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अप्रैल 04, 2011

सार्थक बनाएं माँ की आराधना

नवरात्रि के परम पावन अवसर पर हम सभी माँ दुर्गा के नौ रूपों की आराधना में सतत लीन रहते हैं , प्रार्थना है माँ सभी की मंगल कामनाएं पूर्ण करें । साथ बेटी स्वरूप में माँ सबके घर पधारें । कोख में आए माँ के आशीर्वाद स्वरूप रत्न  " कन्या " की कोई माँ - बाप या सास - ससुर , जेठ - जेठानी , देवर - देवरानी , नंद - नंदोई  कोई भी हत्या न कर पाए  बल्कि ऐसी पापी सोच ही किसी के दिमाग में विकसित न हो पाए  तब सार्थक होगी माँ की आराधना ।                                                                                                                                                                                       प्यार की घनी छाँव हैं ये बेटियाँ  - उर्मि कृष्ण
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प्यार की घनी छाँव हैं ये बेटियाँ


भर देती जिंदगी के अभाव ये बेटियाँ


बापू की आन में


पति की शान में


चाचा, ताऊ और जेठ, देवर


के भार में


मन के गुबार को, सद्‍भावना के नीचे


दफना रही हैं ये बेटियाँ


कुल की लाज में


सपूतों के निर्माण में






अपने अरमान को


मौन में


पी रही हैं ये बेटियाँ


कला की आड़ में


सौंदर्य के गुमान में


रंगमंच हो या टीवी


बेटी हो या बीवी


अखबार हो या पत्रिका


उघाड़ी जा रही हैं ये बेटियाँ


आग की आँच पर


चौपड़ की बिसात पर


सीता सावित्री के नाम पर


हर युग में दाँव पर


लगी हैं ये बेटियाँ






तुम कुछ भी कहो


कुछ भी करो


हर युग में मिटती आई है बेटियाँ


घर को सँवारती


जग को सुधारती


कभी न हारती


नया जन्म फिर फिर


लेती हैं बेटियाँ


नया जन्म फिर फिर


देती हैं बेटियाँ ।
                                                      

फ़रवरी 14, 2011

मिस्र की जनता को मुबारक बाद


                                        मिस्र की जनता को   "गांधीगिरी" मुबारक 

अलविदा , होस्नी मुबारक
दुनिया भर से मिस्र की जनता को सराहा जा रहा है । उसकी एकजुटता जनित क्रांति की अप्रत्यासित सफलता पर बधाइयां - शुभकामनाएं मिल रही हैं । तहरीर चौक पर मिस्र की जनता ने एक तरह से सत्याग्रह के जरिए ही आंदोलन छेड़ा और जीत हासिल की। यह जनक्रांति इतनी जल्दी अपने उद्देश्य में सफ़ल साबित हो जाएगी, इसका अनुमान तो था , पर इतनी जल्दी , इसका अनुमान शायद किसी को भी नहीं रहा होगा । मिस्र में आए इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे इंटरनेट पर चलने वाली फेसबुक जैसी कई सोशल नेटवर्किंग साईट की भी बहुत अहम भूमिका रही। यही वजह थी कि आम जनता एक दूसरे के सीधे संपर्क में आकर सड़कों पर निकल आई। विश्व के राजनैतिक इतिहास में सत्ता परिवर्तन के लिए जितनी भी क्रांतियां हुई हैं, उनमें नेतृत्व व्यक्ति या दल आधारित रहा है। लेकिन मिस्र में मुबारक की तानाशाही के खिलाफ जनता का स्वत:स्फूर्त आंदोलन था। हांलाकि मुस्लिम ब्रदरहुड की अग्रणी भूमिका इस आंदोलन में रही । होस्नी मुबारक के लगातार 30 सालों के शासन के दौरान देश में जहां भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी , भूखमरी और गरीबी ने जहाँ पूरे मिस्र में पैर पसारा वहीं राष्ट्रपति मुबारक स्वयं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति बनने में पूरी तरह सफल रहे । मुबारक के धन कुबेर होने का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे इस समय लगभग 70 अरब डालर की संपत्ति के स्वामी हैं।  तीन हफ्तों के संघर्ष के बाद यह प्रश्न अपनी जगह कायम है कि मिस्र में सत्ता की कमान कौन संभालेगा ? फिलहाल सेना इस भूमिका को निभा रही है। और उसने आश्वस्त किया है कि जल्द ही नागरिक सत्ता स्थापित की जाएगी।  अन्यथा पूर्व के अनुभव यह बताते हैं कि जब सेना के हाथों देश की सत्ता आती है, तो फिर सैन्य तानाशाही का रास्ता ही प्रशस्त होता है। मुबारक का बेटा, जिसे वे अपने बाद सत्ता सौंपने के इच्छुक थे, पहले ही देश छोड़कर जा चुका था और जब होस्नी मुबारक को यह अहसास हो गया कि वे किसी भी तरह आंदोलनकारियों को झुका नहीं सकते, तो उन्हें पद छोड़ना ही पड़ा।  मिस्र में लोकतंत्र की स्थापना में सेना किस तरह से सहयोग करेगी,  अब यह बड़ा सवाल है। समुचे विश्व को संदेश देने में सफ़ल हुआ यह आंदोलन मिस्र की जनता आगे कितना सफ़ल जीवन दिला पाता है इस ओर समूचे संसार की निगाहें हैं । तमाम तानाशाहों को अब सावधान हो जाना चाहिए । नैतिकता की ताकत कितनी अक्षुण्य है संसार ने देखा और सीखा है । जनता अब तानाशाहों के द्वारा विश्वस्तर पर आंख मूंद कर मचाई जाने वाली लूट-खसोट तथा धन-संपत्ति के अथाह संग्रह को भी और अधिक सहन करने के मूड में हरगिज़ नहीं है । दुनिया के लोग अब जागरुक हैं, अपने व अपनी आने वाली नस्लों के भविष्य को लेकर वे चिंतित हैं ।
 साथ ही एक सवाल यह भी है कि क्या भारत की जनता भी कभी जागेगी जमाखोरी , मुनाफ़ाखोरी ,भ्रष्टाचारियों और भूमाफ़ियाओं के खिलाफ़ ?  इन तमाम बुराईयों की जड़ राज नेताओं के खिलाफ़ ??  भ्रष्ट और तानाशाह सरकारी अफ़सरों की मनमानी के खिलाफ़ ???

फ़रवरी 11, 2011

छत्तीसगढ़ का एक त्योहार (छत्तीसगढ़ी तिहार) "छेरछेरा पुन्नी"

छेरछेरा मांगने निकले बच्चे । फोटो  साभार : तेजेन्द्र ताम्रकार फ़्लीकर्स

धान का कटोरा
छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति यहाँ के लोकमानस मे लोक रंगों की अनेक विधाएं है जो यहाँ  के  लोकजीवन का सहज चित्रण करती है| छत्तीसगढ़ मे वर्ष भर तरह - तरह के जनश्रुति से जुड़े त्योहार मनाये जाते है | पूष माह की पूर्णिमा को यहाँ समूचे प्रदेश में  "छेरछेरा" का त्योहार पारम्परिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है , यह छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति और  ग्रामीण जनजीवन में सम्पन्नता और समानता में समन्वय की भावना को प्रकट करता है | "छेरछेरा ,माई कोठी के धान हेर हेरा " के सामुहिक घोष के साथ बच्चे-बड़े मनना आरंभ करते हैं इस त्योहार को मनाना । गाँव ही नहीं शहरी क्षेत्रों में भी मनाया जाता है यह त्योहार । समूचे देश में छत्तीसगढ़ को " धान का कटोरा " के नाम से जाना जाता है । Bowl of Rice( paddy ) .


   छत्तीसगढ़ में यह पर्व नई फसल के खलिहान से घर आ जाने के बाद मनाया जाता है। इस दौरान लोग घर-घर जाकर लोग धान जो इस प्रदेश की मुख्य फ़सल है , वह मुट्ठी भर माँगते हैं । जिसकी जितनी समाई होती होती है वह अपने द्वार आने वाले को उतना धान दान देता है । यहाँ यह दान सभी छोटे-बड़े , सभी वर्ग के लोग देते - लेते हैं । इसके पीछे की कथा रतनपुर के महाराजा कल्याण साय के इस दिन अपने राज्य वापस लौटने की खुशी से जुड़ी है । आठ वर्षों बाद महाराज दिल्ली से वापस अपनी राजधानी रतनपुर (अब बिलासपुर जिला में )लौटे थे , जिसकी खुशी में राज्य में धन-धान्य लुटाया गया था । राज कोष के अलावा प्रजा ने भी अपना धन-धान्य , कोठियों में रखा - जमा किया हुआ धान दान कर खुशी का इजहार किया था । इस सब को देखकर प्रसन्न हो कर महराज ने यह घोषणा की थी कि अब से हर वर्ष इसी तिथी को "छेरछेरा" पर्व मनाया जाएगा । तभी से प्रतिवर्ष यह त्योहार लोक परंपरा के अनुसार पौष माह की पूर्णिमा को  " छेरछेरा पुन्नी " के नाम से  मनाया जाता है। इस दिन सुबह से ही बच्चे, युवक व युवतियाँ हाथ में टोकरी, बोरी आदि लेकर घर-घर छेरछेरा माँगते हैं। वहीं युवकों की टोलियाँ डंडा नृत्य कर घर-घर पहुँचती हैं। धान मिंसाई हो जाने के चलते गाँव में घर-घर धान का भंडार होता है, जिसके चलते लोग छेर छेरा माँगने वालों को मुक्त हस्त दान देते हैं। इसी त्योहार में छत्तीसगढ़ के तमाम जमीदारों - दाऊ कहे जाने वाले सम्पन्न लोगों ने जरूरतमंदों - ब्राह्मणों को जमीन -जायदाद आदि भी दान दिया है । मंदिर-देवालय बनवाये हैं ।बहुत ही समृद्धशाली है छत्तीसगढ़ में छेरछेरा पुन्नी का इतिहास । इस दिन लोग इतने प्रसन्न बदन देखे जाते कि वे इस त्योहार के दिन कामकाज पूरी तरह बंद रहते हैं - पूरे दिन इस त्योहार की उमंग - तरंग में खोए रहते हैं । इस दिन लोग प्रायः गाँव छोड़कर बाहर नहीं जाते ।

जनवरी 14, 2011

मकर संक्रांति की शुभ कामनाएं - बधाईयाँ ।

 

दिसंबर 16, 2010

तंग आ चुके लोगों ने भिखारी को ही बनाया नेता


नेताओं के झूठे वायदों से तंग आ चुकी उत्तर प्रदेश के एक गाँव की जनता ने इनसे निपटने का एक अनोखा तरीका निकाला । उत्तरप्रदेश के शहावर शाह में की बात है जहाँ गांव के लोगों ने कोरे वादे करने वाले नेताओं को ठेंगा दिखाते हुए ऐसे नेताओं की बजाय एक भिखारी को अपना नेता चुनना कहीं ज्यादा अच्छा समझा और ऐसा कर दिखाया है । मजे की बात तो यह है कि  चुनाव जीतने के एक महीने बाद भी यह नया "नेता" भीख  ही मांग रहा है , लेकिन अब भीख अपने साथ-साथ जनता के लिए भी । इस गाँव के मतदाताओं को कुल आठ उम्मीदवारों में से एक का चयन करना था। लेकिन उन्होंने सभी को नकारते हुए 70 वर्षीय नारायण नट को अपना नेता चुना। यह नट पिछले 40 बरसों से गांव में भीख माँग रहा हैं । चुनाव लड़ने और जीतने के बाद वह कहता है कि उसने सपने में भी कभी ऐसा नहीं सोचा था कि नेतागिरी भी करनी पड़ेगी , उसका मानना है कि अब तो ग्राम विकास के लिए आगे भी  उसे भीख मांगना जारी रखना होगा । भीख में मिले सारे पैसों का उपयोग वह गांव के विकास के लिए करेगा । अभी तक  आजकल के नेता भिखारी कहे जाते थे अब भिखारी भी नेता हैं , धन्य है समय की लीला । आगे-आगे देखिए और क्या-क्या देखने-सुनने को मिलता है ।

दिसंबर 10, 2010

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है …


छत्तीसगढ़ की जनता का दर्द कुछ अनोखा ही है । जिस-जिस को और जब-जब यहाँ लोगों ने सर आँखों पे बिठाया, उसने चार दिन बाद उसी जनता से बड़ी ही ढ़िठाई से पूछा है - कि तू क्या है … ? और ठगी सी रह गई जनार्दन कही जाने वाली जनता । देश के परिप्रेक्ष्य में भी यही देखा - महसूस किया जा रहा है । जिसे भी हम अपना नेता चुनते वह नमक हलाल न होकर चंद दिनों में ही लाल हो कर दिखाता है ।हम सब इन दिनों नेता और अधिकारियों के "भ्रष्ट आचरण" से परेशान हैं । भारतीय नागरिक इन दिनों दोहरा दर्द झेल रहे हैं । बेकाबू - बेलगाम "मंहगाई" की मार समानान्तर चल ही रही है , ऊपर से एक के बाद एक नित्य नए "घोटालों" की खबर , वह भी करोड़ों - अरबों रुपयों की । ऐसी खबरों ने मानो आम लोगों का दर्द बढ़ा दिया है ।  पहला दर्द यह कि इन प्रतिस्पर्धी भ्रष्टाचार और घोटालों पर काबू करने वाला कोई दिखता नहीं है । दूसरा पकड़े जाने के बाद भी ऐसे अपराधी समाज में सिर उठाए घूम रहे हैं । सैर - सपाटे पर सपरिवार विदेशों की यात्राएं कर रहे हैं । नित्य नये बंगले - नई देशी-विदेशी कारें खरीद कर लोगों को चिढ़ाते खुली सड़कों पर मौज-मस्ती करते दिख रहे हैं । यह कहते भी नहीं शर्माते हैं कि अच्छा है सस्पेंड कर दिया , घूम घाम लें । लौटकर सब ठीक कर लेंगे , तब तक मामला भी ठण्ढ़ा पड़ जायेगा , लोग भूल जायेंगे । और हो भी यही रहा है। छत्तीसगढ़ में कुछ ज्यादा ही ,लेकिन लोग भूल नहीं रहे हैं बल्कि और अधिक आक्रोशित हैं ।  हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने आधा दर्जन बड़े अधिकारियों को  और उनके अपराधों को माफ़ कर दिया बिना इस बात की परवाह किये कि इसका जनमानस पर क्या असर होगा । मिर्जा गालिब की गज़ल की चंद वो लाईनें बरबस ही याद आतीं है कि - "हए एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है  ? तुम्ही कहो कि ये अंदाज - ए - गुफ़्तगु क्या है , रगों में दौड़ते फ़िरने के हम नहीं कायल , जब आँख ही से न टपका तो फ़िर लहू क्या है … " यहाँ कुछ इसी अंदाज में सरकार अपनी जनता को और जनता सरकार को यहाँ देख रही है । सरकार की  इसके पीछे छिपी सोच शायद यही होगी कि जनता का क्या है वह तो बिकाऊ है ,चुनाव के समय फ़िर खरीद लेंगे , उन्हीं के बीच से तमाम एजेंट भी हैं उसके पास । लेकिन  कहीं जनता को खुश करने की सोच में दोषी अधिकारियों को सजा दे दी , अधिकारियों को माफ़ नहीं किया तो हमारी पोल खुल जायेगी और हम मुसीबत में पड़ जायेंगे । इन्हें सब मालूम ही नहीं है बल्कि सारी फ़ाईलें भी इन्हीं अधिकारियों के बस्तों में रहती है । इन्हें माफ़ करना जरूरी है , जनता का क्या ? वह मरती रहेगी सड़क , पानी, बिजली, मंहगाई , स्कूल अस्पताल और राशन-पानी के बोझ तले , मरने दो । छत्तीसगढ़ पिछले दस सालों से  इसे लूटने वालों की नजर में आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है । दिल्ली , कोलकता ,  हरियाणा , जयपुर , जोधपुर , ओड़िसा काटाभांजी , मुम्बई नागपुर और न जाने कहाँ-कहाँ से बड़े व्यापारी यहाँ आकर सत्त्ता के गलियारों से चिपके हैं ,सारा कामकाज सम्हाल रहे हैं । भ्रष्टाचार का आलम यहाँ यह है कि इनमें से कोई भी हजारों करोड़ रुपयों से नीचे की सम्पत्ति की बात नहीं करता है । मुख्यमंत्री बनने का सपने देख रहा एक मंत्री (भाईबंद सहित)और कांग्रेस के आधा दर्जन पूर्व मंत्री - विधायक जमीन के कारोबार में खुलेआम गुण्डागर्दी करते देखे-सुने जा सकते हैं । तमाम एन जी ओ अधिकारियों की गिरफ़्त में हैं , लेकिन इनके विरूद्ध कार्यवाही तो दूर कोई मुँह खोलने की हिम्मत नहीं कर रहा है । सत्तारूढ़ भाजपा का काँग्रेस के साथ इस मसले पर मानो खुल्लमखुल्ला गढ़बंधन जैसा है । यहाँ इस सफ़लता का श्रेय भाजपा को देना ही पड़ेगा ,जिसने काँग्रेस को उसके साथ प्रेम संबंध बनाने मजबूर कर दिया और आज यहाँ दोनो को फ़ील गुड है अब ऐसे में यदि यहाँ करप्शन का ग्राफ़ बढ़ता है,तो बढ़ने दो , फ़िर भला अधिकारी इस बहती गंगा में हाँथ धोने से क्यों चूकें ? बिहार का सोफ़ेस्टिकैटेड स्वरूप निर्मित किया है जमीन दलालों-लुटेरों ने यहाँ । सरकार भी सब कामकाज भूल कर बिल्डर की भूमिका में देखी जा रही है , जबरिया लोगों की जमीनें लेकर मकान, दुकान, मल्टिप्लेक्स, मॉल ,रेसिडेंसियल सिटीस बनाने में मस्त है। यदि आपके पास भी ऐसा कुछ करने का माद्दा है आईये छत्तीसगढ़ , आपका भी स्वागत है इस सरकार के रहते रहते आप भी लूट जाइये इस प्रदेश को । भोले-भाले आदिवासियों और  सीधे-साधे छत्तीसगढ़ियों का  राज्य है यह ।

विध्वंस के इस युग में भी इन हांथों ने केवल सृजन करना ही सीखा है ।

विध्वंस के इस युग में भी इन हांथों ने केवल सृजन करना ही सीखा है ।

दिसंबर 07, 2010

फ़िर आ गया खाना फ़ेंकने का समय , कृपया इसे रोकने का प्रयास करें


दोस्तों शादीयों का सीजन आ गया । हम आप बहुत सी शादीयाँ अटेंड करेंगे । पार्टियाँ अटेंड करेंगे और देखेंगे कि कैसे लोग असत्तियों की तरह गिरते तक लबलबा कर अपनी खाने की प्लेट भरेंगे ,जैसे कि पहली बार पार्टी का खाना खा रहे हैं या फ़िर उन्हें दुबारा कोई खाना लेने से रोकेगा या खाना ही खत्म हो जायेगा । और शायद इसी डर से वे लोग अपनी - अपनी खानें की प्लेटें इतनी भर  लेंगे कि उसे खा भी नहीं पायेंगे और बेझिझक बड़ी बेशर्मी के साथ बचा हुआ खाना ड्स्टबीन में डाल कर चलते बनेंगे ।
सच मानिये भारतीय विवाह वस्तुत: अब पारिवारिक आयोजन न रहकर सामाजिक एवं आर्थिक हैसियत और पारिवारिक शक्ति प्रदर्शन का भौण्डा हथियार बन गये हैं। यही कारण है कि वे सार्वजनिक मेलों की तरह आयोजित होते हैं । विवाह स्थल पर लोग एक दूसरे को धक्का देकर खाना खाते हैं। समारोह स्थल पर थर्मोकोल और प्लास्टिक के गिलासों के पहाड़ बन जाते हैं। हर आदमी थाली में बड़ी मात्रा में झूठन छोड़ता है।
एवरेज हजार लोगों की पार्टी में लगभग 250 - 300 लोगों के खाने लायक का खाना बेकार कर यूं ही फ़ेंका जाता है । यह हम सभी आये दिन शादी - पार्टियों मे देखते हैं । अन्न की इस बरबादी को कैसे रोका जा सकता है , हम सब को मिलकर ही सोचना होगा । समझना ही होगा कि हम सब मे से ही बहुतों से यह गलती होती है । अन्न की ही तरह पानी की भी बरबादी को भी समझबूझ कर रोकना होगा । इस जरूरत को प्राथमिकता के आधार पर समझना होगा । कैसे इस सवाल का जवाब भी अपने आपसे ही पूछ्ना और अपनी  आवाज सुन कर समझना होगा । क्या हम अपने आप को , अपने मित्रों को , अपने रिश्तेदारों को इस दिशा में सहयोग देने की समझाईस दे सकते हैं ?

नवंबर 16, 2010

ईद मुबारक

ईद-उल-जुहा (बकरीद) इस्लाम धर्म में विश्वास करने वालों का एक प्रमुख त्यौहार है। रमजान के पवित्र महीने की समाप्ति के लगभग 70 दिनों बाद इसे मनाया जाता है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार इब्राहिम अपने प्रिय पुत्र को इसी दिन खुदा की राह में कुर्बान करने जा रहे थे, यह  उन्की परीक्षा थी जिस खरे उतरने के बाद अल्लाह ने उसके पुत्र को जीवनदान दिया । जिसकी याद में यह पर्व मनाया जाता है। मुबारकबाद कबूल करें ।

नवंबर 11, 2010

ठहरो , जरा रुको ; अभी मेरे शहर का विकास चल रहा है…


जी हाँ ,मेरा शहर अभी विकास के दौर से गुजर रहा है । यहाँ आसपास के हर खेत-खलिहान पाटे जा रहे हैं , शहर की हर झोपडी तोड़ी जा रही है , छोटे - छोटे बाजार उजाडे जा रहे हैं ,यहाँ खड़े होंगे बडे बाज़ार , बडे-बडे मकान जो शहर के विकास के साक्षी बनेंगे । न रहेगा कोई गरीब  ना रहेगी गरीबी मेरे इस शहर में । गरीब और गरीबी को हमेशा हमेशा के लिए हटा कर एक सुन्दर सा शहर सिंगापुर - बैंकाक जैसा शहर बनायेंगे इसे राज्य के आई ए एस  अधिकारी और नेता मेरे शहर को । भा ज पा का शासन है लिहाजा संस्कृति की रक्षा होगी , हर गली मोहल्ले का नाम बदल जाएगा । हर गली-चौराहे में कमल ही कमल खिलेगा । जगह जगह बस कमल विहार ही बनेगा । हर जगह जहाँ कहीं भी झोपड़ियाँ दिखेंगी तोड़ दी जाएंगी । उस जगह खिलेगा कमल । मुझे शर्म नहीं, गर्व है अपनी सरकारों पर , अपने प्रशासनिक अधिकारियों - नेताओं पर कि आज मेरे शहर का नाम सारा देश जानता है - कभी गंदगी के लिए तो कभी मंहगाई के लिए ,नेता और अधिकारियों की बेशुमार कमाई के लिए । कलकत्ता और मारवाड़ के बैंकों से लूट कर लाई गई मलाई के लिए । इटली ,मलेशिया , सिंगापुर , उड़ीसा , महाराष्ट्र और राजस्थान में लगाई गई छत्तीसगढ़ की गाढ़ी कमाई के लिए ।  ठहरो , जरा रुको । अभी मेरे शहर का विकास चल रहा है । मीडिया इस पर फ़िनीशिंग की मुहर लगा रहा है । नेता - अधिकारी बताते हैं -गरीब लुट रहे हैं - बर्बाद हो रहें हैं तो यह नीयति ही है उनकी । हम तो दे रहे हैं न दो - तीन रुपये में  चाँवल -सस्ती शराब , और क्या चाहता है यह गरीब ? हजारों रुपये दे रहे हैं न इसे ,इसकी जमीन के , खोल रहे हैं न इसकी जमीन पर कारखानें - खदानें , बना रहे हैं न इनकी खेतिहर बेकार जमीनों पर सुन्दर-सुन्दर मकान और दुकानें और क्या चाहिये इस 'गरीब' को ? देखिएगा देखते जाइयेगा इक दिन ऐसा भी आयेगा जब मेरे शहर को कोई भी न पहचान पाएगा , जगह-जगह जब वह नई -नई बुलंद ईमारतें ही पाएगा , चक्कर खाकर गिर जायेगा । और मेरा शहर विकसित हो जाएगा । ईमारतों की फ़सल यहाँ लहलहाएगी , गरीब और गरीबी कोषों दूर तक भी नजर नहीं आएगी । सच्चे भारत का सपना यहीं से साकार होगा , अन्य प्रदेशों का यह प्रदेश मॉडल आधार होगा । सच पूछें तो शायद ऐसे ही इस देश का उद्धार होगा । गांधी जी का सपना साकार होगा । गरीबी और गरीबों से रहित नव भारत का निर्माण होगा  - छत्तीसगढ़ इसका द्वार होगा ।

नवंबर 09, 2010

दीपावली

दीपावली का त्यौहार सभी ने मना लिया ,बधाइयाँ  । मुझे ऐसा प्रतीत हुआ इस वर्ष की दीपावली गत वर्ष की अपेक्षा कुछ ज्यादा इको फ़्रेण्डली रही । आतिश बाजी भी अपेक्षाकृत कम हुई , हरे-हरे केले के पेड़ो को काटा तो गया लेकिन खरीददारों ने तरजीह नहीं दी ,तभी जगह-जगह जहाँ से बिकते थे वहाँ ही बिना बिके पडे देखे गये। नकली खोये के भय ने भी अपना  काम किया ,घरों में बेसन-आटे की मिठाइयाँ -घर के बने नमकीन ज्यादा दिखे । बच्चों ने भी अपेक्षाकृत बडे बम कम ही फ़ोडे , आकाशिय फ़टाके कहीं ज्यादा चलाये । घरेलू सजावट में भी चायनिज रंगीन  बल्बों का अधिक्ता में प्रयोग किया गया हो ऐसा भी कहीं नहीं दिखा । अच्छा है जागरुकता आए । लेकिन वहीं दूसरी ओर शहर के हर बडे अखबारों ने जिन्होंने ढ़ेरों विज्ञापन पूरे हफ़्ते भर छापे थे उन्हें शायद मजबूरी में यह बताना पडा अपनी रिपोर्ट में कि राजधानी में करोड़ों का बर्तन , सोना-चाँदी , कपड़ा , आटोमोबाईल , फ़टाका बिका । बाज़ार बूम रहा । ये बाज़ार को बूम बताने वाले आंकड़े भी हर एक ने अपने-अपने ढ़ंग  से बताए ।  ऐसी रिपोर्ट को लेकर बाज़ार में तरह - तरह की चर्चाएं होतीं रहीं , खुद अधिकांश व्यवसायी हतप्रभ थे ।         संक्षेप में कुछ ऐसी रही इस बार की दीपावली ।

नवंबर 04, 2010

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं


                        


 
आईये एक - एक दीप जलाएं , अंध तमस भगाएं । उजियारा फ़ैलाएं ।                                                                            पूजा मुहूर्त  - शाम 06 : 46 से  रात्रि 08 : 10 के मध्य

अक्टूबर 30, 2010

नन्हें हांथों का कमाल …

दिवाली आई  दिवाली आई ,                                          मेरी नन्हीं बिटिया अकुलाई ,                                 उसके नन्हें हांथों ने आंगन में देखो                                      एक सुन्दर सी है रंगोली सजाई ।                                                                                                                                                    

अक्टूबर 27, 2010

राज्योत्सव 2010 : नेताओं का सपरिवार आनंद मेला

ये सारे नेता गर्व महसूस कर रहे हैं , दबंग अभिनेता सलमान खान का सम्मान करते हुए , और  सलमान हैं कि  यहाँ  इस  उदघाटन  के कार्यक्रम में बमुश्किल 5 मिनट रुके और वापस उड़ लिए अपने उद्योगपति दोस्त के साथ ।
छत्तीसगढ़ राज्य के दस साल पूरे होने पर रायपुर के साइंस कालेज मैदान में मंगलवार को राज्योत्सव की रंगारंग शुरुआत हुई। महोत्सव का शुभारंभ करते हुए राज्यपाल शेखर दत्त ने कहा कि इन दस सालों में राज्य ने काफी तरक्की की है। खनिज संसाधनों के साथ ही उद्योगों का भी विकास हुआ है। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने दस सालों की विकास यात्रा को गौरवशाली बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षो में प्रदेश का नागरिक हर क्षेत्र में तरक्की करेगा। समारोह के पहले दिन अभिनेता सलमान खान की मौजूदगी खास रही। इसके अलावा झारखंड के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल भी मौजूद थे। इस मौके पर संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने राज्य की सांस्कृति विरासतों व धरोहरों का गुणगान किया।
नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे ने कहा कि उत्तराखंड, झारखंड व छत्तीसगढ़ तीनों ही राज्य एक साथ बने हैं और तीनों ही राज्य उन्नति कर रहे हैं।  

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छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण को  01 नवम्बर 2010 को  दस बरस पूरे हो जायेंगे । हर बरस इस खुशी में हमारे प्रदेश में एक बडे मेले का आयोजन किया जाता है जिसे  'राज्योत्सव' का नाम दिया गया है । इस मेले में शासन  गरीबों की गाढ़ी कमाई में से करोड़ो रुपये फ़ूंकता है , मुम्बई ने नामी-गिरामी नाचने-गाने वाले आते हैं और मंत्रियों- बडे अधिकारियों , बडे व्यापारियों , इनके परिजनों  के मनोरंजन का सार्वजनिक इंतजाम किया जाता है । ये वी वी आई पी बन कर सोफ़ा सेट पर बैठ कार्यक्रमों का मजा लेते हैं , और प्रदेश की गरीब जनता - युवा , महिला-पुरुष पीछे दूर खड़े तमाशा देखते रहते हैं ।   बीच-बीच में पुलिस आकर इनपर अपना रोब दाब दिखा कर व्यवस्था बनाती दिखती है । पूरे सात दिनों तक चलने वाले इस कार्यक्रम को गौर से देखें तो बर्बस ही अंग्रेजों की याद आ जाती है । छत्तीसगढ़ियों को दर किनार कर उन्हे पीछे  धकेल कर सातों दिन कार्यक्रम का पूरा मजा लूटते हैं  -राज्य शासन के  मंत्री- बडे अधिकारी , बडे व्यापारी , और इनके परिजन - चाहने वाले । संक्षेप में यही है    छत्तीसगढ़ का  'राज्योत्सव' । सरकारी खर्चे पर बडे लोगों का आनंद मेला । पूरे सात दिनों तक और बाद में भी चापलूस इसकी भी जय जयकार करते देखे जायेंगे।   जिसकी इस वर्ष शुरुवात 26अक्टूबर की शाम हो गई है  यह उत्सव एक नबम्बर तक चलेगा ।                               शायद आप यह भी जानना चाहेंगे कि क्या है -                                              





                                                                                                                                         

अक्टूबर 22, 2010

ऐसा होता क्यों है … ?


बहुत दिनों से एक बात दिमाग में कौंधती रही है कि किसी भी शादी में वर-वधु दोनो ही पक्ष बेहद खुश रहते हैं । खुशी-खुशी शादी होती है । सर्वाधिक खुशी माँ-बाप को होती है । खुशी का यह शायद अतिरेक का सा होता है जो अधिकांशतः बाद में कायम नहीं रह पाता , और तरह-तरह की कहानियाँ बनती हैं , माँ-बाप ही बाद में बेहद दुख का शिकार होते हैं । दुखद पक्ष देखने सुनने में आते हैं । अधिकांश बातें कोर्ट-कचहरी तक पहुंच जाती हैं । आपसी समझ , प्रेम , मान-मर्यादा , धैर्य, त्याग इन सब बातों की जगह स्वार्थ और वैमनस्य-प्रतिशोध का भाव ले लेता है ।यह मानवीय स्वभाव समझ से परे हो गया , आखिर ऐसा क्यों होता है ? अखबार ऐसी खबरों से रंगे रहते हैं क्यों ??? क्या आप बता पायेंगे ?

अक्टूबर 20, 2010

आदमी


एक मित्र की दुकान में रुक कर उसका हालचाल जानना चाहा , इसी बीच एक ग्राहक ने दुकान में आकर शैम्पू देने को कहा , मित्र ने ग्राहक से ब्राण्ड और क्वांटिटी पूछी । खरीददार ने उल्टा पूछा अच्छा क्या रहेगा । मित्र ने  उसे समझाना शुरु किया देखिए यदि आप शैम्पू का शैशे लेते हैं तो  उतनी ही मात्रा आपको आधी कीमत पर मिल सकती है यानि कि 100 एम एल के 30 शैशे आपको 28 रुपये मे मिलेंगे , और इतनी ही मात्रा इसी कम्पनी की आप यदि बॉटल पैक लेते हैं तो 45 रुपये ,दूसरी कम्पनियों के लगभग 60 में आएंगे ,बोलिए क्या दूं । उस समझदार आदमी ने  बिना देर किये शैम्पू की बॉटल खरीदी और कारण समझाया कि दरअसल शैशे तो उसकी कामवाली बाई भी लेती है न , फ़िर वह भी वही ले , अच्छा नहीं लगता ।

अक्टूबर 16, 2010

विजयादशमी की शुभ कामनाएं - बहुत बहुत बधाईयाँ

भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को विजयादशमी के नाम से जाना जाता है।  दशहरा अथवा विजयादशमी राम की विजय के रूप में मनाया जाए अथवा दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा का पर्व है। दशहरा का पर्व दस प्रकार के पापों- काम, क्रोध, लोभ, मोह मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी के परित्याग की सद्प्रेरणा प्रदान करता है। वर्तमान संदर्भ में चिंता का विषय यह है कि प्रति वर्ष धन पिशाचों के बल पर रावण के पुतले का कद बढ़ रहा है और रावण का कद बढ़ाने में जुटे धन पिशाचों को उनके इस कृत्य पर गर्व भी है ।
                                   बुराईयों पर विजय पाईये 
                                     आईये विजयादशमी के शुभ अवसर 
                                        पर मिठाईयाँ - पान खाईये ।
                                                                                                                                                                                         शुभ कामनाएं

सितंबर 30, 2010

मेल कराती मधुशाला …।

महानायक अमिताभ बच्चन ने आज दोपहर ट्विटर पर लिखा है - 1935 में उनके पिता द्वारा रचित 'मधुशाला'   आज 75 वर्षों बाद भी सामयिक है   -                                                           मुसलमान और हिन्दू हैं दो , एक मगर उनका प्याला ,
एक मगर उनका मदिरालय , एक मगर उनकी हाला .
दोनों रहेते एक न जब तक , मंदिर मस्जिद में जाते ,
बैर बढ़ाते मंदिर मस्जिद , मेल कराती मधुशाला !

सितंबर 29, 2010

ईश्वर अल्लाह तेरो नाम सबको सन्मति दे भगवान …

                           ईश्वर अल्लाह तेरो नाम  सबको सन्मति दे भगवान

सितंबर 27, 2010

शायद सस्ती है जवानों की जान छत्तीसगढ़ में

हमारा छत्तीसगढ़ समूचे देश में ही नहीं , पूरी दुनियाँ में  नक्सलवाद  से घिरा प्रदेश माना जाता है । आये दिन यहाँ नक्सल आतंक देखने-सुनने को मिलता है । हमारे अफ़सर - नेता राजधानी में बैठ कर इस पर नियंत्रण पाने की कवायत करते हैं । बीते रविवार 19 सितम्बर को नक्सल प्रभावित बीजापु्र क्षेत्र के भद्रापाली थाने में पदस्थ सात जवानों को नक्सलियों ने भोपालपटनम से भद्रापाली के बीच अगवा कर लिया । इसी जंगल में तीन शव भी मिले ,जिनकी शिनाख्त नहीं हो पाई । इन जवानों की रिहाई के बदले नक्सली कुछ शर्तें रख रहें हैं जो केवल सरकारी नुमाइंदें जानते हैं । यह पूरा प्रकरण ठीक बिहार में हुई घटना की मानो पुनरावृति है । अंतर केवल इतना है कि तब झारखण्ड में शासन-प्रशासन और वहाँ के आम लोगों की इस प्रकरण पर चिंता समुचा देश-विदेश देख-सुन रहा था , सब इसी कोशिश में थे कि जवानों की हर हाल में रिहाई हो । एक मंत्री को नक्सलियों से चर्चा करने भेजा गया और अंततः अपहृत पुलिस जवानों की रिहाई हुई भी , लेकिन ऐसा कुछ क्या उसका दस फ़ीसदी प्रयास हमारे यहाँ होता हुआ न तो आप देख पा रहे हैं और ना ही सुन सकते हैं । हमारे नेता - अधिकारी एक उपचुनाव में व्यस्त हैं , दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों की मानों प्रतिष्ठा दांव पर लगी है भटगाँव के उपचुनाव में । अभी फ़ालतु कामों के लिए किसी को फ़ुर्सत कहाँ है ? मीडिया के भी मानों हाँथ बधें है । विज्ञापनों का बंधन उनकी भी चीखने-चिल्लाने की - छापने की सीमा तय करता है । जो अच्छा लिखने के लिए कभी सराहे गये वैसे लोगों ने अपने आप को सरकारी उपक्रमों में एक अदना सा किन्तु उनके लिए शायद अदद सा पद पाने के लिए गिरवी रख दिया । कौन कहे-सुने ? किसके लिए ? कोई मंत्री -विधायक य आला अधिकारी का भाई य बच्चा हो तो फ़िर बात कुछ और हो , ये बेचारे ठहरे गरीब-बेरोजगार ,जरूरतमंद परिवार के बच्चे जो पुलिस में भर्ती होकर अपने प्राणों की आहूति देने ही आते हैं नेताओं के लिए । नक्सली भी ऐसे कमजोर लोगों को पकड कर अपनी बहादुरी का परिचय देते शर्म नहीं महसूस करते । हमारे छत्तीसगढ़ में कौन लड़ेगा इन बेचारों के लिए ?   मुखयमंत्री जी ने एकाध चैनल वालों को पूछे जाने पर कह दिया है कि उनके अधिकारी कोशिश कर रहे हैं , बस । और भला वे कर भी क्या सकते हैं ? सच ही तो कहा है मुखयमंत्री  ने, यहाँ जो भी करते हैं कुछ एक श्रीमान अधिकारी गण ही तो करते हैं । यहाँ के लोग मानो लचार हैं । नियती है जो हो रहा है होने दो , हम क्या करें ?  दूसरी ओर अपहृत जवानों के परिजनों के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं । इनकी सुध लेने वाला भी यहाँ कोई नहीं है । ये तो हाल है मेरे प्रगतिशील - समृद्धशाली प्रदेश का , जहाँ सबको अपनी-अपनी समृद्धि पर गर्व है । देश-दुनियाँ को भरमाने नित्य नए पैंतरेबाजी वाले विज्ञापन छापे- छपवाये जाते हैं और छापने वाले सब कुछ जानसमझ कर भी चुप रहने का वादा निभाते हैं ।

फ़िल्म दिल्ली 6 का गाना 'सास गारी देवे' - ओरिजनल गाना यहाँ सुनिए…

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