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रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस

रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा   :  मो. नं. 9717630982 पर करें एसएमएस
रेलवे की एस.एम.एस. शिकायत सुविधा : मो. नं. 9717630982 पर करें एस.एम.एस. -- -- -- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ट्रेन में आने वाली दिक्कतों संबंधी यात्रियों की शिकायत के लिए रेलवे ने एसएमएस शिकायत सुविधा शुरू की थी। इसके जरिए कोई भी यात्री इस मोबाइल नंबर 9717630982 पर एसएमएस भेजकर अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। नंबर के साथ लगे सर्वर से शिकायत कंट्रोल के जरिए संबंधित डिवीजन के अधिकारी के पास पहुंच जाती है। जिस कारण चंद ही मिनटों पर शिकायत पर कार्रवाई भी शुरू हो जाती है।

अगस्त 31, 2010

भगवा आतंकवाद मामला अदालत पंहुचा

‘भगवा आतंकवाद’ शब्द प्रयोग विवाद तूल पकड़ने के बाद अब अदालत पहुंच गया है। सोमवार को ब्रह्मचारी स्वामी नित्यामंद तीर्थ ने अहमदाबाद मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत-क्रमांक-5 में चिदंबरम के खिलाफ मानहानि का दावा किया है। केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का प्रयोग किया था ।
स्वामी ने अधिवक्ता विराट पोपट के माध्यम से दावा किया है। इसमें कहा गया है कि ‘भगवा आतंकवाद’ कह कर केंद्रीय गृहमंत्री ने साधु-समाज पर आतंकी होने का आरोप लगाया है। भारत में भगवा शब्द केवल और केवल साधु-सन्यासी के साथ जुड़ा हुआ है। इस लिए केन्द्रीय गृह मंत्री के उक्त आशय के विचार से साधु-समाज की बदनामी हुई है। अदालत ने स्वामीजी की शिकायत दर्ज कर शिकायकर्ता को और अधिक प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए छह सितंबर तक का समय दिया है। स्वामीजी के अधिवक्ता विराट पोपट ने ब्यौरा देने से इंकार कर दिया।
कार्रवाई इसलिए की: स्वामी नित्यामंद ने कहा है कि चिदंबरम के बयान से मुझे बहुत दु:ख पहुंचा है। बार-बार इस बयान को टीवी चैनलों पर दिखाए जाने से जनमानस में साधु समाज की छवि धूमिल हुई है। इतना ही नहीं एक-दो दिन पहले कुछ लोगों ने आतंकवादी कह कर स्वामी निजानंद तीर्थ का उपहास किया था। इस पर स्वामीजी ने केन्द्रीय गृहमंत्री के खिलाफ मानहानि का दावा करने का फैसला किया ।

"डॉक्टर" अब हैं क्या ?


समाज ने डॉक्टरों को भगवान के समान या फ़िर भगवान के बाद का दर्जा दिया है । लेकिन डॉक्टर्स हैं कि यह कहते हैं कि वे कोई भगवान या उसके बाद नहीं हैं ,वे तो "प्रोफ़ेशनल" हैं । उन्हें जबर्दस्ती महान न बनाया जाय । 
वर्तमान समय में डॉक्टरी का पेशा समाज में जैसा पेश आने लगा है उस पर आप सभी साथियों - प्रबुद्ध जनों के विचार सादर आमंत्रित हैं । 
कृपया अपने विचारों से अवगत कराने की महती कृपा करें । धन्यवाद

अगस्त 28, 2010

आतंकवाद और राजनीति


'भगवा आतंकवाद' पर चिदम्बरम ने चेताया
केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने बुधवार को 'भगवा' सहित आतंकवाद के विभिन्न स्वरूपों के प्रति जहां देश को आगाह किया वहीं जम्मू एवं कश्मीर में जारी हिंसा के दौर पर यह खुलासा किया कि सुरक्षा बलों को वहां अधिक से अधिक संयम बरतने के निर्देश दिए गए हैं।राज्यों के पुलिस महानिदेशकों व पुलिस महानिरीक्षकों के तीन दिवसीय सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए चिदंबरम ने बुधवार को यह बातें कहीं। उन्होंने यह भी कहा कि नक्सलियों ने सरकार की वार्ता की पेशकश का विश्वसनीय जवाब नहीं दिया है। उन्होंने स्वीकार किया कि नक्सली हिंसा पर काबू पाने में वर्षो लगेंगे।इस 45वें सम्मेलन में चिदम्बरम ने कहा, "मैं आपको आगाह करना चाहता हूं कि देश के युवक और युवतियों में कट्टरवाद जगाने की कोशिश की जा रही है।"
उन्होंने कहा कि हाल ही में भगवा आतंकवाद की प्रवृत्ति देखने को मिली है। बम विस्फोटों की कई घटनाएं इसी ओर इशारा करती हैं। "मेरी सलाह है कि हमें सतर्क रहना होगा और राज्य एवं केन्द्रीय स्तर पर आतंकवाद से निपटने की क्षमता विकसित करते रहना होगा।"
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चिदंबरम के इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार अपनी नाकामियों से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है।भाजपा प्रवक्ता राजीव प्रताप रूड़ी ने कहा, "देश में इस समय काफी उथल-पुथल भरा दौर है। चिदम्बरम को उस ओर से देश का ध्यान बंटाने के लिए बहाने की जरूरत है।"
उन्होंने सरकार पर हिंदुओं को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए कहा कि आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता
जम्मू एवं कश्मीर में जारी हिंसा के दौर का जिक्र करते हुए चिदंबरम ने कहा, "हम इस बात से चिंतित हैं कि राज्य आज जिस कुचक्र में फंसा हुआ है, उससे हम उसे निकाल पाने में सफल नहीं रहे हैं। इसके बावजूद सुरक्षा बलों को वहां अधिक से अधिक संयम बरतने के निर्देश दिए गए हैं।"
उन्होंने कहा, "मुझे भय है कि जम्मू एवं कश्मीर अब पथराव, लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोलों और गोलीबारी से होने वाली मौतों और इसके जवाब में और पथराव की एक श्रृंखला से घिर गया है।"
"मुझे विश्वास है कि अगले कुछ दिनों में ऐसी स्थिति तक पहुंचने में सफल होंगे, जहां से हम प्रदर्शनकारियों तक पहुंच सकेंगे और उन्हें उनके अधिकारों और गरिमा के प्रति आश्वस्त कर शांति तथा कानून-व्यवस्था बहाल कर वार्ता की प्रक्रिया फिर शुरू करेंगे, जिससे एक हल निकलेगा।"
नक्सल समस्या पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने स्वीकार किया कि नक्सलियों के साथ संघर्ष लंबा खिंच सकता है और इस संघर्ष को सुलझाने में धैर्य बहुत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा, "हमने राज्यों से नवम्बर 2009 में ही स्पष्ट कर दिया था कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) पर नियंत्रण करने और उनके हमलों को रोकने में वर्षो लगेंगे।" चिदम्बरम ने कहा, "मेरे विचार से भले ही हमारी आलोचना करने वाले न समझें लेकिन देश की जनता यह समझती है कि नक्सलियों से लंबा संघर्ष चलेगा और इसमें धर्य महत्वूपर्ण होगा।"चिदम्बरम ने पुलिस बलों के आधुनिकीकरण के लिए केन्द्रीय अनुदान राज्य सरकारों को देने की बजाए सीधे पुलिस प्रमुखों को देने का सुझाव भी दिया। उनके इस सुझाव को राज्य सरकारों द्वारा पसंद न किए जाने की संभावना है। उन्होंने कहा, "हमें पुलिस बलों का आधुनिकीकरण (एमपीएस) योजना के तहत अनुदान भेजने की एक प्रणाली तैयार करनी चाहिए।"
महज महीना भर पहले 54वीं राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने राज्य की व्यवस्थापिकाओं को नजरदांज करते हुए विभिन्न एजेंसियों को सीधे अनुदान भेजने की केन्द्र सरकार की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति विरोध जाहिर किया था। चिदम्बरम ने पुलिस प्रमुखों से जानना चाहा, "क्या उनकी राज्य सरकार एमपीएफ में जरूरी 25 फीसदी योगदान दे रही है? " उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि आप लोगों को बताएंगे कि आपकी राज्य सरकार ने सही मायनों में पुलिस के लिए आवंटन बढ़ाया है या नहीं .

नितिन को चुभा चिंदबरम का 'भगवा आतंकवाद'

भोपाल: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के उस बयान पर नाराजगी जताई गई है जिसमें चिंदबरम ने कहा है कि देश में कई धमाकों के पीछे "भगवा आतंकवाद" का हाथ है।
चिदंबरम के बयान से नाराज भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने गुरुवार को प्रेस कॉफ्रेंस में कहा कि  "भगवा आतंकवाद जैसा कोई शब्द नहीं होता।" नितिन ने कहा कि भगवा के ऊपर आतंकवाद के आरोप मढ़ना कांग्रेस की मानसिकता को दर्शाता है।
गडकरी ने कॉफ्रेंस में कहा की भगवा आंतकवाद की बात कहकर चिंदबरम बहुसंख्‍य लोगों के दिलों को ठेस पहुंचा रहे हैं। उन्होंने कहा कि असली आतंककारियों से ध्यान हटाने के लिए यह कांग्रेस की चाल है। उल्लेखनीय है कि गृहमंत्री चिदंबरम ने बुधवार को पुलिस प्रमुखों की बैठक में कहा था कि भगवा आतंकवाद के रूप में एक नई चीज सामने आई है। उन्होंने कहा था कि देश में कई धमाकों के पीछे भगवा आतंकवाद का हाथ रहा है। उन्होंने कहा था कि भारत में युवकों और युवतियों को कट्टर बनाने के प्रयास बंद नहीं हुए हैं। हाल ही में हुए कई बम विस्फोटों से भगवा आतंकवाद का नया स्वरूप सामने आया है। हमें हमेशा सतर्कता बरतने के साथ साथ आतंकवाद से निपटने के मामले में केन्द्र एवं राज्यों के स्तर पर क्षमता विस्तार करने की जरूरत है।
‘भगवा आतंकवाद’ पर कांग्रेस की सफाई
 केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम द्वारा राज्यों के पुलिस प्रमुखों के सम्मेलन में ‘भगवा आतंकवाद’ पर की गई टिप्पणी को लेकर शुक्रवार को हंगामा मचा रहा। जहां इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना के हंगामे के कारण राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी, वहीं दूसरी ओर हिंदू संगठनों ने इंदौर में विरोध प्रदर्शन किया और चिदंबरम का पुतला फूंका। इस बीच कांग्रेस ने कहा कि मुद्दा रंग का नहीं आतंकवाद का है।
कांग्रेस महासचिव जर्नादन द्विवेदी ने संवाददाताओं से कहा, ‘सैफ्रॉन, भगवा या केसरिया कोई मुद्दा नहीं है। मुद्दा आतंकवाद है। आतंकवाद का कोई रंग नहीं होता। इसका एक मात्र रंग काला ही होता है।’
कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी द्विवेदी ने कहा कि चाहे इसे भगवा, हरा, सफेद या लाल कहें, आतंकवाद तो आतंकवाद है।
उन्होंने कहा, ‘आतंकवाद तो आतंकवाद है और वह जिस भी रूप में सामने आए, इसका विरोध किया जाना चाहिए। भगवा रंग हमारी प्राचीन परंपरा का हिस्सा रहा है और यह हमारे आजादी के आंदोलन से जुड़ा रहा है। समाज के किसी खास वर्ग का इस पर अकेले अधिकार नहीं है।

हिन्दू आतंकवाद का भूत दिखा रही है कांग्रेस : संघ 

 राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) का मानना है कि महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार की कथित जन विरोधी नीतियां कहीं 'युवराज' राहुल गांधी की ताजपोशी में बाधा न पैदा कर दें, इसलिए कांग्रेस 'हिन्दू आतंकवाद' का भूत खड़ा कर रही है।
आरएसएस के मुखपत्र 'पांचजन्य' के ताजा अंक के संपादकीय में कहा गया है, "संघ को बदनाम करने के लिए कांग्रेस की ओर से एक सुनियोजित साजिश के तहत हिन्दू आतंकवाद का भूत खड़ा किया जा रहा है।"
इसमें कहा गया है कि 'हिन्दू आतंकवाद' जैसे छद्म शब्द गढ़कर संघ को उससे जोड़ना कांग्रेस की ओछी राजनीति के अलावा कुछ और नहीं है। किसी इक्का-दुक्का हिन्दू मंच के आक्रोश को 'हिन्दू आतंकवाद' का नाम देना राजनीति ही कही जा सकती है।
संपादकीय में कहा गया है, "कांग्रेस चुनावी लाभ के लिए कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहती है, चाहे राहुल गांधी का वर्ष 2012 का उत्तर प्रदेश अभियान हो या फिर वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव। महंगाई, आतंकवाद, नक्सलवाद और भ्रष्टाचार पर सरकार की जन विरोधी नीतियों का दंश राहुल गांधी की ताजपोशी के लिए खतरा न बन जाए इसके लिए कांग्रेस मुस्लिम वोट पर एकाधिकार चाहती है। उसकी इसी चाह से 'हिन्दू आतंकवाद' का भूत निकला है।"
संघ ने कहा है कि मालेगांव विस्फोट में साध्वी प्रज्ञा की गिरफ्तारी का मामला हो या फिर अजमेर दरगाह विस्फोट कांड में आरोपी बनाए गए देवेंद्र गुप्ता का, जांच एजेंसियां कोई ठोस आधार स्थापित नहीं कर पाई हैं। पूछताछ के नाम पर उनकी पहचान को मीडिया के माध्यम से सुनियोजित तरीके से दुष्प्रचारित कर संघ को बदनाम करने की कोशिश की गई।
गौरतलब है कि हाल ही में एक समाचार चैनल पर संघ के एक पदाधिकारी को कथित तौर पर 'हिन्दू आतंकवाद' से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होने से संबंधित रिपोर्ट प्रसारित की गई थी। इस रिपोर्ट के प्रसारित होने के बाद संघ के कार्यकर्ताओं ने समाचार चैनल के दफ्तर पर हमला भी किया था।

अगस्त 27, 2010

चीन ने भारतीय सेना के जनरल को वीजा देने से इंकार किया


 चीन ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दे को तूल देते हुए चीन जा रहे एक भारतीय सैन्य प्रतिनिधिमंडल में शामिल भारतीय सेना की उत्तरी कमांड के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल बी. एस. जसवाल को वीजा देने से इसलिए इंकार किया है, क्योंकि वे जम्मू व कश्मीर में तैनात हैं।
गौरतलब है कि चीन जम्मू व कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानता है।
चीन ने भारत से कहा था कि वह प्रतिनिधिमंडल से जनरल जसवाल को हटा दे, लेकिन भारत ने प्रतिनिधिमंडल में किसी भी तरह का बदलाव करने से इंकार कर दिया और यह सैन्य दौरा ही स्थगित कर दिया है।
 उधर, जम्मू एवं कश्मीर में तैनात सेना के एक वरिष्ठ जनरल को चीन के वीजा देने से इंकार करने संबंधी खबरों के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि चीन और भारत को एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।मंत्रालय के प्रवक्ता विष्णु प्रकाश ने कहा, "जहां हम चीन के साथ आदान-प्रदान को महत्व देते हैं, वहीं एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता भी होनी चाहिए।"
एक मीडिया रिपोर्ट में यह कहा गया कि उत्तरी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग इन चीफ बी. एस. जसवाल को एक उच्च स्तरीय आदान-प्रदान कार्यक्रम के तहत चीन दौरे पर जाना था, लेकिन उनके नियंत्रण में जम्मू एवं कश्मीर का क्षेत्र आने के कारण चीन ने उन्हें वीजा देने से इंकार कर दिया।
बहरहाल प्रकाश ने कहा कि वह दौरा कुछ कारणों से रद्द हो गया था।
प्रवक्ता ने कहा कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए चीन के साथ वार्ता जारी है।
एक दैनिक अखबार की खबर के अनुसार वरिष्ठ जनरल को वीजा देने से इंकार के बाद चीन के दो सैन्य अधिकारियों के नेशनल डिफेंस कॉलेज के दौरे को रोक दिया गया है।
इस मुद्दे से जुड़ी खबरों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए रक्षामंत्री ए. के. एंटनी ने भारत द्वारा चीन के साथ रक्षा संबंध तोड़े जाने से इंकार किया।
मिश्र धातु निगम लिमिटेड (एमआईडीएचएएनआई) में शुक्रवार को एक कार्यक्रम के दौरान संवाददाताओं से बातचीत में एंटनी ने कहा, "संबंध तोड़ने का सवाल ही नहीं उठता।"
उन्होंने कहा कि समय-समय पर समस्याएं आती रहती हैं, लेकिन उनसे व्यापक रुख नहीं प्रभावित होगा।

अगस्त 26, 2010

नौकरानी के शरीर में 23 कीलें ठोंक दीं

सऊदी अरब के एक परिवार ने दरिंदगी की सारी हदों को पार करते हुए अपनी नौकरानी के शरीर में 23 कीलें ठोंक दीं। अमानवीय यातनाएं झेलने के बाद श्रीलंका की यह नौकरानी अपने देश लौट गई है, जहां उसका इलाज चल रहा है। नौकरानी की पहचान आरियावथी (50) के रूप में हुई है।
श्रीलंका के न्यूज चैनल ‘न्यूजफस्र्ट सिरासा’ पर प्रसारित फुटेज में नौकरानी ने उन जख्मों के निशान दिखाए, जहां वक्त-वक्त पर कीलें ठोंकी गई थीं। उसने बताया कि उसे दिनभर काम करना पड़ता था। यदि वह थकान के बाद सुस्ताने की कोशिश करती तो दंड देने के लिए शरीर में कील ठोंक दी जाती।
उसके मालिकों ने धमकी दी थी कि यदि उसने इसका खुलासा किया तो उसे जान से मार दिया जाएगा। रियाद स्थित श्रीलंकाई दूतावास के एक अधिकारी ने कहा कि नौकरी दिलवाने वाले एजेंट ने इस बारे में दूतावास को कोई जानकारी नहीं दी। और महिला को स्वदेश भेज दिया। उन्हें विदेश मंत्रालय से इस बारे में शिकायत मिली है। इस बारे में जल्द कार्रवाई की जाएगी ।दरिदंगी के आगे मानवता फ़िर एक बार हुई है शर्मसार । 

100 वाँ जन्म दिन है आज इनका


मदर टेरेसा

मदर टेरसा
अग्नेसे गोंकशे बोजशियु
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मदर टेरसा
जन्म26 अगस्त 1910
उस्कुब, ओटोमन साम्राज्य (आज का सोप्जे,मेसेडोनिया गणराज्य)
मृत्यु5 सितंबर 1997 (87वर्ष )
कोलकाताभारत
राष्ट्रीयताअल्बीनियाई
व्यवसायरोमन केथोलिक नन, मानवतावादी
मदर टेरेसा ( २६ अगस्त, १९१० ५ सितम्बर, १९९७) का जन्म अग्नेसे गोंकशे बोजशियु के नाम से एक अल्बेनीयाई परिवार में उस्कुब, ओटोमन साम्राज्य (आज का सोप्जे, मेसेडोनिया गणराज्य) में हुआ था। मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं, जिनके पास भारतीय नागरिकता थी। उन्होंने १९५० में कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी की स्थापना की। ४५ सालों तक गरीब, बीमार, अनाथ, और मरते हुए इन्होंने लोगों की मदद की और साथ ही चेरिटी के मिशनरीज के प्रसार का भी मार्ग प्रशस्त किया।
१९७० तक वे ग़रीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्द हो गयीं, माल्कोम मुगेरिज के कई वृत्तचित्र और पुस्तक जैसेसमथिंग ब्यूटीफुल फॉर गोड में इसका उल्लेख किया गया। उन्होंने १९७९ में नोबेल शांति पुरस्कार और १९८० में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा के जीवनकाल में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी का कार्य लगातार विस्तृत होता रहा और उनकी मृत्यु के समय तक यह १२३ देशों में ६१० मिशन नियंत्रित कर रही थी। इसमें एचआईवी/एड्सकुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं/ घर शामिल थे, और साथ ही सूप रसोई, बच्चों और परिवार के लिए परामर्श कार्यक्रम, अनाथालय और विद्यालय भी थे। मदर टेरसा की मृत्यु के बाद उन्हें पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया और उन्हें कोलकाता की धन्य की उपाधि प्रदान की।

अगस्त 20, 2010

मुम्बई के धोबी जाएं तेल लेने …

आईये साहबान विकास के नाम काँक्रिट के जंगलों में करें एक और नायाब काम । जी हाँ , राज ठाकरे की मुम्बई में अब सामत आई है धोबियों की । मुम्बई के धोबी घाट पर अब नजर है वहां के बिल्डरों की ,इन्होने बी एम सी को आगे किया है । बी एम सी का कहना है - जिस जगह पर धोबी कपडे धोते हैं - सुखाते हैं ,वह जगह बी एम सी की है और अब उसे वापस चाहिए । वहां वह विकास की नई गंगा बहाएगी । सदियों से यहां काम करते आ रहे धोबी जाएं तेल लेने । कुछ को कपडा सुखाने की मशीनें दे दी जायेंगी ,उनसे उनकी जगह छीनने के बाद । याने विरासत का मिटना तय है । बिल्डर्स ने नेताओंको अपना सपना मनी-मनी जो दिखा दिया है । अब जनता को दिखाने - भरमाने के लिए ये लालची बंदर आपस में दिखावटी-राजनीतिक उठा पटक का खेल करके दिखायेंगे , मीडिया अपनी प्लांड भूमिका का निर्वाह करता दिखेगा और इन सब के बाद पूर्व निर्धारित बिल्डर्स को उनकी चिन्हित जमीनें दे दी जायेंगी ।  इस विकास की कीमत चुकायेंगे दस हजार धोबी परिवार , जिनकी पीढ़ियों ने मुंम्बई के लोगों के कपडों मे चमक - दमक लाने का काम पूरी निष्ठा से किया था ,बगैर यह सोचे कि ऐसा भी एक दिन आयेगा। हद कर दी है लालच ने  , अमानवीय - असंवेदनशील शासन-प्रशासन ने । ऐसे कृत्यों को समय रहते  रोका जाना चाहिए , ह्तोत्साहित किया जाना चाहिए ।

क्या आप सभी सहमत हैं ???



  रायपुर विकास प्राधिकरण  की  कमल विहार योजना  में रिंग रोड का निर्माण अक्टूबर में शुरु किए जाने की संभावना है.आवास एवं पर्यावरण मंत्री श्री राजेश मूणत के निर्देश पर प्राधिकरण ने इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर निविदा सूचना जारी कर 28 सितंबर तक निविदा आमंत्रित की है. रिंग रोड निर्माण के साथ नाली - पुलिया का निर्माण भी किया जाएगा. सड़क निर्माण के साथ ही निर्माण एजेंसी को पांच साल तक रिंग रोड का रखरखाव भी करना होगा. प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी श्री अमित कटारिया के अनुसार लगभग 26 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली रिंग रोड की लंबाई 3.36 किलोमीटर तथा चौडाई 75 मीटर होगी. सड़क का निर्माण का समय 12 माह होगा. रिंग रोड के मुख्य मार्ग में चार लेन तथा दो सर्विस लेन होगी. इसके अतिरिक्त सड़क के साथ स्ट्रीट लाईटिंग, सर्विस डक्ट, भूमिगत नालियां, हरित गलियारा, फुटपाथ व सायकल ट्रैक का प्रावधान होगा. रिंग रोड निर्माण के लिए सक्षम एवं अनुभवी ठेकेदार के चयन के पहले प्राधिकरण ने 21 सितंबर को एक प्री बिड मीटिंग का आयोजन किया है जिसमें ठेकेदारों को योजना के संबंध में विस्तृत जानकारी दी जाएगी.रिंग रोड का निर्माण लोक निर्माण विभाग के सड़क व भवन निर्माण के शिड्यूल ऑफ रेट की दरों के प्रतिशत आधार पर किया जाएगा.रिंग रोड निर्माण के लिए ऐसे ठेकेदार का चयन किया जाएगा जिसे कम से कम से कम दो लेन की सड़कों का नाली - पुलिया सहित निर्माण करने का अच्छा अनुभव हो तथा पिछले तीन सालों में कम से कम 19.5 करोड़ रुपए का कार्य किया हो. उल्लेखनीय है कि राज्य शासन के निर्देश पर रायपुर विकास प्राधिकरण द्वारा नगर विकास योजना क्रमांक 4 - कमल विहार तैयार कर 16 जुलाई को छत्तीसगढ़ राजपत्र में इसका अंतिम प्रकाशन कर दिया है. ग्राम डूंडा, बोरियाखुर्द, टिकरापारा, देवपुरी व डुमरतराई के भाग में बनने वाली यह योजना जनभागीदारी के साथ लगभग 16 सौ एकड़ में क्रियान्वित की जाएगी. इसमें भूस्वामियों की अविकसित भूमियों का पुनर्गठन कर उन्हें विकसित भूखंड दिए जाएंगे. जनभागीदारी के साथ बनने वाली यह योजना छत्तीसगढ़ ही नहीं वरन देश की सबसे बड़ी आवासीय योजनाओं में से एक होगी. ऐसा कहना है रायपुर विकास प्राधिकरण का । क्या आप सभी सहमत हैं  रायपुर विकास प्राधिकरण की इस योजना से ? उनकी कथनी पर भरोसा है ? जरूरी समझें तो अपनी राय जरूर दें ।

अगस्त 19, 2010

अतिथि तुम कब आओगे ???


बीते सप्ताह हमारे यहाँ  मेहमानआए थे । हमें अच्छा लगा ।  मेहमान 8-10 रोज रुके । तब हमारी सुबह 6 बजे होती थी और बच्चों की साढ़े 6 बजे । नित्य कर्म , पूजा-पाठ , भोजन , घूमना-फ़िरना, रात का खाना ,सोना सब कुछ समय पर होता था । क्या बच्चे और क्या बडे सभी को मजा आ रहा था । दिनचर्या जैसे ठीक हो रही थी । हमारी "आलस" मानो उदास हो गई थी । लेकिन फ़िर आ गया वो दिन भी जब  मेहमानको वापस अपने घर जाना था । रिजर्वेशन की डेट सर पर आ खड़ी हुई , ट्रेन के आने का समय भी समीप आने लगा , मन मानो बैठने लगा । पर कुछ कर पाए हम सब । स्टेशन गये, ट्रेन आई और ले गई अतिथियों को पहुँचाने उनके गंतव्य तक ,हुम सब उदास मन लिए लौट आये अपने घर ।दूसरे दिन सुबह हुई ,तब साढ़े सात बज रहे थे,दिनचर्या सब पहले ही की तरह गडमड । कल जैसी स्फ़ूर्ती नहीं थी ।सब अपनी-अपनी मर्जी से चल रहे थे । कल जैसा उत्साह-उमंग भरा दिन नहीं  था यह आज का दिन ।तब से मन आज भी पूछ्ता है "अतिथि आप फ़िर कब आओगे" ?   मेहमान कोई और नहीं बच्चों के नाना-नानी थे ।
एकल परिवार में बडे बुजुर्गों का "साया" मिल जाए तो सोना है ।
सच ही कहा है गालिब ने -  दुनियाँजिसे कहते हैं जादू का खिलौना है , मिल जाए तो मिट्टी है , खो जाए तो सोना है ।

अगस्त 18, 2010

देश और दुनियाँ के गरीब देशों में " छत्तीसगढ़" भी

"ऑक्सफ़ोर्ड पॉवर्टी एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव" नामक संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित संस्था जिसको विश्व स्तरीय मान्यता प्राप्त है ,का अध्यन है कि छत्तीसगढ़ में  भी अफ़्रीकी देशों जैसी ही गरीबी है -निर्धनता है।शर्म आनी चाहिए हमारे उन सभी नेताओं को जिन्होने  छत्तीसगढ़ के विकास के नाम पर अरबों - खरबों रुपए फ़ूंक डाले और यह भी साबित कर दिखाया कि उन रुपयों से उन्होंने किसका विकास किया है ।
संस्था की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत के आठ राज्यों में अफ़्रीका के 26 सर्वाधिक  गरीब देशों से भी ज्यादा गरीबी है । ये गरीबी भोग रहे राज्य हैं - बिहार,झारखंड, मध्य प्रदेश,  छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल ।और ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि इसकी जानकारी भारत सरकार को भी है। भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने बकायदा राज्यसभा में इस बात को स्वीकार भी किया है । उनकी इस स्वीकारोक्ति के पीछे गर्वोक्ति छिपी थी या शर्म यह पता नहीं चल पाया , लेकिन देश जरूर शर्मसार है कि उसके पास ऐसे नेताओं की ही भरमार है । देश को  गरीब रख कर खुद को अमीर बनाने वाले नेताओं से आखिर कब और कैसे निजात मिल पायेगी ? ये बेशर्मी से अपनी तनख्वाह बढ़ाने जा रहे हैं । अरे शर्म करो, निर्लज्जों । छत्तीसगढ़ का हाल यह है कि यहाँ कल तक  सड़कों की धूल फ़ांकने वाले कथित नेता आज के अरब पति बने बैठे हैं ,बिना किसी व्यवसाय के । और प्रदेश के लोगों की गरीबी दिनों दिन बढ़ती जा रही है । इन गरीबों को सस्ता चांवल देने के नाम पर भी यहाँ नेता और उनके चंद व्यापारी लाल हुए जा रहे हैं । गरीबों का बुरा हाल है । कागजी विकास, कांक्रीट के जंगलों का विकास , यहाँ का मूल मुद्दा है जिसे लेकर सभी राजनैतिक पार्टियों में एका है ।गरीबों की खेतिहर जमीनें जबर्दस्ती खरीदीं-बिकवाई जा रही हैं । इस काम में क्या मंत्री और क्या संत्री सभी पूरे जोरशोर से लगे देखे जा सकते हैं । भला कोई बताए कैसे और कब होगी यहां से गरीबी दूर , जहाँ के रक्षक ही भक्षक बन बैठे हैं ???

अगस्त 17, 2010

अब इन्हें भी चाहिए ज्यादा तनख्वाह !!!


सचमुच मेरा भारत महान है । मेरे देश के कथित नेता अब झगड़ रहें हैं अपना वेतन बढ़ाने के लिए , क्योंकि मंहगाई की डायन उन्हें भी तंग कर रही है , ऐसा उनका कहना है । मंहगाई से समूचा देश परेशान है , और जिन्हें मंहगाई कम करना है वे ही मंहगाई से अपने आप को परेशान बता कर अपना वेतन 16 से 80 हजार करना चाह रहे हैं । हद है बेशर्मी की । देखिए इसके लिए ये क्या-क्या कर रहे हैं -
    वेतन  बढ़ाने के मामले पर सांसदों ने आज लोकसभा में जमकर हंगामा किया। वामपंथियों के अलावा सभी सांसद इस मुद्दे पर एकमत थे कि  वेतन  बढ़ाने कि सिफारिश पर तुरंत अमल किया जाए। हंगामा इतना बढ़ा कि लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। मालूम हो कि कल कैबिनेट ने इस मसले को टाल दिया था।दरअसल सोमवार को कैबिनेट ने सांसदों का वेतन बढ़ाने का मसला यह कहकर टाल दिया था कि महंगाई की मार के बीच ऐसा करने का गलत संदेश जाएगा लेकिन मंगलवार को सांसदों ने ऐसा बवाल काटा कि लोकसभा की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। सांसदों का कहना था कि महंगाई की मार के वे भी शिकार हैं और उन्हें क्लर्क के बराबर भी   वेतन नहीं मिलता। इस हंगामे में वामपंथियों को छोड़कर सभी दलों के सांसद शामिल थे। गौरतलब है कि संसद की स्थाई समिति ने सिफारिश की है कि सांसदों की महीने की तनख्वाह 16,000 रुपये से बढ़ा कर 80,001 रुपये मतलब केंद्र सरकार के सचिव स्तर के अफसर से एक रुपया अधिक कर दिया जाए। वहीं संसदीय कार्य मंत्रालय ने सांसद का वेतन 50000 रुपये करने की सिफारिश की है।
सरकार द्वारा सांसदों की   वेतन  वृद्धि का फैसला टाले जाने पर लालू प्रसाद यादव ने विरोध किया और हंगामें के चलते सदन की कार्यवाही दो घंटे के लिए स्थगित की गई। शून्य काल शुरू होते ही लालू प्रसाद यादव ने सांसदों की वेतन वृद्धि का फैसला टाले जाने का विरोध किया। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव बहुजन समाज पार्टी, शिव सेना और तृणमूल कांग्रेस ने भी राजद अध्यक्ष का साथ दिया। सांसदों के हमगामें का जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मंगलवार को कहा कि सांसदों की वेतन वृद्धि के लिए सदन के मौजूदा सत्र में सरकार विधेयक प्रस्तुत करेगी। लोकसभा में मुखर्जी ने बताया कि सरकार इस विधेयक को जल्द से जल्द पेश करने के लिए तैयार है।
उधर इस मामले पर लेफ्ट का कहना है कि सांसद अपना   वेतन   खुद बढ़ा लें, यह अनैतिक है। इस पर क्रियान्वयन के लिए अलग से विचार किया जाना चाहिए। लेफ्ट के इस रुख को देखकर लोकसभा के अंदर हुए हंगामे में शामिल बीजेपी ने भी आयोग के पक्ष में बयान जारी कर दिया। लोकसभा में हुए हंगामे में सासंदों का यह दर्द बार-बार छलका कि उन्हें आमतौर पर भ्रष्ट माना जाने लगा है। लोगों को ये भी देखना चाहिए कि इतनी कम तनख्वाह में एक ईमानदार सांसद का घर भी नहीं चल सकता। वैसे, सिद्धांत रूप से सरकार को वेतन बढ़ोतरी से एतराज नहीं है। ये बढ़ोतरी पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के समय से लागू होगी। यानी लाखों को एरयिर भी तय है।

 वेतन बढ़ाने की मांग अनैतिक भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल के कार्यकारी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने आज संसद के दोनों सदनों में अपनी पार्टी के सदस्यों से कहा कि   वेतन   में प्रस्तावित बढ़ोतरी पर अपने विचार सार्वजनिक तौर पर नहीं रखें क्योंकि सांसदों द्वारा अपना ही   वेतन   बढ़ाने की मांग उठाना अनैतिक है ।आडवाणी ने आज संसदीय दल की साप्ताहिक बैठक में कहा कि सांसदों को अपने   वेतन   भत्ते बढ़ाने के मुद्दे पर मीडिया के सामने नहीं बोलना चाहिए या सार्वजनिक तौर पर विचार नहीं रखने चाहिए.। भाजपा के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि उन्हें लगता है कि सांसदों के वेतन और भत्तों को लेकर समय-समय पर फ़ैसला करने के लिए वेतन आयोग की तरह ही एक निकाय होना चाहिए. आडवाणी इसके सख्त खिलाफ़ हैं कि सांसद खुद ही यह फ़ैसला करें कि उनका वेतन कितना होना चाहिए । पार्टी के आला नेताओं समेत अधिकतर सांसदों का मानना है कि सांसदों को वर्तमान में मिल रहा वेतन काफ़ी कम है और इसे बढ़ाया जाना चाहिए लेकिन उनका सोचना है कि इस मुद्दे से निपटने के लिए एक व्यवस्था होनी चाहिए । पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने कहा कि सरकार ने खुद ही संयुक्त संसदीय समिति गठित करके यह कवायद शुरू की ।  इस समिति ने सांसदों का वेतन 16 हजार से बढ़ाकर सीधे 80 हजार रुपये करने की सिफ़ारिश की ।  अब खुद सरकार के ही कुछ मंत्री इसका विरोध कर रहे हैं ।

भारतीय तिरंगे का इतिहास


स्वतंत्रता दिवस मना लिया , अब पाँच माह बाद मनाएंगे गणतंत्र दिवस । फ़हराएंगें तिरंगा । आईये जान लें कुछ अपने  राष्ट्र ध्वज के विषय में भी ।

महात्‍मा गांधी ने कहा था -
"सभी राष्‍ट्रों के लिए एक ध्‍वज होना अनिवार्य है। लाखों लोगों ने इस पर अपनी जान न्‍यौछावर की है। यह एक प्रकार की पूजा है, जिसे नष्‍ट करना पाप होगा। ध्‍वज एक आदर्श का प्रतिनिधित्‍व करता है। यूनियन जैक अंग्रेजों के मन में भावनाएं जगाता है जिसकी शक्ति को मापना कठिन है। अमेरिकी नागरिकों के लिए ध्‍वज पर बने सितारे और पट्टियों का अर्थ उनकी दुनिया है। इस्‍लाम धर्म में सितारे और अर्ध चन्‍द्र का होना सर्वोत्तम वीरता का आहवान करता है।"
"हमारे लिए यह अनिवार्य होगा कि हम भारतीय मुस्लिम, ईसाई, पारसी और अन्‍य सभी, जिनके लिए भारत एक घर है, एक ही ध्‍वज को मान्‍यता दें और इसके लिए मर मिटें।"
प्रत्‍येक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र का अपना एक ध्‍वज होता है। यह एक स्‍वतंत्र देश होने का संकेत है। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज की अभिकल्‍पना पिंगली वैंकैयानन्‍द ने की थी और इसे इसके वर्तमान स्‍वरूप में 22 जुलाई 1947 को आयोजित भारतीय संविधान सभा की बैठक के दौरान अपनाया गया था, जो 15 अगस्‍त 1947 को अंग्रेजों से भारत की स्‍वतंत्रता के कुछ ही दिन पूर्व की गई थी। इसे 15 अगस्‍त 1947 और 26 जनवरी 1950 के बीच भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया गया और इसके पश्‍चात भारतीय गणतंत्र ने इसे अपनाया। भारत में ‘’तिरंगे’’ का अर्थ भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज है।
भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज में तीन रंग की क्षैतिज पट्टियां हैं, सबसे ऊपर केसरिया, बीच में सफेद ओर नीचे गहरे हरे रंग की प‍ट्टी और ये तीनों समानुपात में हैं। ध्‍वज की चौड़ाई का अनुपात इसकी लंबाई के साथ 2 और 3 का है। सफेद पट्टी के मध्‍य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है। यह चक्र अशोक की राजधानी के सारनाथ के शेर के स्‍तंभ पर बना हुआ है। इसका व्‍यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर होता है और इसमें 24 तीलियां है।

तिरंगे का विकास

यह जानना अत्‍यंत रोचक है कि हमारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज अपने आरंभ से किन-किन परिवर्तनों से गुजरा। इसे हमारे स्‍वतंत्रता के राष्‍ट्रीय संग्राम के दौरान खोजा गया या मान्‍यता दी गई। भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज का विकास आज के इस रूप में पहुंचने के लिए अनेक दौरों में से गुजरा। एक रूप से यह राष्‍ट्र में राजनैतिक विकास को दर्शाता है। हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के विकास में कुछ ऐतिहासिक पड़ाव इस प्रकार हैं:

1906 में भारत का गैर आधिकारिक ध्‍वज। प्रथम राष्‍ट्रीय ध्‍वज 7 अगस्‍त 1906 को पारसी बागान चौक (ग्रीन पार्क) कलकत्ता में फहराया गया था जिसे अब कोलकाता कहते हैं। इस ध्‍वज को लाल, पीले और हरे रंग की क्षैतिज पट्टियों से बनाया गया था।


1907 में भीका‍जीकामा द्वारा फहराया गया बर्लिन समिति का ध्‍वज। द्वितीय ध्‍वज को पेरिस में मैडम कामा और 1907 में उनके साथ निर्वासित किए गए कुछ क्रांतिकारियों द्वारा फहराया गया था (कुछ के अनुसार 1905 में)। यह भी पहले ध्‍वज के समान था सिवाय इसके कि इसमें सबसे ऊपरी की पट्टी पर केवल एक कमल था किंतु सात तारे सप्‍तऋषि को दर्शाते हैं। यह ध्‍वज बर्लिन में हुए समाजवादी सम्‍मेलन में भी प्रदर्शित किया गया था।

इस ध्‍वज को 1917 में गघरेलू शासन आंदोलन के दौरान अपनाया गया। तृतीय ध्‍वज 1917 में आया जब हमारे राजनैतिक संघर्ष ने एक निश्चित मोड लिया। डॉ. एनी बीसेंट और लोकमान्‍य तिलक ने घरेलू शासन आंदोलन के दौरान इसे फहराया। इस ध्‍वज में 5 लाल और 4 हरी क्षैतिज पट्टियां एक के बाद एक और सप्‍तऋषि के अभिविन्‍यास में इस पर बने सात सितारे थे। बांयी और ऊपरी किनारे पर (खंभे की ओर) यूनियन जैक था। एक कोने में सफेद अर्धचंद्र और सितारा था।
   इस ध्‍वज को 1921 में गैर अधिकारिक रूप से अपनाया गया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सत्र के दौरान जो 1921 में बेजवाड़ा (अब विजयवाड़ा) में किया गया यहां आंध्र प्रदेश के एक युवक ने एक झंडा बनाया और गांधी जी को दिया। यह दो रंगों का बना था। लाल और हरा रंग जो दो प्रमुख समुदायों अर्थात हिन्‍दू और मुस्लिम का प्रतिनिधित्‍व करता है। गांधी जी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्‍ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा होना चाहिए।

इस ध्‍वज को 1931 में अपनाया गया। यह ध्‍वज भारतीय राष्‍ट्रीय सेना का संग्राम चिन्‍ह भी था। वर्ष 1931 ध्‍वज के इतिहास में एक यादगार वर्ष है। तिरंगे ध्‍वज को हमारे राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाने के लिए एक प्रस्‍ताव पारित किया गया । यह ध्‍वज जो वर्तमान स्‍वरूप का पूर्वज है, केसरिया, सफेद और मध्‍य में गांधी जी के चलते हुए चरखे के साथ था। तथापि यह स्‍पष्‍ट रूप से बताया गया इसका कोई साम्‍प्रदायिक महत्‍व नहीं था और इसकी व्‍याख्‍या इस प्रकार की जानी थी।



भारत का वर्तमान तिरंगा, हमारा राष्ट्रीय ध्‍वज। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने इसे मुक्‍त भारतीय राष्‍ट्रीय ध्‍वज के रूप में अपनाया। स्‍वतंत्रता मिलने के बाद इसके रंग और उनका महत्‍व बना रहा। केवल ध्‍वज में चलते हुए चरखे के स्‍थान पर सम्राट अशोक के धर्म चक्र को दिखाया गया। इस प्रकार कांग्रेस पार्टी का तिरंगा ध्‍वज अंतत: स्‍वतंत्र भारत का तिरंगा ध्‍वज बना


भारत के राष्‍ट्रीय ध्‍वज की ऊपरी पट्टी में केसरिया रंग है जो देश की शक्ति और साहस को दर्शाता है। बीच में स्थित सफेद पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्‍य का प्रतीक है। निचली हरी पट्टी उर्वरता, वृद्धि और भूमि की पवित्रता को दर्शाती है।
चक्र
इस धर्म चक्र को विधि का चक्र कहते हैं जो तीसरी शताब्‍दी ईसा पूर्व मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाए गए सारनाथ मंदिर से लिया गया है। इस चक्र को प्रदर्शित करने का आशय यह है कि जीवन गति‍शील है और रुकने का अर्थ मृत्‍यु है।
ध्‍वज संहिता  -
26 जनवरी 2002 को भारतीय ध्‍वज संहिता में संशोधन किया गया और स्‍वतंत्रता के कई वर्ष बाद भारत के नागरिकों को अपने घरों, कार्यालयों और फैक्‍ट‍री में न केवल राष्‍ट्रीय दिवसों पर, बल्कि किसी भी दिन बिना किसी रुकावट के फहराने की अनुमति मिल गई। अब भारतीय नागरिक राष्‍ट्रीय झंडे को शान से कहीं भी और किसी भी समय फहरा सकते है। बशर्ते कि वे ध्‍वज की संहिता का कठोरता पूर्वक पालन करें और तिरंगे की शान में कोई कमी न आने दें। सुविधा की दृष्टि से भारतीय ध्‍वज संहिता, 2002 को तीन भागों में बांटा गया है। संहिता के पहले भाग में राष्‍ट्रीय ध्‍वज का सामान्‍य विवरण है। संहिता के दूसरे भाग में जनता, निजी संगठनों, शैक्षिक संस्‍थानों आदि के सदस्‍यों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में बताया गया है। संहिता का तीसरा भाग केन्‍द्रीय और राज्‍य सरकारों तथा उनके संगठनों और अभिकरणों द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रदर्शन के विषय में जानकारी देता है।
26 जनवरी 2002 विधान पर आधारित कुछ नियम और विनियमन हैं कि ध्‍वज को किस प्रकार फहराया जाए:

क्‍या करें

राष्‍ट्रीय ध्‍वज को शैक्षिक संस्‍थानों (विद्यालयों, महाविद्यालयों, खेल परिसरों, स्‍काउट शिविरों आदि) में ध्‍वज को सम्‍मान देने की प्रेरणा देने के लिए फहराया जा सकता है। विद्यालयों में ध्‍वज आरोहण में निष्‍ठा की एक शपथ शामिल की गई है।
किसी सार्वजनिक, निजी संगठन या एक शैक्षिक संस्‍थान के सदस्‍य द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज का अरोहण/प्रदर्शन सभी दिनों और अवसरों, आयोजनों पर अन्‍यथा राष्‍ट्रीय ध्‍वज के मान सम्‍मान और प्रतिष्‍ठा के अनुरूप अवसरों पर किया जा सकता है।
नई संहिता की धारा 2 में सभी निजी नागरिकों अपने परिसरों में ध्‍वज फहराने का अधिकार देना स्‍वीकार किया गया है।
क्‍या न करें

इस ध्‍वज को सांप्रदायिक लाभ, पर्दें या वस्‍त्रों के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है। जहां तक संभव हो इसे मौसम से प्रभावित हुए बिना सूर्योदय से सूर्यास्‍त तक फहराया जाना चाहिए।
इस ध्‍वज को आशय पूर्वक भूमि, फर्श या पानी से स्‍पर्श नहीं कराया जाना चाहिए। इसे वाहनों के हुड, ऊपर और बगल या पीछे, रेलों, नावों या वायुयान पर लपेटा नहीं जा सकता।
किसी अन्‍य ध्‍वज या ध्‍वज पट्ट को हमारे ध्‍वज से ऊंचे स्‍थान पर लगाया नहीं जा सकता है। तिरंगे ध्‍वज को वंदनवार, ध्‍वज पट्ट या गुलाब के समान संरचना बनाकर उपयोग नहीं किया जा सकता।
भारत का राष्ट्रीय झंडा, भारत के लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं का प्रतिरूप है। यह हमारे राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। सभी के मार्गदर्शन और हित के लिए भारतीय ध्वज संहिता-2002 में सभी नियमों, रिवाजों, औपचारिकताओं और निर्देशों को एक साथ लाने का प्रयास किया गया है। ध्वज संहिता-भारत के स्थान पर भारतीय ध्वज संहिता-2002 को 26 जनवरी 2002 से लागू किया गया है। यहाँ सांसद नवीन जिंदल को देश इस बात के लिए सदैव याद रखेगा कि उन्होंने ही सर्वोच्च न्यायलय से जनसाधारण को -भारतवासियों को अपना राष्ट्रीय ध्वज फ़हराने का अधिकार दिलाया था ।

झंडा फहराने का सही तरीका
* जब भी झंडा फहराया जाए तो उसे सम्मानपूर्ण स्थान दिया जाए। उसे ऐसी जगह लगाया जाए, जहाँ से वह स्पष्ट रूप से दिखाई दे।

* सरकारी भवन पर झंडा रविवार और अन्य छुट्‍टियों के दिनों में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाता है, विशेष अवसरों पर इसे रात को भी फहराया जा सकता है।

* झंडे को सदा स्फूर्ति से फहराया जाए और धीरे-धीरे आदर के साथ उतारा जाए। फहराते और उतारते समय बिगुल बजाया जाता है तो इस बात का ध्यान रखा जाए कि झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* जब झंडा किसी भवन की खिड़की, बालकनी या अगले हिस्से से आड़ा या तिरछा फहराया जाए तो झंडे को बिगुल की आवाज के साथ ही फहराया और उतारा जाए।

* झंडे का प्रदर्शन सभा मंच पर किया जाता है तो उसे इस प्रकार फहराया जाएगा कि जब वक्ता का मुँह श्रोताओं की ओर हो तो झंडा उनके दाहिने ओर हो।

* झंडा किसी अधिकारी की गाड़ी पर लगाया जाए तो उसे सामने की ओर बीचोंबीच या कार के दाईं ओर लगाया जाए।

* फटा या मैला झंडा नहीं फहराया जाता है।

* झंडा केवल राष्ट्रीय शोक के अवसर पर ही आधा झुका रहता है।

* किसी दूसरे झंडे या पताका को राष्ट्रीय झंडे से ऊँचा या ऊपर नहीं लगाया जाएगा, न ही बराबर में रखा जाएगा।

* झंडे पर कुछ भी लिखा या छपा नहीं होना चाहिए।

* जब झंडा फट जाए या मैला हो जाए तो उसे एकांत में पूरा नष्ट किया जाए।

अगस्त 15, 2010

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

दर्द भरे जीवन को हंस कर गुजारना कोई इनसे सीखे  । आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ        - आशुतोष मिश्र                                                                                                                  

अगस्त 07, 2010

ख़रीददारी कीजिए ' राम ' देकर

नीदरलैंड में अब यह  मुद्रा भी चलती है ।
महर्षि महेश योगी द्वारा जारी की  मुद्रा  '' राम'' को नीदरलैंड में क़ानूनी मान्यता दे दी गई है ।
'' राम'' नाम की इस मुद्रा में चमकदार रंगों वाले एक, पाँच और दस के नोट हैं ।
इस  मुद्रा  को महर्षि की संस्था ''ग्लोबल कंट्री ऑफ वर्ल्ड पीस'' ने गत वर्ष अक्टूबर में जारी  किया  गया था। तभी से तीस गाँवों और शहरों की सौ से अधिक दुकानों में ये नोट चल रहे हैं. इन दुकानों में कुछ तो बड़े डिपार्टमेंट स्टोर श्रृँखला का हिस्सा हैं ।डच सेंट्रल बैंक ने कहा है कि '' राम'' का उपयोग अब क़ानून का उल्लंघन नहीं होगा. बैंक के प्रवक्ता ने बीबीसी से कहा है कि संस्था ने सारी वैधानिक कार्रवाई पूरी कर दी है. पर बैंक के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि फ़िलहाल इसके सीमित उपयोग की अनुमति ही दी गई है ।
'' राम'' का लेनदेन - अमरीकी राज्य आइवा के महर्षि वैदिक सिटी में भी ''राम'' का प्रचलन है. वैसे 35 अमरीकी राज्यों में '' राम'' पर आधारित बॉन्डस चलते हैं ।महर्षि संस्था के ''वित्त मंत्री'' बेंजामिन फेल्डमैन ने बीबीसी से कहा है कि '' राम'' का उपयोग ग़रीबी दूर करने और विश्व शांति के लिए हो सकता है.उन्होंने कहा कि सरकारें ''राम'' का उपयोग कृषि और विकास की अन्य परियोजनाओं में कर सकती हैं.फेल्डमैन ने कहा,''डेढ़ अरब लोग बेहद ग़रीब हैं और उन्हें डॉलर जैसी  मुद्रा  नसीब नहीं हो रही है, राम का उपयोग उनके लिए मकान, सड़कें और अस्पताल बनवाने के लिए हो सकता है. ''नीदरलैंड जैसे धनी देश में  मुद्रा जारी करने को तर्कसंगत ठहराते हुए उन्होंने कहा कि इससे विकासशील देश प्रेरणा ले सकते हैं ।मूल्य =नीदरलैंड की डच दुकानों में एक '' राम'' के बदले दस यूरो मिल सकते हैं. डच सेंट्रल बैंक के प्रवक्ता ने बताया कि इस वक्त कोई एक लाख ''राम'' नोट चल रहे हैं ।लोग इसे बैंक में जाकर भुना सकते हैं ।और हमारे यहाँ जहाँ  राम  थे ,अब उनका नाम लेने वाला आम आदमी भी साम्प्रदायिक कहलाता है ।  राम के नाम - काम , उनके जन्म स्थान का निर्धारण अदालतें करतीं हैं ।
महर्षि महेश योगी -
महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी 1918 को छत्तीसगढ़ के राजिम शहर के पास पांडुका  गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम महेश प्रसाद वर्मा था। उन्होने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक की उपाधि अर्जित की। उन्होने तेरह वर्ष तक ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के सानिध्य में शिक्षा ग्रहण की। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम में 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी। हिमालय क्षेत्र में दो वर्ष का मौन व्रत करने के बाद सन् 1955 में उन्होने टीएम तकनीक की शिक्षा देना आरम्भ की। सन् 1957 में उनने टीएम आन्दोलन आरम्भ किया और
इसके लिये विश्व के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। महर्षि महेश योगी द्वारा चलाया गए आंदोलन ने उस समय जोर पकड़ा जब रॉक ग्रुप 'बीटल्स' ने 1968 में उनके आश्रम का दौरा किया। इसके बाद गुरुजी का ट्रेसडेंशल मेडिटेशन पूरी पश्चिमी दुनिया में लोकप्रिय हुआ। उनके शिष्यों में पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी से लेकर आध्यात्मिक गुरू दीपक चोपड़ा तक शामिल रहे।पश्चिम को योग और आध्यात्म से परिचित कराने वाले महर्षि महेश योगी ने मंगलवार पाँच फ़रवरी को करीब 7 बजे नीदरलैंड (हॉलैंड) के शहर व्लोड्राप स्थित आवास में अंतिम सांसें लीं। तब वह 91 वर्ष के थे । 11 जनवरी 2008 को उन्होंने सामान्य जीवन से संन्यास ले लिया था।
उनका कहना था कि गुरूदेव द्वारा प्रदत्त समस्त कर्तव्य उन्होंने पूर्ण कर दिए हैं। अब उनका कार्य समाप्त हो चुका है। इसके बाद उन्होंने अपना सारा समय वेदों के अध्ययन और अनुसंधान में बिताया। ऐसा लगता है कि उन्हें अपनी संभावित मृत्यु का आभास हो चुका था।
महर्षि की पार्थिव काया 09 फरवरी को भारत ल्ली गई और 12 फरवरी को इलाहाबाद के संगम घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया।

कहीं "टशन" तो कहीं "टेंशन" है "ट्यूशन"

 स्कूल  का नया सत्र आरंभ हुए दो माह होने को आए हैं । बड़ी विड्म्बना ही है कि जितना जरूरी  स्कूल  जाना है , उतना ही जरूरी हो गया है "ट्यूशन" जाना । पढ़ाई पर हावी हो गया है  ट्यूशन। कभी आप सोच भी पाते हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है ? पहले कभी तो नहीं होता था ऐसा । अब क्यों ? मैं तो कहता हूं पढ़े लिखे ऐसे अभिभावक जो अपनी सामाजिक-पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर भागते हैं ,प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से वे ही ट्यूशन के गोरख धंधे को बढ़ावा देते हैं । कम पढ़े लिखे अभिभावकों की मजबूरी समझ आती है ।
आप शायद सहमत होगें की स्कूल-कॉलेज में उनकी क्षमता से कहीं अधिक संख्या में बच्चों को प्रवेश दिया जाता है । जिसकी वजह से प्रबंधन पैसा कमाता और बच्चा तकलीफ़ें पाता देखा जाता है । क्वालिटी ऑफ़ एजुकेशन की कमी ,कोर्स की अधिकता , समय प्रबंधन की कमी , कोर्स और किताबों के चयन में क्वालिटी की बजाय कमीशन पर ज्यादा ध्यान दिया जाना । क्लासेस में बैठने की समुचित व्यवस्था न होना ,प्रकाश और हवादार बड़ी खिड़कियों की व्यवस्था का न होना , या कहीं-कहीं घर का वातावरण कलह भरा - तनाव पूर्ण होना ऐसे तमाम दोष हैं जो ट्यूशन को जन्म ही नहीं वरन सतत प्रोत्साहन देते हैं ।
 ट्यूशन सफ़लता की कोई कुंजी हो ऐसा कतई भी नहीं है । आज तो इसका विकृत स्वरूप मानो एक फ़ैशन या सोशल स्टेटस का रूप धारण करता हुआ देखा जा सकता है । कुछ न समझ आ रहा हो ,और उस विषय पर मार्ग दर्शन चाहें ,अच्छे से पूछ्ने- बताने की सहुलियत हो तो क्लास रूम ही बहुत होगा ,लेकिन फ़िर इस बीच कमाई का रुपया न होगा ,इसलिए भी बहुत जरूरी हो जाता है ट्यूशन । बिखरा और डरा हुआ अभिभावक अपनी बात समझा नहीं पाता स्कूल - कॉलेज प्रबंधन को , और प्रबंधन समझना भी नहीं चाहता ,शायद इसलिए भी बहुत जरूरी हो जाता है ट्यूशन । वरना सबसे अच्छा है टीचर्स के द्वारा स्कूल - कॉलेज में दिया गया मार्ग दर्शन , बच्चों की सेल्फ़ स्टडी ,घर में माँ की या पिता की देखरेख में की गई पढ़ाई, टाईम टेबल बना कर की जाने वाली पढ़ाई , जब पढ़ाया जा रहा हो उस वक्त ध्यान केवल पढ़ाई पर ही केन्द्रित हो । न समझ आने वाली बातों को तुरंत ही पूछ लिया जाए और शिक्षकवृंद ऐसा माहौल अपनी-अपनी कक्षाओं में बनाएं कि बच्चा कुछ पूछने में डर या झिझक न महसूस करे । शिक्षा विभाग में पदस्थ बड़े अधिकारी इसकी प्रॉपर मॉनिट्रिंग करें । पर ऐसा होता नहीं है ,क्यों ? कौन देगा जवाब ? अधिकांश शैक्षणिक संस्थाओं में अप्रशिक्षित , कम पढ़े-लिखे , कम वेतन पर काम करने वाले शिक्षक हैं ।जो स्वयं शोषित-पीडित हैं ,इनसे आप क्या और कैसी उम्मीद करेंगे ? जरूरत है शैक्षणिक संस्थाओं में उनके प्रबंधन पर शासन-प्रशासन की ईमानदार मजबूत पकड़ -पहल की , सतत निगरानी की तभी कुछ अच्छे नतीजे आने की उम्मीद करना उचित होगा वरना जो जैसा चल रहा है चलता रहेगा ।  ट्यूशन एक सफ़ल व्यवसाय बन चुका है ,बना ही रहेगा । विशिष्ट वर्ग को छोड़ कर शेष सारा सामान्य वर्ग ऐसा ही त्रस्त रहेगा । समाज में एक नया फ़्रस्टेशन बढ़ेगा ।

अगस्त 05, 2010

क्या आप कुछ सोचने को तैयार हैं मेरे साथ …?


आज मैं आपका ध्यान एक छोटी सी बात की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ । क्या आप बता सकते हैं कि एक आदमी अपनी पूरी जिंदगी में कितना  जल,फ़ल,फ़ूल  और कितने पेड़ों की लकड़ी का उपयोग करता है ?  शायद नहीं । जल,फ़ल और फ़ूल को छोड़िए पेड़ों की लकड़ी की बात करते हैं । अपनी जिंदगी में एक आदमी औसतन 300 पेड़ों की लकड़ियों का उपयोग जन्म से मरण तक उपयोग करता है । क्या आप यह बता सकते हैं कि यही एक व्यक्ति अपने जीवन में कितने पौधे रोपता है ? नहीं ना  । यहाँ आकर आप - हम सभी मौन हो जाते हैं क्यों ? सावन का पवित्र माह चल रहा है , हमें नित्य प्रतिदिन बेल पत्र एवम  फ़ूलों की जरूरत पड़ती है , हमें जहाँ कुछ पत्र-पुष्पों की जरूरत होती है , हम  पेड़  की पूरी टहनियाँ तोड़ लाते हैं ,क्या ऐसा करना उचित व्यवहार है, एक जीवित वृक्ष के साथ ? हमारे धर्म शास्त्रों में फ़ल,फ़ूल,पत्र तोडने के पूर्व बकायदा  वृक्ष  के सम्मुख आव्हान करने का प्रावधान वर्णित है ,इसी तरह जीवित  वृक्ष से भी आप अपने उपयोग के लिए आवश्यक लकड़ी आव्हान कर प्राप्त कर सकते हैं । लेकिन कौन करता है भला ऐसा ? ऐसा सत्कर्म तो हवन-पूजन की लकड़ी के लिए नहीं किया जाता ,तो रोजमर्रा की जरूरतों के लिए कोई भला क्यों करने चला ? मैं समझता हूँ यहीं से शुरु होता है लोगों के जीवन में तरह-तरह का दुख ,आप मानें ना मानें । किसी भी जीव की हत्या से निकली चित्कार व्यर्थ नहीं जाती है । आप किसी की जान लेकर बद्दुवाओं से नहीं बच सकते। अपने आसपास जहाँ उपयुक्त हो ,दूर दृष्टि का परिचय देते हुए पौधों का रोपण और उसकी देखभाल जरूर कीजिए , अपनी आने वाली पीढ़ी को यही  अनमोल उपहार  दीजिए । ये वृक्ष ही हमारी समृद्धि के प्रतीक हैं , सभ्यता और संस्कृति के रक्षक हैं । वृक्ष रहेंगें तो ही मनुष्य भी रह पायेगा ।पेड़ काटने वालों से कहना चाहुंगा ,आप पेड़ नहीं अपने पैर काट रहे हैं । अपनी भावी पीढ़ी की साँसें उखाड़ रहे हैं ।   संक्षेप में कहना चाहता हूं कि आईए प्रायश्चित करें । मैंने कम लिखा है ,आप समझदार हैं । आग्रह स्वीकार कीजिए ।खबर-दुनियाँ,

अगस्त 02, 2010

फ़्रेंडशिप डे पर पिटाई - हंगामा

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल शाम बूढ़ा तालाब स्थित विवेकानंद उद्यान में बजरंगियों ने एक प्रेमी युगल के मुंह पर न केवल कालिख पोती वरन युवक और युवती दोनो को पीटा भी , हमेशा की ही तरह यहाँ तैनात पुलिस मुक दर्शक बनी रही ।यह मामला आज विधान सभा में भी गूंजा , जिस पर गृह मंत्री ननकी राम कंवर ने पाँच आरोपियों को गिरफ़्तार किये जाने की बात कही विधान सभा में विपक्ष ने इस विषय पर जम कर हंगामा मचाया । जन प्रतिनिधियों और आम लोगों में इस बात को लेकर आक्रोश था कि बजरंगियों ने सरेआम युवती के साथ मारपीट की , उसके मुंह पर भी कालिख पोती ।यह सच है कि राजधानी की पुलिस सख्ती के नाम पर केवल और केवल सड़कों पर अवरोधक बेरिकैट्स लगा कर मोटर सायकलों - कारों , भारी वाहनों से चालान के नाम वसूली करती ही दिखती है । शहरी गुण्डों - बदमाशों से याराना है । बड़े बिल्डरों के सामने मानो दुम हिलाती है । रही बात प्रेमी युगलों की ,यह किसी भी बढ़ते शहर में जहाँ बाहर से पढ़ने - नौकरी करने युवक युवती आतें ,वहाँ की एक बडी समस्या है ही । रायपुर में हर बड़े होटलों , रिसॉर्ट्स , गार्ड्न में शाम होते ही ऐसे मनचले रोज देखे जा सकते हैं । यहाँ इन्हें देख कर भी अनदेखी की जाती है । पुलिस केवल पैसा पहचानती है ,यहीं की नहीं सभी जगह की । समाज सुधरना नहीं चाहता है ।इसे समय की मांग बताते हैं ,ऐसी घटनाओं के पक्षधर । सर्वाधिक दुर्भाग्य जनक बात तो यह है कि ऐसे मनचलों का सबसे बडा जमावड़ा राज भवन के सामने वाली सड़क पर बने एक गार्डन, मुख्यमंत्री निवास से लगे शहर के सबसे बड़े गार्डन और कलेक्ट्रेट गार्डन में रोज होता है । यह तीनों ही गार्डन पुलिस मुख्यालय के भी निकट है , क्या करती है पुलिस ? इन उद्यानों में आज भी सम्भ्रांत जन सपरिवार आने में कतराते हैं । कहाँ हैं जनता के रखवाले ? केवल   फ़्रेंडशिप डे या फ़िर वेलेन्टाईन डे पर हल्ला बोलना ही कर्तव्यों की इति श्री है ? क्यों जरूरी है मारपीट करना ? या कालिख पोतना ? बहुत से सवाल हैं जो सिर्फ़ इसलिए उत्तर विहीन हैं क्यों कि रक्षकों की ही नीयत साफ़ नहीं है । उनके इरादे जगजाहिर हैं । उनका लक्ष्य "कहीं पे निगाहें - कहीं पे निशाना" जैसा छल - कपट भरा है । प्रदेश में अब बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा जैसा माहौल है ,कांग्रेस को बैठे बिठाये मिल गया मुद्दा और वह तो इस मुद्दे पर प्रदेश की "बेचारी सी" - "निर्दोष सी" भा ज पा सरकार से गद्दी छोड्ने की मांग करने लगी है । मतलब, बहुत कर लिया तुमने, अब हमको मौका दो । यह सब तो चलता ही रहेगा । तुम तो गद्दी छोडो ।

आज इनका जन्म दिन है , दोनो को बधाईयाँ

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ नेता विद्या चरण शुक्ल आज 81 वर्ष और रमेश बैस 63 वर्ष के पूरे हो गए हैं । श्री शुक्ल लम्बे समय तक महासमुंद ,रायपुर ,राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र से संसद सदस्य रहे हैं। केन्द्रीयमंत्री रहे हैं । श्री बैस रायपुर संसदीय क्षेत्र से लम्बे समय से संसद सदस्य हैं ,केंद्रीय मंत्री रहे हैं ।
रायपुर संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी से एक दूसरे के प्रतिद्वन्दी रहे इन दोनों ही नेताओं का जन्म दिन एक ही दिन यानि 02अगस्त को ही पड़ता है। दोनो का जन्म स्थान भी रायपुर ही है ।श्री शुक्ल का जन्म 02 अगस्त 1929 को हुआ और श्री बैस का जन्म 02 अगस्त 1947 को हुआ था । दोनो ही नेताओं को जन्म दिन की   बधाईयाँ ।                          
                                                                                                                    

अगस्त 01, 2010

हमारी भी बधाईयाँ

मित्रता को वैसे तो किसी दिवस की जरूरत नहीं ,
फ़िर भी आज जब सभी …
तो हमारी भी ।
 स्वीकार हों ।  
इस दिन के अतिरिक्त 
पूरी जिन्दगी, वर्ष के 365 दिन ,
24 * 7  हमारी 

मित्रों के साथ हैं ।  
- आशुतोष मिश्र 

दर्द जब दोहरा हुआ…


एक समय ऐसा भी था जब समुचे मध्य प्रदेश में एक ही समय पर अखबारों के माध्यम से लोगों को खबरें मिल जाया करतीं थीं । लेकिन आज ऐसा नहीं होता । हर जिले की   खबर  के लिए अब आपको उस जिले का संस्करण पढ़ना होगा जो एक ही जगह से आम आदमी को तो उपलब्ध नहीं हो पायेगा । इसीलिए अब आपको यह भी पता नहीं चल पाता है कि पड़ोसी जिले में क्या हो रहा है ? अखबार मालिकों ने भी डॉक्टरों की ही तरह मानो बिना कहे ही यह कह दिया है कि यह उनका धंधा है कोई मिशन नहीं , रहा होगा कभी मिशन । आज तो यह प्रोफ़ेशन है अच्छी खासी कमाई का जरिया है ऐसे में इसे संवेदनशील भला कैसे बनाया जा सकता है , आप ही बताईये ? इसी अंधी दौड़ में - धन पिशाचों से यह उम्मीद करना कि ये निधन की सूचना या सामाजिक जनचेतना से जुड़ी खबरें पूरे प्रदेश में देंगे ,बेईमानी होगी , अपने को धोखा देने जैसा काम करना होगा । मेरे एक मित्र इंजीनियर हैं उनकी भतीजी गीतांजली हफ़्ते भर  पहले ही दहेज की बली चढ़ गई , मित्र की इच्छा थी कि  खबर  रायपुर के अखबारों मे भी छपे ताकि दोषी जनों पर प्रभावी कार्यवाही हो सके , वरिष्ठ अधिकारी जनों की नजर से यह मामला गुजरे । लेकिन दुर्भाग्य आम लोगों का कि ऐसा काम रायपुर से प्रकाशित होने वाले अखबारों ने आमलोगों के लिये बंद कर दिया है । किसी बड़े विज्ञापनदाता या बिल्डर की सिफ़ारिश पर छापा जा सकता है कुछ भी , पर आम आदमी का … सॉरी । "ये उनके फ़ॉर्मेट में फ़िट नहीं है । "
  खबर छपनी थी रायपुर और बिलासपुर के बीच के एक गाँव की , तो बिलासपुर संस्करण में छ्प कर इतिश्री कर दी गई ,जहाँ लोग इस घटना को जानते थे उन्हीं को पढ़ाया भी गया । जो नहीं जानते थे ,वो क्यों जानें ? उन्हें क्यों पढ़ाया जाए ? कुछ ऐसा हो गया है अखबारों का रवैया आम लोगों के लिए । लेकिन खास लोग जो खबरों को छापने के बदले विज्ञापन देते-दिलाते हैं उनकी सर्दी-खाँसी , पैदल चलने-फ़िरने ,चना-मुर्रा खाने की खबरें भी अपने सभी संस्करणों में छाप कर दुनियाँ को बताने से नहीं हिचकिचाते आज के अखबार । कितनी गैर जिम्मेदाराना और शर्मनाक है ये बात हम सब की नजरों में । इसे सुधारना तो होगा । कौन - कब सुधारेगा यह अभी नहीं मालूम , देर-सबेर होगा जरूर ,अखबारों की संकीर्ण मानसिकता भी दूर होगी ।
बहरहाल खबर यह है कि ग्राम खम्हरिया निवासी शशीकांत पांडेय पिता रामकृष्ण पांडेय की पुत्र वधु गीतांजली की दहेज प्रताड़ना के बाद जलने से मौत हो गई ,उसका दो साल का एक बच्चा आज भी अपनी माँ के अस्पताल से लौटने का इंतजार कर रहा है । सन 2007 में अपनी बेटी के हाँथ पीले करने वाले बूढ़े बाप का कलेजा दहल उठा है , परिजनों के आंसू थम नहीं रहे हैं , गीतांजली की माँ को जो बीमार है उन्हें  कुछ भी बताया नहीं गया है ,वह घर के लोगों को रोता देखकर और भी अधिक परेशान है । गीतांजली की मौत के बाद उसके मायके वालों को बताया जाना कि वह चिमनी की लौ से जल कर मर गई । संदेह को जन्म ही नहीं देता वरन पुख्ता करता है । मायके वाले चाहते हैं इस मामले में दोषी दामाद को सजा हो । उनके उन अन्य परिजनों को भी सजा हो जिन्होंने शादी से पूर्व शशीकांत पांडेय को इंजीनियर हैं , बताया था । दामाद ने अपने ससुर से अपनी टेक्नीशियन की नौकरी परमानेंट कराने के लिए डेढ़ लाख रुपये लिये थे , रायपुर में मकान खरीदने के और रुपयों की माँग करते हुए  नवम्बर 2009 में ससुर कन्हैयाधर दीवान से साथ उन्हीं के घर में मारपीट भी की थी , वह चाहता था कि ससुर गांव की सम्पत्ति को बेचकर उसके साथ रायपुर चल कर उसे एक घर खरीदने के लिए मदद करे और उसी के साथ रहे । इन्हीं बातों को लेकर विवाद हुआ करता था । इस लालच की बली चढ़ी बेटी गीतांजली । दोनो परिवारों का दुख कम होने की बजाय कई गुना बढ़ गया है । गीतांजली के पिता कन्हैयाधर दीवान पुलिस अधिकारियों से इंसाफ़ की गुहार लगा रहे हैं ,क्योंकि इस धरती के प्रथम भगवान बन बैठे "पुलिस वाले" यदि रिपोर्ट ही सही-सही लिख कर उसकी विवेचना सही समय पर कर दें तो यह इंसाफ़ पाने की पहली सीढ़ी साबित होगी । बाकि फ़िर इंसाफ़ तो वही करता है और करेगा भी जिसका यह जिम्मा है सही मायने में । हम इस घटना में अपनी गहन संवेदना प्रकट करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं उसके अपने घर में यह दरिंदगी - वहशीपन न होने दें । साथ ही अखबार वालों को , पुलिस वालों को अच्छा करने की ताकत - बुद्धि दें ।

वापस नहीं होगा " कोहिनूर ",जहाँ है वहीं रहेगा - कैमरन


 ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा हमारा   कोहिनूर हमें वापस नहीं लौटाएगा ब्रिटेन। भारत यात्रा पर आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने इस मशहूर हीरे को वापस करने की अपील ठुकरा दी है। यह बेशर्मी ही नहीं , चोरी ऊपर से सीना जोरी करने जैसा काम है । शर्म आनी चाहिये ब्रिटेन को ।
एक भारतीय समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में कैमरन ने कहा - ‘मैं अगर "हाँ" कहूं तो ब्रिटिश संग्रहालय खाली हो जाएगा। कोहिनूर के मालिकाना हक को लेकर काफी बहस हो चुकी है।
मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि यह हीरा वहीं रहेगा, जहां फिलहाल रखा गया है।’ कैमरन से पूछा गया था कि क्या वे   कोहिनूर  हीरा भारत को वापस लौटाएंगे?
गौरतलब है कि ब्रिटेन में लेबर पार्टी के सांसद कीथ वाज ने भी कोहिनूर हीरा लौटाने की अपील की थी। बेंगलुरू से दिल्ली पहुंचने पर कैमरन ने गुरुवार को महात्मा गांधी की समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित की।
उन्होंने राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील से भी मुलाकात की। पिछले दो सदियों में ब्रिटेन के सबसे युवा प्रधानमंत्री कैमरन (43) का राष्ट्रपति भवन में भव्य स्वागत किया गया। कैमरन ने विदेश मंत्री एसएम कृष्णा से द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की।
 कोहिनूर   के साथ जुड़ा है श्राप - कोहिनूर के बारे में 1306 ईस्वी में लिखा गया संस्कृत का एक श्लोक है, ‘केवल ईश्वर या कोई महिला इसे दोषमुक्ति के लिए पहन सकती है।’
आंध्रप्रदेश की खान से निकला यह हीरा जिस किसी के भी पास रहा, उसकी या तो मौत हो गई, या राजगद्दी चली गई।

फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

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