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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस

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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।
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मई 18, 2011

Political game in Noida - Is Rahul flip flops on Bhatta-Parsaul facts ? / गंदे - सड़े नेता देश को सड़ाने पर हैं आमदा !!!




खबर आई है कि भट्टा में रेप की बात कहकर बुरे फंस गये राहुल गांधी और बचाव में उतरी उनकी कांग्रेस पार्टी । लगता है इस देश के सारे नेता केवल और स्वार्थी और बुद्धिहीन हो कर ही जीना पंसंद कर रहे हैं । राहुल राजनीति में नया है , यदि उतावलेपन में ही उसने कोई जनहित की बात कह डाली तो नेता उस बात में जनता का नहीं , अपना नफ़ा-नुकसान ही देखते हैं , कितने शर्म की बात है यह ? अब भाजपा को यह लग रहा है कि कहीं राहुल की कही गई कोई बात सच साबित हो जाती है तो इसका फ़ायदा उसकी पार्टी को मिलेगा , ऐसा होने नहीं देना चाहिए चलो हल्ला मचाना शुरु करें । देखिए क्या हल्ला हो रहा है …

ग्रेटर नोएडा के भट्टा पारसौल गांव में महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ था। राहुल गांधी के इस आरोप से विवाद खड़ा हो गया है। बीजेपी ने आरोप लगाया है कि बिना ठोस सुबूत बलात्कार का आरोप लगाकर राहुल गांधी ने गांव की महिलाओं का अपमान किया है। वहीं बैकफुट पर आई कांग्रेस ने सफाई दी है कि राहुल ने वही कहा, जो किसानों ने उन्हें बताया था।
सोमवार को किसानों के साथ प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद मीडिया के सामने आए राहुल ने गांव में महिलाओं के साथ बलात्कार का आरोप लगाया था। लेकिन समस्या ये है कि इस सनसनीखेज आरोप की अब तक पुष्टि नहीं हो पाई है। अभी तक गांव की किसी महिला या परिवार ने इस सिलसिले में शिकायत नहीं की है। ऐसे में राहुल के दावे पर सवाल उठ रहे हैं। बीजेपी ने राहुल के बयान को ग्रामीण महिलाओं का अपमान बताया है।

भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे भट्टा पारसौल के किसानों के बीच सबसे पहले पहुंच कर राहुल गांधी ने विरोधियों को पटखनी दे दी थी। अब कांग्रेस यूपी में इसका फायदा उठाने में जुटी है। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि गांव में उन्होंने 70 फुट व्यास का राख का ढेर देखा था। राहुल ने राख में मानव हड्डियों के होने की आशंका जताई थी। हालांकि यूपी सरकार ने राहुल के दावों को बेबुनियाद बताया था। सरकार राख की फारेंसिक जांच भी करा रही है। जाहिर है, कांग्रेस बैकफुट पर है। लेकिन वो सरकार को चुनौती देने में जुटी हुई है। महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने कहा कि राहुल ने वही बोला जो गांव वालों ने उन्हें बताया था। अगर आरोप गलत हैं तो राज्य सरकार जांच करा ले।
2012 के यूपी चुनावों के लिए कांग्रेस को खड़ा करने की कोशिश में जुटे राहुल को इस विवाद से झटका लगा है। हालांकि पार्टी राहुल के साथ खड़ी दिखने की कोशिश कर रही है, लेकिन राहुल के सलाहकारों पर सवाल तो उठने ही लगे हैं। राहुल ने भट्टा पारसौल गांव सबसे पहले पहुंचकर विरोधियों पर राजनीतिक बढ़त बनाई थी लेकिन उनके बयान ने पार्टी को बैकफुट पर ला दिया है। सवाल ये है कि भरोसा किस पर किया जाए। बीजेपी, कांग्रेस या यूपी सरकार पर। जो भी हो इस मामले की सच्चाई जल्द से जल्द सामने आनी चाहिए।
ऐसा लगता है देश के सारे नेताओं ने मानों एक होकर इस बात की कसम खा रखी है कि भूल से भी  किसी नेता से कोई अच्छा काम होने नहीं देंगे । कांग्रेस ने अपने महासचिव राहुल गांधी के इस दावे का बचाव किया है कि ग्रेटर नोएडा के भट्टा परसौल गांव में राख के 74 ढेर मिले हैं जिनमें मानव अवशेष हैं। राहुल गांधी ने मायावती सरकार के खिलाफ जंग का एलान किया।
कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा कि वह मामले की जांच कराए। कांग्रेस महासचिव जनार्दन द्विवेदी ने नई दिल्ली में पत्रकारों को बताया, "मीडिया में जो कुछ (राहुल गांधी के बयान के बारे में) आया है वह दुर्भाग्यपूर्ण है. कहीं उन्होंने 74 संख्या या 74 शवों का जिक्र नहीं किया है। राहुल गांधी ने यह कहा है कि एक जगह है जहां जगह पर 70 फीट के इलाके में राख का एक ढेर है जिसमें कुछ हड्डियां मिली हैं।"
सोमवार को राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की. किसानों के साथ राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को भट्टा परसौल गांव के जले हुए शवों, हड्डियों वाली राख और तहस नहस घरों के कुछ फोटो भी सौंपे। उनका कहना है कि राज्य सरकार के लोगों ने गांव में बलात्कार और स्थानीय लोगों पर और भी अत्याचार किए हैं। जमीन अधिग्रहण के मामले पर भट्टा परसौल में ग्रामीणों की सरकार की लोगों से झड़पें हुईं।
राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया है। बुधवार को उन्होंने वाराणसी में कहा कि कांग्रेस हर गांव में जाएगी और इस सरकार को सत्ता से बाहर करने के लिए संघर्ष करेगी. उन्होंने कहा, "उत्तर प्रदेश सरकार कहती हैं कि भट्टा परसौल में सब ठीक हैं तो फिर वहां धारा 144 क्यों लगाई गई। अगर सब कुछ ठीक हैं तो लोग वहां से भाग क्यों रहे हैं। अगर सब कुछ ठीक है तो फिर मामले की न्यायिक जांच के आदेश क्यों नहीं दिए जाते। स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच बहुत जरूरी है ताकि जिम्मेदारी तय की जा सके।"
द्विवेदी ने साफ किया कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को पुलिस पर लगाए गए लोगों के आरोपों के बारे में बताया। उन्होंने यह बात राहुल गांधी के इस बयान पर पूछे गए सवाल के जवाब में कही कि पुलिस भट्टा परसौल और दूसरे मायावती भी पलटवार की तैयारी में हैं।
गांवों में महिलाओं का बलात्कार हुआ. उन्होंने कहा, "यह जांच का मामला है. इसकी जांच होनी चाहिए। अगर हड्डियां मिली हैं और पता लगाया जाना चाहिए कि वे किसकी हड्डियां हैं। और अगर महिलाओं पर अत्याचार हुए हैं और उन्हें पीटा गया है तो ऐसा क्यों हुआ।"
इस बीच उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने भी कांग्रेस का समर्थन करते हुए जांच की मांग की है. पार्टी के मुताबिक इस बारे में केंद्र सरकार को मायावती की उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगनी चाहिए ।


मई 16, 2011

2G SCAM : PLEASE SHARE IF YOU CARE.




PLEASE SHARE IF YOU CARE.


1) CAG report on 2G scam identified three groups of


losses.
a) 102498 cr loss with 122 licenses,
b) 37154 cr dual tech,
c) 36993 cr below 6.3Mhz spectrum


2) CBI has been focusing only on the 122 new license


part (2007-08) of 2G scam. A.Raja, Kani., etc are from here.  :  )




3) Dual Tech Part:- Reliance-14 circles, Tata-19 circles &


others-2 circles,a 2G scam loss of Rs.37,154 cr are NOT


under CBI probe at present    : (


4) 2G scam's spectrum under 6.2MHz:- BSNL/MTNL,


Bharti, Vodafone and IDEA, totalling Rs.36,993 cr loss,


NOT under CBI investigation now    : (


Source: @DNA Newspaper.

दिसंबर 10, 2010

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है …


छत्तीसगढ़ की जनता का दर्द कुछ अनोखा ही है । जिस-जिस को और जब-जब यहाँ लोगों ने सर आँखों पे बिठाया, उसने चार दिन बाद उसी जनता से बड़ी ही ढ़िठाई से पूछा है - कि तू क्या है … ? और ठगी सी रह गई जनार्दन कही जाने वाली जनता । देश के परिप्रेक्ष्य में भी यही देखा - महसूस किया जा रहा है । जिसे भी हम अपना नेता चुनते वह नमक हलाल न होकर चंद दिनों में ही लाल हो कर दिखाता है ।हम सब इन दिनों नेता और अधिकारियों के "भ्रष्ट आचरण" से परेशान हैं । भारतीय नागरिक इन दिनों दोहरा दर्द झेल रहे हैं । बेकाबू - बेलगाम "मंहगाई" की मार समानान्तर चल ही रही है , ऊपर से एक के बाद एक नित्य नए "घोटालों" की खबर , वह भी करोड़ों - अरबों रुपयों की । ऐसी खबरों ने मानो आम लोगों का दर्द बढ़ा दिया है ।  पहला दर्द यह कि इन प्रतिस्पर्धी भ्रष्टाचार और घोटालों पर काबू करने वाला कोई दिखता नहीं है । दूसरा पकड़े जाने के बाद भी ऐसे अपराधी समाज में सिर उठाए घूम रहे हैं । सैर - सपाटे पर सपरिवार विदेशों की यात्राएं कर रहे हैं । नित्य नये बंगले - नई देशी-विदेशी कारें खरीद कर लोगों को चिढ़ाते खुली सड़कों पर मौज-मस्ती करते दिख रहे हैं । यह कहते भी नहीं शर्माते हैं कि अच्छा है सस्पेंड कर दिया , घूम घाम लें । लौटकर सब ठीक कर लेंगे , तब तक मामला भी ठण्ढ़ा पड़ जायेगा , लोग भूल जायेंगे । और हो भी यही रहा है। छत्तीसगढ़ में कुछ ज्यादा ही ,लेकिन लोग भूल नहीं रहे हैं बल्कि और अधिक आक्रोशित हैं ।  हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने आधा दर्जन बड़े अधिकारियों को  और उनके अपराधों को माफ़ कर दिया बिना इस बात की परवाह किये कि इसका जनमानस पर क्या असर होगा । मिर्जा गालिब की गज़ल की चंद वो लाईनें बरबस ही याद आतीं है कि - "हए एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है  ? तुम्ही कहो कि ये अंदाज - ए - गुफ़्तगु क्या है , रगों में दौड़ते फ़िरने के हम नहीं कायल , जब आँख ही से न टपका तो फ़िर लहू क्या है … " यहाँ कुछ इसी अंदाज में सरकार अपनी जनता को और जनता सरकार को यहाँ देख रही है । सरकार की  इसके पीछे छिपी सोच शायद यही होगी कि जनता का क्या है वह तो बिकाऊ है ,चुनाव के समय फ़िर खरीद लेंगे , उन्हीं के बीच से तमाम एजेंट भी हैं उसके पास । लेकिन  कहीं जनता को खुश करने की सोच में दोषी अधिकारियों को सजा दे दी , अधिकारियों को माफ़ नहीं किया तो हमारी पोल खुल जायेगी और हम मुसीबत में पड़ जायेंगे । इन्हें सब मालूम ही नहीं है बल्कि सारी फ़ाईलें भी इन्हीं अधिकारियों के बस्तों में रहती है । इन्हें माफ़ करना जरूरी है , जनता का क्या ? वह मरती रहेगी सड़क , पानी, बिजली, मंहगाई , स्कूल अस्पताल और राशन-पानी के बोझ तले , मरने दो । छत्तीसगढ़ पिछले दस सालों से  इसे लूटने वालों की नजर में आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है । दिल्ली , कोलकता ,  हरियाणा , जयपुर , जोधपुर , ओड़िसा काटाभांजी , मुम्बई नागपुर और न जाने कहाँ-कहाँ से बड़े व्यापारी यहाँ आकर सत्त्ता के गलियारों से चिपके हैं ,सारा कामकाज सम्हाल रहे हैं । भ्रष्टाचार का आलम यहाँ यह है कि इनमें से कोई भी हजारों करोड़ रुपयों से नीचे की सम्पत्ति की बात नहीं करता है । मुख्यमंत्री बनने का सपने देख रहा एक मंत्री (भाईबंद सहित)और कांग्रेस के आधा दर्जन पूर्व मंत्री - विधायक जमीन के कारोबार में खुलेआम गुण्डागर्दी करते देखे-सुने जा सकते हैं । तमाम एन जी ओ अधिकारियों की गिरफ़्त में हैं , लेकिन इनके विरूद्ध कार्यवाही तो दूर कोई मुँह खोलने की हिम्मत नहीं कर रहा है । सत्तारूढ़ भाजपा का काँग्रेस के साथ इस मसले पर मानो खुल्लमखुल्ला गढ़बंधन जैसा है । यहाँ इस सफ़लता का श्रेय भाजपा को देना ही पड़ेगा ,जिसने काँग्रेस को उसके साथ प्रेम संबंध बनाने मजबूर कर दिया और आज यहाँ दोनो को फ़ील गुड है अब ऐसे में यदि यहाँ करप्शन का ग्राफ़ बढ़ता है,तो बढ़ने दो , फ़िर भला अधिकारी इस बहती गंगा में हाँथ धोने से क्यों चूकें ? बिहार का सोफ़ेस्टिकैटेड स्वरूप निर्मित किया है जमीन दलालों-लुटेरों ने यहाँ । सरकार भी सब कामकाज भूल कर बिल्डर की भूमिका में देखी जा रही है , जबरिया लोगों की जमीनें लेकर मकान, दुकान, मल्टिप्लेक्स, मॉल ,रेसिडेंसियल सिटीस बनाने में मस्त है। यदि आपके पास भी ऐसा कुछ करने का माद्दा है आईये छत्तीसगढ़ , आपका भी स्वागत है इस सरकार के रहते रहते आप भी लूट जाइये इस प्रदेश को । भोले-भाले आदिवासियों और  सीधे-साधे छत्तीसगढ़ियों का  राज्य है यह ।

अगस्त 20, 2010

मुम्बई के धोबी जाएं तेल लेने …

आईये साहबान विकास के नाम काँक्रिट के जंगलों में करें एक और नायाब काम । जी हाँ , राज ठाकरे की मुम्बई में अब सामत आई है धोबियों की । मुम्बई के धोबी घाट पर अब नजर है वहां के बिल्डरों की ,इन्होने बी एम सी को आगे किया है । बी एम सी का कहना है - जिस जगह पर धोबी कपडे धोते हैं - सुखाते हैं ,वह जगह बी एम सी की है और अब उसे वापस चाहिए । वहां वह विकास की नई गंगा बहाएगी । सदियों से यहां काम करते आ रहे धोबी जाएं तेल लेने । कुछ को कपडा सुखाने की मशीनें दे दी जायेंगी ,उनसे उनकी जगह छीनने के बाद । याने विरासत का मिटना तय है । बिल्डर्स ने नेताओंको अपना सपना मनी-मनी जो दिखा दिया है । अब जनता को दिखाने - भरमाने के लिए ये लालची बंदर आपस में दिखावटी-राजनीतिक उठा पटक का खेल करके दिखायेंगे , मीडिया अपनी प्लांड भूमिका का निर्वाह करता दिखेगा और इन सब के बाद पूर्व निर्धारित बिल्डर्स को उनकी चिन्हित जमीनें दे दी जायेंगी ।  इस विकास की कीमत चुकायेंगे दस हजार धोबी परिवार , जिनकी पीढ़ियों ने मुंम्बई के लोगों के कपडों मे चमक - दमक लाने का काम पूरी निष्ठा से किया था ,बगैर यह सोचे कि ऐसा भी एक दिन आयेगा। हद कर दी है लालच ने  , अमानवीय - असंवेदनशील शासन-प्रशासन ने । ऐसे कृत्यों को समय रहते  रोका जाना चाहिए , ह्तोत्साहित किया जाना चाहिए ।

अगस्त 07, 2010

ख़रीददारी कीजिए ' राम ' देकर

नीदरलैंड में अब यह  मुद्रा भी चलती है ।
महर्षि महेश योगी द्वारा जारी की  मुद्रा  '' राम'' को नीदरलैंड में क़ानूनी मान्यता दे दी गई है ।
'' राम'' नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पाँच और दस के नोट हैं ।
इस  मुद्रा  को महर्षि की संस्था ''ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस'' ने गत वर्ष अक्टूबर में जारी  किया  गया था। तभी से तीस गाँवों और शहरों की सौ से अधिक दुकानों में ये नोट चल रहे हैं. इन दुकानों में कुछ तो बड़े डिपार्टमेंट स्टोर श्रृँखला का हिस्सा हैं ।डच सेंट्रल बैंक ने कहा है कि '' राम'' का उपयोग अब क़ानून का उल्लंघन नहीं होगा. बैंक के प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा है कि संस्था ने सारी वैधानिक कार्रवाई पूरी कर दी है. पर बैंक के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि फ़िलहाल इसके सीमित उपयोग की अनुमति ही दी गई है ।
'' राम'' का लेनदेन - अमरीकी राज्य आइवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी ''राम'' का प्रचलन है. वैसे 35 अमरीकी राज्यों में '' राम'' पर आधारित बॉन्डस चलते हैं ।महर्षि संस्था के ''वित्त मंत्री'' बेंजामिन फेल्डमैन ने बीबीसी से कहा है कि '' राम'' का उपयोग ग़रीबी दूर करने और विश्व शांति के लिए हो सकता है.उन्होंने कहा कि सरकारें ''राम'' का उपयोग कृषि और विकास की अन्य परियोजनाओं में कर सकती हैं.फेल्डमैन ने कहा,''डेढ़ अरब लोग बेहद ग़रीब हैं और उन्हें डॉलर जैसी  मुद्रा  नसीब नहीं हो रही है, राम का उपयोग उनके लिए मकान, सड़कें और अस्पताल बनवाने के लिए हो सकता है. ''नीदरलैंड जैसे धनी देश में  मुद्रा जारी करने को तर्कसंगत ठहराते हुए उन्होंने कहा कि इससे विकासशील देश प्रेरणा ले सकते हैं ।मूल्य =नीदरलैंड की डच दुकानों में एक '' राम'' के बदले दस यूरो मिल सकते हैं. डच सेंट्रल बैंक के प्रवक्ता ने बताया कि इस वक्त कोई एक लाख ''राम'' नोट चल रहे हैं ।लोग इसे बैंक में जाकर भुना सकते हैं ।और हमारे यहाँ जहाँ  राम  थे ,अब उनका नाम लेने वाला आम आदमी भी साम्प्रदायिक कहलाता है ।  राम के नाम - काम , उनके जन्म स्थान का निर्धारण अदालतें करतीं हैं ।
महर्षि महेश योगी -
महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका  गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम महेश प्रसाद वर्मा था। उन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की। उन्होने तेरह वर्ष तक ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण की। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम में 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी। हिमालय क्षेत्र में दो वर्ष का मौन व्रत करने के बाद सन् 1955 में उन्होने टीएम तकनीक की शिक्षा देना आरम्भ की। सन् 1957 में उनने टीएम आन्दोलन आरम्भ किया और
इसके लिये विश्व के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। महर्षि महेश योगी द्वारा चलाया गए आंदोलन ने उस समय जोर पकड़ा जब रॉक ग्रुप 'बीटल्स' ने 1968 में उनके आश्रम का दौरा किया। इसके बाद गुरुजी का ट्रेसडेंशल मेडिटेशन पूरी पश्चिमी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनके शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से लेकर आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा तक शामिल रहे।पश्चिम को योग और आध्यात्म से परिचित कराने वाले महर्षि महेश योगी ने मंगलवार पाँच फ़रवरी को करीब 7 बजे नीदरलैंड (हॉलैंड) के शहर व्लोड्राप स्थित आवास में अंतिम सांसें लीं। तब वह 91 वर्ष के थे । 11 जनवरी 2008 को उन्होंने सामान्य जीवन से संन्यास ले लिया था।
उनका कहना था कि गुरूदेव द्वारा प्रदत्त समस्त कर्तव्य उन्होंने पूर्ण कर दिए हैं। अब उनका कार्य समाप्त हो चुका है। इसके बाद उन्होंने अपना सारा समय वेदों के अध्ययन और अनुसंधान में बिताया। ऐसा लगता है कि उन्हें अपनी संभावित मृत्यु का आभास हो चुका था।
महर्षि की पार्थिव काया 09 फरवरी को भारत ल्ली गई और 12 फरवरी को इलाहाबाद के संगम घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।

जून 27, 2010

इंतहां हो गई लालच की

बिहार में भू माफ़िया संस्कृति किस कदर लोगों के सर चढ़ कर बोलने लगी है , इसका सबसे बड़ा और इसकी इंतहाँ को दर्शाने वाला  एक औत उदाहरण पिछले दिनों देखने - सुनने को मिला । ढ़ंग जरूर थोड़ा सोफ़ेस्टिकेडेड सा है । मगर  मामला जमीन हथियाने का ही है , जिसके लिए बिहार का पूरे देश -  दुनियाँ  में  काफ़ी नाम है । एक कहानी सामने आई है जो भू-माफ़ियाओं की लालच की इंतहां बयां करती है  ।
देश के प्रथम राष्ट्रपति  को  भी  नहीं बख्शा बिहारी बाबुओं नें ।राजनीति में मूल्यों को तिलांजलि दी जा चुकी है ,इसे कोई और नहीं बल्कि बिहार में कांग्रेसी ही प्रमाणित करते दिखते हैं ।डॉ बाबु ने  शायद यह सोचा भी नहीं होगा कि कांग्रेस के नेता उन्हें  शिक्षण संस्था चलाने  के लिए   मिली जमीन पर अवैध कब्जा कर लेंगे। लेकिन सच यही है। शर्मनाक स्थिति से पार्टी को बचाने के लिए इस मामले में  प्रधानमंत्री कार्यालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस  मामले में झारखंड सरकार को कार्रवाई करने को कहा हैं। खबरों की दुनियाँ में वर्षों बाद याद आए देश के प्रथम राष्ट्रपति  डा. राजेंद्र प्रसाद जी कुछ इस तरह ।
 डा. राजेंद्र प्रसाद  को दुमका के एक व्यवसायी रामजीवन हिम्मत सिंह ने  सन 1940  में  करीब साढ़े तीन एकड़ जमीन शिक्षण संस्था खोलने के लिए दान में दी।  हाईवे पर स्थित इस जमीन की कीमत आज करोड़ो रूपये हो गई है ,तमाम लोगों की नजर इस जमीन पर लगी हुई थी ।
कांग्रेस नेताओं की नजरें भी लम्बे समय से  इस जमीन पर थी।  डा. राजेंद्र प्रसाद जी 1963 में इस संसार से विदा हो गये । सन 1970 में कांग्रेस ने इस कीमती जमीन पर कब्जे की कोशिशें शुरू कर दी थी ।  नेताओं का मानना था कि डॉक्टर साहब  कांग्रेस के ही तो  थे,  इसीलिए, उनकी यह जमीन भी कांग्रेस पार्टी की तो हुई ना । कांग्रेस ने 19 अप्रैल 1976 को दुमका के सरकारी दफ़्तर में एक अर्जी लगा कर जमीन को पार्टी के नाम पर चढ़ाने की मांग की।
जमीन के दानदाता परिवार को  इस बारे में आपत्ति थी उन्होने अपनी आपत्ति दर्ज  भी की। लेकिन दानदाताओं की आपत्ती को नजर अंदाज कर प्रशासन ने जमीन कांग्रेस के नाम कर दी।   डा. राजेंद्र प्रसाद  मेमोरियल ट्रस्ट ने 2007 में दुमका की राजस्व संबंधी मामलों वाली अदालत में इस मामले को लेकर  दोबारा  अपील की। फ़ैसला सुनाते हुए इस  अदालत ने कांग्रेस को दी गई जमीन के आदेश को निरस्त कर दिया। लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने डिप्टी कमिश्नर आफिस में 2008 में फैसले के खिलाफ अपील की जिस पर न्याय आना शेष है । हमार मकसद है हमारे वो भाई जो इस खबर को ना पढ़ पायें हों यहां पढ़ लें  । जान - समझ लें कि आज लोग राजनीति में क्या-क्या कर रहे हैं ।
यह खबर देश के अनेक अखबारों में प्रकाशित भी हुईं ,लेकिन शायद ही किसी संबधितों को शर्म आई हो , क्यों की जमीन के मामले में सभी में राष्ट्रीय एकता जो है । इसमें कोई मतभेद नहीं है । शर्मसार तो देश है । नेता और पार्टियां तो अपने आप को इन सब से उपर मानते हैं , तभी तो कुछ भी करने से न तो झिझकते हैं और ना ही उसे गलत मानते हैं । गलत मानते हैं उसे जो टोकता है । कहां ले जाएगी ये लालच हमें ?

जून 23, 2010

तबादला बड़े साहबों का - ये क्या हुआ , कैसे हुआ , क्यों हुआ ?

छत्तीसगढ़ शासन ने  आई जी ,  डी आई जी और एस पी साहबानों के  तबादला कर  दिया है । मुख्यमंत्री की सूझबूझ से ये अधिकारी तो भौंचक हैं ,  राजनीतिक गलियारे के चक्कर लगाने वाले भी चकराए घूम रहे हैं । कुछ अधिकारियों के तो मानों चारो खाने चित्त हो गये हैं । किसी ने सोचा भी नहीं  था उसे यह मिलेगा । एक साहब पिछ्ले सात सालों से मानों  सी एम साहब की नाक के बाल की तरह काम  कर रहे थे । हर गोपनीय काम उन्हीं के जिम्में  था ।   अक्सर कानों में जा कर ही अपनी बात कहा करते थे । ये साहब चाहते थे यदि इन्हें हटाया जाता है तो पूरी तरह से ,स्वतंत्र रूप से परिवहन विभाग ही दिया जाए ,  उनके सिर पर किसी को भी न बिठाया जाए । मलाई को लेकर कोई अन्य दावेदारी न हो ,  लेकिन उनका दुर्भाग्य कि ऐसा इसलिए ना हो सका क्योंकि  यह प्रस्ताव  उन्हें  कतई भी मंजूर नहीं  था जिनकी कम्पनी अंग्रेजों के जमाने से सही मायने में राज करती आ रही है । भारत का प्रशासन चला रही है । अपने अलावा शेष सारी दुनियाँ को दोयम दर्जे का मानती आ रही है । और इस झगड़े के बाद उन साहब को  मिला है लूप लाईन जैसा विभाग  । बड़ी निराशा हांथ लगी । इतने लम्बे समय की वफ़ादारी का उन्हें यह सिला मिला । वहीं दूसरी ओर जोगी जी के जमाने में खूब नाम कमाने वाले साहब ने  मानो  अपनी योग्यता फ़िर  साबित की है  और  हथिया लिया है एक ऐसा विभाग जिससे वह अब मुख्यमंत्री के  और  भी करीब हो  गये हैं । तमाम लोगों की परेशानी की एक बड़ी वजह यह  भी है ।  मैदानी  रणबांकुरों को  मुख्यालय बैठने के आदेश मानों सजा के तौर पर मिले हैं । जिनसे किसी भी तरह का खतरा नहीं हो सकता है उनको गाड़ी-मोटर  का काम देखने को कहा गया  है । मुख्यालय में इस विभाग के तमाम दावेदारों के चेहरे तो उतरे हुये देखे जा सकते हैं । चर्चा भी सुनी जा सकती कि भी आखिर क्या कमी थी हममें ?  हम भी वह सब करते  जो ये करेंगे ।  वैसे लोगों को अब भी अपने अपने उचित माध्यमों पर भरोसा है , जिनके जरिए वो अभी भी अपना - अपना  प्रयास जारी रखे हुए हैं । देखना है आगे  होता है क्या ?

जून 17, 2010

मरते हो तो मरो , हम राजनीति करना नहीं छोड़ेंगे

भोपाल गैस काण्ड़ का भूत मानो पूरे देश में नेताओं के साथ-साथ घूम रहा है । नेता जहां भी जा रहे हैं -मानो भूत को साथ साथ ले जा रहे हैं ।भारतीय जनता पार्टी के एक राष्ट्रीय नेता रवि शंकर प्रसाद जी ने 16,जून 2010 को राजधानी रायपुर में पत्रकारों से चर्चा की , कहा कि भोपाल गैस काण्ड़ के बाद यूनियन कारबाईड़ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी वारेन एडरसन को भोपाल से बाहर सुरक्षित निकाले जाने के मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता अर्जुन सिंह कुछ बोलते क्यों नहीं हैं ?  मौन क्यों हैं ?  इसका क्या मतलब समझा जाना चाहिए ?
इसके बाद भी अर्जुन सिंह तो कुछ नहीं बोले , मगर यह बात हमारे स्थानीय कांग्रेस नेताओं को जमीं नहीं , चुप रहना भी नागवार गुजरने लगा । राजधानी में कांग्रेस के नेता - पूर्व मन्त्री मोहम्मद अकबर से चुप रहा नहीं गया ।
दूसरे ही दिन उन्होंने शहर स्थित अपने दफ़्तर में पत्रकारों को बुलाया और`रवि शंकर प्रसाद के उक्त कथन पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कहा - भोपाल गैस काण्ड़ की चिन्ता जताने वाले श्री प्रसाद जी को यह मालूम होना चाहिए कि छत्तीसगढ़  के कोरबा में चिमनी गिरने से बड़ी संख्या में श्रमिक मारे गये हैं , यह भी एक बड़ी औद्योगिक घटना है इसमें भा द वि की उसी धारा के तहत अपराध पंजीबद्ध हुआ है जैसा कि भोपाल के मामले में दर्ज है । श्री प्रसाद जी को छ्त्तीसगढ़ के मुख्यमन्त्री जी से यह पूछ्ना चाहिये था कि कोरबा के इस अति संवेदनशील मामले में वे क्या कर रहे हैं ? क्यों उस कम्पनी के मालिक अनिल अग्रवाल को बचाने की कोशिशें की जा रही है ?
क्यों इस मामले को रफ़ा-दफ़ा करने की कोशिशें की जा रहीं हैं ? भा ज पा के नेता इस मसले पर मौन क्यों हैं  ? आदि ।
इस खबर का यहां उल्लेख कर यह बताना चाहता हूं कि एक बार फ़िर यह बात सच साबित हो रही है , कि ये सभी नेता एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं , और ये खुद ही साबित करने में भी लगे दिख रहे हैं कि  मरने वाले मरते रहें , राजनीति करने के लिये उनकी लाशें ही काफ़ी हैं । मुद्दा अच्छा है जनता के बीच हो - हल्ला करने-कराने के लिये । भोपाल में आज से पच्चीस साल पहले हुआ मौत का ताण्ड़व अब जब नई पीढ़ी को भी असह्य दर्द दे गया है  तब  भला उस पर मरहम लगाना छोड राजनीति करना कितना उचित है ? मगर नेताओं को क्या हर गरम तवे पर उन्की रोटी सिंकनी चाहिए बस ।  मगर हमार मानना तो यह  है कि काण्ड चाहे भोपाल का हो या फ़िर कोरबा का , न्याय और मानवीय संवेदनाएं तो कम से कम दोहरी नहीं होनी चाहिए । ना जाने नेता बन जाने के बाद इनकी संवेदनाएं कहाँ मर जातीं हैं ? राजनीति ही सर चढ़कर क्यों बोलती  है ?  बुद्धी-विवेक कहां चला जाता है ? लोगों की मौतें मानो इनकी किस्मत से हुई हों , मुख्य मुद्दा छोड ये आपस में  ही  तू-तू   मैं-मैं  करने लगते हैं और मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने में सफ़ल भी हो जाते हैं । समर्थक आपसी झगड़ों में सिर फ़ुटव्वल करते नजर आने लगते हैं ।  बड़ी ही दुर्भाग्यजनक बात है यह । शर्म आनी चाहिये  नेताओं को ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर आरोप - प्रत्यारोप  और दलगत  राजनीति करने करते हुए । आखिर कहाँ  जाकर  और कब जा कर सुधरेंगे आदमी से नेता बने ये लोग ???

जून 15, 2010

नेतागिरी हमारे छत्तीसगढ़ की

छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना सन 2000 में की गई । बिना किसी प्रयास के आसानी से बन गया था यह राज्य । राज्य बनते ही राजनीति ने यहां नई करवट ली। दिल्ली से फ़रमान आया और अजीत जोगी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैढ़ गए । इन्फ़्रास्ट्रक्चर ड़व्लपमेंट के साथ - साथ शुरु हो गया, गोरी चमड़ी और काली चमड़ी वालों की पहचान का सिलसिला , बेहद दुर्भाग्यजनक बात यह थी की इस वर्णभेद की राजनीति की शुरुआत किसी और ने नहीं बल्कि स्वयं अजीत जोगी ने की थी , इस बात को छत्तीसगढ़ की जनता अच्छी तरह से जानती है। समूचे प्रदेश मे भय का वातावरण बन गया था, अगड़े-सवर्णों में भय ज्यादा था और राजनीति से परे रहने वाले दूसरे लोग अचरज मे थे क्योंकि घर बैठे - बिठाए  ही ये बेचारे सवर्णों के दुश्मन कहे जा रहे थे । वैमनश्य का यह बीज गांव - गांव बोए जाने का प्रयास किया जा रहा था।  वो तो अच्छा हुआ की विधान सभा का चुनाव आ गया और तीसरी राजनैतिक पार्टी एन सी पी लेकर विद्याचरण शुक्ल चुनावी मैदान पर आ गये ।उनकी पार्टी ने 7% वोट हासिल किये एक सीट भी मिली लेकिन इस झगड़े में भारतीय जनता पार्टी को फ़ायदा हुआ ज्यादा सीटें जीत कर उसने अपनी सरकार बना ली।
लोगों ने मानो राहत की सांस ली । एक अध्याय समाप्त हुआ ।नई शुरुआत हुई ।
 भाजपा शासनकाल का पहला दौर प्रदेश मे सभी के लिए  मानो फ़ीलगुड़ का सा दौर रहा है।इसमें वो कांग्रेसी भी शामिल थे जिनकी जोगी काल में घोर उपेक्षा हुई थी। क्या जनता क्या नेता सभी खुश थे ,बद्लाव से । इसी बीच शुरु हो गया जमीन की दलाली का धंधा और खूब फ़लने-फ़ूलने लगा ,जिसका दौर अभी जारी है । इस धंधे ने यहां हमारे सभी राजनैतिक दलों के नेताओं को प्रभावित किया ,अपनी ओर आकर्षित किया ।यहां से राजनीति ने फ़िर एक बार करवट बदली और जो करवट बदली की आज भी उसी करवट में नेताओं को राजनीति रास आ रही है। अब जनता जाये भाड में , फ़िर कौन सा अभी सामने कोई चुनाव है कि उसकी परवाह की जाए । अब तो हमारे यहां राजनीतिक इच्क्षा शक्ति से मॉल - शॉपिंग कॉम्प्लेक्स  बनते हैं , पुराने आशियाने उजाडे जाते हैं । जमीनें सरकारी हों या निजी उन पर बेधड़क कब्जे किये जाते हैं। और बेचारी बनी पुलिस भी वही करती जैसा इशारा होता है।  कुछ चुनिंदा सड़कें साल में दो-चार बार बनाई जातीं हैं ।भाजपा के जिला अध्यक्ष बहुत बडे बिल्डर हैं जैसी बडी बिल्डिंग वो बनना चाह्ते हैं बनतीं हैं। गृह निर्माण मण्डल  अब गरीबों के लिये नहीं वरन करोड़ों की कीमत के घर अमीरों के लिये बनाता है। हमारे प्रदेश का अधिकारी बेखौफ़ विदेश धूमने जाता है ,पत्रकार कुछ ना कहें इसलिये उन्हें भी विदेश के नाम पर बैंकाक- पटाया घुमाया जाता है। बदले हुए परिवेश मे अब हमारे यहां प्रतिष्पर्धा इस बात की है कि कितने कम समय मे कौन कितना ज्यादा कमा कर दिखा सकता है।किसके पास कितनी ज्यादा जमीन है ? इस प्रतिष्पर्धा में बिना किसी भेद-भाव के वर्तमान और पूर्व दोनो मन्त्री लगे हुए हैं।महाराष्ट्र में इन्वेस्ट करने में भी इन सभी की रुचि समान रूप से देखी जा सकती है।
यह सब जानकर कैसा लगा आपको ? बताईएगा ।

जून 14, 2010

आओ मॉल-मॉल खेलें…

आओ मॉल-मॉल खेलें… रायपुर में यह खेल बच्चों के खेल की ही तरह खेला जा रहा है। फ़र्क केवल इतना है कि यह खेल यहां बच्चे नहीं ,बड़े खेल रहे हैं। जो जितना बड़ा है, वो उतना बड़ा मॉल बना रहा है। राजधानी बनने के बाद यहां पैसों की तो कोई कमी नहीं रही । कमी है तो मॉल के लिये जगह की। लेकिन अब यह कमी भी नहीं रहेगी । शहर में हर वो जगह जिस पर किसी बड़े आदमी की नजर है ,खाली करा दी जायेगी।  शहर के सारे तालाब पाटे जा रहे हैं, पेड़ एक-एक कर काटे जा रहे हैं। नहरें पहले ही पाट दी गई हैं। अब बारी है पुरानी गंज मन्डी की फ़िर गोल बाज़ार की फ़िर बूढ़ा तालाब की ।यानि कि कुछ सालों बाद हमारा शहर मॉलों का शहर हो जायेगा। हम चुपचाप यह सब देखते रह जायेंगे । हम आम लोग विरोध भी नहीं करेंगे , जैसी की हमारी आदत पड गई है । और शायद इसी कमजोरी का फ़ायदा उठाते आ रहे हैं लोग । खेती की जमीन - मध्यम वर्गीय लोगों के मकान-दुकान बिक रहे हैं ।इस खेल में बड़े मालामाल हो रहे हैं,छोटे और मध्यम वर्गीय लोग बेहाल हो रहे हैं।
कोई इन मालदारों से पूछ सकता है कि भैया जी ,सौ - पचास  सालों से बैठ्ते आ रहे छोटे-छोटे व्यवसायी जिनकी पीढ़ियां यहां इन्हीं छोटे से धन्धे के सहारे पली - बढ़ी है ,वो कहां जायेगी ? उनका क्या होगा? आपके मॉल मे वो दुकानें भला कैसे खरीद पायेंगे ? वहां वो क्या धंधा-पानी करेंगे ?अनके परिवार का क्या होगा? फ़िर सीधी और सरल बात यह कि आप उनका धंधा उजाड़ कर अपनी दुकान क्यों और कैसे सजायेंगे ? केवल पैसा है आपके पास इस बिना पर कुछ भी कर जायेंगे आप ?
खेद की बात तो यह भी है कि इस अन्धी दौड़ मे खुद प्रदेश की सरकार भी एक प्रतिद्वन्द्वी  की तरह लगी हुई है,फ़िर किससे समझदारी की उम्मीद की जाय ? आम आदमी का हित कौन सोचेगा ? ? ?
क्या सारे छोटे - छोटे बाज़ार उजाड कर मॉल बना देना ही उचित होगा ? क्या विकास के नाम पर सारे शहरों की मौलिकता मिटा देने के लिये हमने बनाई है सरकार ? क्या यही है हमारे कथित नेताओं की दूरदर्शिता ? क्या हांथ पर हांथ धरे बैठे रहना हम सभी की मजबूरी है ? सोचिए ।

जून 13, 2010

मन्त्री जी पहुँचे अघोरी बाबा की शरण में

खबर कहीं और की नहीं बल्कि छ्त्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की है।प्रदेश के एक बहुचर्चित मन्त्री एक अघोरी बाबा जी की शरण में पिछ्ले कुछ वर्षों से पड़े हैं।मन्त्री जी चाहते हैं बाबा जी उन्हें अपने  तन्त्र के प्रभाव से छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बना दें । ये मन्त्री जी अपने धनबल और बोलीबानी की वजह से केवल राजधानी में ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में  जाने-पहचाने जाते हैं ।छात्र राजनीति से मुख्यधारा में पहुंचे इन मन्त्री जी को पहले-पहल तलाश थी राजनीतिक जमीं की , जो उन्हें मुकम्मल हो गई , लेकिन अब उनके पास जमीन ही जमीन है   छत्तीसगढ़ से लेकर महाराष्ट्र तक  । बस गर कुछ नहीं है तो वो है मनचाहा पद ।धनबल पर इक्छित पद मिल नहीं पा रहा है , दिल्ली वाले मान नहीं रहे हैं । अब यह कुर्सी तन्त्र के दम पर मिलने की थोड़ी बहुत उम्मीदें जरूर दिख पड़ती है।  लेकिन सब कुछ इतना आसां भी तो नहिं है ना बाबा जी भी बहुत पहुँचे हुये हैं , सब कुछ भलीभांति जानते हैं । इन दिनों बाबा जी भी मन्त्री जी के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं । मन्त्री जी भी यथासंभव सब कुछ उपलब्ध कराने की चेष्टा करते देखे जा सकते हैं । बाबा जो चाहो लेलो ,बस एक बार मुख्यमंत्री बना दो ,बन गया तो आपको राजकीय अतिथी का दर्जा भी दे दूंगा , रुपयों से लाद दूंगा ,कभी कोई कमी न होगी। मगर बाबा भी जानते हैं कि ऐसा गर हो गया तो राज्य की प्रजा का , लोगों की जमीन-जायदाद का क्या हाल होगा ? बाबा जी किसी एक के नहीं वरन समुचे भारत वर्ष से प्रेम रखने वालों मे से हैं। भूमि(धरती-जमीन ) को अपनी माँ का दर्जा देते  हैं । फ़िर भला कैसे वो अपनी  धरती माँ  को  छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सौदागर के हांथों (राज्य की बागडोर) सौंपने के लिए तन्त्र का उपयोग होने देंगे ?  इस अति महत्वाकांक्षी राजनेता से शहर तो वाकिफ़ है ही समूचा प्रदेश भी इन्हें इनके स्वभावगत कारणों से जानता है । आप भी समझ ही गये होंगे । हमारा मानना है भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं ।ऊपर वाले को अगर आप भी  मानते हों तो प्रार्थना कीजियेगा कि हे नीली छ्तरी वाले छ्त्तीसगढ की रक्षा कीजियेगा ।  इनके और भी कारनामें पढ़ने मिलेंगे आपको ।


फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

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