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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस

रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा   :  मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस
रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।

मार्च 31, 2011

कम नहीं हुआ कन्या भ्रुण हत्या का मामला : शर्मसार हुआ देश




 जनगणना आयुक्त सी चंद्रमौली ने भारत की 15वीं जनगणना के आंकड़े जारी किये। इन आंकड़ो के अनुसार भारत की कुल आबादी एक अरब इक्कीस करोड़ पर पहुंच गयी है।  पिछले 10 सालो में भारत की आबादी 18 करोड़ बढी है।  देश में महिलाओ की कुल आबादी 58 करोड़ है।  यानि कि पिछले 10 सालो में 9 करोड़ महिलाओं की आबादी बढी है जबकि पुरुषों की कुल आबादी 62 करोड़ है। और पुरुषो की आबादी 17 फीसदी और महिलाओ की आबादी में 18 फीसदी की वृद्धि हुई है।
इस जनगणना का एक सबसे निराशाजनक तथ्य सामने आया है कि लिंग अनुपात में महिलाओं की संख्या में और कमी आई है। प्रति हजार पुरुषो के अनुपात में महिलाओ की संख्या 927 से घटकर 914 हो गई है। इतना ही नहीं गर्भ में भी लड़कियों की हत्या के मामलों मे बढ़ोत्तरी हुई है।
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक पुरुषों की आबादी 17 फीसदी बढ़ी है। वही महिलाओं की आबादी 18 फीसदी बढी है। 6 साल तक के बच्चो की संख्या घटी है। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की साक्षरता दर बढ़ी है।
15वीं जनगणना से प्राप्त आंकड़ो के मुताबिक उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 21 करोड़ है। जबकि जनसंख्या के हिसाब से महाराष्ट्र दूसरे नंम्बर का राज्य बन गया है। देश का एक मात्र नागालैंड ऐसा राज्य है जिसकी जनसंख्या में कमी आयी है। ठाणे देश का सबसे अघिक आबादी वाला जिला उभरा है ।  यह तो अच्छा है कि लड़कियाँ अब शिक्षा के क्षेत्र में लड़कों से आगे आ रही हैं । साक्षरता दर में भी  अब लड़कियों ने बाजी मारी है । पुरुष साक्षरता दर 38.82  %  है , वहीं महिलाओं की साक्षरता दर 49.10 % है । युवा महिलाओं की संख्या में भी पुरुषों की तूलना में इजाफ़ा हुआ है । यह संख्या प्रति हजार युवा पुरुषों पर पहले  933  थी जो अब बढ़ कर  940  हो गई है ।

मार्च 28, 2011

भारत में बाघों की संख्या बढ़ी




भारत में  बाघों (टाइगर्स) की संख्या 295 बढ़ गई है। दुनिया के सबसे ज्यादा बाघ भारत में ही रहते हैं लेकिन उनके अस्तित्व पर बराबर खतरा मंडरा रहा है. ऐसे में बाघ की आबादी के ताजा आंकड़े निःसंदेह खुश करने वाले हैं , अब भारत में बाघों की संख्या बढ़ कर 1706 हो गई है ।

पिछले साल हुई इस गणना के दौरान भारत में बाघों की संख्या 1,706 बताई गई है जो 2006 में 1,411 थी. नई दिल्ली में अधिकारियों ने बताया कि बाघों की संख्या में वद्धि की वजह सही तरह से उनकी गिनती करना है. सरकार की तरफ से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट टाइगर के राजेश गोपाल ने कहा, "हमने अपनी गिनती का दायरा पूरे भारत तक बढ़ा दिया है और हमारा अनुमान पहले से कहीं ज्यादा सही है."

दुनिया के लगभग आधे बाघ भारत में रहते हैं , लेकिन उनकी संख्या तेजी से घट रही है।
 टाइगरों की इस गणना में सुंदरवन जैसे इलाकों में भी सघन रूप से गिनती की गई। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में फैले इस इलाके को खासा दुर्गम माना जाता है। सरकार की ओर से उनके संरक्षण के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रम में इस बात की पूरी कोशिश की गई है कि इस खूबसूरत जानवर को लुप्त होने से रोका जाए।

2002 में भारत में बाघों की संख्या 3,700 थी जबकि बात अगर 1947 की करें तो यह संख्या 40 हजार के आसपास थी। पूरे एशिया में अधिकारी बाघ के शिकार को रोकने की कोशिशों में जुटे हैं। जंगलों को काटे जाने से भी बाघों के बसेरे सिमट रहे हैं। यह भी उनकी घटती संख्या की वजह मानी जाती है।



मार्च 17, 2011

"गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा…"


साथी और भाई संजीत त्रिपाठी की सलाह है कि मैं,पत्रकारिता के अपने अनुभव "खबरों की दुनियाँ" में शेयर करुं । कोशिश होगी कि वर्तमान समय जो बदलाव आया या आ रहा है उसे दृष्टिगत कर अपने अनुभव आप तक इस माध्यम से पहुंचा सकूं ।पिछ्ड़ा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ , पत्रकारिता के क्षेत्र में समृद्ध रहा है । ज्यादा पुरानी बात नहीं करता 1985 से आज तक की बातें करें तो इस क्षेत्र में "मूल्यों" का बड़ा परिवर्तन आया है ।यहाँ मेरे कहने का यह मतलब कतई न निकाला जाए कि अब कहीं मूल्यवान पत्रकारिता नहीं हो रही है या फ़िर आज के साथी यह समझने की भूल कर बैठें कि वे मूल्यवान पत्रकारिता नहीं कर रहे हैं और पुराने लोग बड़े आदर्शवादी थे । यहाँ मैं उन हालातों की चर्चा करने की चेष्टा करुंगा जिन्होंने पत्रकारिता के मूल्य बदले हैं और आज जिन वजहों से पत्रकारिता से जुड़े कलम के सच्चे सिपाही भी जन सामान्य को पत्रकारिता पर सरेराह टिप्पणी करते , कुछ भी कहते-बोलते सुनते रहते हैं ।
सन 1990 का दौर था एक बड़े पत्र ने रायपुर की धरती पर अपनी नींव रखनी शुरु की थी । सही मायने मे यही वह काल खण्ड था जहाँ से बदलाव की बयार बहुत धीरे-धीरे ही सही ,लेकिन बहना शुरु हो गई थी । स्थापित दो बड़े अखबारों के दिल की धड़कनें बढ़ गईं थीं । इससे पहले तक "प्रतिस्पर्धा" धीमी थी और मान-मर्यादा , लोक लिहाज से मानो डरती थी । रिपोर्टिंग की ही बात की जाय तो उन दिनों किसी भी घटना की रिपोर्ट और उसका फ़ालोअप , नतीजे तक पहुंचने तक करना पत्र की मानो एक जिम्मेदारी होती थी  , दूसरा पत्र भी समर्थन की दिशा में काम करता था । किसी भी तरह का दबाव सोचना भी मानो पाप जैसा था , तब लोग ऐसा पाप करना तो दूर सोचने से भी डरते थे । कहने का सीधा सा मतलब कि समाचार पत्रों का दबाव था अपराधी ही नहीं तत्कालीन शासन-प्रशासन भी डरता था कि उससे कहीं कोई बड़ी गलती न हो जाय , वर्ना खैर नहीं । पत्र समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से भलिभाँति वाकिफ़ ही नहीं थे बल्कि सतत उसका निर्वहन भी करते थे।  पत्र-पत्रकारों की राय-सुमारी केवल सामाजिक संगठन ही नहीं , नेता और शासन-प्रशासन के लोग भी मानते थे , क्रियान्वित करते थे । मायाराम जी सुरजन , मधुकर खेर जी , बबन प्रसाद जी मिश्र , राजनारायण मिश्रा जी  'दा' , कुमार साहू जी , गिरिजा शंकर जी अग्रवाल , रम्मू शीवास्तव जी, सतेन्द्र गुमाश्ता जी ,  रामाश्रय उपाध्याय जी , बसंत तिवारी जी , नीरव जी , अनल शुक्ल जी , नरेन्द्र पारख जी , निर्भीक वर्मा जी  और इनके बाद एम ए जोसेफ़ , आसिफ़ इकबाल , सुरेश तिवारी  जैसे और बहुत सारे ऐसे नाम हैं जो पत्रकारिता करते हुए समाज हित को सर्वोपरि रखते रहे हैं । हमें सौभाग्य से ऐसे लोगों के मार्ग दर्शन में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ । समय ने करवट ली नया राज्य बना छत्तीसगढ़  राजधानी में हर बड़े पत्र - पत्रिकाओं के स्टेट ब्यूरो आए , पत्रकारिता को नई दिशा मिली , रायपुर ने भी जाना क्या होती है  ' पेड न्यूज ' । उन दिनों मैं दैनिक भास्कर में था । प्रदेश में पहली मर्तबा विधान सभा का चुनाव का समय आ गया था , मुझे और मेरे जैसे तमाम लोगों को बताया गया कि किस पार्टी की न्यूज कैसी और क्यूं लगेगी और किसकी नहीं लगेगी । चुनावी पैकेज कैसा होता है यह भी उम्मीदवारों को हमें ही समझाने को कहा गया , मेरे मना करने पर मुझे काम से हटाने की बात समझाई गयी , बाद में मेरे आग्रह पर यह काम मेरे कार्यक्षेत्र में प्रेस के उच्च पदस्थ व्यक्ति ने आ कर पैकेज डील किया प्रेस के लिए । कुछ दिनों बाद मैं कार्यमुक्त हो गया था । फ़िर मैंने रायपुर मे ही जहाँ भी नौकरी की यही तकलीफ़ आई , दरअसल मैं था संपादकीय विभाग का आदमी , मुख्य रूप से सिटी रिपोर्टर रहा , विशेष संवाददाता रहा , प्रेस प्रबंधन चाहता था मैं और मेरे साथी विज्ञापन और प्रसार का भी काम देंखें , पेपर के लिए जमीन दिलाने , सरकारी मामले -मुकदमें निपटाने का भी काम बखूबी करें जो हम नहीं करना चाहते थे । हम गुलदस्ता हाँथों में लेकर किसी मंत्री या अधिकारी के  घर - दफ़्तर के बाहर नहीं खडे होना सीख पाए थे , हमारे अग्रजों ने हमें यह नहीं सिखाया था , सो हमारे जैसे सभी लोग फ़ेल हो गये ऐसा कर पाने में और आज सब प्रेस से बाहर अपना अपना छोटा छोटा काम जो पत्रकारिता से जुडा है कर रहे हैं । हाँ 1993-94 में रायपुर से प्रकाशित पहले रंगीन दैनिक अखबार समवेत शिखर में काम करते हुए उस अखबार के लिए , तत्कालीन कलेक्टर देवराज विरदी जी से अच्छे संबंधों के चलते रजबंधा मैदान जो आज प्रेस कॉम्प्लेक्स के नाम से जाना जाता है  , वहाँ पर 44000 वर्गफ़ुट(एक एकड़) जगह उस प्रेस को एक रुपये वर्गफ़ुट के हिसाब से दिलवाने का काम जरूर किया था , इस जगह को उस समय रौद्रमुखी पत्र के लिए लेने का प्रयास किया जा रहा था लेकिन यह जगह हमें मिल गई थी । आज वहाँ नवनिर्मित कॉम्प्लेक्स बन कर तैयार है । हम तब और अब भी ऐसे कामों से अपना नफ़ा - नुकसान नहीं समझ पाए । लेकिन आज हालात किसी से छिपे नहीं हैं । हमको ही सोचना होगा हम जाने अनजाने में क्या कर रहें हैं । जहाँ कभी प्रेस की बिल्डिंग देखी थी लोगों ने उसी जगह पर विशाल शॉपिंग मॉल खड़े हो रहे हैं । लोग अब सरेराह इनपर छींटा कसी कर रहे हैं , जो इस शहर में कभी खरा - खरा लिखने के नाम से जाने जाते थे उन्हें भी सरकार से पद चाहिए , वह भी चुप बैठने को सशर्त तैयार देखे जा सकते हैं ।  साथी पत्रकार जिन्होने समय के साथ करवट बदली - उन मूल्यों को तिलांजलि दी जो कभी बेहद मूल्यवान हुआ करते थे और वे आज करोड़ों रुपयों बेशुमार दौलत के मालिक हैं जमीन के कारोबार में जुड़े तमाम लोगों के बेहद हित चिंतक हैं । यह है पत्रकारिता का नया स्वरूप । पहले कभी जिन मूल्यों की कदर थी वह मुल्य अब बेकद्री के शिकार हैं , नये मूल्य स्थापित हो गये जिन्हें रिक्शा चलाने वाला भी समझता है कि इस मूल्य से बोटल आती है  , ऐसे मूल्य आज हुए हैं यहाँ मूल्यवान । छत्तीसगढ़ में तो मानो मौका भी है और दस्तूर भी कि दोनो हाँथों से लूट लो , ऐसा मौका फ़िर कहाँ मिलेगा ? फ़िर यह भी तो सही है न कि गुजरा हुआ जमाना आता नहीं दोबारा… सच ही है सब लूटो - खावो में लगे हैं इस अमीर धरती को और उसके गरीब लोगों को। मुबारक हो ।

मार्च 09, 2011

जानिए होली को उसके समूचे स्वरूप में






होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय त्योहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। रंगों का त्योहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुरड्डी, धुलेंडी, धुरखेल या धूलिवंदन कहा जाता है, लोग एक दूसरे पर रंग, अबीर-गुलाल इत्यादि फेंकते हैं, ढोल बजा कर होली के गीत गाये जाते हैं, और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भूल कर गले मिलते हैं और फिर से दोस्त बन जाते हैं। एक दूसरे को रंगने और गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है। इसके बाद स्नान कर के विश्राम करने के बाद नए कपड़े पहन कर शाम को लोग एक दूसरे के घर मिलने जाते हैं, गले मिलते हैं और मिठाइयाँ खिलाते हैं।
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही, पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। होली का त्योहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। इस दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा छा जाती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से परिपूर्ण हो जाते हैं। खेतों में गेहूँ की बालियाँ इठलाने लगती हैं। किसानों का ह्रदय ख़ुशी से नाच उठता है। बच्चे-बूढ़े सभी व्यक्ति सब कुछ संकोच और रूढ़ियाँ भूलकर ढोलक-झाँझ-मंजीरों की धुन के साथ नृत्य-संगीत व रंगों में डूब जाते हैं। चारों तरफ़ रंगों की फुहार फूट पड़ती है।

इतिहास

होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या होलाका नाम से मनाया जाता था। वसंत की ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा गया है।


राधा-श्याम गोप और गोपियो की होली

इतिहासकारों का मानना है कि आर्यों में भी इस पर्व का प्रचलन था लेकिन अधिकतर यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र। नारद पुराण औऱ भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से ३०० वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।
सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के किस्से उत्सुकता जगाने वाले हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय के एक चित्र में जहाँगीर को होली खेलते हुए दिखाया गया है । शाहजहाँ के समय तक होली खेलने का मुग़लिया अंदाज़ ही बदल गया था। इतिहास में वर्णन है कि शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध है कि होली पर उनके मंत्री उन्हें रंग लगाने जाया करते थे। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में दर्शित कृष्ण की लीलाओं में भी होली का विस्तृत वर्णन मिलता है।
इसके अतिरिक्त प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर इस उत्सव के चित्र मिलते हैं। विजयनगर की राजधानी हंपी के १६वी शताब्दी के एक चित्रफलक पर होली का आनंददायक चित्र उकेरा गया है। इस चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ राज दम्पत्ति को होली के रंग में रंगते हुए दिखाया गया है। १६वी शताब्दी की अहमदनगर की एक चित्र आकृति का विषय वसंत रागिनी ही है। इस चित्र में राजपरिवार के एक दंपत्ति को बगीचे में झूला झूलते हुए दिखाया गया है। साथ में अनेक सेविकाएँ नृत्य-गीत व रंग खेलने में व्यस्त हैं। वे एक दूसरे पर पिचकारियों से रंग डाल रहे हैं। मध्यकालीन भारतीय मंदिरों के भित्तिचित्रों और आकृतियों में होली के सजीव चित्र देखे जा सकते हैं। उदाहरण के लिए इसमें १७वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ चित्रित किया गया है। शासक कुछ लोगों को उपहार दे रहे हैं, नृत्यांगना नृत्य कर रही हैं और इस सबके मध्य रंग का एक कुंड रखा हुआ है। बूंदी से प्राप्त एक लघुचित्र में राजा को हाथीदाँत के सिंहासन पर बैठा दिखाया गया है जिसके गालों पर महिलाएँ गुलाल मल रही हैं।

 होली की कहानियाँ


भगवान नृसिंह द्वारा हिरण्यकशिपु का वध
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है।कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था ।

परंपराएँ

होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं, और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी। । वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में व्याप्त था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।


होलिका दहन

होली का पहला काम झंडा या डंडा गाड़ना होता है। इसे किसी सार्वजनिक स्थल या घर के आहाते में गाड़ा जाता है। इसके पास ही होलिका की अग्नि इकट्ठी की जाती है। होली से काफ़ी दिन पहले से ही यह सब तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। पर्व का पहला दिन होलिका दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होली जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं। होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए। लकड़ियों व उपलों से बनी इस होली का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होली का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है। होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा नाचते हैं।


सार्वजनिक होली मिलन

होली से अगला दिन धूलिवंदन कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं। सारा समाज होली के रंग में रंगकर एक-सा बन जाता है। रंग खेलने के बाद देर दोपहर तक लोग नहाते हैं और शाम को नए वस्त्र पहनकर सबसे मिलने जाते हैं। प्रीति भोज तथा गाने-बजाने के कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
होली के दिन घरों में खीर, पूरी और पूड़े आदि विभिन्न व्यंजन पकाए जाते हैं। इस अवसर पर अनेक मिठाइयाँ बनाई जाती हैं जिनमें गुझियों का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बेसन के सेव और दहीबड़े भी सामान्य रूप से उत्तर प्रदेश में रहने वाले हर परिवार में बनाए व खिलाए जाते हैं। कांजी, भांग और ठंडाई इस पर्व के विशेष पेय होते हैं। पर ये कुछ ही लोगों को भाते हैं। इस अवसर पर उत्तरी भारत के प्रायः सभी राज्यों के सरकारी कार्यालयों में अवकाश रहता है, पर दक्षिण भारत में उतना लोकप्रिय न होने की वज़ह से इस दिन सरकारी संस्थानों में अवकाश नहीं रहता ।

 देश विदेश की होली

भारत में होली का उत्सव अलग-अलग प्रदेशों में भिन्नता के साथ मनाया जाता है। ब्रज की होली आज भी सारे देश के आकर्षण का बिंदु होती है। बरसाने की लठमार होली काफ़ी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। इसी प्रकार मथुरा और वृंदावन में भी १५ दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले शुरू हो जाता है। हरियाणा की धुलंडी में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने की प्रथा है। बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जलूस निकलते हैं और गाना बजाना भी साथ रहता है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला में सिक्खों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है। तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोतसव है जबकि मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है। दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है, छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया , जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग दिखाई देता है। इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में अलग अलग प्रकार से होली के श्रृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।

साहित्य में होली

प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में 'रंग' नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ऋतुसंहार में पूरा एक सर्ग ही 'वसन्तोत्सव' को अर्पित है। भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है। आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर , जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचुर रचनाएँ की हैं। इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है। सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं। आधुनिक हिंदी कहानियों प्रेमचंद की राजा हरदोल, प्रभु जोशी की अलग अलग तीलियाँ, तेजेंद्र शर्मा की एक बार फिर होली, ओम प्रकाश अवस्थी की होली मंगलमय हो तथा स्वदेश राणा की हो ली में होली के अलग अलग रूप देखने को मिलते हैं। भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सव, यश चोपड़ा की सिलसिला, वी शांताराम की झनक झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं।

संगीत में होली


भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हाँलाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे चलो गुंइयां आज खेलें होरी कन्हैया घर आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं। होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली हैं, जिसमें अलग अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहां ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में। राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर गाई जाने वाली होली का विशेष रंग है। उनकी एक प्रसिद्ध होली है आज रंग है री मन रंग है,अपने महबूब के घर रंग है री। इसी प्रकार शंकर जी से संबंधित एक होली में दिगंबर खेले मसाने में होली कह कर शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता हैं। भारतीय फिल्मों में भी अलग अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किये गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। 'सिलसिला' के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और 'नवरंग' के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।
आधुनिकता का रंग

होली रंगों का त्योहार है, हँसी-खुशी का त्योहार है, लेकिन होली के भी अनेक रूप देखने को मिलते है। प्राकृतिक रंगों के स्थान पर रासायनिक रंगों का प्रचलन, भांग-ठंडाई की जगह नशेबाजी और लोक संगीत की जगह फ़िल्मी गानों का प्रचलन इसके कुछ आधुनिक रूप हैं। लेकिन इससे होली पर गाए-बजाए जाने वाले ढोल, मंजीरों, फाग, धमार, चैती और ठुमरी की शान में कमी नहीं आती। अनेक लोग ऐसे हैं जो पारंपरिक संगीत की समझ रखते हैं और पर्यावरण के प्रति सचेत हैं। इस प्रकार के लोग और संस्थाएँ चंदन, गुलाबजल, टेसू के फूलों से बना हुआ रंग तथा प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परंपरा को बनाए हुए हैं, साथ ही इसके विकास में महत्वपूर्ण योगदान भी दे रहे हैं। रासायनिक रंगों के कुप्रभावों की जानकारी होने के बाद बहुत से लोग स्वयं ही प्राकृतिक रंगों की ओर लौट रहे हैं। होली की लोकप्रियता का विकसित होता हुआ अंतर्राष्ट्रीय रूप भी आकार लेने लगा है। बाज़ार में इसकी उपयोगिता का अंदाज़ इस साल होली के अवसर पर एक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान केन्ज़ोआमूर द्वारा जारी किए गए नए इत्र होली है से लगाया जा सकता है।

मार्च 06, 2011

होली खेलने से पहले पत्रिका की यह खबर पढ़िए …

                                                                                                           
                                                                              


फ़रवरी 25, 2011

बदतमीजी और बेशर्मी की राजनीति से पीड़ित है समूचा देश




कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह कहते हैं बाबा रामदेव को राजनैतिक बातें नहीं करनी चाहिए , राजनीति करना ही है तो वे एक राजनैतिक पार्टी बनाना चाहते हैं , बना कर  मैदान में आएं राजनीति में आएं फ़िर उनका मुकाबला करेंगे , उनकी बातों का जवाब दिया जायेगा … आदि आदि । मैं बाबा रामदेव का या दिग्विजय सिंह का ना तो समर्थक हूँ और ना ही विरोधी , पर दिग्विजय सिंह की बात मुझे गैर वाजिब लगी - अप्रजातांत्रिक लगी ,इसलिए मजबूर हुआ हूँ यहाँ कुछ लिखने को । कमोवेश  बदतमीजी और बेशर्मी की राजनीति से पीड़ित है समूचा देश ।
क्या मैं दिग्विजय सिंह जी से यह जान सकता हूँ कि उन्हें ऐसा कहने का यह अधिकार कौन सा संविधान देता है ? क्या भारत का कोई नागरिक राजनीति की बातें कहने के लिए किसी दल में हो , यह जरूरी है ? कहाँ लिखा है ऐसा कोई नियम या कानून बताईये ? आपका बाबा रामदेव से वाद-विवाद चल रहा है इसका यह मतलब तो नहीं है कि आप जो आपके मन में आए कह दें ? काला धन विवाद का विषय है - वह चाहे राजनीतिक लोगों के पास हो , बड़े औद्योगिक घरानों के पास हो या फ़िर बाबा रामदेव या कोई और बाबा , संत , प्रवचनकारों के पास हो सब गलत है ,इसकी जाँच ही होनी चाहिए , बल्कि तत्काल प्रभाव से ऐसे चोरों को सजा दी जानी चाहिए । क्यों डरती है सरकारें ऐसी कार्यवाहियाँ करने से ? क्यों सालों साल से ऐसे बड़े और आर्थिक अपराधियों को संरक्षण देतीं है भारत सरकार ? इसका जबाव सीधे सीधे देना छोड़ कर बेकार की बकवास कर रहें हैं नेता गण ।  मैं पूछना चाहता हूँ कि क्यों बनने देते हैं काले धन से किसी भी बाबा का आश्रम ? जब कहीं भी काला धन लग रह होता है तब क्या करता रहता है शासन - प्रशासन ? जिसे जनता की गाड़ी कमाई का करोड़ो - अरबों रूपया सिर्फ़ कानून - व्यवस्था को समय पर लागू करने के लिए हर माह बतौर वेतन - भत्ता  और सुविधाओं के रूप में दिया जाता है ? शर्म नहीं आती देश के कर्णधार बनने वालों को चोरी और सीना जोरी करते हुए ? अरे सा… कब तक सहेगी इस देश की जनता तुमको ? चोरी तुम करो , झूठ तुम बोलो , मक्कारी तुम करो , हत्याएं तुम करो , बलात्कार तुम करो , जनता के पैसों पर ऐय्याशियाँ तुम करो , काला धन देश के बाहर जमा कर देश द्रोह तुम करों , सत्ता पर कब्जा तुम करो , देश में जाति - धर्म , संप्रदाय को भड़का कर दंगा - फ़साद तुम करवाओ । देश को जगह जगह गिरवी रखते तुम घूमों , रक्षा सौदों  में दलाली तुम खा जाओ । अमेरिका के हाँथो अपनी देश की जनता का भविष्य तुम बेच ड़ालो - तमाम गुप्त समझौते तुम करो , हवाला काण्ड तुम करो , शक्कर - तेल के माफ़िया तुम बनो , क्या नहीं कर रहे हो तुम ? और जब कोई तुम्हें आईना दिखाए तो उसे भला - बुरा कहो । क्या यही है तुम्हारा राष्ट्रीय चरित्र ? शर्म करो यार - शर्म करो , सुधरो अति हो गई है , बड़े बड़े राजे - महाराजे , तानाशाह नहीं टिक पाए , तुम  क्या चीज हो सुधरो । भगवान से डरो । जनता से डरो  जो बेकारी - भुखमरी और तमाम तरह की बदहाली के बाद भी तुमको झेल रही है , कुछ कर नहीं रही है तुम्हारा … लेकिन कब तक ? पानी सर से ऊपर जाता जा रहा है ।      

फ़रवरी 21, 2011

छतीसगढ़ संदर्भ - 2011




प्रदेश का मौजूदा स्वरूप चिंता जनक है । यह प्रदेश के लोगों का मानना है लेकिन सरकार बड़ी
ही सहजता से इसे इंकार करती है । 18 जिलों वाले इस राज्य के सत्रह जिलों में नक्सलियों का
सिकंजा कसा हुआ है - अच्छा नेटवर्क है , यह स्वंय प्रदेश सरकार कहती है , कब ? जब
प्रदेश के मुख्यमंत्री , मुख्य सचिव , गृह सचिव और ऐसे ही महत्वपूर्ण पदों की शोभा बढ़ाने
वाले नेता और अधिकारी नई दिल्ली में प्रधान मंत्री , गृह मंत्री की बैठकों में पैसा और पैकेज
मांगने के लिए बोलते हैं । इन्हें प्रदेश के हर थाना क्षेत्र की सुरक्षा के लिए केंद्र से 200करोड़
रुपया चाहिए । राजनीति शास्त्र कहता है - " राज्य एक लोकतांत्रिक संस्था है। " लेकिन हमारे
राज्य में आकर देखिए तो एहसास होगा यह एक वर्ग विशेष की बेहद नीजि सी संस्था है ।
 यहाँ अमीरी और गरीबी की खाई बेहद तेजी से बढ़ रही है । गरीबों की जमीनें धनवानों को
और अधिक धनवान बना रहीं हैं , वहीं गरीबों को न केवल गरीब वरन  आगे चल कर
भूमिहीन और निकम्मा बनाने की बहुत ही सोची-समझी साजिश का आसान शिकार बना रहीं है
। सबका मुंह बंद रखने के लिए निम्न आय वर्ग के लिए सस्ता चांवल देकर । ऐसा होने से
ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों में काम के प्रति उदासीनता बढ़ी देखी जा रही है , खतरा उनकी अगली
पीढ़ी को ज्यादा दिखता है , सरकार इसे अपनी सफ़लता बताने करोड़ों रूपयों के विज्ञापन देश
भर में छपवा कर एक तीर से दो निशाने कर रही है , अखबार भी खुश हैं कि उन्हें अच्छा
बिजनेस मिल रहा हैं छत्तीसगढ़ से और इसी बीच सरकार से जुड़े कथिपत लोग अपना उल्लू
सीधा करने में मस्त हैं । इन्हें मालूम है कि सदा चलने वाली योजना नहीं है यह , जब तक
चल रही तब तक निम्न आय वर्ग की जनता इस एक छोटे से ही सही मगर स्वार्थवश उनके
(सरकार) साथ है , विरोध नहीं करेगी , इस बीच जो करना है कर गुजरो कौन सा जीवन भर
सत्ता सुख भोगा है कोई , लेकिन आज जब मौका है तब तो पीढ़ियों के कमाया ही जा सकता है
।  कोई भी यदि इस ओर ध्यान दिलाना चाहे तो शासन - प्रशासन में बैठे सूरमा आक्रामक हो
उठते हैं जबकि नीति कहती है कि राज्य के संचालन से जुड़े इस वर्ग को आक्रामक होने का
अधिकार नहीं है । जिन शोषकों के विरूद्ध राज्य को आक्रामक होना चाहिए , उनके प्रति उनका
नम्र और अपनेपन का व्यवहार देखते ही बनता है । राज्य की  -  गरीब किसानों  की स्थाई
संपत्तियों का हस्तानांतरण इस बात के दस्तावेजी साक्ष्य हैं - ऐतिहासिक गवाही बन पड़े हैं ।
 बेहद ही अफ़सोस के साथ यहाँ यह कहना पड़ रहा है कि यह राज्य अपने निर्माण काल से
अब तक बीते दस वर्षों में अपने यहाँ ऐसा वातावरण तैयार करने में पूर्णतः असफ़ल रहा है
जिससे कि राज्य में अपराध को रोका - नियंत्रित किया जा सके । उल्टे रसूकदार अपराधियों
को पकड़ने वालों को सजा मिलती है यहाँ , ए एस पी शशिमोहन इसका जीवंत उदाहरण हैं ,
जिन्होने दूसरा कारण बना कर दो साल की छुट्टी पर रहना ,नौकरी करने से कहीं ज्यादा सही
समझा और किया । अच्छा होता यदि यहाँ लोकतांत्रिक प्रणाली को इतना कुशल बनाया जाता
जिसके सहारे अपराध पर अंकुश लगाने में मदद मिल सके ,लेकिन ऐसा होने नहीं दिया गया ,
क्योंकि अपराध में इनके ही लोग जो शामिल हो गये । यहाँ झूठ और मक्कारी की मदद से
आर्थिक अपराध ने अपनी खासी पैठ बना ली है ।
 संक्षेप में यह कहना गलत नहीं होगा कि शोषण के मामले में यहाँ किसी एक राजनीतिक दल
को दोषी नहीं ठहराया जा सकता , सभी के नेता जिन्हें जैसा मौका मिल रहा है दोनो हाँथों से
लूटने में लगे हैं , मौसेरे भाईयों की ही तरह  और जनता है कि ठगी सी बैठी खुद को लुटता
देख रही है । अराजकता का इससे ज्यादा शालीन स्वरूप शायद ही किसी देश - दुनियाँ मे
देखने - सुनने को मिले । जहाँ नदी , नाले , तालाब , पोखर , पहाड़ , बेश्कीमती हीरों की
खदानें , यूरेनियम से समृद्ध टिन की खदानें सब अंदर ही अंदर बिक रहीं हैं  वहीं नहीं बिक
रहा है तो कवर्धा के किसानों का गन्ना , प्रदेश के किसानों का अच्छा धान - ओन्हारी । कौन
है इन तमाम दुर्दशा का जिम्मेदार ? मैं कहुंगा प्रजातंत्र की आड़ लेकर किया जा रहा तानाशाही
का शासन ही है जिम्मेदार , जो अभी और बढ़ेगा , अति होगी , शायद तभी अंत आएगा ।
मगर  आज एक आम मध्यम वर्गीय व्यक्ति का जीवन दूभर हो चला है यहाँ । उच्च वर्ग पंच
मेवा की खीर खा रहा है - निम्न वर्ग चांवल - नमक और सस्ती शराब में खुश है । मध्यम
वर्ग को दो समय का खाना कमाना यहाँ दुष्कर हो रहा है । यह तो हाल है अमीर धरती के
गरीब लोगों का ।



फ़रवरी 14, 2011

मिस्र की जनता को मुबारक बाद


                                        मिस्र की जनता को   "गांधीगिरी" मुबारक 

अलविदा , होस्नी मुबारक
दुनिया भर से मिस्र की जनता को सराहा जा रहा है । उसकी एकजुटता जनित क्रांति की अप्रत्यासित सफलता पर बधाइयां - शुभकामनाएं मिल रही हैं । तहरीर चौक पर मिस्र की जनता ने एक तरह से सत्याग्रह के जरिए ही आंदोलन छेड़ा और जीत हासिल की। यह जनक्रांति इतनी जल्दी अपने उद्देश्य में सफ़ल साबित हो जाएगी, इसका अनुमान तो था , पर इतनी जल्दी , इसका अनुमान शायद किसी को भी नहीं रहा होगा । मिस्र में आए इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे इंटरनेट पर चलने वाली फेसबुक जैसी कई सोशल नेटवर्किंग साईट की भी बहुत अहम भूमिका रही। यही वजह थी कि आम जनता एक दूसरे के सीधे संपर्क में आकर सड़कों पर निकल आई। विश्व के राजनैतिक इतिहास में सत्ता परिवर्तन के लिए जितनी भी क्रांतियां हुई हैं, उनमें नेतृत्व व्यक्ति या दल आधारित रहा है। लेकिन मिस्र में मुबारक की तानाशाही के खिलाफ जनता का स्वत:स्फूर्त आंदोलन था। हांलाकि मुस्लिम ब्रदरहुड की अग्रणी भूमिका इस आंदोलन में रही । होस्नी मुबारक के लगातार 30 सालों के शासन के दौरान देश में जहां भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी , भूखमरी और गरीबी ने जहाँ पूरे मिस्र में पैर पसारा वहीं राष्ट्रपति मुबारक स्वयं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बनने में पूरी तरह सफल रहे । मुबारक के धन कुबेर होने का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे इस समय लगभग 70 अरब डालर की संपत्ति के स्वामी हैं।  तीन हफ्तों के संघर्ष के बाद यह प्रश्न अपनी जगह कायम है कि मिस्र में सत्ता की कमान कौन संभालेगा ? फिलहाल सेना इस भूमिका को निभा रही है। और उसने आश्वस्त किया है कि जल्द ही नागरिक सत्ता स्थापित की जाएगी।  अन्यथा पूर्व के अनुभव यह बताते हैं कि जब सेना के हाथों देश की सत्ता आती है, तो फिर सैन्य तानाशाही का रास्ता ही प्रशस्त होता है। मुबारक का बेटा, जिसे वे अपने बाद सत्ता सौंपने के इच्छुक थे, पहले ही देश छोड़कर जा चुका था और जब होस्नी मुबारक को यह अहसास हो गया कि वे किसी भी तरह आंदोलनकारियों को झुका नहीं सकते, तो उन्हें पद छोड़ना ही पड़ा।  मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना में सेना किस तरह से सहयोग करेगी,  अब यह बड़ा सवाल है। समुचे विश्व को संदेश देने में सफ़ल हुआ यह आंदोलन मिस्र की जनता आगे कितना सफ़ल जीवन दिला पाता है इस ओर समूचे संसार की निगाहें हैं । तमाम तानाशाहों को अब सावधान हो जाना चाहिए । नैतिकता की ताकत कितनी अक्षुण्य है संसार ने देखा और सीखा है । जनता अब तानाशाहों के द्वारा विश्वस्तर पर आंख मूंद कर मचाई जाने वाली लूट-खसोट तथा धन-संपत्ति के अथाह संग्रह को भी और अधिक सहन करने के मूड में हरगिज़ नहीं है । दुनिया के लोग अब जागरुक हैं, अपने व अपनी आने वाली नस्लों के भविष्य को लेकर वे चिंतित हैं ।
 साथ ही एक सवाल यह भी है कि क्या भारत की जनता भी कभी जागेगी जमाखोरी , मुनाफ़ाखोरी ,भ्रष्टाचारियों और भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ ?  इन तमाम बुराईयों की जड़ राज नेताओं के खिलाफ़ ??  भ्रष्ट और तानाशाह सरकारी अफ़सरों की मनमानी के खिलाफ़ ???

फ़रवरी 11, 2011

छत्तीसगढ़ का एक त्योहार (छत्तीसगढ़ी तिहार) "छेरछेरा पुन्नी"

छेरछेरा मांगने निकले बच्चे । फोटो  साभार : तेजेन्द्र ताम्रकार फ़्लीकर्स

धान का कटोरा
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति यहाँ के लोकमानस मे लोक रंगों की अनेक विधाएं है जो यहाँ  के  लोकजीवन का सहज चित्रण करती है| छत्तीसगढ़ मे वर्ष भर तरह - तरह के जनश्रुति से जुड़े त्योहार मनाये जाते है | पूष माह की पूर्णिमा को यहाँ समूचे प्रदेश में  "छेरछेरा" का त्योहार पारम्परिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है , यह छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति और  ग्रामीण जनजीवन में सम्पन्नता और समानता में समन्वय की भावना को प्रकट करता है | "छेरछेरा ,माई कोठी के धान हेर हेरा " के सामुहिक घोष के साथ बच्चे-बड़े मनना आरंभ करते हैं इस त्योहार को मनाना । गाँव ही नहीं शहरी क्षेत्रों में भी मनाया जाता है यह त्योहार । समूचे देश में छत्तीसगढ़ को " धान का कटोरा " के नाम से जाना जाता है । Bowl of Rice( paddy ) .


   छत्तीसगढ़ में यह पर्व नई फसल के खलिहान से घर आ जाने के बाद मनाया जाता है। इस दौरान लोग घर-घर जाकर लोग धान जो इस प्रदेश की मुख्य फ़सल है , वह मुट्ठी भर माँगते हैं । जिसकी जितनी समाई होती होती है वह अपने द्वार आने वाले को उतना धान दान देता है । यहाँ यह दान सभी छोटे-बड़े , सभी वर्ग के लोग देते - लेते हैं । इसके पीछे की कथा रतनपुर के महाराजा कल्याण साय के इस दिन अपने राज्य वापस लौटने की खुशी से जुड़ी है । आठ वर्षों बाद महाराज दिल्ली से वापस अपनी राजधानी रतनपुर (अब बिलासपुर जिला में )लौटे थे , जिसकी खुशी में राज्य में धन-धान्य लुटाया गया था । राज कोष के अलावा प्रजा ने भी अपना धन-धान्य , कोठियों में रखा - जमा किया हुआ धान दान कर खुशी का इजहार किया था । इस सब को देखकर प्रसन्न हो कर महराज ने यह घोषणा की थी कि अब से हर वर्ष इसी तिथी को "छेरछेरा" पर्व मनाया जाएगा । तभी से प्रतिवर्ष यह त्योहार लोक परंपरा के अनुसार पौष माह की पूर्णिमा को  " छेरछेरा पुन्नी " के नाम से  मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही बच्चे, युवक व युवतियाँ हाथ में टोकरी, बोरी आदि लेकर घर-घर छेरछेरा माँगते हैं। वहीं युवकों की टोलियाँ डंडा नृत्य कर घर-घर पहुँचती हैं। धान मिंसाई हो जाने के चलते गाँव में घर-घर धान का भंडार होता है, जिसके चलते लोग छेर छेरा माँगने वालों को मुक्त हस्त दान देते हैं। इसी त्योहार में छत्तीसगढ़ के तमाम जमीदारों - दाऊ कहे जाने वाले सम्पन्न लोगों ने जरूरतमंदों - ब्राह्मणों को जमीन -जायदाद आदि भी दान दिया है । मंदिर-देवालय बनवाये हैं ।बहुत ही समृद्धशाली है छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पुन्नी का इतिहास । इस दिन लोग इतने प्रसन्न बदन देखे जाते कि वे इस त्योहार के दिन कामकाज पूरी तरह बंद रहते हैं - पूरे दिन इस त्योहार की उमंग - तरंग में खोए रहते हैं । इस दिन लोग प्रायः गाँव छोड़कर बाहर नहीं जाते ।

फ़रवरी 07, 2011

" ब्रह्मकमल "

ब्रह्मकमल का अर्थ है ‘ब्रह्मा का कमल’। यह माँ नन्दा का प्रिय पुष्प है । तालाबों या पानी के पास नहीं बल्कि ज़मीन पर होता है। ब्रह्मकमल 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है। ब्रह्मकमल उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। और इसकी भारत में लगभग 61 प्रजातियां पायी जाती हैं जिनमें से लगभग 58 तो अकेले हिमालयी इलाकों में ही होती हैं।
ब्रह्मकमल का वानस्पतिक नाम सोसेरिया ओबोवेलाटा है। यह एसटेरेसी वंश का पौंधा है। इसका नाम स्वीडर के वैज्ञानिक डी सोसेरिया के नाम पर रखा गया था। ब्रह्मकमल को अलग-अगल जगहों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे उत्तरखंड में ब्रह्मकमल, हिमाचल में दूधाफूल, कश्मीर में गलगल और उत्तर-पश्चिमी भारत में बरगनडटोगेस नाम से इसे जाना जाता है।
ब्रह्मकमल भारत के उत्तराखंड, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश, कश्मीर में पाया जाता है। भारत के अलावा यह नेपाल, भूटान, म्यांमार, पाकिस्तान में भी पाया जाता है। उत्तराखंड में यह पिण्डारी, चिफला, रूपकुंड, हेमकुण्ड, ब्रजगंगा, फूलों की घाटी, केदारनाथ आदि जगहों में इसे आसानी से पाया जा सकता है।
इस फूल के कई औषधीय उपयोग भी किये जाते हैं। इस के राइज़ोम में एन्टिसेप्टिक होता है इसका उपयोग जले-कटे में उपयोग किया जाता है। यदि जानवरों को मूत्र संबंधी समस्या हो तो इसके फूल को जौ के आटे में मिलाकर उन्हें पिलाया जाता है। गर्मकपड़ों में डालकर रखने से यह कपड़ों में कीड़ों को नही लगने देता है। इस पुष्प का इस्तेमाल सर्दी-ज़ुकाम, हड्डी के दर्द आदि में भी किया जाता है। इस फूल की संगुध इतनी तीव्र होती है कि इल्का सा छू लेने भर से ही यह लम्बे समय तक महसूस की जा सकती है और कभी-कभी इस की महक से मदहोशी सी भी छाने लगती है।
इस फूल की धार्मिक मान्यता भी बहुत हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे बुरी आत्माओं को भगाया जाता है । इसे नन्दाष्टमी के समय में तोड़ा जाता है और इसके तोड़ने के भी सख्त नियम होते हैं जिनका पालन किया जाना अनिवार्य होता है। यह फूल अगस्त के समय में खिलता है और सितम्बर-अक्टूबर के समय में इसमें फल बनने लगते हैं। इसका जीवन 5-6 माह का होता है।

फ़रवरी 04, 2011

आखिर कब तक चूड़ी पहनी बैठी रहे जनता …?


मंहगाई की मार ने किसी को भी नहीं छोड़ा है । रोटी , दाल और सब्जी की जद्दोजहद इस दशा में दोहरा सरदर्द बन गया है । हमारे देश में अभी मंहगाई दर 17.7% है । आम आदमी का बजट शक्कर , प्याज , टमाटर और आलू जैसी रोजमर्रा की चीजों ने बिगाड़ रहा है । मंहगाई और मनमोहन सरकार का मानो चोली दामन का साथ हो गया है । दु:खद है  विश्व के एक जानेमाने अर्थ शास्त्री के प्रधान मंत्री रहते हुए अर्थ से जुड़े मुद्दे में उसका अपने ही  देश के सामने असफ़ल सिद्ध होना ।
इससे भी कहीं ज्यादा दु:खद है बेकाबू मंहगाई पर देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी का बेतुका बयान - यह कहना कि " मंहगाई को कम करने के उनके पास कोई जादू की छड़ी या अलादीन का चिराग नहीं है । " मैं इसे सरकार की नाकामी ही नहीं बल्कि बेशर्मी भरा कथन मानता हूँ । किसने कहा है कि आपके पास जादू की छड़ी है , या आपको जादू की छड़ी हाँथ में ले कर शासन चलाना है  , किसने कहा है या आपसे ऐसा बेतुका सवाल किया है , जो आप समूचे  देश के सामने ऐसा सीना तानकर कह रहे हैं ? आपको सत्ता क्या केवल सुख भोगने और भौंकने के लिए दी गई है क्या ? अरे समूचे देश के सामने बोलने का सहूर तो होना चाहिए । क्यों भूलते हो कि तुम कहीं के राजा या फ़िर तानाशाह नहीं हो , फ़िर ऐसी भाषा कैसे बोलने का साहस कर गुजरते हो ? अच्छे - अच्छे राजा और तानाशाह तो धूल चाट गये और चाट रहें है । मिश्र की राजधानी काहिरा का ही हाल देख लो । तमाम तानाशाहों और उनके अरबी मुल्कों का हाल देख कर भी नहीं सीखना चाहते , प्रजातंत्र के हिमायती बनते हो , शर्म करो - जनता से डरो , अपने देश की माटी से डरो , जमीन में ही रहो और मर्यादित रहो वर्ना यहाँ भी वह दिन दूर नहीं जब घर- दफ़्तर में घुस कर जनमानस तुमको कुर्सी से उठा बाहर फ़ेंक देगा , धरा का धरा रह जाएगा तुम्हारा सारा धन और घमण्ड । बेकारी - बेबसी में वर्षों से जीती आ रही जनता और कितने दिन क्या-क्या सहेगी ? तुम बैठे हो समस्या सुलझाने की जगह पर समस्या सुलझाने की वजाय उलझाने और भड़काने वाली बातें करते हो अपने बयानों में क्या यही है तुम्हारी राजनीतिक दूर दर्शिता- दक्षता ? यही है देश का भविष्य संवारने वाला बयान ? अरे नहीं सम्हलती है कुर्सी तो छोड़ो - हटो । 70-70 वर्ष के हो रहे हो , चलते फ़िरते नहीं बन रहा है , बोलते नहीं बन रहा है , अपने पैरों पर चल नहीं पा रहे हो , व्हील चेयर चाहिए सबको वह भी जनता के पैसों से , कोई मौलिक सोच नहीं है साहस नहीं है फ़िर भ्रष्टाचार करना है करके बने हुए हो पूरी बेशर्मी के साथ , क्या है यह सब  ? है कोई जवाब ?
इतनी ही बेशर्म हैं तमाम राज्य सरकारें मंहगाई की बेकाबू चाल पर ये बेशर्म सरकारें खुश हैं , जनता को बताना चाहती हैं मंहगाई तो केन्द्र सरकार की गलत नीतियों की वजह से बढ़ रही है । ये राज्य सरकारें यदि अपने ही प्रदेश की जनता की हिमायती हैं तो क्यों नहीं ये अपने अपने राज्यों में  मंहगाई पर काबू पाने - अपनी जनता को राहत देने ये मंडी टैक्स , तमाम तरह के अन्य स्थानीय (Local) टैक्स , ऑक्ट्रॉय कम या माफ़ कर देतीं ? ऐसा करने से उन प्रदेशों में तो मंहगाई कम होगी । केन्द्र हो या राज्य की सरकारें सब केवल जनता को ही बेवकूफ़ समझें और उसी से बेतुकी - बदमिजाजी की बातें करती रहें कब तक चलेग यह सब ? अखिर कब तक ??? आखिर कब तक भारत का बेरोजगार - किसान - आम आदमी - बेबस महिलाएं , नेताओं की हवस का शिकार महिलाएं - बच्चियाँ आत्महत्या का , हत्या का शिकार होती रहें ? कब तक आम जनता चूड़ी पहनी बैठी रहे ???

जनवरी 27, 2011

अपील : श्री सांई विशेष


" भाग्योत्कर्ष " धर्म , आध्यात्म , वास्तु शास्त्र और ज्योतिष से जुड़ा नाम है जो प्रकाशन के क्षेत्र में कार्यरत है । रायपुर (छत्तीसगढ़) से भाग्योत्कर्ष का मासिक प्रकाशन होता है । हर आध्यात्मिक विषय पर भाग्योत्कर्ष का एक विशेष अंक 'वेद-पुराणों' पर आधारित होता है जो ग्लेज आर्ट पेपर प्रकाशित होता है । धार्मिक संस्थानों - आध्यात्मिक चाहत रखने वाले लोगों के हाँथों इसका वितरण धर्मावलंबियों - जिज्ञासु जनों के मध्य होता है ।
  अब तक भाग्योत्कर्ष के "अघोर" , "देवी शक्ति" , "समृद्धि" , "मंत्र शक्ति" ,  "रामसेतु" , "भगवान श्री परशुराम" , "राजिम कुंभ" , "जागरण" , "चेतना" जैसे अनेक महत्वपूर्ण अंक प्रकाशित हुए हैं ।
 सर्व विदित है कि यह विषय आज के तड़क-भड़क की दुनियाँ , ग्लेमर की दुनियाँ से अलग है लिहाजा इसका प्रकाशन कठिन ही नहीं दुष्कर होता है । प्रदेश के मुख्य मंत्री डॉ रमन सिंह इस बात को समझते थे , लेकिन यह बात उनके मातहतों को अच्छी नहीं लगी । प्रकाशन लम्बे समय से अवरुद्ध हो गया ।
भाग्योत्कर्ष ने पुनः हिम्मत जुटा कर शिरडी वाले सांई बाबा पर एक विशेष अंक के प्रकाशन की  तैयारी की है । बाबा के सक्षम भक्तों से सहयोग की अपेक्षा सहित यहाँ यह पोस्ट लगाई गई है । सहयोग केवल इतना कि इस अंक की प्रतियाँ अपनों - भक्तों के बीच वितरित करने के लिए अग्रिम क्रय कर प्रकाशन को सुलभ सुगम बनाने में मदद करें ।                                                                                                                                                                                                                - आशुतोष मिश्र / 094242 02729

जनवरी 26, 2011

शुभ कामनाएं


जनवरी 23, 2011

अपनी पवित्र गायों से द्रोह



यह जानकर शायद आपको झटका लगेगा कि हमने अपनी देसी गायों को गली-गली आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया है, क्योंकि वे दूध कम देती हैं और इसलिए उनका आर्थिक मोल कम है, लेकिन आज ब्राजील हमारी इन्हीं गायों की नस्लों का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। ब्राजील भारतीय प्रजाति की गायों का निर्यात करता है, जबकि भारत घरेलू दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए अमरीका और यूरोपीय प्रजाति की गायें आयात करता है। वास्तव में, तीन महत्वपूर्ण भारतीय प्रजाति गिर, कंकरेज और ओंगोल की गायें जर्सी गाय से भी ज्यादा दूध देती हैं, यहां तक कि भारतीय प्रजाति की एक गाय तो होलेस्टेन फ्राइजियन जैसी विदेशी प्रजाति की गाय से भी ज्यादा दूध देती है। जबकि भारत अपने यहां दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए होलेस्टेन फ्राइजियन का आयात करता है।

अब जाकर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के गर्व - गिर प्रजाति की गाय - को स्वीकार करने का निश्चय किया है। उन्होंने हाल ही में मुझे बताया कि उन्होंने उच्च प्रजाति की शुद्ध गिर नस्ल की गाय को ब्राजील से आयात करने का निश्चय किया है। उन्होंने यह भी कहा कि आयात की गई गिर गाय को भविष्य में "क्रॉस ब्रीडिंग प्रोग्राम" में इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि राज्य में दुग्ध उत्पादन को बढ़ावा मिल सके। मैंने उन्हें बताया कि हाल ही में ब्राजील में दुग्ध उत्पादन प्रतियोगिता हुई थी, जिसमें भारतीय प्रजाति की गिर गाय ने एक दिन में 48 लीटर दूध दिया। तीन दिन तक चली इस प्रतियोगिता में दूसरा स्थान भी भारतीय नस्ल की गिर गाय को ही प्राप्त हुआ। इस गाय ने 45 लीटर दूध दिया। तीसरा स्थान आंध्र प्रदेश के ओंगोल नस्ल की गाय (जिसे ब्राजील में नेरोल कहा जाता है) को मिला। उसने भी एक दिन में 45 लीटर दूध दिया।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत विकास की गलत नीति अपनाकर चल रहा है। यदि हमें अपने यहां गायों की नस्लों का विकास करना है, तो हमें कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं, अपने यहां जो उच्च उत्पादकता वाली गायें हैं, उनसे क्रॉस ब्रिडिंग कराने का बड़ा वैज्ञानिक महत्व है।

आयातित प्रजातियों के प्रति आकर्षण भारतीय डेयरी उद्योग के लिए घातक सिद्ध हुआ है। हमारे योजनाकारों व नीति निर्माताओं ने देसी नस्लों को पूरी तरह आजमाए बिना ही विदेशी नस्लों को आगे बढ़ाया है। भारतीय नस्ल की गायें स्थानीय माहौल में अच्छी तरह ढली हुई हैं, वे भीषण गर्मी झेलने में सक्षम हैं, उन्हें कम पानी चाहिए, वे दूर तक चल सकती हैं, वे स्थानीय घासों के भरोसे रह सकती हैं, वे अनेक संक्रामक रोगों का मुकाबला कर सकती हैं। अगर उन्हें सही खुराक और सही परिवेश मिले, तो वे उच्च दुग्ध उत्पादक भी बन सकती हैं।

केवल ज्यादा दुग्ध उत्पादन की बात हम क्यों करें, हमारी गायों के दूध में ओमेगा-6 फैटी एसिड्स होता है, जिसकी कैंसर नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विडंबना देखिए, ओमेगा-6 के लिए एक बड़ा उद्योग विकसित हो गया है, जो इसे कैप्सूल की शक्ल में बेच रहा है, जबकि यह तत्व हमारी गायों के दूध में स्वाभाविक रूप से विद्यमान है। गौर कीजिएगा, आयातित नस्ल की गायों के दूध में ओमेगा-6 का नामोनिशान नहीं है। न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने पाया है कि पश्चिमी नस्ल की गायों के दूध में "बेटा केसो मॉर्फिन" नामक मिश्रण होता है, जिसकी वजह से अल्जाइमर (स्मृतिलोप) और पार्किसन जैसे रोग होते हैं।

इतना ही नहीं, भारतीय नस्ल की गायों का गोबर भी आयातित गायों के गोबर की तुलना में श्रेष्ठ है। भारतीय गायों का गोबर अर्घ-कठोर होता है, जबकि आयातित गायों का गोबर अर्घ-तरल। इसके अलावा देसी गायों का गोबर ऎसा पंचागभ्य तैयार करने के अनुकूल है, जो रासायनिक खादों का बेहतर विकल्प है। कई शोध बताते हैं कि गो मूत्र भी औषधीय प्रयोग में आता है। गो-मूत्र और एंटीबायोटिक के एक औषधीय मिश्रण का अमरीका में पेटेंट कराया गया है। गो-मूत्र में मौजूद कारगर तत्वों के लिए और कैंसर रोधी कारक के रूप में भी गो-मूत्र का पेटेंट हुआ है।

एक ऎसा देश, जो अपने प्राकृतिक संसाधनों पर भी शायद ही गर्व करता है, वहां यह उम्मीद करने का सवाल ही नहीं उठता कि पवित्र गायों का वैज्ञानिक व तकनीकी रूप से विकास किया जाता। जब हमने अपने पशुधन के मोल को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जब हमने अपने पशुधन की क्षमता बढ़ाने के तमाम प्रयासों को धता बता दिया, तब हमारे देसी पशुधन को विदेशी धरती पर शानदार पहचान मिल रही है!

पिछली सदी के मध्य में ब्राजील ने भारतीय पशुधन का आयात किया था। ब्राजील गई भारतीय गायों में गुजरात की गिर और कंकरेज नस्ल और आंध्र प्रदेश की ओंगोल नस्ल की गाय शामिल थी। इन गायों को मांस के लिए ब्राजील ले जाया गया था, लेकिन जब ये गायें ब्राजील पहंुचीं, तो वहां लोगों को अहसास हुआ कि इन गायों मे कुछ खास बात है और वे दुग्ध उत्पादन का बेहतर स्रोत हो सकती हैं। भारतीय गायों को अपने यहां के मौसम के अनुरूप पाकर ब्राजील जैसे देशों ने उनकी नस्लों का विकास किया और भारतीय गायों को अपने यहां प्रजनन परियोजनाओं में आदर्श माना। भारतीय पशुपालकों और भारतीय पशु वैज्ञानिकों ने अगर देसी गायों की उपेक्षा नहीं की होती, तो हमारी गायों का इतिहास कुछ और होता। तब हमारी पवित्र गायों की सचमुच पूजा हो रही होती। हमारी गायें सड़कों पर लाचार खुले में घूमती न दिखतीं।

अगर भारत ने विदेशी जहरीली नस्लों के साथ क्रॉस ब्रिडिंग की बजाय अपनी ही गायों के विकास पर ध्यान दिया होता, तो हमारी गायें न केवल आर्थिक रूप से व्यावहारिक साबित होतीं, बल्कि हमारे यहां खेती और फसलों की स्थिति भी व्यावहारिक और लाभदायक होती। मरूभूमि के अत्यंत कठिन माहौल में रहने मे सक्षम राजस्थान में पाई जाने वाली थारपारकर जैसी नस्ल की शक्तिशाली गायें उपेक्षित न होतीं। आज दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए आयातित नस्लों पर विश्वास करने से ज्यादा विनाशकारी और कुछ नहीं हो सकता।

देविन्दर शर्मा
कृषि व खाद्य सुरक्षा विशेषज्ञ
राजस्थान पत्रिका से साभार

जनवरी 16, 2011

आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की 31 मंज़िला ईमारत का निर्माण अवैध , ईमारत तोड़ने की बात : गर हम डूबे तो तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम


मुंबई स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी में करगिल युद्ध लड़ने वाले वीर जवानों उनके परिजनों को फ़्लैट मिले , यह योजना थी , जिस पर इस देश के कर्णधार नौकरशाहों और नेताओं के रिश्तेदारों की बुरी नजर पड़ गई , फ़िर क्या था जो ग्रहण लगा कि आज यह ईमारत तोड़ने की बात कर रहे हैं बेशर्म नेता , वे अब इसे भ्रष्टाचार की ईमारत कह रहे हैं क्योंकि अब इसमें उन्हें- उनके रिश्तेदारों को फ़्लैट जो नहीं मिल पा रहा है । हुई न वही बात कि गर हम नहीं खा पायेंगे तो  खाने की सजी सजाई थाली में पानी डाल देंगे । किसी को भी नहीं खाने देंगे ।   गर हम डूबे तो तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम ।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने रविवार (16 जनवरी 2011) को अपने बयान में कहा, "यदि दूसरा विकल्प चुना जाता तो ईमारत के अवैध निर्माण को जायज़ ठहराए जाने के बराबर होता. तीसरे विकल्प पर चर्चा हुई पर उसका मतलब भी यही होता । इसलिए तथ्यों और परिस्थितियों पर चर्चा के साथ-साथ विश्लेषण करने के बाद मेरा निर्णय है कि पहले विकल्प (यानी पूरी इमारत को गिराने) का फ़ैसला किया जाए ।"

भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने पाया है कि विवादों में घिरी मुंबई स्थित आदर्श कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी की 31 मंज़िला इमारत का निर्माण अवैध तरीके से, अनिवार्य इजाज़त लिए बिना किया गया और पूरी ईमारत को गिरा दिया जाना चाहिए ।
मुंबई स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी तब विवादों में घिर गई जब पाया गया कि इसकी इमारत के निर्माण में अनेक स्थानीय नियमों और क़ानूनों का उल्लंघन हुआ था । यही नहीं, कई प्रभावशाली अधिकारियों और राजनीतिक नेताओं के रिश्तेदारों को इस ईमारत में फ़्लैट दिए गए । पूरे मामले ने राजनीतिक तूल पकड़ा और कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस की सरकार के उस समय मुख्यमंत्री रहे आशोक चव्हान को अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा । अब मंत्रालय का कहना है कि उसके पास तीन विकल्प थे. पहला विकल्प ये था कि कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (तटीय नियमन क्षेत्र - 1991) की इजाज़त के बिना अवैध तौर पर बनाई गई पूरी ईमारत को गिरा दिया जाए । सवाल उठता है खर्च किये गये रुपयों के लिए जिम्मेदार कौन होगा ? एक दिन में तो यह इमारत बनी नहीं होगी , क्या कर रहे थे जिम्मेदार अधिकारी तब, जब यह ईमारत बन रही थी । क्यों न उन अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही की जाए जिनके जिम्मे यह दायित्व होता है कि ऐसे निर्माण न हों । सबसे बड़ी बात यदि सब कुछ  नौकरशाहों और नेताओं के हिसाब से  सब कुछ चल रहा होता , उनके रिश्तेदारों को फ़्लैट मिला हुआ होता तो क्या ये नेता ऐसा निर्णय लेते ? आज हर बड़े शहर में सैकड़ों अवैध बहुमंजिला ईमारतें सीना ताने खड़ी हैं ,क्या उन्हें गिराने कोई मंत्री - नेता सामने आयेगा ।  पर्यावरण के नियमों का खुल्ला उल्लंघन देश में हजारों-लाखों उद्योग कर रहे हैं , क्या कर रहा है जय राम रमेश का पर्यावरण विभाग उनके खिलाफ़ ? रायपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हो सकता है , जहाँ समूची सत्ता इसी काम में जुटी देखी जा सकती है , आम आदमी सरकार के ऐसे कार्यों के विरुद्ध अदालत की शरण ले रहे हैं ।
मेरा मानना है पर्यावरण मंत्रालय का ऐसा सुझाव करगिल के शहीदों का अपमान है । देश का अपमान है । इसके विरूद्ध जनता की आवाज बुलंद होनी ही चाहिए । यह पूरी ईमारत वीर सपूतों के परिजनों को जो जरूरतमंद हों उन्हें दिया जाना चाहिए , पर्यावरण ही नहीं अन्य सभी संबंधित मंत्रालयों को जिनका इससे संबंध है आगे आकर स्वीकृति प्रपत्र ईमारत को बचाने के लिए देना चाहिए । साथ ही जो लोग इस काण्ड से जुडे हैं उन्हें ऐसी सजा मिलनी चाहिए जिससे दूसरे सबक लें ।  

फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

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