के मशहूर खिलाड़ी महेन्द्र सिंह धोनी की शादी में मीडिया का प्रवेश वर्जित था । मीडिया परेशान - हलाकान था । मगर मीडिया वालों ने उतावलेपन का प्रदर्शन करना नहीं भूला । विवाह स्थल के बाहर खड़े रह कर अंदर से इससे सीखना चाहिए पत्रकरों को , खासकर माईक लेकर घुमने वालों को ।
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चिंतन
गर तोप मुकाबिल हो तो "अखबार" निकालो
नक्सली आतंक को लेकर छत्तीसगढ़ में जो स्थिती निर्मित है उसे भयावह ही कहा जा सकता है ।कौन है इसके लिए जिम्मेदार ? यह प्रश्न सरल हो सकता है पर इसका उत्तर शायद इतना सरल नहीं है,जितना कि अपेक्षित रहता है ।नक्सलवाद कभी आंदोलन रहा होगा ,लेकिन अब आतंक का दूसरा नाम है । समाज को इस समस्या से खुद नक्सलियों ने और फ़िर मीडिया ने परिचित कराया है । पहले ने अपने आतंक के जरिये तो दुसरे ने अपने प्रचार माध्यमों को रेटिंग की सीढ़ी पर चढ़ा कर गला फ़ाडू आवाज में विस्तार देने का सफ़ल प्रयास किया है । दोनो ही तरीके घातक सिद्ध हुए हैं । दोनो ने ही इसे अपने-अपने मतलब से किया है। मैं चाहता हूँ कि आप स्वयं ही इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि किनके कितने प्रयासों से यह आंदोलन आतंक बन बैठा है । प्रश्न यह है कि क्या ऐसा किया जाना जरूरी था ? इससे किसको लाभ हुआ है ? आम लोगों में उत्पन्न भय का वातावरण घटना जनित है या फ़िर उन घट्नाओं के प्रचार-प्रसार का तौर तरीका भी एक जिम्मेदार पहलू है । किसी बड़ी घटना का हल्ला समझ आता है पर हर छोटी से छोटी बात पर भी उतना ही हल्ला होना ,क्या परोछ रूप से जन मानस में भय का वातावरण उत्पन्न करने में सहायक नहीं होता है ? क्या लगातार ऐसा होते रहना उचित होगा ? क्या यह सोचना-समझना हम मीडिया जगत से जुड़े लोगों की सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बनती ? किस घटना का समाज पर कैसा असर होगा यह तय करना और इसे भुनना आतंकी बहुत अच्छी तरह से जानते हैं । ये लोग तोप ,तलवार के साथ-साथ हथियारों की ही तरह अखबार (मीडिया के अन्य सभी श्रोतों) का उपयोग भी करने लगे हैं । प्रारंभिक अवस्था है आज की जहां उन्हें इस तीसरे हथियार के प्रयोगके लिये खुद होकर ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़ रहा है । चिंतन उन्हें जरूर करना चाहिए जो अनजाने में ही हथियार के रूप में प्रयुक्त हो रहे हैं । समाज इनकी करनी से कहीं ज्यादा भयभीत या कहें खौफ़ज़दा नजर आता है। हमें गंभीरता पूर्वक यह सोचना चाहिए कि एक खाली पड़ा थाना भवन उड़ा कर जितना आतंक वे वहां पैदा नहीं कर पाते उससे कहीं ज्यादा तो हम यहां उस घटना के विषय में प्रचारित-प्रसारित कर देश-दुनिया के लोगों में अनायास ही आतंक उत्पन्न कर देते हैं , आखिर क्यों ? शायद यहां यह कहना कतई भी गलत नहीं होगा कि सिर्फ़ और सिर्फ़ हमको छोड़ कर शेष उपयोग कर्ता नेता , ठग , आतंकी , सभी अकबर इलाही की उन चंद लाईनों को सार्थक रूप में जी रहे हैं जिनमें यह कहा गया था कि- खिचों न कमान , न तलवार निकालो , गर तोप मुकाबिल हो तो "अखबार" निकाओ ।
तभी तो ये सभी के सभी अखबारों (मीडिया) का सबसे अच्छा और सीधा सा उपयोग करते आ रहे
हैं , बात बुरा मानने के लिए नहीं , बल्कि समझने और स्वीकार करने की है ।
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समस्याएँ
जान - समझ कर ऐसा क्यों करते हैं हम सब ?
ग्लोबल वार्मिंग को लेकर हमने हजारों फैक्ट पढे, पर्यावरण प्रदूषण की बातें रोजाना सुनते हैं। हम यह भी जानते हैं कि भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है, लेकिन फिर भी हमनें हमारी पृथ्वी को शुद्ध रखने और बचाने के लिए क्या कदम उठाएं हैं ? पूरी गारंटी के साथ हम कुछ नहीं कह पाएंगे। कुछ ऎसा ही संकल्प लें कि इस धरती की सुंदरता को हम आने वाली पीढ़ियों के लिए उसी स्वरूप में छोड़ जाएंगे,जैसा कि हमारे पूर्वजों ने हमें सौंपा । इसके लिए प्रयास हमें ही शुरू करना होगा।हम सब को यह समझना ही होगा कि हम रोजमर्रा में कहां - कहां , क्या-क्या गलतियाँ करते जा रहे हैं , जिसके दुष्परिणाम हमारे बच्चे और उनके बच्चे भुगतेंगे ।खुली हवा में साँस लेने को तरस जायेंगे । हम बड़ी ही सहजता से अपने आसपास कभी न खत्म होने वाला जहर फ़ैला रहे हैं । इस जहर को हम बड़े गर्व से अंग्रेजी में पॉलीथिन बैग , कैरी बैग्स कहते हैं ,उपयोग करते नहीं शर्माते हैं । अब तो इसकी छपाई भी इतनी आकर्षक होने लगी है कि बड़ा से बड़ा आदमी भी इसे दिखावे के रूप में
भी उपयोग करने में नहीं झिझकता ।
पॉलिथिन बैग जिस चीज़ से बनते हैं वे बायोडिग्रेडेबल पदार्थ नहीं हैं। यानी वे नष्ट नहीं
होते, रिसायकल नहीं होते और प्रकृति में अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं।
इससे बहुत सारे नुकसान होते हैं। पर्यावरण से जुड़े लोग इसीलिए इनके इस्तेमाल का
विरोध करते हैं। इसी तर्क पर दिल्ली ही नहीं कई दूसरे राज्यों में भी पॉलिथिन को
प्रतिबंधित कर दिया गया है। इससे उन राज्यों को प्रदूषण और गंदगी से बचाने में
मदद भी मिली है। इसके अलावा पॉलिथिन खाने से होने वाली पशुओं की मौतों में
भी कमी आई है। लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ में बेरोकटोक , बेधड़क - बेहिसाब
पॉलीथिन का उपयोग किया जा रहा है ।
कुदरत खुद जो भी पैदा करती है तो उसके सृजन से लेकर विसर्जन तक की जिम्मेदारी
भी खुद ही निभाती है। मगर मानव अपने कारखानों में जो भी बनाता है और उस बने
हुए कृत्रिम सामान का उपयोग करता है परन्तु उसके विसर्जन की जिम्मेदारी न उत्पादन
कर्ता लेता है और न उपभोक्ता लेता है । चूंकि जो मानव ने कृत्रिम तरीके से बनाया है
उसके अपव्यय को धरती भी स्वीकार नही करती। अर्थात् समस्त संसार में प्रदूषण रूपी
राक्षस संसार से जीवन खत्म करने के लिए अपनी प्रदूषण रूपी सेना बढ़ा रहा है।
हमारे वेदों में राक्षस उसी को कहते हैं जिसका क्षय नहीं होता है।
यह कुदरत का नियम है जो समाप्त नहीं होता वह समाप्त कर देता है।
पॉलिथिन के कारण पर्यावरण प्रदूषण जल मल की निकासी में व्यवधान उत्पन्न
होता है । आज हर गली - मोहल्लों में बारिश का पानी क्यों जमा हो जाता है ?
लोग अपने घरों में पानी घुसने के लिए शासन-प्रशासन को दोषी मानते हैं ,
लेकिन क्या यह सच नहीं कि वे खुद भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं इसके लिए ?
पहले जब कभी पॉलीथिन का उपयोग नही होता था तब तो ऐसी समस्या नहीं थी ।
आज हर शहरी क्षेत्रों में नाले-नालियाँ पॉलीथिन से पटे पड़े हैं । कहाँ से निकलेगा
बारिश का पानी ? कैसे होगा आपके आसपास का वातावरण पर्यावरण शुद्ध ?
कैसे बचेगा , कैसे शुद्ध रह पायेगा आपके लिये पीने वाला पानी ? ऐसी
विषम स्थितियों में कैसे न हो नई-नई बीमारियों का जन्म ? आदमी तो
आदमी बड़ी संख्या में बेजुबान पशुओं की असामयिक मृत्यु के लिये भी पॉलिथिन जिम्मेदार है।
सही मायने में इस पुरे विषाक्त वातावरण के निर्माण के हम सब दोषी हैं ,हमें
सोचना समझना चाहिए और कुछ अच्छा करने की हिम्मत का परिचय देना
चाहिए , तभी हम अपने और आने वाली पीढ़ी के साथ न्याय कर पायेंगे ।
भी उपयोग करने में नहीं झिझकता ।
पॉलिथिन बैग जिस चीज़ से बनते हैं वे बायोडिग्रेडेबल पदार्थ नहीं हैं। यानी वे नष्ट नहीं
होते, रिसायकल नहीं होते और प्रकृति में अपनी उपस्थिति बनाए रखते हैं।
इससे बहुत सारे नुकसान होते हैं। पर्यावरण से जुड़े लोग इसीलिए इनके इस्तेमाल का
विरोध करते हैं। इसी तर्क पर दिल्ली ही नहीं कई दूसरे राज्यों में भी पॉलिथिन को
प्रतिबंधित कर दिया गया है। इससे उन राज्यों को प्रदूषण और गंदगी से बचाने में
मदद भी मिली है। इसके अलावा पॉलिथिन खाने से होने वाली पशुओं की मौतों में
भी कमी आई है। लेकिन हमारे छत्तीसगढ़ में बेरोकटोक , बेधड़क - बेहिसाब
पॉलीथिन का उपयोग किया जा रहा है ।
कुदरत खुद जो भी पैदा करती है तो उसके सृजन से लेकर विसर्जन तक की जिम्मेदारी
भी खुद ही निभाती है। मगर मानव अपने कारखानों में जो भी बनाता है और उस बने
हुए कृत्रिम सामान का उपयोग करता है परन्तु उसके विसर्जन की जिम्मेदारी न उत्पादन
कर्ता लेता है और न उपभोक्ता लेता है । चूंकि जो मानव ने कृत्रिम तरीके से बनाया है
उसके अपव्यय को धरती भी स्वीकार नही करती। अर्थात् समस्त संसार में प्रदूषण रूपी
राक्षस संसार से जीवन खत्म करने के लिए अपनी प्रदूषण रूपी सेना बढ़ा रहा है।
हमारे वेदों में राक्षस उसी को कहते हैं जिसका क्षय नहीं होता है।
यह कुदरत का नियम है जो समाप्त नहीं होता वह समाप्त कर देता है।
पॉलिथिन के कारण पर्यावरण प्रदूषण जल मल की निकासी में व्यवधान उत्पन्न
होता है । आज हर गली - मोहल्लों में बारिश का पानी क्यों जमा हो जाता है ?
लोग अपने घरों में पानी घुसने के लिए शासन-प्रशासन को दोषी मानते हैं ,
लेकिन क्या यह सच नहीं कि वे खुद भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं इसके लिए ?
पहले जब कभी पॉलीथिन का उपयोग नही होता था तब तो ऐसी समस्या नहीं थी ।
आज हर शहरी क्षेत्रों में नाले-नालियाँ पॉलीथिन से पटे पड़े हैं । कहाँ से निकलेगा
बारिश का पानी ? कैसे होगा आपके आसपास का वातावरण पर्यावरण शुद्ध ?
कैसे बचेगा , कैसे शुद्ध रह पायेगा आपके लिये पीने वाला पानी ? ऐसी
विषम स्थितियों में कैसे न हो नई-नई बीमारियों का जन्म ? आदमी तो
आदमी बड़ी संख्या में बेजुबान पशुओं की असामयिक मृत्यु के लिये भी पॉलिथिन जिम्मेदार है।
सही मायने में इस पुरे विषाक्त वातावरण के निर्माण के हम सब दोषी हैं ,हमें
सोचना समझना चाहिए और कुछ अच्छा करने की हिम्मत का परिचय देना
चाहिए , तभी हम अपने और आने वाली पीढ़ी के साथ न्याय कर पायेंगे ।
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समस्याएँ
जुलाई 07, 2010
कैसा है दूर दिल्ली का हाल ?
में राष्ट्र मण्डल खेल होने जा रहे हैं । इन खेलों के भारत में , खास कर दिल्ली में आयोजित किये जाने को लेकर गत दिनों एक चैनल में बहस सुनी । सोचा अपने पाठकों को भी इस विषय में कुछ बताऊँ ।
इस बहस में शामिल थे अटल बिहारी बाजपेयी जी के कार्यकाल के खेल मंत्री(नाम याद नहीं) , मनमोहन सिंह जी के साथ खेल मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर और ओलंपिक संघ के वाईस प्रेसीडेंट त्रिलोचन सिंग , खेल पत्रकार वी कृष्णा स्वामी , एक एन जी ओ से मि.हूनू ।
मि.हूनू ने बताया इस आयोजन में कुल 90 हजार करोड़ रूपए खर्च होंगे । दिल्लीमें इसके लिए 35 हजार गरीबों के परिवारों को विस्थापित किया गया है , जिनमे सेकेवल एक हजार परिवार को ही बसाहट की व्यवस्था दी गई है । शेष भगवान भरोसे हैं ।जब तक ये खेल चलेंगे दिल्ली की सड़कों मे जहाँ जहाँ से खिलाड़ी निकलेंगे उन सड़कों की
एक लेन पर धारा 144 लग जायेगी , दूसरा कोई भी इन सड़कों -लेनों का उपयोग
नहीं कर पायेगा ।चैनल का कहना था अनुमानित खर्च 80 हजार करोड़ से भी ज्यादा होगा । हिन्दुस्तान
की हकीकत पर पर्दा डाल कर चकमक दिल्ली दिखाने की कोशिश की जाएगी ।खेल मन्त्री रहे मणिशंकर अय्यर ने बताया इस आयोजन से देश की जनता पर ,खासकर दिल्ली की जनता पर आर्थिक बोझ बहुत अधिक बढ़ेगा ,मंत्री रहते हुए ही उन्होंनेयह बात प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी से कही थी और आयोजन के तौर-तरीकों पर
अपनी आपत्तियां समय रहते ही दर्ज कराईं थीं , मगर उनकी एक ना सुनी गई ।मौजूदा परिस्थितियों में अमीरों को फ़ायदा होगा , गरीब और गरीब हो जायेंगे । उनका क्षेत्र विकसित नहीं हो पायेगा , जबकि होना उल्टा चाहिए था ।4 मिनट नाचने के लिये एश्वर्या राय को 4 करोड़ रूपयों का भुगतान किया गया ,शेष का हिसाब भी करोड़ो में है । ओपनिंग और क्लोजिंग सेरेमनी पर ही करोड़ो रुपयों के फ़टाके फ़ोड़े जायेंगे । ये सभी खर्च कर्ज लेकर किया जाता है ।बड़े-बड़े विकसित देश यह कर्जा 20 से 25 वर्षों में अदा कर पाते हैं ,इसकी अदायगी का बोझ भी परोक्ष रूप से जनता पर ही रहता है । त्रिलोचन सिंह और खेल पत्रकार स्वामी इस आयोजन को खेलों के विकाश के लिये बेहद आवश्यक बता रहे थे । इन्फ़्राइस्ट्रक्चर ड्व्लपमेंट के लिए और खिलाड़ियों की बेहतरी के
लिए जरूरी खर्च बता रहे थे । त्रिलोचन सिंह जी तो विभिन्न श्रोतों से 6-7 सौ करोड़ रुपयों की वापसी का भी इंतेजाम हो जाने की बातें कर रहे थे । इन बातों से परे ,यहां आने वाले पर्यटकों के स्वागत की तैयारियों में जुटी दिल्ली सरकार को अनुमान है कि एक लाख से भी अधिक विदेशी पर्यटक इस दौरान दिल्ली आयेंगे ,सब दिल्ली वासियों को मदद करनी होगी । शीला दीक्षित जी की यह अपील है ।तो कुछ ऐसा हाल है दूर की दिल्ली का ।समय शेष है और भी बातें मालूम होंगी । औरचर्चा करेंगे । आज के लिए इतना ही ।
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चिंतन
गर इजाजत हो तो थोड़ी सी खुशी अपने-अपनों के लिए
का आभार ।
इस समारोह में सम्मानित अग्रज वरिष्ठ पत्रकार सनत चतुर्वेदी जी , संतोष जैन जी , कैलाश वनवासी जी , अशोक शर्मा जी , संदीप अखिल जी एवं मेरे भाई नरेन्द्र बंगाले , आप सभी को बहुत-बहुत बधाइयां । उत्तरोत्तर प्रगति के लिए अशेष शुभ कामनाएं ।
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जीवन शैली
जुलाई 06, 2010
727 गल्तियों वाली पुस्तक
यह कोई बाजारू नहीं बल्कि सरकारी पुस्तक है , जिसे छ्त्तीसगढ़ शासन ने अपने पाठ्य पुस्तक निगम से छपवाया है ,जिसमें कुल 727 जगह गल्तियाँ हैं।यह पुस्तक है कक्षा नवमीं की गणित।
जिसमे 8 यूनिट और 20 चेप्टर हैं । हर चेप्टेर में ढेरों गल्तियाँ हैं । यहाँ तक की इस पुस्तक के मुखय पेज (कव्हर) पर भी छत्तीसगढ़ बोर्ड ओफ़ सेकेण्ड्री एजुकेशन की स्पैलिंग गलत प्रिन्ट है । पिछले वर्ष भी यह पुस्तक स्कूली बच्चों को दे दी गई थी । रायगढ़ के एक जागरूक शिक्षक ने अपने विभागीय अधिकारियों को इस आशय की शिकायत भी की थी ,लेकिन कुछ भी ना हो सका । इस वर्ष भी दूसरा कोई विकल्प न होने की वजह से , वही गल्तियों से भरी गणित की किताब हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम के बच्चे खरीदने को मजबूर हैं । गल्तियों से भरी यह पुस्तक बाजार में 71 रूपये की कीमत पर उपलब्ध है । पाठ्य पुस्तक छापने वाला विभाग कहता है उसने गल्तियाँ सुधार दी हैं , लेकिन किताब में गल्तियाँ जस की तस हैं ।सरकारी पुस्तकों की छ्पाई , कागज की रद्दी किस्मों और बाईंडिग को लेकर हर वर्ष चर्चा रहती ही थी । अब पुस्तकों में प्रकाशकीय त्रुटि को लेकर भी स्कूली बच्चे और उनके अभिभावक परेशान हैं ।भला नक्कार खाने में तूती कभी सुनी गई है जो अब सुने जाने की उम्मीद की जाए ? जय हो छ्त्तीसगढ़ की ।
जिसमे 8 यूनिट और 20 चेप्टर हैं । हर चेप्टेर में ढेरों गल्तियाँ हैं । यहाँ तक की इस पुस्तक के मुखय पेज (कव्हर) पर भी छत्तीसगढ़ बोर्ड ओफ़ सेकेण्ड्री एजुकेशन की स्पैलिंग गलत प्रिन्ट है । पिछले वर्ष भी यह पुस्तक स्कूली बच्चों को दे दी गई थी । रायगढ़ के एक जागरूक शिक्षक ने अपने विभागीय अधिकारियों को इस आशय की शिकायत भी की थी ,लेकिन कुछ भी ना हो सका । इस वर्ष भी दूसरा कोई विकल्प न होने की वजह से , वही गल्तियों से भरी गणित की किताब हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम के बच्चे खरीदने को मजबूर हैं । गल्तियों से भरी यह पुस्तक बाजार में 71 रूपये की कीमत पर उपलब्ध है । पाठ्य पुस्तक छापने वाला विभाग कहता है उसने गल्तियाँ सुधार दी हैं , लेकिन किताब में गल्तियाँ जस की तस हैं ।सरकारी पुस्तकों की छ्पाई , कागज की रद्दी किस्मों और बाईंडिग को लेकर हर वर्ष चर्चा रहती ही थी । अब पुस्तकों में प्रकाशकीय त्रुटि को लेकर भी स्कूली बच्चे और उनके अभिभावक परेशान हैं ।भला नक्कार खाने में तूती कभी सुनी गई है जो अब सुने जाने की उम्मीद की जाए ? जय हो छ्त्तीसगढ़ की ।
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समस्याएँ
जुलाई 03, 2010
संवेदना
संवेदना तुम कहाँ हो ?
लोग तो कहते हैं कि तुम मर गई ,
क्या यह सच है कि तुम
अब नहीं रही ?
कहते हैं मानवता में तुम्हारा वास था ,
मर्यादा तुम्हारा लिबास था ।
हर सांस में वेदना का साथ था ,
जुबां पर तुम्हारी, दया-करूणा का वास था ।
हमें लगता है, तुम मरी नहीं, यहीं-कहीं हो ,
जहां कहीं भी हो आ जाओ ।
वेदना को तुम्हारी तलाश है , मर्यादा को तुम्हारे आने की आस है ।
तुम बिन दया - करूणा उदास है ,
मानवता को तुम्हीं से जीवन की आस है ।
- आशुतोष मिश्र
( 14 सितम्बर 1993 )
लोग तो कहते हैं कि तुम मर गई ,
क्या यह सच है कि तुम
अब नहीं रही ?
कहते हैं मानवता में तुम्हारा वास था ,
मर्यादा तुम्हारा लिबास था ।
हर सांस में वेदना का साथ था ,
जुबां पर तुम्हारी, दया-करूणा का वास था ।
हमें लगता है, तुम मरी नहीं, यहीं-कहीं हो ,
जहां कहीं भी हो आ जाओ ।
वेदना को तुम्हारी तलाश है , मर्यादा को तुम्हारे आने की आस है ।
तुम बिन दया - करूणा उदास है ,
मानवता को तुम्हीं से जीवन की आस है ।
- आशुतोष मिश्र
( 14 सितम्बर 1993 )
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जीवन शैली
जुलाई 02, 2010
घर तुम्हारा है , मैदान में जाकर लड़ो , नायक बन कर दिखाओ , झोंक दो पूरी ताकत और जीत कर आओ
देश में पांच राज्य नक्सली हिंसा से बुरी कदर प्रभावित हैं । सर्वाधिक खराब हालात छत्तीसागढ़ में देखे जा सकते हैं ।क्या इस खराब हालात के लिए अकेले नक्सली दोषी हैं ? क्या वे लोग भी दोषी नहीं हैं , जिन पर जिम्मेदारी थी समय रहते इस समस्या पर काबू पा लेने की ? जो लोग जनता के पैसों पर सिर्फ़ इसलिए एशोआराम के साथ जीवन गुजार देते हैं कि वे इसके बदले जनता को स्वच्छ प्रशासन देंगे । प्रगतिशील-निर्भय जीवन जीने देने में सहायकहोंगे । कानून-व्यवस्था ठीक रर्खेंगे। लेकिन स्थिती ठीक उलट है । आम लोगों को इन दोनो ही वर्गों ने बराबर परेशान किया है ।
कलुसित राजनीति और अधिकारियों में इच्छाशक्ति की कमी - मक्कारी की अधिकता का सीधा सा नतीजा है ,अशांत और पिछड़ा छत्तीसगढ़ , जो आज लाल आतंक के साये में जीने को मजबूर है । देश-दुनियाँ इसे इसी वजह से जानती है ।और दुखद पहलू तो यह भी कि अब इस समस्या पर भी यहां राजनीति जोरों से की जा रही है ।कौन कर रहा है यह राजनीति ? कथित नेता लोग या फ़िर परदे के पीछे से राज्य के चंद नकारा सिद्ध अधिकारी ,जो शासन को इधर उलझा कर आराम पसंद जिंदगी जीने में कामयाब दिखते हैं ? ये दोनों वर्ग यह मानने को तैयार क्यों नहीं है कि आम लोग की नजर इन दोनों की करतूतों पर है ।
शर्म तो माओवादियों को भी आना चाहिए जो खून खराबे की राजनीति कर रहे हैं । आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं ये विश्व को ?इनसे ज्यादा शर्मसार तो उन्हे होना चाहिए जो इस आतंक की आड़ लेकर अपनी-अपनी जेबें भरने की फ़िराख में लगे दिखते हैं , अपना फ़र्ज पूरा करना छोड़ कर मदद की गुहार लगाने , बड़ा पैकेज हासिल करने में ही सारा समय लगे दिखते हैं । कथित राज नेताओं के इन हथकण्ड़ों ने यहां प्रदेश के लोगों को बेहद परेशान किया है । संवेदना का यहां यह हाल है कि रोज ही ग्रामीण जन नक्सलियों के हत्थे चढ़ रहे हैं , पर सरकारी अमला मौन है ।
खुद को भी लाचार पाता है । जिनकी पद्स्थापना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में की जा रही है , खौफ़ जदा वे लोग वहां रहना नहीं चाहते । वरिष्ठ अधिकारी रायपुर छोड़ कर जाना नहीं चाहते हैं , यहीं ऐसे - ऐसे प्रभार ले कर बैठे रहना चाहते हैं कि मानो ज्यादा जरूरी प्रभार वाले काम हैं , मूल काम से । भला कैसे हो मुकाबला नक्सलियों से ?जिला पुलिस अधीक्षक वी के चौबे की शहादत को मानों दूसरे अर्थों में मौजुदा महकमें ने सबक सीखने - सिखाने के लिए मौन संदेश बना कर रखा है , इस मामले से "शौर्य" न सीख कर मानो कुछ और ही सीखा है ।
जमीन पर नीति बनाने वालों में नेता बयानबाजी में उलझे हैं , तो वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी सी आर पी एफ़ की तैनात टुकडी के साथ समन्वय बनाना छोड़ उनके खिलाफ़ बयान देना अपनी बहादुरी समझते हैं । उन्हें रास्ता बताने से कतराते हैं , ये भला क्या बात हुई ? कोई तुम्हारे लिए तुम्हारे घर में आकरतुम्हारे ही दुश्मन से लड़े और अपनी जान भी न्यौछावर करे और तुम हो कि उसे अपने उस घर जहां केवल आतंक ही आतंक है वहां का रास्ता भी न बताना चाहो ? कैसे लड़ोगे तुम ? खुद तो वहां जाने से डरते हो , जो गया है उसे मरने के लिए दिशा हीन बना कर छोड़ देते हो । अपने ऐसे कृत्यों पर क्या तुम्हे शर्म भी नहीं आती ? या फ़िर इसे भी अपनी बहादुरी के लिए कोई पुरुस्कार पाना चाहते हो ?
कब तक , आखिर कब तक लोगों की आंखों में यूं ही धूल झोंकी जाएगी ?
जिस बात के लिए ,जिस जस्बात के लिए तुम्हारी सेवाओं का ये सारा राष्ट्र सम्मान करता है तुम क्यों उस बात-जस्बात के लिए अपना काम नहीं करते यार ? सीधे-सीधे कोई बात क्यों नहीं समझना चाहते ? हर बात का अन्यथा अर्थ ही क्यों निकालना जानते हो ? क्या होगा तुम्हारे ऐसा कर लेने से ? है दम तो जगाओ अपनी इच्छा शक्ति , जावो जाकर साफ़ करो अपना घर जिसे नामुराद किस्म के हैवान लगातार और तुम्हारी लापरवाही के चलते गंदा कर चुके हैं ।
जावो जाकर वहां दिखाओ अपनी मर्दान्गी , अपना कैलिबर , अपना शौर्य - पराक्रम । यहां एयर कंडीशन ऑफ़िस में समय गुजारने से , बेनतीजन बैठ्कें लेते रहने से, चाय-पानी पी कर सिगरेट फ़ूंकने से नहीं होगी यह समस्या हल ,समझे । घर तुम्हारा है , मैदान मे जाकर लड़ो , नायक बन कर दिखाओ , झोंक दो पूरी ताकत और जीत कर आओ । फ़िरभले ही कुछ समय धूंए के छ्ल्ले उड़ाओ ,हम कुछ नही कहेंगे । फ़र्ज तो निभाओ वीरों !!!
कलुसित राजनीति और अधिकारियों में इच्छाशक्ति की कमी - मक्कारी की अधिकता का सीधा सा नतीजा है ,अशांत और पिछड़ा छत्तीसगढ़ , जो आज लाल आतंक के साये में जीने को मजबूर है । देश-दुनियाँ इसे इसी वजह से जानती है ।और दुखद पहलू तो यह भी कि अब इस समस्या पर भी यहां राजनीति जोरों से की जा रही है ।कौन कर रहा है यह राजनीति ? कथित नेता लोग या फ़िर परदे के पीछे से राज्य के चंद नकारा सिद्ध अधिकारी ,जो शासन को इधर उलझा कर आराम पसंद जिंदगी जीने में कामयाब दिखते हैं ? ये दोनों वर्ग यह मानने को तैयार क्यों नहीं है कि आम लोग की नजर इन दोनों की करतूतों पर है ।
शर्म तो माओवादियों को भी आना चाहिए जो खून खराबे की राजनीति कर रहे हैं । आखिर क्या संदेश देना चाहते हैं ये विश्व को ?इनसे ज्यादा शर्मसार तो उन्हे होना चाहिए जो इस आतंक की आड़ लेकर अपनी-अपनी जेबें भरने की फ़िराख में लगे दिखते हैं , अपना फ़र्ज पूरा करना छोड़ कर मदद की गुहार लगाने , बड़ा पैकेज हासिल करने में ही सारा समय लगे दिखते हैं । कथित राज नेताओं के इन हथकण्ड़ों ने यहां प्रदेश के लोगों को बेहद परेशान किया है । संवेदना का यहां यह हाल है कि रोज ही ग्रामीण जन नक्सलियों के हत्थे चढ़ रहे हैं , पर सरकारी अमला मौन है ।
खुद को भी लाचार पाता है । जिनकी पद्स्थापना नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में की जा रही है , खौफ़ जदा वे लोग वहां रहना नहीं चाहते । वरिष्ठ अधिकारी रायपुर छोड़ कर जाना नहीं चाहते हैं , यहीं ऐसे - ऐसे प्रभार ले कर बैठे रहना चाहते हैं कि मानो ज्यादा जरूरी प्रभार वाले काम हैं , मूल काम से । भला कैसे हो मुकाबला नक्सलियों से ?जिला पुलिस अधीक्षक वी के चौबे की शहादत को मानों दूसरे अर्थों में मौजुदा महकमें ने सबक सीखने - सिखाने के लिए मौन संदेश बना कर रखा है , इस मामले से "शौर्य" न सीख कर मानो कुछ और ही सीखा है ।
जमीन पर नीति बनाने वालों में नेता बयानबाजी में उलझे हैं , तो वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी सी आर पी एफ़ की तैनात टुकडी के साथ समन्वय बनाना छोड़ उनके खिलाफ़ बयान देना अपनी बहादुरी समझते हैं । उन्हें रास्ता बताने से कतराते हैं , ये भला क्या बात हुई ? कोई तुम्हारे लिए तुम्हारे घर में आकरतुम्हारे ही दुश्मन से लड़े और अपनी जान भी न्यौछावर करे और तुम हो कि उसे अपने उस घर जहां केवल आतंक ही आतंक है वहां का रास्ता भी न बताना चाहो ? कैसे लड़ोगे तुम ? खुद तो वहां जाने से डरते हो , जो गया है उसे मरने के लिए दिशा हीन बना कर छोड़ देते हो । अपने ऐसे कृत्यों पर क्या तुम्हे शर्म भी नहीं आती ? या फ़िर इसे भी अपनी बहादुरी के लिए कोई पुरुस्कार पाना चाहते हो ?
कब तक , आखिर कब तक लोगों की आंखों में यूं ही धूल झोंकी जाएगी ?
जिस बात के लिए ,जिस जस्बात के लिए तुम्हारी सेवाओं का ये सारा राष्ट्र सम्मान करता है तुम क्यों उस बात-जस्बात के लिए अपना काम नहीं करते यार ? सीधे-सीधे कोई बात क्यों नहीं समझना चाहते ? हर बात का अन्यथा अर्थ ही क्यों निकालना जानते हो ? क्या होगा तुम्हारे ऐसा कर लेने से ? है दम तो जगाओ अपनी इच्छा शक्ति , जावो जाकर साफ़ करो अपना घर जिसे नामुराद किस्म के हैवान लगातार और तुम्हारी लापरवाही के चलते गंदा कर चुके हैं ।
जावो जाकर वहां दिखाओ अपनी मर्दान्गी , अपना कैलिबर , अपना शौर्य - पराक्रम । यहां एयर कंडीशन ऑफ़िस में समय गुजारने से , बेनतीजन बैठ्कें लेते रहने से, चाय-पानी पी कर सिगरेट फ़ूंकने से नहीं होगी यह समस्या हल ,समझे । घर तुम्हारा है , मैदान मे जाकर लड़ो , नायक बन कर दिखाओ , झोंक दो पूरी ताकत और जीत कर आओ । फ़िरभले ही कुछ समय धूंए के छ्ल्ले उड़ाओ ,हम कुछ नही कहेंगे । फ़र्ज तो निभाओ वीरों !!!
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नक्सली समस्या
जुलाई 01, 2010
नक्सलियों ने तीन ग्रामीण जनों की हत्या की
सी आर पी एफ के २७ जवानों की ह्त्या का दर्द अभी कम नहीं हो पाया था कि नारायणपुर से लगे ग्राम इडका के तीन लोगों का गला रेत कर उनकी निर्मम हत्या कर दी नक्सलियों ने | लगातार दुसरे दिन भी हैवानियत का एक और काम कर दिखाया है ,नक्सलियों ने | यह घटना ३० जून की है | नक्सलियों ने इन तीनों को पुलिस का मुखबिर कहा और बड़ी दरिंदगी के साथ सरेआम इनकी ह्त्या कर दी | लाश गाँव में ही फेंक कर चले गए | इस घटना से गाँव में दहशत का माहौल है | प्रशासन मौन है | रात में ही नक्सलियों ने कांकेर के उदनपुर स्थित बी एस एफ़ के कैम्प पर भी फ़ायरिंग की ,फ़ोर्स ने जवाबी हमला किया ,किसको कितना नुक्शान हुआ अभी तक पता नहीं चल पाया है । नक्सली वारदातें लगातार जारी हैं ।
लगातार दिल देने वाली घटनाओं को अंजाम दे रहे नक्सलियों के होसले काफी बुलंद देख रहे हैं | उनकी हैवानियत बढती ही जा रही है | एक दिन पहले सी आर पी एफ के जिन जवानों की ह्त्या की गी थी , नक्सलियों ने उनके शवों को भी क्षत -विक्षप्त किया था , उनका गला रेतने और अंग भंग करने जैसा वीभत्स कृत्य किया था |
देश के विभिन्न भागों में बीते पाँच सालों के दौरान नक्सली हिंसा में लगभग १० हजार ५०० लोगों की जानें गईं हैं | आम लोगों और सुरक्षाकर्मियों की जान ली गईं हैं | हाल के दिनों में नक्सल प्रभावित इलाकों में भाकपा (माओवादी) की गतिविधियों में आई तेजी से आम आदमी भी गंभीर रूप से चिंतित है।
देश के विभिन्न भागों में बीते पाँच सालों के दौरान नक्सली हिंसा में लगभग १० हजार ५०० लोगों की जानें गईं हैं | आम लोगों और सुरक्षाकर्मियों की जान ली गईं हैं | हाल के दिनों में नक्सल प्रभावित इलाकों में भाकपा (माओवादी) की गतिविधियों में आई तेजी से आम आदमी भी गंभीर रूप से चिंतित है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों की बात को सही माने तो अकेले 2009 में ही लगभग 2375 लोगों के नक्सलियों के हाथ मारे जाने की खबर है, जबकि 2008 में 1770 लोग नक्सलियों का शिकार बने थे। इस साल जनवरी से जून के बीच 450 से अधिक लोग नक्सली हमलों की भेंट चढ़ चुके हैं ।
सूत्रों ने कहा कि केंद्र सरकार भी नक्सली हमलों में आई तेजी से काफी चिन्तित है और इससे निपटने के लिए व्यापक रूपरेखा तैयार की जा रही है। गृह मंत्रालय ने दंतेवाड़ा हमले के बाद नक्सल विरोधी अभियान के लिए सीआरपीएफ में ही चार नए विशिष्ट पदों का सृजन किया है।
ये तो हो गई दिल्ली की बात | ये आंकड़े भी सरकारी हैं |
छत्तीसगढ़ सरकार रोज नई रणनीति ही बना रही होती है | उसके अधिकारी राजधानी रायपुर में बैठ कर यह लड़ाई लड़ना चाहते हैं ,शायद | रोज मुख्यमंत्री को कुछ न कुछ समझा आते हैं |और हेलिकॉप्टर से बस्तर का दौरा पूरा कर आते हैं | शायद कुछ ऐसा ही है यहाँ इस समस्या का हल |
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नक्सली समस्या
जून 30, 2010
नक्सली आतंक और अधिकारियों के काहिलपन से शर्मसार है छत्तीसगढ़ , 27 जवान और हुए शहीद
रायपुर .30 जून . छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और गृह मंत्री ननकी राम कंवर ने रायपुर माना कैम्प में केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के उन शहीद जवानों को विनम्र श्रध्दांजलि अर्पित की, जो नारायणपुर जिले में धौड़ाई के पास कल नक्सलियों का मुकाबला करते हुए शहीद हो गए थे। श्रध्दांजलि कार्यक्रम में प्रदेश सरकार के अनेक मंत्री, विधायक तथा राज्य शासन और पुलिस और केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए।
शर्मनाक एवम बेहद खेदजनक विषय यह है कि करोड़ों रुपये फ़ूंक कर भी हमारा गुप्तचर विभाग क्या करता है किसी के भी समझ नहीं आता है । ऐसा शायद ही कभी हुआ हो हमारी इस सरकारी एजेंसी की खबर से किसी की जान बची हो । नक्सली समस्या से निबटते हुए एक ओर जहां जवान बस्तर के बीहड़ वनों में अपनी जान से हांथ धो रहे हैं वहीं दुसरी ओर आला अफ़सर राजधानी में बेशर्मी के साथ ए सी चला कर चैन की नींद सो रहे हैं । शर्म आनी चाहिए अधिकारियों को । पुलिस कब -कहां से आ जा रही है ,नक्सलियों को इसकी खबर हो जाती है और वो हमला करने में सफ़ल हो जाते हैं , लेकिन खुफ़िया तंत्र के नाम पर करोड़ो रुपये खर्च करने वाली हमारी पुलिस को यह भी नहीं मालुम हो पाता है सैकड़ों की संख्या में नक्सली कहां आ जा रहे हैं ,कितनी शर्मनाक बात है यह ?
कैंप से करीब साढ़े तीन किमी दूर महिमागावाड़ी के पास नक्सली घात लगाकर बैठे थे। पुलिस को संदेह है कि नक्सलियों को पहले ही भनक लग गई थी कि जवानों की एक टुकडी सुबह से रोड ओपनिंग के लिए निकली है जिस पर नक्सली दूर से नजर रखे हुए थे। रेंज में आते ही एके 47 जैसे हथियारों से लैस नक्सलियों ने उन पर बेहिसाब फायरिंग शुरू कर दी। बताया गया है कि ज्यादातर जवानों की मौतें नक्सलियों की तरफ से हुई पहली फायरिंग से ही हुईं। सीआरपीएफ और जिला पुलिस के जवानों ने भी जवाबी हमला किया। सीआरपीएफ के आईजी आरके दुआ ने बताया कि मुठभेड़ करीब ढाई घंटे तक चली। डीजीपी छत्तीसगढ़ विश्वरंजन ने इस मुठभेड़ में 26 जवानों के मारे जाने की पुष्टि कर दी है। घायलों में से चार की हालत चिंताजनक बताई जा रही है। घायलों को सड़क के रास्ते जगदलपुर के महारानी अस्पताल लाया गया।
लचर संचार व्यवस्था होने के कारण प्रशासन को हादसे की सूचना में देरी हुई। शाम तक सूचना थी कि मुठभेड़ में सीआरपीएफ के चार जवान घायल हुए हैं। रात करीब साढ़े आठ बजे स्थिती साफ हुई कि फायरिंग में काफी संख्या में जवान शहीद हुए हैं। घायलों को लाने के लिए वायुसेना का हेलिकॉप्टर भी भेजा गया था, लेकिन कुछ कारणों से वह घटनास्थल के पास नहीं उतर पाया।
मुख्यमंत्री ने बुलाई आपात बैठक
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने राज्य के नारायणपुर जिले में धौड़ाई के पास नक्सलियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले की तीव्र निंदा की है। डॉ. सिंह ने इस वारदात के दौरान नक्सलियों का मुकाबला करते हुए सुरक्षा बलों के अनेक जवानों की शहादत पर गहरा दु:ख व्यक्त किया है और शहीद जवानों के शोक संतप्त परिवारजनों के प्रति अपनी संवेदना प्रकट की है। मुख्यमंत्री ने घायल जवानों के जल्द स्वास्थ्य लाभ की कामना की है और अधिकारियों से कहा है कि उनका बेहतर से बेहतर इलाज सुनिश्चित किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा है कि नक्सलियों में इतना नैतिक साहस नहीं है कि वे हमारे बहादुर जवानों से आमने-सामने मुकाबला कर सके, इसलिए उन्होंने कायरता का परिचय देते हुए छुपकर वार किया है और हमारे वीर जवानों की हत्या की है। मानव अधिकारों में आस्था रखने वाले सभी शांतिप्रिय नागरिकों और संगठनों को हर प्रकार के वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर नक्सलियों की इस शर्मनाक हरकत की एक स्वर से निंदा करनी चाहिए। डॉ. रमन सिंह ने कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने आम जनता और सुरक्षा बलों के जांबाज जवानों के सहयोग से बस्तर संभाग सहित राज्य के अन्य नक्सल पीड़ित जिलों को भी नक्सल हिंसा और आतंक से मुक्त करने का संकल्प लिया है। हमारे जवानों का मनोबल बहुत ऊंचा है और वे पूरी दृढ़ता के साथ नक्सलियों का मुकाबला कर रहे हैं। डॉ. सिंह ने कहा कि आज की इस घटना में सुरक्षा बलों के जवानों ने बस्तर संभाग और नारायणपुर जिले की जनता को नक्सल आतंक से मुक्त करने के अभियान में अपने प्राणों की आहुति दी है। उनकी यह शहादत व्यर्थ नहीं जाएगी।
आपात बैठक
डॉ. रमन सिंह ने इस वारदात की जानकारी मिलते ही आज रात यहां अपने आवासीय कार्यालय में प्रदेश सरकार के गृह मंत्री ननकी राम कंवर, मुख्य सचिव पी. जॉय उम्मेन, गृह विभाग के प्रमुख सचिव एन.के. असवाल और पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की आपात बैठक लेकर स्थिति की पूरी जानकारी ली और उन्हें जरूरी दिशा-निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने इस घटना के बारे में केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम् से भी टेलीफोन पर विचार-विमर्श किया। श्री चिदम्बरम् ने भी घटना की तीव्र निदां की और जवानों की शहादत पर गहरा दु:ख प्रकट किया। चिदम्बरम् ने मुख्यमंत्री को छत्तीसगढ़ में नक्सल हिंसा से निपटने के लिए केन्द्र की ओर से निरन्तर सहयोग जारी रखने का भरोसा दिलाया।
वैसे तो यह खबर आज सभी अखबारों में प्रकाशित हो जायेगी , पर शायद इस अन्दाज में न हो पाए । मजबूर हैं हमारे साथी भी । यहां यह खबर हम अपने ब्लॉगर साथियों के लिए लिख रहें हैं वो भी रात को करीब जब सवा बज चुके हैं । निःसंदेह यह घटना निदंनीय है । कायराना है । लेकिन उनके बारे में क्या कहेंगे जिन्हें सम्हालने का जिम्मा मिला है और जो राजधानी की राजनीति से उबरना नहीं चाहते , पी एच क्यू से बाहर झांकना नहीं चाहते ? कौन कसेगा इन अधिकारियों पर सिकंजा ? ये जंगलों में जा कर क्यों काम नहीं करेंगे ? कब तक चलेगा ऐसा ही ?
अहम सवाल यह है कि आखिर और कब तक मारे जायेंगे जवान ? कब तक यूं ही जाती रहेगी हमारे जवानों की जानें ? और क्या देखना - दिखाना चाहती है ,केन्द्र और राज्य की सरकारें ?
अहम सवाल यह है कि आखिर और कब तक मारे जायेंगे जवान ? कब तक यूं ही जाती रहेगी हमारे जवानों की जानें ? और क्या देखना - दिखाना चाहती है ,केन्द्र और राज्य की सरकारें ?
अब तक की प्रमुख घटनायें _
- 08 मई 2010 को बारुदी सुरंग विस्फ़ोट , बीजापुर कोडेपाल में में 08 जवान शहीद
- 06 अप्रैल 2010 को बारुदी सुरंग विस्फ़ोट और मुठ्भेड, ताड़मेटला में 76 जवान शहीद
- 12 जुलाई 2009 को मदनवाड़ा राजनांदगांव में सीधा हमला कर पुलिस अधीक्षक (एस पी) वी के चौबे समेत 29 पुलिस कर्मी शहीद हुए ।
- 20 जून 2009 को कोकावाड़ा तोंगपाल में बारूदी सुरंग विस्फ़ोट , 09 जवान शहीद
- जवाबों मई को रिसगांव धमतरी में हमला किया ,13 जवान शहीद अनेक घायल
- 10 अप्रैल 2009 को जगरगुण्ड़ा चिन्तागुफ़ा में पुलिस से मुठभेड़ हुई 09 जवान शहीद हुए
- 25 नवम्बर 2008 को मर्दापाल में बारुदी सुरंग विस्फ़ोट 06 जवान शहीद हुए
- 20 अक्टूबर 2008 को बीजापुर कोंगुपल्ली में बारुदी सुरंग विस्फ़ोट ,12 जवान शहीद
- 29 सितम्बर 2008 को मारीकोडेर में बारुदी सुरंग विस्फ़ोट में 04 जवान शहीद
- 29 अगस्त 2008 को छेरीबेडा बेनूर में बारुदी सुरंग विस्फ़ोट ,06 जवान शहीद
- 18 मार्च 2008 को धरमावरम पामेड में मुठभेड़ हुई 17 नक्सली मारे गए थे
- 18 फ़रवरी 2008 को तड्केल में मुठभेड़ हुई 06 जवान शहीद हो गए थे
- 09 जुलाई 2008 जगरगुण्डा उपलमेटा में मुठभेड़ हुई 24 जवान शहीद हो गए थे
- 15 मार्च 2007 को रानी बोदली कुटरू में पुलिस के कैम्प पर हमला किया गया 55 जवान शहीद,18 घायल
- 18 जुन 2006 को बन्डा कोंटा में बारुदी सुरंग विस्फ़ोट कर 04 जवानों को शहीद किया
- इसी माह (जून 2006) में नक्सलियों ने दंतेवाडा के एर्राबोर राहत शिविर में हमला कर 33 आदिवासियों की निर्मम हत्या की
- नक्सलियों द्गारा मारे गये एस पी ओ , गला रेत कर मारे गये बेकसूर ग्रामीण जनों की संख्या हजारों में बताई जाती है ।
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